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पौराणिक कथाएँ >> वीर हनुमान

वीर हनुमान

अनिल कुमार

प्रकाशक : मनोज पब्लिकेशन प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :48
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 3961
आईएसबीएन :81-8133-383-7

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शौर्य-पराक्रम,उत्साह तथा भक्ति के प्रतीक महावीर की जीवनगाथा....

Veer hanuman

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

हनुमान की उत्पत्ति

हनुमान की उत्पत्ति से सम्बन्धित अनेक कथाएं हैं। इस पुस्तक में सभी कथाओं का दिया जाना सम्भव नहीं है। परन्तु कुछ कथाएं ऐसी हैं जो अन्य कथाओं से अधिक प्रचलित हैं। ऐसी ही कथा नीचे दी जा रही है—
राजा दशरथ इस बात से अत्यधिक दुखी रहा करते थे कि विवाह के इतने वर्षों बाद भी उनके कोई संतान नहीं थी। गुरु वशिष्ठ के निर्देश पर उन्होंने महर्षि ऋष्यश्रृंग से पुत्र प्रापित हेतु यज्ञ करवाया। महर्षि ऋष्यश्रृंग द्वारा अत्यंत भक्तिपूर्वक आहुति दिए जाने पर प्रसन्न होकर देवता हाथ में खीर लेकर प्रकट हुए उन्होंने राजा दशरथ से कहा, ‘‘तुम्हारी कामना पूर्ण होगी। तुम यह खीर अपनी रानियों में यथाक्रम बांट दो,’’ यह कहकर अग्नि देवता अन्तर्धान हो गए।
राजा दशरथ ने आज्ञानुसार खीर का आधा भाग बड़ी रानी कौशल्या को दिया और बची हुई खीर का दो भाग करके एक भाग करके एक भाग कैकेयी को दिया। पुनः शेष खीर का दो भाग करके कौशल्या और कैकेयी के हाथ पर रखा उनकी अनुमति से सुमित्रा को दे दिया।

कैकेयी हाथ में हविष्यान्न (खीर) लिए हुए कुछ विचार करने लगीं। इसी बीच आकाश में उड़ रही एक गृन्धी ने ढपटकर खीर अपनी चोंच में ले ली और उड़ गई। कैकेयी अत्यंत व्याकुल हो गईं। राजा दशरथ ने उन्हें सान्त्वना दी और कौशल्या एवं सुमित्रा को खीर का थोड़ा थोड़ा भाग कैकेयी को देने के लिए प्रेरित किया। अग्नि देवता की कृपा से तीनों रानियां गर्भवती हुईं। महारानी कौशल्या ने श्रीराम को जन्म दिया, कैकेयी ने भरत को एवं सुमित्रा ने जुड़वां बच्चों को, अर्थात् लक्ष्मण और भरकत को जन्म दिया।

इस कथा का दूसरा पहलू यह है कि कपिराज केसरी अपनी सहधर्मिणी अंजना के साथ सुमेरु पर्वत पर निवास करते थे। अंजना के कोई संतान नहीं थी और इस लिए उन्होंने पुत्र प्रापित हेतु सहस्र वर्षों तक तपस्या की थी। उनके कठोर तप से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें वरदान देकर कहा था कि उनके एकादश रुद्रों में से एक अंश उन्हें पुत्र के रूप में प्राप्त होगा। भगवान शिव ने उन्हें जाप करने का लिए एक मंत्र देकर कहा था कि उन्हें पवन देवता के प्रसाद के एक सर्वगुणसम्पन्न पुत्र की प्राप्ति होगी।

अंजना अंजलि पसारकर उक्त मंत्र का जाप कर रही थी कि उसी समय उक्त गृन्धी कैकेयी के भाग की खीर लिए उड़ते हुए वहां आ गई। सहसा एक झंझावात आया और गृधी ठंड से सिकुड़ने लगी। गृधी की चोंच खुल गई और खीर बाहर आ गई। पवन देवता, जो पहले से ही इस अवसर की ताक में थे, ने खीर को वायु का सहारा देकर अंजना की अंजलि में डाल दिया। चूंकि भगवान शिव ने अंजना को पहले ही सब कुछ बतला रखा था, इसलिए उन्होंने तुरंत उस खीर को ग्रहण कर लिया और गर्भवती हो गईं।
और इस प्रकार चैत्र शुक्ल मंगलवार की पवित्र वेला में माता अंजना के गर्भ से महावीर हनुमान अवतरित हुए। हनुमान भगवान शिव के अश, ग्यारहवें रुद्र थे।

