Parchhaain Naach - Hindi book by - Priyamvad - परछाई नाच - प्रियंवद
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परछाई नाच

प्रियंवद

प्रकाशक : भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशित वर्ष : 2022
पृष्ठ :219
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 1273
आईएसबीएन :Parchhaain Naach

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परछाई नाच सत्ताओं की छाया के बीच मनुष्य के अस्तित्व के अर्थ उसके प्रश्न और संघर्ष का जीवन्त आख्यान है...

Parchhain Nach

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

वैसे तो परछाई नाच वसन्त के चार दिनों की ही कहानी है,लेकिन इन चार दिनों के साथ ही इसमें डेढ़ सौ वर्षों का काल भी गुँधा-बुना है-इतिहास, मिथक, फैण्टसी, प्रेम, जिजीविषा, भय, संशय और तमाम आदिम भावनाओं को समेटता हुआ। परछाई नाच सत्ताओं की छाया के बीच मनुष्य के अस्तित्व के अर्थ उसके प्रश्न और संघर्ष का जीवन्त आख्यान है। इस आख्यान में मनुष्य एक इकाई की तरह अपनी सारी पीड़ा, अपने सारे रोग, सारे राग, भोग, शोक स्वप्न अपनी सारी आकांक्षाओं और अपने क्षत-विक्षत होते अस्तित्व के साथ विभिन्न चरित्रों के माध्यम से निरन्तर उपस्थित है।

परछाईं नाच

 

उन सबको जिन्होंने मेरी लिखने की कोशिशों पर बचपन से ही विश्वास किया था, और जो आज देख रहे हैं उत्सुकता और संशय से काल की उस तुला को जिसके एक पलड़े पर इस कृति के साथ उनका विश्वास भी है और जिसके काँटे की नोक भी बस, अब एक ओर झुकने ही वाली है।
खिड़की के बाहर अँधेरा शुरू हो गया था। अँधेरा अभी उतना नहीं था जितना की होता है।
अनहद ने सिर घुमाकर देखा। कान के नीचे गले की खाल जहाँ ख़त्म होती है वहाँ शेमल का मस्सा अलग से दिख रहा था। मस्से का काला रंग अभी अँधेरे का रंग नहीं हुआ था इसलिए अनहद को लगा कि अभी उतना अँधेरा नहीं है। मस्से पर एक गीली चमक रूकी थी। वह पसीना था या शायद वसन्त था। छूटा हुआ विश्रान्त सुख था या शायद अन्दर की शेष उत्तेजना थी।

शेमल ने करवट ली। पेट के बल लेट गयी वह। अनहद जानता था कि इस तरह से पेट के बल लेटकर वह क्या चाहती थी। वह बाद में हमेशा ऐसा चाहती थी। अनहद शेमल की नंगी पीठ पर हाथ फेरने लगा। कुछ क्षण बाद ही धीरे-धीरे टूटे असम्पृक्त शब्दोंवाली आवाज़ शेमल के मुँह से निकलने लगी। गिरती पत्ती की तरह कमज़ोर...अनिश्चित...काँपती हुई। बहुत देर तक शेमल पूरा शब्द नहीं बोल पाती थी। जो देर तक बोलता था वह उसका शिथिल आनन्द होता था, उखड़ी पपड़ीवाली कमरे की दीवारों से हवेली के पुराने खम्भों से छूटा हुआ मौन होता था, गर्म मांस की गन्ध उलीचता हुआ एक कालखण्ड होता था। यही सब बाद में अनहद के साथ रह जाता था।
शेमल की पीठ की खाल अनहद की घूमती हुई हथेली के नीचे फैलने, सिकुड़ने लगी। अनहद देख रहा था कि कहीं भी शेमल की खाल अब वैसी नहीं थी जैसी बीस साल पहले थी। बीते हुए बीस साल उसकी खाल पर थे। अनहद की हथेली के नीचे, पीठ की खाल के साथ, वे बीस साल भी फैल और सिकुड़ रहे थे। पीठ के अलावा बची हुई शेमल चादर के अन्दर थी। बचे हुए सुख से थरथराती हुई। पीठ पर हाथ फेरते हुए अनहद ने खिड़की के बाहर देखा। बाहर सर्दियों के आख़िरी दिन थे। वसन्त था। तोते पेड़ों को लौट रहे थे। खिड़की के एक तरफ़ ख़ाली आसमान दिख रहा था...दूसरी तरफ़ मस्जिद की पुरानी मीनारें थीं। मीनारों के अन्दर पंख फड़फड़ाते कबूतर थे। जब सन्नाटा होता, तब फड़फड़ाहट तैरती हुई, खिड़की से अन्दर कमरे तक आ जाती थी। अभी जाती हुई सर्दी की धुन्ध, कँपकँपी और विषण्णता थी।

