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गीता प्रेस, गोरखपुर >> हनुमान बाहुक

हनुमान बाहुक

गीताप्रेस

प्रकाशक : गीताप्रेस गोरखपुर प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :64
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 1097
आईएसबीएन :81-293-0504-6

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44 पद्यों का ‘हनुमानबाहुक’ नामक सद्यःफलदायक स्तोत्र...

Hanuman Bahuk-A Hindi Book by Gitapress Gorakhpur - हनुमान बाहुक - गीताप्रेस

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

संवत् 1664 विक्रमाब्द के लगभग गोस्वामी तुलसीदासजी की बाहुओं में वात-व्याधि की गहरी पीड़ा उत्पन्न हुई थी और फोड़े-फुंसियों के कारण सारा शरीर वेदना का स्थान-सा बन गया था। औषध, यन्त्र, मन्त्र, त्रोटक आदि अनेक उपाय किये गये, किन्तु घटने के बदले रोग दिनोंदिन बढ़ता ही जाता था। असहनीय कष्टों से हताश होकर अन्त में उसकी निवृत्ति के लिये गोस्वामी तुलसीदास जी ने हनुमानजी की वन्दना आरम्भ की। अंजनीकुमार की कृपा से उनकी सारी व्यथा नष्ट हो गयी। वही 44 पद्यों का ‘हनुमानबाहुक’ नामक प्रसिद्ध स्तोत्र है। असंख्य हरिभक्त श्रीहनुमान जी के उपासक निरन्तर इसका पाठ करते हैं और अपने वांछित मनोरथ को प्राप्त करके प्रसन्न होते हैं। संकट के समय इस सद्यःफलदायक स्तोत्र का श्रद्धा-विश्वासपूर्वक पाठ करना रामभक्तों के लिये परमानन्ददायक सिद्ध हुआ है। मेरे कनिष्ठ बन्धु पं. बेनीप्रसाद मालवीय जो इस समय पुलिस ट्रेनिंग स्कूल, मुरादाबाद में प्रोफेसर हैं, श्रीहनुमानजी के अत्यन्त प्रेमी भक्त हैं। उन्हीं के अनुरोध से मैंने बाहुक की यह टीका तैयार की है। आशा है, रामानुरागी सज्जनों को बाहुक के पद्यों का भावार्थ समझने में इससे बहुत कुछ सहायता प्राप्त होगी।

 

महावीरप्रसाद मालवीय वैद्य ‘वीर’

 

श्रीगणेशाय नमः
श्रीजानकीवल्लभो विजयते
श्रीमद्गोस्वामीतुलसीदासकृत

 

हनुमानबाहुक

छप्पय

 

सिंधु-तरन, सिय-सोच-हरन, रबि-बालबरन-तनु।
भुज बिसाल, मूरति कराल कालहुको काल जनु।।
गहन-दहन-निरदहन-लंक निःसंक, बंक-भुव ।
जातुधान-बलवान-मान-मद-दवन पवनसुव।।
कह तुलसिदास सेवत सुलभ, सेवक हित संतत निकट।
गुनगनत, नमत, सुमिरत, जपत, समन सकल-संकट-बिकट।।1।।


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