Antatah - Hindi book by - Vivekananda - अन्ततः - विवेकानन्द
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अन्ततः

विवेकानन्द

प्रकाशक : भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशित वर्ष : 1990
पृष्ठ :50
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 1388
आईएसबीएन :00000

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प्रस्तुत है अंततः नाटक संग्रह...

Antatah - A Hindi book by Vivekananda - अन्ततः - विवेकानन्द

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

प्रस्तुति

भारतीय ज्ञानपीठ ने नयी पीढ़ी को प्रोत्साहित करने की अपनी परम्परा को सुदृढ़ करने के लिए कुछ वर्ष पहले एक नये आयोजन का सूत्रपात्र किया था। यह आयोजन था प्रतियोगिता-क्रम जिसके अन्तर्गत हर वर्ष किसी एक विधा को लेकर नयी पीढ़ियों के लेखकों के लिए प्रतियोगिता आयोजित होती है। इस क्रम का आरम्भ कहानी से हुआ और उसके बाद कविता और हास्य व्यंग्य में प्रतियोगिताएँ की गईं। पिछले वर्ष की प्रतियोगिता नाटक में आयोजित की गई थी।

इस प्रतियोगिता की सबसे अनूठी बात यह है कि इसमें हिन्दी के नये पीढ़ी के वह लेखक भाग ले सकते हैं जिनकी विधा-विशेष में कोई पुस्तक प्रकाशित न हुई हो। किसी एक कहानी, कविता, एकांकी आदि पर पुरस्कार न देकर पूरी पाण्डुलिपि पर विचार किया जाता है और सर्वप्रथम घोषित प्रतियोगी की कृति के प्रकाशन का दायित्व भारतीय ज्ञानपीठ वहन करता है। इसके परिणामस्वरूप नये लेखकों को किसी प्रकाशन की तलाश में भटकना नहीं पड़ता।
ऋता शुक्ल, विनोद दास व हरीश नवल के बाद इस क्रम में अब प्रकाशित हो रहा है। विवेकानन्द का नाटक अन्ततः।

बिशन टण्डन, निदेशक

आमुख


‘भारतीय ज्ञानपीठ’ ने मेरे नाटक ‘अन्ततः’ को देशव्यापी सम्मान देकर जो आन्तरिक खुशी और सन्तुष्टि मुझे दी है, वह मेरे लिए अवर्णनीय है। मैं भारतीय ज्ञानपीठ परिवार के समस्त सदस्यों का हृदय से आभारी हूँ।
प्रस्तुत नाटक के प्रकाशन के शुभावसर पर मैं सिर्फ़ इतना कहना चाहता हूँ कि मेरे लिए यह नाटक लिखना गहन प्रसव-पीड़ा से गुजरने के पश्चात् सृजन का सुख भोगने जैसा है जिन चार सालों की लम्बी यातनादायी अवधि से गुज़रते हुए, ड्राफ़्ट-दर-ड्राफ़्ट बनाते हुए तथा लम्बी चुप्पी से पैदा हुए अपवादों को सहन करते हुए मैं अपने गन्तव्य तक पहुँचा हूँ, उसका उल्लेख यहाँ असंगत नहीं होगा। आज भी यह बात मैं बड़ी शिद्दत से महसूस कर रहा हूँ कि यदि रंगकर्मियों का सहयोग मिल गया होता तो यह अवधि निश्चय ही चार सालों से थोड़ी कम हो जाती।

(और मैं इस नाटक के बीस-बाईस ड्राफ़्ट बनाने तथा थोड़े-थोड़े अन्तराल के पश्चात् बारी-बारी से तीन बार इसके टंकित ड्राफ़्ट को स्वयं ही रद्द करने की ज़हमत से बच रहता।) हो सकता है मेरा यह नाटक यह मंच-सम्भावनाओं को पूर्णतया समेट पाने में अभी भी कहीं से असक्षम हो। सम्भवतः आप समझ गये होंगे कि हिन्दी में अच्छे मौलिक नाटक हैं कहाँ, लेखकों और नाट्यकर्मियों के बीच सही तालमेल पैदा करना उतना ही कठिन ! जब तक हमारे छोटे-छोटे अहम् वैयक्तित्क पूर्वाग्रह तथा लाभवादी वृत्ति आड़े आती रहेगी, मैं नहीं समझता कि एक अच्छे नाटक का जन्म हो सकेगा। शायद यही वज़ह है कि आज हिन्दी नाटक के नाम पर या तो विदेशी नाटकों के अनुवाद या रूपान्तरण सामने आ रहे हैं या रंगकर्मियों द्वारा किए गए दुधमुँहा प्रयासों के फलस्वरूप चुस्त-दुरुस्त फॉ़र्म वाले किन्तु कथ्य की दृष्टि से बेहद सामान्य स्तर के नाटक लगातार मंचित हो रहे हैं।