नीचे से खाँसने की आवाज़ आयी...फिर दरवाज़ा बन्द करने की। अनहद ने हथेली रोककर शेमल की पीठ थपथपायी।
‘‘उठो...अभी दुकान भी बन्द करनी है। उनको ऊपर लाना है।’’
शेमल का उठने का मन नहीं था। देह में अभी थकान थी। बचा हुआ सुख भी अभी देह में था। कुछ देर ऐसे ही और लेटने से सुख भी कुछ देर और उसके अन्दर रह जाता। वह फिर खाँसे। इस बार शेमल उठ गयी। अनहद भी पलँग से उतर गया।
‘‘रोशनी कर दो...मैं नीचे जाकर दुकान बन्द करता हूँ।’’

शेमल ने सिर हिलाया। अनहद ने दरवाज़े पर पड़ी चिक हटायी। नीचे जाने वाली लकड़ी की सीढ़ियों पर अभी अँधेरा था। वह कुछ सीढ़ियाँ उतरकर नीचे आया। दुकान के दो दरवाज़े वह बन्द कर चुके थे। कुछ बत्तियाँ भी। उनका हाथ ऊपर नहीं पहुँचता था इसलिए दरवाज़ों की ऊपर की सिटकनी वह बन्द नहीं कर पाते थे। मेज़ पर झुके वह रुपये उठा रहे थे। वह बूढ़े थे....दमा रहता था। खाल सूखकर लटक गयी थी। उस नीम अँधेरे हाल में—पुराने बर्तनों... छड़ी... चादरों... फ़ानूसों... खिलौनों... गहनों.. मूर्तियों.. के बीच वह डरावने लग रहे थे। गले हुए... छड़ी के सहारे मुड़े हुए। अनहद नीचे आ गया। सीढ़ियों पर आहट सुनकर उन्होंने घूमकर देखा फिर उसी तरह वापस झुककर पैसे निकालने लगे। रुपये लेकर कुर्सी पर बैठ गये वह। अनहद ने दरवाज़े के ऊपर की सिटकनी लगायी। आख़िरी दरवाज़ा बन्द करने से पहले अनहद ने बाहर देखा। सड़क धीरे-धीरे ख़ाली हो गयी थी। दुकाने बन्द हो रही थीं। अनहद ने दरवाज़ा बन्द कर दिया... फिर अचानक दरवाज़ा खोला उसने। उसे लगा उसने बौने को देखा था। सामने की दीवार के पीछे छिपते हुए। अनहद को लगा की वह उसका पीछा कर रहा है। अनहद ने एक बार सोचा कि वह बाहर जाए और सामने वाली दीवार के पीछे देखे। दीवार ऊँची थी। उसके पीछे देखने के लिए उसे किसी चीज़ पर चढ़ना पड़ता। बौना भी दूसरी तरफ़ ज़रूर किसी ऊँची चीज़ पर चढ़ा होगा। अनहद के पास ऊँची चीज़ नहीं थी। बौने के पास होगी। या शायद वह था ही नहीं। अनहद को लगा की वह था।
‘‘क्या हुआ ?’’ उन्होंने पूछा।
अनहद ने दरवाज़ा बन्द कर दिया।

