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रहस्य-रोमांच >> घर का भेदी

घर का भेदी

सुरेन्द्र मोहन पाठक

प्रकाशक : ठाकुर प्रसाद एण्ड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2010
पृष्ठ :280
मुखपृष्ठ : पेपर बैक
पुस्तक क्रमांक : 12544
आईएसबीएन :1234567890123

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अखबार वाला या ब्लैकमेलर?


“यस । दैट्स लाइक एक गुड गर्ल। अब बोलो, क्या किया तुमने बतरा के कत्ल की रात को?"
"इमरती की ड्रेस मैंने निर्विघ्न नीचे जाने के लिये ही हासिल की थी। बतरा की स्टडी में उसकी मेज के एक दराज में दो रिवॉल्वरें मौजूद थीं, ऐसा मुझे पहले से मालूम था। एक बार जब मैं संचिता से मिलने वहां गयी थी तो उसने मुझे अपने जीजा की स्टडी में बिठाया था। मेज के पीछे बैठी मैंने यूं ही खिलवाड़ में एक दराज बाहर खींच लिया था तो मैंने उसमें दो रिवाल्वरें पड़ी पायी थीं। उस रात को मैं चुपचाप स्टडी में पहुंची थी और दराज में मौजूद इकलौती रिवॉल्वर मैंने वहां से उठा ली थी।"
"इकलौती? उसमें तो दो रिवॉल्वरें थीं।"
"एक ही थी।"
"कौन-सी?" "अड़तीस कैलीबर की।"
"तुम्हें कैसे मालूम है कि वो रिवॉल्वर अड़तीस कैलीबर की थी, बत्तीस कैलीबर की नहीं थी।" क्योंकि मुझे हैंडगंस की पूरी पूरी नॉलेज है। स्विट्जरलैंड में मैंने हर तरह की हैंडगन चलाना सीखा था। उस रोज दराज में अड़तीस कैलीबर की लकड़ी के हैंडल वाली स्मिथ एण्ड वैसन रिवॉल्वर ही मौजूद थी। दूसरी, बत्तीस कैलीबर की, हाथी दांत के हैंडल वाली रिवॉल्वर, जो कभी मैंने दराज में पड़ी देखी थी, वहां  नहीं थी।"
“पक्की बात?"
“एकदम पक्की बात। मैंने उस दराज में ही नहीं, बाकी दराजों में भी उसे तलाश किया था क्योंकि अगर वो रिवॉल्वर वहां उपलब्ध होती तो उपलब्ध रिवॉल्वर की जगह मैंने उसे काबू में किया होता क्योंकि शार्ट डिस्टेंस पर वो ज्यादा एक्यूरेट रिवॉल्वर है और कम आवाज़ करती है।"
“खैर, फिर?"
“ऊपर संचिता के बेडरूम की खिड़की से ड्राइव-वे दिखाई देता है। जब मुझे बतरा की कार ड्राइव-वे में दाखिल होती दिखाई दी थी तो मैंने इमरती को पकड़ा था, उससे उसकी पोशाक हासिल की थी, बतरा की स्टडी में अपने कपड़े उतार कर उसे पहना था, इमरती को वहीं छुपा रहने की हिदायत दी थी और खुद दबे पांव नीचे पहुंची थी। तब किसी ने मुझे नीचे जाते नहीं देखा था लेकिन मैं जानती थी कि कोई देख भी लेता तो उस भड़कीली पोशाक की वजह से वो मुझे इमरती ही समझता।"
"आगे?"
"मुझे बतरा की इस रुटीन की भी खबर थी कि घर आ कर वो पहले ड्राईंगरूम में बने बार पर ही पहुंचता था और एक ड्रिंक लेता था। इसलिये मुझे मालूम था कि उस वक्त उसने बार पर ही होना था। रिवॉल्वर छुपाये मैं वहां पहुंची थी। वो वहीं था, लेकिन...."
"क्या लेकिन?"
"वो तो पहले ही मरा पड़ा था। किसी ने मेरे से पहले उसे शूट कर दिया था। उसकी हालत बता रही थी कि मेरे वहां पहुंचने से जरा पहले ही किसी ने उसे शूट किया था।"
“उस वक्त खिड़की खुली थी?"
"हां। उस पर वो घातक गोली यकीनन उधर से ही चलाई गयी थी और...."
"और क्या?"
“और एक आदमी को मैंने पिछले कम्पाउन्ड में बाहर की तरफ लपकते देखा था और मैंने उसे साफ पहचाना था।"
"कौन था वो?"
“संजीव सूरी। जो कि फेमस डिस्क जाकी है और जिसे मैं खूब पहचानती हूं।"
"रात के अंधेरे में, पीठ पीछे से, फासले से देख कर तुम उसे क्योंकर पहचान पायीं?"
"क्योंकि जब मैंने खुली खिड़की से बाहर झांका था, जब मेरी निगाह पीठ पीछे से उस पर पड़ी थी, ऐन तभी एक कार की हैडलाइट्स की रोशनी पिछले कम्पाउन्ड में चमकी थी, जिस से चौंक कर उसने गर्दन घुमा कर अपने पीछे देखा था और तब हैडलाइट्स की तीखी रोशनी में साफ मैंने उसकी शक्ल पहचानी थी।"
"था कौन उस कार में?"
"मुझे नहीं मालूम। न मैं मालूम करने के लिये वहां रुकी थी। मेरे तो बतरा की लाश देखकर ही छक्के छूट गये थे। मैं तो उल्टे पांव वापिस स्टडी में लौटी थी रिवॉल्वर को यथास्थान पहुंचाया था, इमरती को उसके कपड़े सौंपे थे और अपने कपड़े पहनकर पार्टी में जा मिली थी।"
"यानी कि तुम खुशकिस्मत निकलीं कि तुम्हें खून से हाथ नहीं रंगने पड़े। जो काम करने के लिये तुम्हें उकसाया गया था, वो किसी ने पहले ही कर दिया था। नहीं?"
"हां। लेकिन ट्रेजेडी ये है कि निरंजन चोपड़ा इस बात का भी मेरे पर प्रेशर बना रहा है।"
"क्या मतलब?"
"उसे कतई एतबार नहीं कि कत्ल किसी और ने किया था। कहता है कि अपने आपको पाक-साफ बताने के लिये मैंने ये कहानी गढ़ ली थी कि वो पहले ही मरा पड़ा था और मैंने संजीव सूरी को वहां से खिसकते देखा था।"
“घटिया आदमी से घटिया बात की ही उम्मीद की जा . सकती है।"
“रही सही कसर खुद मैंने ही उसे रुपये वापिस सौंप कर पूरी कर दी थी।"
"रुपये!"
"ढाई लाख। पांच-पांच सौ के नोटों की पांच गड्डियां।"
“जो कि तुमने मृत बतरा की जेब से निकाली थीं?"
"खुद ही निकली पड़ी थीं। वो मर कर गिरा था तो रबड़ बैंड से बंधे नोटों का बंडल खुद ही उसकी किसी जेब में से उछलकर बाहर आ गिरा था। मुझे मालूम था कि असल में वो रकम चोपड़ा की थी इसलिये मैंने उसे अपने कब्जे में ले लिया था।"
“और वो रुपया तुमने चोपड़ा को वापिस सौंप दिया था?"
"हां। कहता था कत्ल किये बिना वो रुपया मेरे हाथ लग ही नहीं सकता था।"
“संजीव सूरी वाली बात तुमने किसी और को बतायी थी?"
“नहीं। पहले निरंजन चोपड़ा को बतायी थी, अब तुम्हें बतायी है, और किसी को नहीं बतायी।"

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