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जेल जर्नलिज्म - 2

मनीष दुबे

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2021
पृष्ठ :144
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 15508
आईएसबीएन :978-1-61301-677-0

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कैदी जीवन की रोचक गाथा का दूसरा भाग

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पुस्तक के अंश

 

"कस्टडी में लो इसे"...जज ने अमर की तरफ इशारा करते हुए कहा। एकाएक ये क्या हुआ... काटो तो खून नहीं, अमर के पैरों तले जमीन ही दरक चुकी थी।

"सर ये क्या कह रहे हैं आप" .. अमर ने जज से पूछा?

"दोषी करार दिया है तुमको" ..जज ने कहा उससे।

अब क्या होगा? ...अंधेरा सा छा गया अमर की आंखों के आगे। कानून के ऐसे अंधेपन का जरा भी अंदाजा नहीं था उसे। खुद के निरपराध, बेगुनाह होने के बावजूद भी कानून द्वारा सजा दिये जाने की उम्मीद तो कतई ही न थी उसे। कतई उम्मीद न थी उसे कि कानून के ये बुलडाग भी, पूरी तरह धृतराष्ट्र हो चुके हैं। चाहते तो बहुत कुछ अगड़े पिछड़े सबूत थे उसकी बेगुनाही के, पर क्यों जहमत ही करते। उक्त धरती के भगवानों ने दण्ड पेल दिया, सो पेल ही दिया। खूब मिन्नतें कीं अमर ने जज से, पर कहीं कोई सुनवाई नहीं हुई। आनन फानन में जज ने आखिरी इच्छा के तौर पर घर एक फोन कराने को कहा।

"…कर ले यार तू फोन जितने मर्जी कर ले..." रोते हुए अमर को सिपाही नवीन खत्रीने बाहर लाकर अपना फोन देते हुए कहा। सिपाही नवीन जो उसकी आती-जाती तारीखों में कुछ बहुत हिल-मिल गया था उससे ...तरस खाकर कई फोन करवाये उसे। अपने बड़े भाई व पत्नी रमा से भी रोते हुये ही बात की थी उसने। रोने ही लगी थी रमा भी उसे रोता हुआ पाकर। अमर ने रमा को आखिरी बार बेटी तथा सबका ख्याल रखने की कहकर फोन काट दिया।

रोते हुए ही आखिरी बार उसने गुटखा फाड़ कर खाया, जो हर ताऱीख में छुपाकर कोर्ट ले जाया करता था। उसका बैग व दोनों फोन कोर्ट में ही जमा करवा लिये गये। सिपाही नवीन उसे खारजे में जमाकर, वापस जा चुका था। थोड़ी देर के इंतजार बाद उसे तिहाड़ जेल भेज दिया गया। कैसे रोते-गाते बीता था वो साल 2012, अब फिर से झेल दिया गया था उसे। पर इस बार का गम और तकलीफ कहीं अधिक बड़ी थी, जो सिंगल न होकर चौतरफा थी। एक बीवी, दूसरी अबोध बेटी तथा तीसरा वो खुद। चौथा, फिर से माँ-बाप की पिसन। कैसे आखिर बीतेगा इस बार का ये उसका समय, और कितना टाईम होगा इसका?

इस सबके बीच आज वो खुद को भी कोस रहा था, कि इन तीन बीते सालों में उसने कुछ भी न किया, अपने केस को लेकर। खुद में ही ढीला पड़ गया था वो, उम्मीद भी तो नहीं थी कदाचित उसे इस टाईप की। अन्यथा जिस दिन की घटना थी उस दिन वो लखनऊ में था, चाहता तो मोबाइल की कॉल डिटेल अथवा कुछ अन्य संसाधन जुटा सकता था। जमानत पर छूटने के बाद फिर से घर परिवार मौज मस्ती में डूब गया। शादी हुई बीवी बच्ची की आकृष्टता में ध्यान ही न गया उसका केस की पेंचीदगी की तरफ।

सजा का दूसरा कारण अमर का वकील गोयल विंकल भी रहा। धूर्त, उच्च दर्जे का कीचड़ में लोटा हुआ, पक्का मादर-फादर निकला वो। अमर पर लगे दो मुकदमों में से एक जमानत के बाद पड़ी कुछ तारीखों के उपरान्त 2014 में बरी हो चुका था। पुलिस का खड़ा गवाह अपना जमीर जगाकर टूट गया, बरी तो होना ही था। पर इसमें भी हद है देश का कानून कि मामला खतम होने के बाद भी कई साल तारीखें भुगतवाते रहे थे उसे।

खैर, वकील ने दिमाग लगाया होगा कि यार ये इतनी दूर की मुर्गी है। हर बार अण्डा आ कर देती है। तारीख भुगतने के पहले ही। केस खतम आदमी खतम क्यों न इसे यों ही उलझाये रहो, और धन ऐंठते रहो। कोई भी कागज या एप्लीकेशन देनी-लगानी हो तो 2 हजार उसकी अपनी पेशगीथी। प्रति तारीख खड़े होने की 3 हजार रूपये पेमेन्ट थी उसकी।