यो वै चैकादशो रुद्रो हनुमान् स महाकपिः।।
अवतीर्णः सहायतार्थ विष्णोरमिततेजसः।।

(स्क.माहे.के.8/99-100)

कल्पभेद के कुछ विद्वान हनुमान का जन्म चैत्र शुक्ल एकादशी के दिन मघा नक्षत्र में हुआ मानते हैं, तो कुछ विद्वानों का यह भी मानना है कि हनुमान का जन्म कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को हुआ था। कुछ विद्वानों की गणना के अनुसार कार्तिक पूर्णिमा के दिन हनुमान अवतरित हुए थे। कुछ भक्त मंगलवार, तो कुछ शनिवार को हनुमान का जन्म-दिन मानकर उनकी इन दिनों पूजा-अर्चना करते हैं। परंतु सत्य तो यह है कि शुद्ध हृदय से की गई पूजा-अर्चना चाहे जिस दिन भी की जाए, अपना एक विशेष महत्त्व रखती है।

हनुमान की बाल्यवस्था


एक बार कपिराज केसरी कहीं बाहर गए थे। माता अंजना भी बालक को पालने में लिटा कर वन में फल-फूल लेने चली गईं। इसी बीच शिशु को भूख लगी। बच्चे तो थे ही वे। हाथ-पांव उछाल-उछाल कर क्रन्दन करने लगे। सहसा उनकी दृष्टि प्राची के क्षितिज पर गई। सूर्योदय हो रहा था और सूर्य गाढ़े लाल रंग के फल के समान दिखलाई दे रहा था। हनुमान समझा यह लाल फल है।

अपना तेज और पराक्रम वे सिद्ध करने के लिए उम्र बाधक नहीं होती और यहां तो भगवान शिव ने स्वयं हनुमान के रूप में अवतार लिया था। पवन देवता से उड़ने की शक्ति उन्हें पहले ही प्राप्त हो चुकी थी। उन्हें क्षुधा शान्त करनी थी। भोज्य सामने दिखलाई दे रहा था। और इस अखिल ब्रह्माण्ड में दूरी उनके लिए कोई समस्या नहीं थी। शिशु हनुमान उछले और वायु की गति से आकाश में उड़े लगे।
पवन देवता शिशु हनुमान को उड़कर सूर्य की ओर अग्रसर देख चिन्ता से व्याकुल हो उठे। उन्हें भय था कि शिशु हनुमान सूर्य की प्रखर किरणों से भस्म न हो जाएंगे। इसलिए वन देवता शिशु की रक्षा हेतु हिम समान शीतल होकर उनके साथ चलने लगे।

हनुमान अत्यंत वेग के साथ आकाश में उड़ते चले जा रहे थे। उनका वेग ऐसा था कि यक्ष, देव, दावन आदि सभी विस्मित हो उठे। वे मन ही मन विचार करने लगे कि हनुमान जैसा वेग तो स्वयं वायु, गरुण और मन में भी नहीं है। वे कह उठे—‘जब इस शिशु का शैशवावस्था में ऐसा वेग व पराक्रम है तो युवावस्था तक आते-आते यह समूचे ब्रह्माण्ड को हिलाकर रख देगा।’
इधर, सूर्य देवता भी शिशु हनुमान को पवन देवता के सुरक्षा चक्र में अपनी ओर आते देख अति प्रसन्न हुए। हनुमान के स्वागत में उन्होंने अपनी किरणों को शीतल बना लिया। शिशु हनुमान आए और सूर्यदेव के रथ पर सवार होकर उनके साथ क्रीड़ करने लगे।