‘‘कुछ नहीं’’ अनहद पास आ गया ‘‘ऊपर चलें ?’’ रुपये उन्होंने गाउन की जेब में रख लिये। बिकी हुई चीज़ों का कागज़ भी। उठ गये वह। अनहद ने हाथ बढ़ाया।
नहीं... मैं खुद चलूँगा’’ धीरे-धीरे छड़ी टेकते हुए हाल को पार किया उन्होंने। लकड़ी की सीढ़ियों पर आ गये वह। रेलिंग पकड़कर एक-एक सीढ़ी चढ़ने लगे। उनके पीछे अनहद था। तीन-चार सीढ़ियाँ चढ़कर वह रुकते...साँस लेते फिर चढ़ते। अनहद ने घूमकर देखा हाल के एक कोने की आख़िरी बत्ती अभी जल रही थी। उस कोने को अपने पीले घेरे में समेटे थी। उस कोने की दीवार पर पुराने हथियार लटक रहे थे। हथियारों के ऊपर जे.जे जैक्सन लन्दन की सत्रह सौ छियासी की घड़ी लटक रही थी। सोन... चाँदी और पत्थरों से बनी। नीचे छोटे से काँच के शोकेस के अन्दर पुराने तेल... इत्र... लैम्प थे। उस कोने में बचे हुए उजाले में बड़े से हाल की दूसरी चीज़ें दिख रही थीं। कठपुतलियाँ... पीतल के बर्तन... छत... हाथी दाँत की शतरंज। उपर तक पहुँच गये वह। अनहद ने ऊपर से हाल की वह आख़िरी बत्ती भी बन्द कर दी। चिक हटाकर वह अपने कमरे में आये। पलँग पर कुछ देर बैठे, फिर लेट गये। गाउन के ऊपर ही रजाई लपेट ली उन्होंने। बदलते मौसम की हवा उनके दमें को बढ़ाती थी। कुछ क्षण लेटने के बाद ही उनकी साँस फूलने लगी। उठकर बैठ गये वह। ऊपर का रोशनदान खुला था। उन्होंने रोशनदान को देखा ...फिर अनहद को। अनहद ने रस्सी ढीली करके रोशनदान बन्द कर दिया। खूँटी पर टँगा हुआ ऊनी टोप उतारकर उनको दिया। उन्होंने टोप से कान ढँक लिये।

‘‘आक्सीजन ?’’ अनहद ने पूछा। कोने में सिलेण्डर रखा था।
‘‘नहीं’’, उन्होंने सिर हिलाया, रोशनदान बन्द होने से ठीक हो जाएगा।’’
ऊपर छत पर लोहे का जाल पड़ा था। कमरे के सामने भी जाल था। जाल के चारों तरफ़ खुली जगह थी। चाँद धीरे-धीरे जाल के ऊपर आ रहा था। उस खुली जगह पर परछाइयाँ बन गयी थीं। उस खुली जगह के चारों तरफ़ दूसरे कमरे थे।
शेमल चिक हटाकर कमरे में आयी। पलँग पर वह उनके पास बैठ गयी। उनकी पीठ पर हाथ रखा उसने।
‘‘अभी गर्म सूप देती हूँ।’’
उन्होंने गाउन की जेब में हाथ डालकर रुपये और काग़ज़ निकाले। शेमल को दिये।
‘‘वही आया था आज... राजधानीवाला... यह सब ले गया। कुछ चीज़ें उसे और चाहिए। पुराने लहँगे... सरौते... लैम्प...।’’
‘‘दवा खायी शाम को ?’’ शेमल ने पूछा।
‘‘हाँ,’’ उन्होंने सर हिलाया।
‘‘कब ?’’
‘‘जब तुम नीचे आयी थीं।’’
उनके कानों पर से टोप खिसक गया था। शेमल ने रजाई से उनको ठीक से ढँक दिया। उनके कानों पर टोपी कसी, फिर उठ गयी।
‘‘अगर थके हो तो आज कुछ मत लिखाना।’’
‘‘सूप पीने के बाद लिखाऊँगा... तब तक खाना भी तैयार हो जाएगा।’’

