रेत पर लहू - जाबिर हुसैन Ret Ret Lahoo - Hindi book by - Jabir Husain
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रेत पर लहू

जाबिर हुसैन

प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :124
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 12439
आईएसबीएन :9788126701629

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जाबिर हुसेन अपनी शायरी को ‘पत्थरों के शहर में शीशागरी’ का नाम देते हैं।

संभव है, एक नदी रेत भरी से रेत-रेत लहू तक ‘शीशागरी’ का यह तकलीफ़देह सफ़र ख़ुद जाबिर हुसेन की नज़र में उनके सामाजिक सरोकारों के आगे कोई अहमियत नहीं रखता हो। संभव है, वो इन कविताओं को अपनी डायरी में दर्ज बेतरतीब, बेमानी, धुंध-भरी इबारतें मानते रहे हों। इबारतें, जो कहीं-कहीं ख़ुद उनसे मंसूब रही हों, और जो अपनी तल्ख़ियों के सबब उनकी याददाश्त में आज भी सुरक्षित हों। इबारतें, जिनमें उन्होंने अपने आप से गुफ़्तगू की हो, जिनमें अपनी वीरानियों, अपने अकेलेपन, अपने अलगाव और अपनी आशाओं के बिंब उकेरे हों।

लेकिन इन कविताओं में उभरने वाली तीस्वीरें अकेले जाबिर हुसेन की अनुभूतियों को ही रेखांकित नहीं करतीं। अपने-आप को संबोधित होकर भी ये कविताएं एक अत्यंत नाज़ुक दायरे का सृजन करती हैं। एक नाज़ुक दायरा, जिसमें कई-कई चेहरे उभरते-डूबते नज़र आते हैं।

जाबिर हुसेन की कविताएं, बेतरतीब ख़ाबों की तरह, उनके वजूद की रेतीली ज़मीन पर उतरती हैं, उस पर अपने निशान बनाती हैं। निशान, जो वक्त की तपिश का साथ नहीं दे पाते, जिन्हें हालात की तल्ख़ियां समेट ले जाती हैं। और बची रहती है, एक टीस, जो एक-साथ अजनबी है, और परिचित भी।

यही टीस जाबिर हुसेन की कविताओं की रूह है। एक टीस जो, जितनी उनकी है, उतनी ही दूसरों की भी !

रेत-रेत लहू की कविताएं बार-बार पाठकों को इस टीस की याद दिलाएंगी।

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