संयोगवश उस दिन अमावस्या की तिथि थी। और सिंहिका का पुत्र, राहु, सूर्य को ग्रसने के लिए आया तो उसने सूर्यदेव के रथ पर एक बालक को आरुढ़ पाया।
राहु बालक को अनदेखा कर सूर्य को ग्रसने के लिए आगे बढ़ा ही था कि हनुमान ने अपनी वज्रमुष्ठटि में उसे पकड़ लिया। राहु छटपटाने लगा। वह किसी प्रकार जान बचाकर भागा और सीधा इन्द्र देवता के पास गया। उसने क्रोध में भरकर कहा, ‘‘सुरेश्वर ! क्षुधा निवारण हेतु आपने मुझे सूर्य एवं चन्द्र को सोधन के रूबप में प्रदान किया था, पर अब मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि आपने मेरा यह अधिकार किसी कूरे को दे दिया है। यह दूसरा कौन है और आपने मेरे साथ ऐसा क्यों किया ? संभवतः आपको ज्ञात नहीं है। मैं अभी सूर्य के पास पहुंचा ही थी कि वहां पर पहले से ही उपस्थित दूसरे राहु ने मुझे जकड़ लिया। यदि मैं किसी तरह अपनी जान बचाकर भागा न होता तो मेरी मृत्यु सुनिश्चित थी।’’

राहु की बातें सुन इन्द्र देवता चिन्तित हो उठे। वे विचारमग्न हो गए। उन्होंने अपनी स्मृति पर उन्हें ऐसा भी याद नहीं आ रहा था कि उन्होंने कभी किसी और को इस प्रकार का अधिकार प्रदान किया हो। अन्ततः वह अपना सिंहासन छोड़कर उठ खड़े हुए और ऐरावत पर सवार होकर घटना-स्थल की ओर रवाना हो गए। राहु आगे-आगे चल रहा था। वहां पहुँचकर इन्द्र के साथ होने के कारण राहु दुगने उत्साह में भर कर सूर्यदेव को ग्रास बनाने के लिए झपट पड़ा। पहले से उपस्थित शिशु हनुमान को एक बार पुनः अपनी भूख की याद हो आई और वे राहु को भक्ष्य समझकर एक बार फिर उस पर झपट पड़े।
‘‘इन्द्र देवता ! मेरी रक्षा करें,’’ चिल्लाते हुए राहु उनकी ओर भागा।

राहु के प्राण किसी प्रकार बच सके। लेकिन शिशु हनुमान को तो भूख लगी हुई थी। इसलिए ऐरावत को समाने देखकर उसे भक्ष्य समझकर हनुमान उस पर झपट पड़े। यह देखकर इन्द्र भयभीत हो उठे। अपनी रक्षा के लिए उन्होंने शिशु हनुमान पर अपने वज्र का प्रहार कर दिया। वज्र का आघात हनुमान की बायीं हनु (ठुड्डी) पर हुआ और उनकी हनु टूट गई। शिशु हनुमान अचेत होकर शिखर-पर्वत पर गिर पड़े।

वास्तव में यही घटना पवनपुत्र का नाम ‘हनुमान’ पड़ने का कारण बनी। इन्द्र ने कहा था ‘‘मेरे वज्र के आघात से इस बालक की हनु (ठुड्डी) टूट गई, इसलिए इस बालक का नाम हनुमान होगा।’’
पवन देवता अपने पुत्र की यह दशा देखकर अत्यंत क्रोधित हो उठे। उन्होंने वायु की गति रोक दी और अपनी प्राणप्रिय संतान को लेकर एक गुफा में प्रविष्ट हो गए।

वायु के रुक जाने से समस्त प्राणियों का श्वास संचार रुक गया। समस्त प्राणियों का जीवन संकट में देखकर इन्द्र देवता, दूसरे और देवगण, गन्धर्व, असुर, नाग, गुह्यक आदि जीवन की रक्षा हेतु ब्रह्माजी की शरण में गए। ब्रह्माजी सब को साथ लेकर पर्वत की उस गुफा में आए जहां पवन देवता शिशु हनुमान को अंक में लेकर अश्रु बहा रहे थे।


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