शेमल बाहर निकल गयी। अनहद को अचानक लगा, किसी ने बाहर से उसे आवाज़ दी है। दो तरह की आवाज़ थी। पहले फटी हुई...फिर तेज़ सीटी-जैसी। बाहर पड़ा लोहे का जाल पार करके छज्जे पर आया वह। नीचे झाँका उसने। कोई नहीं था। चाँद की रोशनी में सामनेवाली दीवार अब पूरी तरह दिख रही थी। उसके पीछे ऐसा कुछ नहीं था जिस पर चढ़ा जा सके। बौना वहाँ नहीं हो सकता था। दीवार से सटा एक पेड़ था उसके पीछे देखा अनहद ने। बौना वहाँ भी नहीं था। हालाँकि पेड़ के मोटे तने के पीछे छुपा जा सकता था। पर वहाँ कुत्ते सो रहे थे। कुत्ते किसी को छुपने नहीं देते। अनहद वापस आया। सूप के मसालों की महक रसोई से बाहर तक आ रही थी। रसोई के अन्दर शेमल थी। अनहद रुक गया। बाहर से देखा उसने। शेमल के बाल खुले थे। उसके गले की खाल अब साफ़ तरीके से लटकी हुई दिख रही थी। बीस साल, जो कुछ देर पहले उसकी पीठ पर थे....अब गले पर भी दिख रहे थे। गाय के गले की तरह खाल लटक रही थी। पर इतनी नहीं कि अलग से हिलती हो। अनहद को वह थकी हुई लगी। अनहद को देखकर मुस्करायी शेमल। अनहद को लगा कि जिसे वह थकान समझ रहा था। वह थकान नहीं थी। एक तरह की तृप्ति थी... सम्पूर्ण विराम था... या स्थगन का निश्चिन्त भाव था। शेमल के हाथों में ट्रे थी। ट्रे पर सूप के प्याले रखे थे। प्यालों से धुआँ उठ रहा था। मसालों की खुशबू उस धुएँ में थी।
‘‘क्या हुआ ?’’ शेमल ने पूछा।
‘‘मुझे लगा कोई आवाज़ दे रहा है’’ अनहद ने कहा। शेमल पास आ गयी। शेमल के बालों में दो सफ़ेद रेशे भी थे। शायद चाँदनी के हों... अनहद ने सोचा। पर चाँदनी अभी जाल के चारों तरफ़ ही आयी थी। उसके बालों में नहीं आ सकती थी।
‘‘बूढ़ी हो रही हो तुम।’’

तुमसे बड़ी हूँ... तुमसे पहले बूढ़ा होना भी है। मन में कुछ नहीं हो तो आदमी और जल्दी बूढ़ा हो जाता है। ऐसा तुम्हें आज लगा क्या ?’’
‘‘क्या ?’’
‘‘मेरे मन का बूढ़ा होना ?’’
‘‘नहीं... मैं गले की बात कर रहा था... या शायद बालों में चाँदनी की,’’ अनहद बड़बड़या। बात ग़लत बिन्दु तक पहुँच रही थी। ‘‘चलो’’ -अनहद ने कहा।
उनके कमरे तक आ गये वे। अनहद ने चिक हटायी। शेमल ट्रे लेकर अन्दर आयी। वह उठकर बैठ गये। अन्दर छोटी-सी मेज़ पर ट्रे रखी उसने ! एक प्याला उनको दिया। दूसरा अनहद को। अनहद प्याला लेकर कोने के सन्दूक़ पर बैठ गया। पलँग पर शेमल बैठ गयी। उसने उनके तकिये के नीचे से एक छोटा तौलिया निकालकर उनके गले के चारों तरफ़ लपेट दिया। वह धीरे-धीरे चम्मच से सूप पीने लगे। धुआँ उनके गले के अन्दर तक जा रहा था। वह धुएँ को भी पी रहे थे। आवाज़ करते हुए। गर्म सूप की भाप से उनकी सिकुड़ी नसों, सूखी जीभ को सेंक मिल रहा था। शेमल ने भी प्याला हाथ में ले लिया।
कमरा छोटा था। दरवाज़े पर चिक पड़ी थी। यह दरवाज़ा बाहर उसी खुली जगह में खुलता था। कमरे के अन्दर एक दूसरा दरवाज़ा था जो बन्द रहता था। यह एक छोटी बालकनी में था। सामने की दीवार पर तस्वीरें थीं। फ्रेम किये हुए सर्टिफ़िकेट थे। शीशे के शोकेस में मैडल थे... प्रशस्ति चिह्न थे। एक दीवार पर तलवार लटक रही थी। फ़र्श पर एक तरफ़ हारमोनियम पड़ा था। हारमोनियम के पीछे कुछ किताबें थीं। कमरे की छत ऊँची थी। छत के कोनों में जाले लगे थे। जाले हिलते तो हवा पता लगती थी।