जाने कौन सा राम जेठमलानी केगुप्तांग का बाल पर्स में लेकर घूमता था".. जो इतना लेता था। रूपये देने के बाद भीसही ढ़ंग से पैरवी ही नहीं की थी उसने। फलस्वरूप तथाकथित यमराज सरीखे जज ने उसे 7 साल की सजा दे दी। चाहता भी तो यही था वकील गोयल विंकल, उसने सोचा फंसेगा तो छुड़वाने के लिए मामला मेंरे पास ही आना है। फिर से अपनी जेब का जुगाड़ मोटा होगा। जुगाड़ दर जुगाड़ के फेर मेंउसने अमर के ‘पिछवाड़े प्याज कटवा दिया।'

आज फिर से उसके आगे किसी थिएटर के सीन की तरह सारा दृश्य घूम रहा था, कि कैसे घर से रात को निकलता। सुबह दिल्ली में तारीख निपटाकर दोपहर फिर वापस। रात दो ढाई बजे घर वापसी हो पाती। सुबह उठकर फिर अपने काम में मसरूफ हो जाता। आने जाने के बीच इतना भी टाईम न मिलता कि अपने वकील से केस की डिस्कस तक कर ले। जिसका फायदा उठाया था उसने। ऊपर से नीचे तक के सभी छेदों में डण्डा कर के रखना चाहिये था वकील के। जो अमर करने में नाकाम रहा। तो दूसरा रास्ता था सभी पी.पी. पैरोकार, पेशकार, कम्प्यूटरकार, पत्तेचार, पोतेचार कोचढ़ावा चढ़ाता रहता, तो हो सकता था गैरत की गौरत हो जाती उस पर। खूब कहा था उसने जज को खूब दुहाईयाँ दीं।

‘साहब मेरी एक छोटी सी बेटी है’उसे उसके भविष्य की भीख दे दो, पर लंका लगा ही दी उसने।भगवान करे फॉलिज मार जाए उसे। अब हो भी क्या सकता था, उसे जहाँ भेजना था भेज ही दिया था इन कूतियाओं ने।

यहाँ आकर इस बार राहत ये रही कि काम नहीं करना पड़ा था उसे। अन्दर के भाईयों ने इस बार एण्ट्री मारते ही कदम दर कदम साथ दिया। अन्दर के भाइयों का भयत्व बड़ा ही कारगर रहता है यहाँ। दूसरे दिन यहाँ से रिपीटर वार्ड भेजा गया उसे। तिहाड़ जेल नम्बर 8/9, जहाँ इस बार उसके पहुँचने से पहले ही उसकी सिफारिश पहुँच चुकी थी। बैरक के अन्दर दो चार मुँहनुचवों ने उसका इन्टरव्यू करना भी चाहा, पर भाई की सिफारिश सुनकर ठस्सा खा गये सभी। अपना फट्टा बिछवाया गया, पीने के लिये कॉफी भिजवाई गई"विदाऊट कॉफी विद करन"मन बार-बार भाईयों को धन्यवाद दिये जा रहा था, वर्ना तोकैदी होने के बावजूद बार-बार झाड़ू पोंछेसे कंपायमान हो रहा था अमर का। ठंड भी सही वाली पड़ रही थी। काम से बचने की पेशगी यहाँ गाँधी-थान की होती है। घड़ी की टिकटिक के साथ समय और दिन फिर बीतने लगा।

घर और घर वालों से दूर होने का कष्ट तथा उनकी दूरी का दर्द अमर की जिंदगी में दो तरफा काँटे की तरह चुभ रहा था। सबसे अधिक तकलीफ उसे उसकी अबोध बेटी की यादें दे रहीं थीं। जो उम्र के मुताबिक अपनी माँ के बाद अपने पापा को ही पुकारती थी। जो अपनी साढ़े आठ महीने की उम्र में सबसे ज्यादा कांसन्ट्रेट पा...पा...बोलने में ही लगाती थी। कितना बड़ा और डबल बड़ा जख्म दिया था उसे इस बार के धृतराष्ट्रों ने। तभी तो आजकल दोनों टाइम की प्रार्थनाओं के बाद भारत माता की जय फिर कानून मुर्दाबाद बोलना नहीं भूलता था वो।

यहाँ जेल में एक बात का बड़ा आश्चर्य होता था उसे, कि इण्डिया की इन जेलों में भारतीय कैदियों, बंदियों का सम्मान तथा तिरस्कार भी पैसों के बूते-अनबूते होता है। वहीं फॉरनर क्रिमिनल यानी हब्शी या अन्य कोई विदेशी, बड़े ठाठ से यहाँ रहते हैं, बेरोक-टोक। जो अपनी ही चलाते हैं, ना जाने इन्हें क्यों वीआईपी ट्रीटमेंट दिया जाता है..और वहीं हम पर जानवरों सा नियम-कानून होने का दावा किया जाता है इनकी तरफ से। आखिर क्यों ये हमारे लोग हमारे से भेदभाव करते हैं? याफिर कहीं हम इन्हें घर की मुर्गी दाल बराबर लगते दिखते हों।