बल्कि एकाध अपवाद को छोड़ दें तो आज के अधिकाँश स्वयंभू नाटककार खुद रंगकर्मी ही हैं जो स्वयं ही नाटक के निर्देशक भी होते हैं और नायक भी। ऐसे में एक स्वस्थ परम्परा की नितान्त आवश्यकता है। जहाँ नाटककार और निर्देशक के बीच गहरी आस्था, परस्पर सम्मान तथा मोहन राकेश, श्यामानन्द जालान व ओमशिवपुरी वाला सौहार्द्रपूर्ण भाव हो, तभी एक और ‘आषाढ़ का एक दिन’ या ‘लहरों के राजहंस’ या ‘आधे-अधूरे’ का जन्म हो सकेगा। यानि व्यक्ति का आत्म परिष्कार ही सर्वोपरि है जो मेरे प्रस्तुत नाटक का केन्द्रीय कथ्य भी है। अपने जीवनानुभव के तहत जो बात मैंने अन्ततः महसूस की है, वही बात प्रस्तुत नाटक में एक पृथक् परिप्रेक्ष्य में रखने की कोशिश की है। इस विश्वास के साथ कि यही हमारे समय की सच्चाई है और मैं यह मानता हूँ कि सही रचनाकार वही है जो अपने समय की पदचाप को पकड़ने के लिए हर पल अपनी समस्त इन्द्रियों को सक्रिय रखे। वरना समय के इतिहास से कटा रचनाकार अन्ततः साहित्य के इतिहास से भी कट जाता है.....।

और अब अन्त में, मैं आभारी हूँ श्रद्धेय भीष्म साहनी तथा आदरणीय वेद सिन्हा का जिन्होंने मेरी रचनाओं में नाट्य सम्भावनाएं पाकर मुझे नाटक लिखने को बारम्बार प्रेरित किया। साथ ही सम्मान्य सत्येन्द्र तनेजा, जयदेव तनेजा तथा आनन्दगुप्त का जिन्होंने सृजन-प्रक्रिया के दौरान समय-समय पर मेरी पीठ थपथपायी और प्रिय मित्र जफ़र संजरी का जिन्होंने सृजन की पीडा़ को बहुत हद तक मेरे साथ बाँटा। इनके अतिरिक्त मैं उन सभी का आभारी हूँ जिनका प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से नाटक के साथ कोई-न-कोई सम्बन्ध अवश्य रहा है।......

विवेकानन्द

पात्र-परिचय


प्रमुख पात्र स्त्री पात्र
भइयाजी नेता अम्मा
चन्द्रदेव सन्तो
बिसेसर सीमन्ती
चेयरमैन-महाशयजी पतासो-लड़की
पण्डित जी लच्छो
मैनेजर
सिताबी


अन्य पात्र


लक्खी, बजरंगी, चीलर चमार, रंगीला (युवक-1), छबीला (युवक-2), बीमा साहब, शालिग्राम बाबू, सिधांरी लाल, फ़ॉर्मवाला, सिपाही-1, सिपाही-2 तथा मूसाबैण्ड पार्टी एवं अन्य ग्रामीणों की भीड़
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विशेष-इस नाटक के मंचन अथवा किसी भी अन्य उपयोग के लिए लेखक की लिखित पूर्वानुमति अनिवार्य है।


अन्ततः
दृश्य-1


(क्षीण प्रकाश में कुछ लोग मंच के बाएँ विंग से मरी हुई भैंस को रस्सी से खींचते हुए, ‘हई ज्जवाने, हईसा, जोर लगाओ, हईसा, का शोर मचाते हुए आते हैं और दाएँ विंग में निकल जाते हैं। लक्खी और बजरंगी का मंच पर दौड़ते हुए प्रवेश। पीछे से दौड़ता चीलर चमार आता है और दोनों हाथों से लक्खी व बजरंग का एक-एक बाजू पकड़ लेता है। मंच पर गाँव वालों की भीड़ जमा होती है। चीलर चमार ज़ोर-ज़ोर से रो रहा है। लक्खी-बजरंगी अपने को छुड़ा कर विंग में निकल जाना चाहते हैं। पर छुड़ा नहीं पाते।)