शेमल अपना प्याला लेकर बाहर चली गयी। कमरे में वह और अनहद रह गये। चुप... सूप पीते हुए। उन्होंने सूप की भाप को कुछ देर तक अन्दर खींचा। सर्दियों की हवा और दमें से उन्हें राहत मिली। उसी तरह आवाज़ करते हुए उन्होंने कुछ घूँट लिये। प्याले में आख़िरी कुछ बूँदें बची थीं। चम्मच हटाकर, प्याला मुँह में उल्टा लिया उन्होंने। कुछ देर आँखें बन्द किये बैठे रहे... फिर खाली प्याला... चम्मच, मेज़ पर रख दिया। अनहद पहले ही सूप ख़त्म कर चुका था।
‘‘लिखाएँगे ?’’ अनहद ने पूछा।
‘‘कल तो छुट्टी है ?’’ उन्होंने अनहद को देखा।
‘‘हाँ।’’
‘‘दुकान भी बन्द रहेगी। कल ही लिखाएँगे... कल बाहर भी चलेंगे। दोपहर के खाने के बाद... धूप अच्छी हो जाएगी तब तक। शहर छूट रहा है...अन्दर अब नहीं रहता....ढूँढ़ना पड़ता है।’’ कुछ देर वह चुप रहे फिर बोले-‘‘जो लिख रहे हैं उसे पूरा करने के बाद हम उसे एक जिल्द में बाँध लेंगे। दुकान में रख लेंगे... नहीं, दुकान में नहीं, हो सकता है वहाँ कोई चुरा ले... या मैं ही किसी को धोखे में पुरानी किताबों के साथ दे दूँ... उसे हम कहीं ज़मीन में इस तरह गाड़ देंगे कि सैकड़ों सालों बाद, जब कभी किसी को खुदाई में यह मिले, तब लोग समझें कि पहले इस तरह का पारसी थियेटर होता था, ऐसी नौटंकी थी... ऐसे कलाकार थे... कहानियाँ थीं... ये सब इस तरह रहे... इस तरह जिये और इस तरह मर गये। उस समय को कोई तब फिर वहीं से पकड़ेगा। उसी जगह से, जहाँ वह हमसे छूट गया है, या उसने हमें छोड़ दिया है।’’ वह चुप हो गये। कुछ देर बैठे रहे फिर लेट गये।
‘‘मैं चलूँ ?’’ अनहद उठ गया।

