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जीवनी/आत्मकथा >> सत्य के प्रयोग

सत्य के प्रयोग

महात्मा गाँधी

प्रकाशक : राजपाल एंड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2018
पृष्ठ :188
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 6042
आईएसबीएन :9788170287285

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प्रस्तुत है महात्मा गाँधी की आत्मकथा ....


उर्दू या हिन्दी शब्द ध्यान में न आने से मैंशरमाया, पर मैंने जवाब तो दिया ही। मुझे 'नॉन-कोऑपरेशन' शब्द सूझा। जब मौलाना भाषण कर रहे थे तब मैं यह सोच रहा था कि मौलाना खुद कई मामलो मेंजिस सरकार का साथ दे रहे है, उस सरकार के विरोध की बात करना उनके लिए बेकार है। मुझे लगा कि जब तलवार से सरकार का विरोध नहीं करना है, तो उसकासाथ न देने में ही सच्चा विरोध है। और फलतः मैंने 'नॉन-कोऑपरेशन' शब्द काप्रयोग पहली बार इस सभा में किया। समर्थन में अपनी दलीले दी। उस समय मुझेइस बात का कोई ख्याल न था कि इस शब्द में किन-किन बातो का समावेश हो सकताहै। इसलिए मैं तफसील में न जा सका। मुझे तो इतना ही कहने की याद है,'मुसलमान भाइयो ने एक और भी महत्त्वपूर्ण निश्चय किया है। ईश्वर न करे, पर यदि कही सुलह की शर्ते उनके खिलाफ जाये, तो वे सरकार की सहायता करना बन्दकर देगी। मेरे विचार में यह जनता का अधिकार है। सरकारी उपाधियाँ धारण करने अथवा सरकारी नौकरियाँ करने के लिए हम बँधे हुए नहीं है। जब सरकार के हाथोखिलाफत जैसे अत्यन्त महत्त्वपूर्ण धार्मिक प्रश्न के सम्बन्ध में हमे नुकसान पहुँचता है, तब हम उसकी सहायता कैसे कर सकते है? इसलिए अगर खिलाफतका फैसला हमारे खिलाफ हुआ, तो सरकारी सहायता न करने का हमे हक होगा।'

पर इसके बाद इस वस्तु का प्रचार होने में कई महीने बीत गये। यह शब्द कुछमहीनो तक तो इस सभा में ही दबा रहा। एक महीने बाद जब अमृतसर में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ, तो वहां मैंने असहयोग के प्रस्ताव का समर्थन किया। उस समयतो मैंने यही आशा रखी थी कि हिन्दू-मुसलमानों के लिए सरकार के खिलाफ असहयोग करने का अवसर नहीं आयेगा।

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