या फिर ऐसा भी हो सकता है कि ब्राउन शुगर, हेरोइन, स्मैक इत्यादि मादक पदार्थों की तस्करी-सप्लाई वो भी इन्टरनेशनल लेबल पर छोटा अपराध हो।क्या पता इनसे अन्तर्राष्ट्रीय दबाव रहता हो, हमारी सरकारों की सामरिक रोटियाँ सेंक कर खाने वालों की हाँडी फटती भी रहती हो सकती है। इस टाइप के कण्डुए कानून की...जय हो। एशिया की सबसे बड़ी व अतिसुरक्षित जेलों में शुमार तिहाड़, जिसमें अति भृष्ट सिस्टम अपनी जड़ें पसारे हुए नालियों की तरह बजबजा रहा है। बिल्कुल माइनस रेटिंग वाला"धरती का जीता जागता नर्क..तिहाड़..।“

वैसे एक बात है, कानून तो अति बदतर है, उससे भी बड़ी बात इसमें सुधार की माँग या इस टाइप की उम्मीद भी बेमानी ही लगती है। अदरवाइज लोअर कोर्ट जो भी सजा देता है, जैसे अभी अमर को 7 साल की है, किसी को 10, किसी को लाइफ देते हैं। ऊपर की बेंच (हाईकोर्ट) में वो मामला टूट, छूट या कम हो जाता है। जाँच में सजा नाजायज देखी जाती है, तो नीचे आँखों वाले अन्धों के लिए कोई टाइट नियमन (प्रोवीजन) गिफ्ट होना चाहिए। डिमोशन या अन्य किसी प्रकार की सजा का प्रावधान होना चाहिए, और लाजिमी भी है। जरूरी भी है कि आखिर किस आधार पर आपने ये सजा दी है।

कोई भी जज दोषी की पूरी चार्जशीट या केस ढंग से स्टडी ही नहीं करता। बहस के दौरान जज महोदय दूसरे कार्यों में बिजी रहते हैं। सरसरी निगाह से स्टेनोग्राफर द्वारा टाइप की जा रही सामग्री कम्प्यूटर स्क्रीन में देखते रहते हैं। तभी तो लोग पी.पी, आई.ओ, पैरोकार, पेशकारों आदि तमाम सरकारी चिंटुओं को अपनी तरफ सरका लेते हैं, तथा केस को हल्का या बरी कराने में सफल भी रहते हैं। पैसे की ही दम पर दोषी...बेकसूर और बेकसूर सजा का भागीदार बन जाता है।

जज साब अक्सर अपने पीपी तथा लगुओं, भगुओं, चिलांटुओं की बातों पर विश्वास-अविश्वास करते लगते हैं। और फैसला सुना डालते हैं, जय हो आपकी धूर्त धृतराष्ट्रों। कम से कम महाभारत की तर्ज पर ही सही एक संजय नामक जीव की नियुक्ति भी करवा लो अपने डिपार्टमेंन्टों में। जो अपनी दूरदृष्टि नामक लाइव प्रसारण सुविधा से देख दिया करे कि गुनाह कब, कहाँ, किसने किया है। ये था कि नहीं, था तो कौन था और तुम बने रहो धृतराष्ट्र, जन्मांध बाँधे रहो पट्टी। खाते रहो पैसा, पर सरकार.. दुहाई है कि किसी बेगुनाह को गुनहगार बनने पर मजबूर तो मत करो।

जज महोदय आपने तो सजा दे दी, सजा पाने वाला इतनी लम्बी जेल काटता है, मन कुण्ठित होता है कि यार खाँमखाँ बिना कुछ किये ही सजा पा गया, इससे अच्छा तो किसी को निपटा देता या कोई मोटी लूट ही कर लेता। कम से कम सुकून तो रहता, सजा काटने का कष्ट तो न रहता। सारे अपराधी क्रिमिनल अनपढ़ टाइप दो चार क्लास फेल ही होते हैं।

उस पीढ़ी को, उसके आतंक को, अमर ने भी देखा है ..उसके द्वारा मचाई गई दहशत को.. जो अबकी लिखी पढ़ी नई जेनरेशन अपराध में कूद रही है। तो इसका प्रत्यक्ष व परोक्ष कारण आप ही हैं। किसी एमबीए, इंजीनियर, साइबर ला, टेक्निकली महारथी को आप जेल में डालकर सारे फंडे झाड़ फानूस दिखवा देते हैं। फिर वही बाहर आकर आपकी पिछली हांडीमें हाथ दे देता है, फिर चिल्लाते क्यों घूमते हो आप।

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