चीलरः (रोते हुए) नहीं-नहीं, हमारी जान ले लो, पर उसे हाथ मत लगाओ।
लक्खीः (हाथ में सुआ है) हाथ नहीं लगाएँगे, सुआ लगाएँगे।
चीलरः नहीं-नहीं...
बजरंगीः अबे, हम तेरा परलोक सुधार रहे हैं।
चीलरः हमें नहीं चाहिए, कुछ भी।
बजरंगीः तुझे नहीं चाहिए, हमें तो चाहिए। चुप करके बैठ जा।
चीलरः नहीं बैठूँगा।
लक्खीः तो लेट जा।

(दोनों जबरन उसे ज़मीन पर लिटाते हैं। चन्द्रदेव का बिस्तर-बक्सा लिए प्रवेश)

चन्द्रदेवः अरे, चीलर काका, क्या बात है। इस तरह से क्यों लोट रहे हो ? (इस बीच लक्खी-बजरंगी विंग के अन्दर जाना चाहते हैं। चीलर चमार चन्द्रदेव की ओर ध्यान न देकर फुर्ती से उठता है और उन दोनों को विंग के अन्दर से घसीट कर मंच पर लाता है।)
चीलरः हम सौ दफ़ा कह चुके हैं, जे उसे हाथ लगाया तो हम यहीं जान दे देगें।
चन्द्रदेवः क्यों भई, बजंरगी ! यह सब क्या हो रहा है ?...
बजरंगीः अरे चन्नर भइया, कब आये ? राम-राम !
चन्द्रदेवः राम-राम, लेकिन यह क्या मामला है ? यह हाथ में सुआ लिए लक्खी क्या कर रहा है ?...
लक्खीः (हाथ में सुआ पीछे छुपाते हुए) नमस्ते चन्नर भइया !...
चीलरः अरे, चन्नर बचवा, देखो-देखो, इन्हें रोको, सब लोग मिलकर उसे मार डालना चाहते है....
एक अन्य युवकः अरे, काका वो तो कब की मर चुकी है। अब उसे चन्नर भइया क्या, बचा तो उसे भगवान भी नहीं सकता।

(सभी ठहाका लगाते हैं। पर चन्द्रदेव गम्भीर है। चीलर उसी तरह रो रहा है।)

चन्द्रदेवः क्या पागलों की तरह दाँत निपोर रहे हो तुम लोग ! ठीक-ठीक क्यों नहीं बताते, बात क्या है ?...
युवक4 मैं बताता हूँ। बात कुछ भी नहीं है। बात सिर्फ़ इतनी सी है, कि चीलर काका की भैंस मर चुकी है और उस मरी भैंस के कान में लक्खी भइया एक छोटा सा, बिल्कुल छोटा-सा छेद करना चाहते हैं, बस।
चन्द्रदेवः छेद करना चाहते हैं ! लेकिन क्यों !....
युवक3 क्योंकि हम सब मिलकर उस मरी भैंस का जीवन बीमा करवाना चाहते हैं।

(चन्द्रदेव अवाक् देखता रहता है।)

सभीः हाँ-हाँ, ऽऽ जीवन-बीमा ऽऽ...
बजरंगीः रुको-रुको मैं समझाता हूँ। बात यह है कि लक्खी ने यहाँ के कापरेटिव बैंक से लोन लेकर एक भैंस ख़रीदी है। उस भैंस का जीवन-बीमा भी करवा रखा है। अब इसी बीच हमारे चीलर काका की भैंस मर गई जिसका कोई बीमा नहीं। तो हम लोगों ने सोचा कि चीलर काका के साथ-साथ हमारा भी कुछ भला हो जाये।
चन्द्रदेव  (हँसकर) तो इसका मतलब है कि चीलर काका की मरी भैंस के कान में बीमा कम्पनी की मुरकी डालकर तुम लोग कम्पनी को चूना लगाना चाहते हो।
लक्खीः हाँ ऽऽ अब देखो, इत्ती सी बात हमारे काका की समझ में नहीं आ रही है कि कम्पनी से मिलने वाली आधी रकम इनकी, और आधी हमारी...

बजरंगीः अब तुम्हीं बताओ भइया, कि इसमें आख़िर बुराई क्या है ! मेहनत तो हम भी कर रहे हैं। अब देख, आठ आदमियों से उठवाकर भैंस को अपने दुआर पर लाया, तो उन्हें भी कुछ-न-कुछ मज़दूरी तो देनी ही पड़ेगी। साथ ही क़स्बे जाकर इन बीमा साहब को (भीड़ से एक मरियल व्यक्ति को बाहर लाता है) लेकर यहाँ आया तो इन्हें भी ख़ुश करना ही होगा। आख़िर तभी तो लक्खी की भैंस मारेंगे ये (लक्खी चौंकता है।) अपने बही-खाते में !

