भारतीय जीवन और दर्शन >> अभिज्ञानशाकुन्तलम्-कालिदास विरचित अभिज्ञानशाकुन्तलम्-कालिदास विरचितसुबोधचन्द्र पंत
|
|
[प्रियंवदा का प्रवेश]
प्रियंवदा : (हर्ष प्रकट करती हुई) सखी! चलो उठो, जल्दी करो।
अनसूया : (विन्मय से) क्यों, ऐसी क्या बात है?
प्रियंवदा : सखि! उठो! शकुन्तला की विदाई की व्यवस्था करनी है।
अनसूया : (अत्यधिक विस्मय प्रकट करती हुई) यह सब किस प्रकार सम्भव हो गया?
प्रियंवदा : सुनो! मैं अभी शकुन्तला के पास गई थी। मैंने उससे पूछा कि
रात को वह सुख से तो सोई?
अनसूया : तो फिर?
प्रियंवदा : तब तक वहां पूज्य पिता कण्व आ पहुंचे। उन्होंने लाज में गड़ी
शकुन्तला को गले लगाया। उसे प्यार देते हुए बोले, वत्से! आज आंखों में
यज्ञधूम के भरे जाने पर भी यजमान की आहुति सौभाग्य से ठीक उसी स्थान पर
पड़ी जहां कि पड़नी चाहिए थी। इसलिए जिस प्रकार योग्य शिष्य को विद्या दान
करने से मन में दुःख नहीं होता वैसे तुझे भी योग्य पति के हाथ में देते
हुए मुझे भी दुःख नहीं है।
मैं आज ही तुझे ऋषियों के साथ तेरे पति के पास भेजने की व्यवस्था करवाता
हूं।
अनसूया : परन्तु तात कण्व को यह सारा वृत्तान्त बताया किसने?
प्रियंवदा : जैसे ही तात कण्व यज्ञशाला में प्रवष्टि हुए उसी समय
छन्दोवद्ध यह आकाशवाणी सुनाई दी-
अनसूया : (विस्मय से बीच में ही टोककर) क्या?
|