वह कुछ नहीं बोले। उनका मुँह थोड़ा खुला था। आँखें बन्द हो गयी थीं। हवा खुले मुँह से बाहर आ-जा रही थी या फिर वही धुआँ था जो अब हवा बनकर लौट रहा था। अनहद कमरे के बाहर आ गया। सर्दी बढ़ गयी थी। हवा तेज़ हो गयी थी। वैसी ही जैसी वसन्त में होती है। जैसी जाती हुई आख़िरी सर्दियों में होती है। शेमल खाना बना रही थी। अनहद को देखकर बाहर आ गयी।
‘‘मैं जा रहा हूँ’’ अनहद ने कहा।
‘‘क्यों ?... खाकर जाओ।’’
‘‘नहीं।’’
‘‘बाबू सो गये ?’’
‘‘लेट गये ?’’
‘‘कहाँ खाओगे अब... रुको कुछ देर, साथ खाएँगे।’’
‘‘नहीं।’’
‘‘क्या हो गया ?’’ शेमल और पास आ गयी। ‘‘अभी तो ठीक थे।’’ उसकी आँखें अचानक पैदा हुए भय से फैल गयीं। लगा वह रो देगी। ‘‘ऐसा क्यों करते हो। मैं क्या करूँ ? क्या हो जाता है तुम्हें एकदम से ? अभी कितना खुश थे। मैं जो कर सकती थी, किया। फिर अचानक अब जैसे तुम्हें कोई मतलब नहीं है... तुम ऐसे मत रहा करो। मुझे ऐसे ही लगता है मैं तुम्हारे लिए कुछ नहीं कर पाती... इस तरह तो फिर मेरी हिम्मत टूट जाती है। सो नहीं पाती हूँ रात भर।’’ उसके चेहरे की खाल दुःख से काँप रही थी। मस्सा भी। मस्से के काँपने से ही खाल का काँपना दिख रहा था। गीली चमक अभी तक मस्से पर थी। वह अब पसीना नहीं था। वह चाँदनी थी। चाँदनी जैसे वहीं पर फूट रही थी।

अनहद कुछ नहीं बोला। सीढ़ी पर आकर उसने नीचे हाल की वही आख़िरी बत्ती फिर जलायी। वह कोना फिर उसी तरह चमकने लगा। अनहद जानता था कि अगर वह रुका तो शेमल इसी तरह बोलती चली जाएगी। उस बोलने में, दिन भर अकेले ही जमा किये हुए उसके काल्पनिक दुःख होंगे, आशंकाएँ होंगी, दमित आवेग और पंख-विहीन स्वप्न होंगे। ये सब एक-दूसरे से बिल्कुल असम्बद्ध होंगे। यह बोलना लगभग एक प्रलाप की तरह होगा।
‘‘कल आओगे ?’’
‘‘हाँ।’’
ऊपर छत का चाँद अब जाल पर आ गया था। अनहद नीचे सीढ़ियाँ उतर आया। दुकान के अन्दर फ़र्श पर दो चूहे दौड़ रहे थे। किनारे का दरवाज़ा एक पतली गली में खुलता था। यह बाहर से बन्द हो जाता था। उसकी एक ताली अनहद के पास रहती थी। अनहद ने दरवाज़ा खोला। एकदम से तेज़, ठण्डी हवा उससे टकरायी। अनहद ने गले का मफलर कस लिया। सामने देखा उसने। पूरी गली ख़ाली थी। घूमकर अन्दर देखा उसने। शेमल ऊपर सीढ़ियों पर खड़ी थी। अनहद ने बाहर आकर दरवाज़ा बन्द कर दिया। कुछ कदम चलने पर गली एक बड़ी सड़क में मिल गयी। वही सड़क जो ऊपर छज्जे से दिखती थी। पेड़ के नीचे आग जलाकर दो लोग हाथ सेंक रहे थे... रोटी सेंकने की तैयारी के पहले। अनहद को पेड़ के पीछे एक परछाईं दिखी। कुत्ते नहीं थे। शायद बौना ही था। ऊपर से नहीं दिखा होगा।
अनहद सड़क पर चलने लगा। कुछ दूर चलने के बाद उसे लगा जैसे कोई पाँव घसीटता हुआ उसके पीछे आ रहा है। एकदम से घूमकर देखा उसने।
कुत्तों से डरा हुआ एक बूढ़ा भिखारी, जल्दी-जल्दी लाठी घसीटता, उसके साथ आने की केशिश कर रहा था।

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