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जीवनी/आत्मकथा >> सत्य के प्रयोग

सत्य के प्रयोग

महात्मा गाँधी

प्रकाशक : राजपाल एंड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2018
पृष्ठ :188
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 6042
आईएसबीएन :9788170287285

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प्रस्तुत है महात्मा गाँधी की आत्मकथा ....


'मैं जानता था कि आप ऐसा मानते है। इसी से मैंने आपको सावधान करने काविचार किया और यहाँ आने का कष्ट दिया, ताकि आप भोले बंगालियो की तरह धोखे में न रह जाये।'

यह कहकर सेठजी ने अपने गुमाश्ते को नमूने लाने का इशारा किया। ये रद्दी रुई में से बने हुएकम्बल के नमूने थे। उन्हे हाथ में लेकर वे भाई बोले, 'देखिये, यह माल हमनेनया बनाया है। इसकी अच्छी खपत है। रद्धी रुई से बनाया है, इसलिए यह सस्तातो पड़ता ही है। इस माल को हम ठेठ उत्तर तक पहुँचातो है। हमारे एजेंट चारोओर फैले हुए है। अतएव हमे आपके समान एजेट की जरूरत नहीं रहती। सच तो यह हैकि जहाँ आप-जैसो की आवाज नहीं पहुँचती, वहाँ हमारा माल पहुँचती है। साथही, आपको यह भी जानना चाहिये कि हिन्दुस्तान की आश्यकता का सब माल हमउत्पन्न नहीं करते है। अतएव स्वदेशी का प्रश्न मुख्यतः उत्पादन का प्रश्नहै। जब हम आवश्यक मात्रा में कपड़ा पैदा कर सकेंगे और कपड़े की किस्म मेंसुधार कर सकेंगे, तब विदेशी कपड़े का आना अपने आप बन्द हो जायेगा। इसलिएआपको मेरी सलाह तो यह है कि आप अपना स्वदेशी आन्दोलन जिस तरह चला रहे है,उस तरह न चलाये औऱ नई मिले खोलने की ओर ध्यान दे। हमारे देश में स्वदेशीमाल खपाने का आन्दोलन चलाने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि उसे उत्पन्न करनेकी आवश्यकता है।'

मैंने कहा, 'यदि मैं यही काम कर रहा होऊँ, तब तो आप उसे आशीर्वाद देंगेन?'

'सो किस तरह? यदि आपमिल खोलने का प्रयत्न करते हो, तो आप धन्यवाद के पात्रहै।'

'ऐसा तो मैं नहीं कर रहा हूँ, पर मैं चरखे के काम में लगा हुआ हूँ।'

'यह क्या चीज है?'

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