(वह मरियल-सा शहरी बाबू, जिसके हाथ में ‘बीमा एजेंट’ लिखा सूटकेस है, दाँत निपोरता है।)

चन्द्रदेवः लेकिन यह तो सरासर गलत है। मैं तो बनारस से मन बनाकर आया था कि तुम लोगों के साथ मिलकर भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ जनमत तैयार करूँगा। लेकिन देख रहा हूँ कि यहाँ तुम लोग उल्टे भ्रष्टाचार में शामिल हो। क्या तुम लोगों को नहीं लगता कि यह ग़लत है !...
बजरंगीः हुँ..क्या ग़लत है और क्या सही ! अरे भइया कम्बल ओढ़ कर माँड़ सुड़कते जाओ, तो सब सही-ही-सही है, वरना सब गलत...
चन्द्रदेवः साफ़-साफ़ क्यों नहीं कहते, कि तुम लोग अपने-अपने टुच्चे स्वार्थों से चिपके रहना चाहते हो।...
लक्खीः हमारी छोड़ो भइया, पहले अपनी सुनाओ ! हमने तो सुना है, तुम्हें एम.ए. करने के बाद भी नौकरी नहीं मिली। क्या यह ग़लत नहीं है !
चन्द्रदेवः (लगभग बौखलाकर) हाँ, मुझे नौकरी नहीं मिली। क्योंकि मैंने तुम लोग की तरह बहती गंगा में हाथ धोना नहीं सीखा है....
बजरंगीः तो फिर गाँव क्या करने आ गये ? यहाँ कौन सी नौकरी धरी है !

चन्द्रदेवः मैं यहाँ के कापरेटिव बैंक से क़र्ज लेकर, बैलों की जोड़ी खरीदूँगा और अपने हाथों अपनी खेती करूँगा, समझे ! मैं तुम्हारी तरह नहीं हूँ कि पढ़-लिखकर भी, नौकरी नहीं मिली तो भ्रष्टाचार को रोकने की बजाय उसे और बढ़ावा दूँ।
बीमा एजेंट  आप बिलकुल दुरुस्त फरमा रहे हैं ज़नाब, लेकिन क्या आप ऐसा सोचते हैं कि यहाँ की कोपरेटिव बैंक से बिना रिश्वत दिये ही आपको लोन मिल जायेगा ! और यदि आप ऐसा समझते हैं, तो बहुत बड़ी ग़लतफ़हमी में हैं।
चन्द्रदेव  लेकिन इतना ज़रूर मैं जानता हूँ कि आपसे बड़ी ग़लतफ़हमी का शिकार अभी मैं नहीं। और यह भी, मैं अच्छी तरह से जानता हूँ कि यहाँ जो कुछ भी हो रहा है, उसमें आपका भी हाथ है। जबकि आप एक सरकारी नौकर हैं। और मेरी एक शिक़ायत पर आपकी नौकरी जा सकती है।

(भीड़ में कानाफूसी शुरू हो जाती है।)

युवक3 पर चन्दर भइया ! ये तो बीमा-साहब हैं, इन्होंने तो अपनी नौकरी का भी जीवन-बीमा करवा रखा होगा।..
युवक4 (युवक3-से) अबे, चुप-चुप ! कहीं नौकरी का भी जीवन-बीमा होता है ! जीवन बीमा तो गाय-भैंस और आदमी का होता है, जिनके कान होते हैं और जिनके कान में मुरकी डाली जाती है। नौकरी के तो कान नहीं होते, कहाँ तो तू करेगा भुरकी, और कैसे तू डालेगा उसमें मुरकी !....
(भीड़ ठहाका लगाती है।)
बीमा एजेंटः हँस लो, जितना चाहे, हँस लो। लेकिन यह जान लो कि इन साहब के टेंटियाने मात्र से मेरा कुछ नहीं बिगड़ेगा। अभी, इसी दम, इस मरी भैंस के कान में, मैंने बीमा कम्पनी की मुरकी न डाल दी, तो कम्पनी मैंनेजर का, असल दामाद नहीं मैं।...आओ दोस्त आगे बढ़ें..
(एजेंट के पीछे भीड़ का तेज़ी से प्रस्थान। चन्द्रदेव हतप्रभ खड़ा रह जाता है।)
चीलरः (दहाड़ मार कर रोते हुए) नहीं, नहीं हमारी जान ले लो, पर उसे हाथ मत लगाओ...
(अन्धकार)
(प्रकाश)
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1.छल्ला।
2.छेद।


