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रहस्य-रोमांच >> घर का भेदी

घर का भेदी

सुरेन्द्र मोहन पाठक

प्रकाशक : ठाकुर प्रसाद एण्ड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2010
पृष्ठ :280
मुखपृष्ठ : पेपर बैक
पुस्तक क्रमांक : 12544
आईएसबीएन :1234567890123

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अखबार वाला या ब्लैकमेलर?


सुनील ने कागज पर से सिर उठाया तो अर्जुन बोला-“मैं . . 'घर का भेदी' का रेगुलर रीडर हूं। इस बाबत मैंने उसमें कभी कुछ नहीं पढ़ा था।"
"छपा ही नहीं होगा। इसे देख कर बतरा की कार्यप्रणाली' । मेरी समझ में आ रही है। लगता है कि अपने ब्लैकमेल के सम्भावित शिकार की बाबत वो अपने कॉलम में सीधे ही नहीं छाप देता है। पहले अपने हाथ लगी खतरनाक जानकारी से वो उसे खबरदार करता था। शिकार वैसे ही डर जाता था तो उसकी बाबत कॉलम में कुछ छपना जरूरी नहीं रह जाता था। कॉलम में जरूर उन्हीं शिकारों की बाबत छपता था जो कि बतरा की सीधी अप्रोच को नजरअन्दाज कर देते थे।"
"हो सकता है।"
“ये कार्बन कापी है। ओरीजिनल उसने जरूर उस नानगांधी मोहनदास को भिजवा दी होगी। उसने इतने से ही हथियार डाल दिये होंगे इसलिये कॉलम में कुछ नहीं छपा होगा।"
"गुरुजी, आपने बिल्कुल दुरुस्त नतीजा निकाला है इस बार।"
“इस बार?" -सुनील उसे घूरता हुआ वोला।
“हमेशा की तरह इस बार भी।”–अर्जुन ने तत्काल संशोधन पेश किया--"और गुरुजी..."
"हां।"
"जिस शख्स का इस तहरीर में जिक्र है, वो मुझे सूझ रहा है कि कौन हो सकता है?"
"कौन हो सकता है?"
“मोहनदास भाटिया। जो कि नेशनल बैंक की रौनक बाजार ब्रांच का सीनियर मैनेजर है।"
"तुम कैसे जानते हो उसे?"
“जानता नहीं हूं सिर्फ नाम से वाकिफ हूं। पिछले साल, 1 उसकी ब्रांच को बैस्ट ब्रांच का अवार्ड मिला था और उसे मैनेजर से सीनियर मैनेजर की तरक्की मिली थी। खबर हमारे अखबार में भी लोकल पेज पर छपी थी। इत्तफाक से याद रह गयी।"
“हूं। तो महात्मा गांधी के नामराशि वो मैनेजर साहब बैंक के माल पर हाथ साफ कर रहे हैं।"
"घर का भेदी कह रहा है तो कर ही रहे होंगे।"
"मालूम करेंगे।"
“अभी ये और देखिये।"
अर्जुन ने सुनील को वैसा ही एक और कागज थमाया। सुनील ने उस पर निगाह डाली तो अंकित पाया :
धन्य हैं वो महानुभाव जो एन.सी. के संक्षिप्त नाम से जाने जाते हैं और जो अपने मौजूदा कारोबार में इतने कामयाब हैं कि सारा शहर रश्क करता है। लेकिन क्या कोई ये भी जानता है कि उनकी कामयाबी का राज क्या है? वो राज कम से कम ये नहीं है कि वो चित्र-तारिकाओं का सौन्दर्य साबुन इस्तेमाल करते हैं। तो फिर क्या राज है? कहीं वो राज गोलियों से बिंधी उस लाश में तो नहीं छुपा हुआ जो कि , विक्रम कनौजिया की थी और जिसे कि तीन साल पहले हमारे इस एन.सी. ने मछलियों का आहार बनने के लिये समुद्र में फेंक दिया था?
"माई फर्स्ट बॉर्न।"-कागज पर से सिर उठाता हुआ सुनील बोला-“मोहनदास भाटिया की तरह एन-सी से भी तेरे जेहन में कोई बिजली कौंधी या नहीं?"
“नरेश चटवाल।"-अर्जुन तत्काल बोला-“तानिया का डैडी। ईजी।".
सुनील ने इनकार में सिर हिलाया।
"नहीं हो सकता?--अर्जुन बोला।
"होने को तो क्या नहीं हो सकता इस फानी दुनिया में लेकिन ये बात कामनसेंस की कसौटी पर खरी नहीं उतरती।"
"क्यों भला?"
“आफिस में तूने बताया था कि एक एन-सी के बारे में पिछले हफ्ते 'घर का भेदी" में इशारों में काफी डैमेजिंग बातें छपी थीं जबकि हम अभी फैसला करके हटे हैं कि कागज पर टाइपशुदा ऐसी बातें, जिनमें से दो की कार्बन कापियां हमारे सामने हैं, शिकारों को सीधे अरसाल की जाती थीं और कोई नतीजा न निकलने की सूरत में ही उनकी वाबत अखबार में छापा जाता था।"
“शायद कोई नतीजा न निकला हो और बात इसलिये छपी हो।"
"फिर भी मैं एक बड़े उद्योगपति की, जो कि काटन किंग कहलाता हो, कल्पना कातिल के तौर पर नहीं कर सकता।"
"तीन साल पहले नरेश चटवाल बड़ा उद्योगपति नहीं होगा।"
"जरूर होगा। बड़ा उद्योगपति, वो भी काटन किंग, कोई ओवरनाइट नहीं बन जाता लेकिन चोर-उचक्के, गुण्डे-बदमाश, डकैत, स्मगलर, डोप डीलर्स ऐसी तरक्की आनन फानन कर सकते हैं।"

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