|
गीता प्रेस, गोरखपुर >> तू-ही-तू तू-ही-तूस्वामी रामसुखदास
|
263 पाठक हैं |
||||||
जब तक हम परमात्मा को सर्वत्र व्याप्त नहीं पाते तब तक सारे संशय और मायाजाल हमें घेरे रहते हैं। जब हम परमात्मा को सही जान जाते हैं, तो सर्वत्र और सर्वदा उसी के दर्शन होते हैं।
A PHP Error was encountered
Severity: Notice
Message: Undefined offset: -2
Filename: books/book_info.php
Line Number: 553
|
|||||
अन्य पुस्तकें
लोगों की राय
No reviews for this book










