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उपासना एवं आरती >> रुद्राष्टाध्यायी

रुद्राष्टाध्यायी

गीताप्रेस

प्रकाशक : गीताप्रेस गोरखपुर प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :224
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 1148
आईएसबीएन :81-293-1354-5

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प्रस्तुत पुस्तक में रुद्राष्टाध्यायी सानुवाद अभिषेक-विधि एवं पूजा विधान सहित प्रस्तुत की गई है।

Rudrastadhyayi-A Hindi Book by Geetapres Gorakhpur Gitapress - रुद्राष्टाध्यायी - गीताप्रेस

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

निवेदन

‘वेद: शिव: शिवो वेद:’ वेद शिव हैं और शिव वेद हैं अर्थात् शिव वेद स्वरूप हैं। यह भी कहा है कि वेद नारायण का साक्षात् स्वरूप है-‘वेदो नारायण: साक्षात् स्वयम्भूरिति शुश्रुम।’ इसके साथ वेद को परमात्म प्रभु का नि:श्वास कहा गया है। इसीलिये भारतीय संस्कृति में वेद की अनुपम महिमा है। जैसे ईश्वर अनादि-अपौरुषेय हैं, उसी प्रकार वेद भी सनातन जगत् में अनादि-अपौरुषेय माने जाते हैं। इसीलिये वेद-मन्त्रों द्वारा शिवजी का पूजन, अभिषेक, यज्ञ और जप आदि किया जाता है।

‘शिव’ और ‘रुद्र’ ब्रह्म के ही पर्यायवाची शब्द हैं। शिव को रुद्र कहा जाता है- ये‘रुत्’ अर्थात् दु:ख को विनष्ट कर देते हैं- ‘रुतम्-दु:खम्, द्रावयति-नाशयतीति रुद्र:।’
ऱुद्र भगवान् की श्रेष्ठता के विषय में रुद्रहृदयोपनिषद् में इस प्रकार लिखा है-

सर्वदेवात्मको रुद्र: सर्वे देवा: शिवात्मका:।
रुद्रात्प्रवर्तते बीजं बीजयोनिर्जनार्दन:। यो रुद्र: स स्वयं ब्रह्मा यो ब्रह्मा स हुताशन:।।
ब्रह्मविष्णुमयो रुद्र अग्नीषोमात्मकं जगत्।।

इसी प्रमाण के आधार पर यह सिद्ध होता है कि रुद्र ही मूलप्रकृति-पुरुषमय आदिदेव साकार ब्रह्म हैं। वेदविहित यज्ञपुरुष स्वयम्भू रुद्र हैं।


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