दृश्य-2



(समय-सुबह। चन्द्रदेव के घर का दालान। बिसेसर महतो हाँफते हुए कुट्टी काट रहे हैं और अम्मा ओसारा बुहार रही है। पार्श्व से गाय रम्भाने की ध्वनि)
बिसेसर :-अरी, ओ सन्तो ! जल्दी से बाल्टी भर कर ला, देखती नहीं, मारे भूख के तेरी झुमनी गैया झूमे जा रही है और नन्हीं बछिया इत्ती देर से रम्भा रही है !....
सन्तो : (प्रवेश करते हुए) लाई बाबू, लाई ऽऽ..(पानी भरी बाल्टी रखती है।)
बिसेसर : (बाल्टी में कुट्टी उठाकर डालते हुए)-जा, -जाकर एक बाल्टी पानी नांद में भी डाल दे, तब तक मैं झुमनी को पानी देकर दुहने की तैयारी करता हूँ..तेरा भैया जाग गया !...
सन्तो : नहीं, अभी सो रहे हैं, क्या जगा दूँ ! (जाने लगती है।)

बिसेसर : हाँ,...और सुन, झटपट चाय का पानी भी रख दे।
अम्मा : (हाथ रोक कर) पानी तो, मैं रख दूँगी लेकिन क्या मुँह अँधेरे ही बबुआ को जगा देना ठीक रहेगा, आधी रात तक तो तुम उससे बनारस की बातें पूछते रहे..(झाड़ू लगाने लगती है)।
सन्तो : पूरे शहरी बाबू हो गये हैं, अपने चन्दर भैया ! उन्हें बैड-टी मिलेगी, तभी तो जाएँगे.!..(हँसती है)..तो चाय का पानी रख दूँ, न !..(हँसते हुए बिसेसर बाल्टी लेकर जाते हैं)।
(चन्द्रदेव का प्रवेश)
चन्द्रदेव : बेड-टी नहीं, सिर्फ टी चाहिए। और वह भी नाश्ते के साथ। अभी तो तू जा और एक गिलास पानी लाकर पिला मुझे...(सर पर पीछे से चपत लगाता है।)
सन्तो : अरे लो, आप तो जग भी गये...(जाती है।)
अम्मा : तू नाश्ते में दूध नहीं पीयेगा रे ! तेरे आने की ख़बर सुनकर ही तेरे बाबू ने, अभी तीन दिन पहले ही एक गाय ख़रीदी है। देख तो, दूध के बिना इन तीन सालों में तेरा चेहरा कैसा झुर्रा गया है ! कोई देखे तो पहली नज़र में पहचान भी न पाये...
(बिसेसर का प्रवेश)
बिसेसर: अब खड़ी-खड़ी बतियाती ही रहेगी ! चलो, तुम बछिया को लाओ, मैं झुमनी को नाँद पर बाँधता हूँ। (मंच के पीछे के भाग में जाता है। अम्मा बुहारन उठाकर मंच के अगले भाग से बाहर फेंकने जाती है। सन्तो का प्रवेश)
सन्तो: (पानी का गिलास पकड़ा कर) लीजिए।
चन्द्रदेव: (अन्दर जाती अम्मा से) अम्मा, जायदाद के सभी क़ाग़ज़ात सहेज कर मेरी मेज़ पर रख देना। उन्हें लेकर मुझे कर्ज़ के लिये बैंक जाना हैं। (पानी पीता है।)

सन्तो : अच्छा भैया ! तो आज आप सीमन्ती के घर जायेंगे।
चन्द्रदेव: (चौंकता है) मैं बात बैंक की कर रहा हूँ, अब यह तेरी सीमन्ती बीच में कहाँ से आ गई !...
सन्तो : (शरारत से) मेरी या आपकी !...
चन्द्रदेव : भई, मेरी क्यों !
सन्तो : अब शरमाइए मत भइया, मुझे सब पता है। सीमन्ती ने मुझे सब कुछ बता दिया है। (गिलास वापस लेती है) कर्ज तो बैंक से आपको चुटकी बजाते ही मिल जाएगा।..
चन्द्रदेव : क्यों भला, ये क्या बात हुई !...
सन्तो : क्योंकि आपकी सीमन्ती के पिता, महाशय जी, कोपरेटिव सोसाइटी के चेयरमैन जो हो गये हैं !...
चन्द्रदेव : (हँसकर) अच्छा-अच्छा, तो यह बात है। (गम्भीर होकर) अच्छा, एक बात बता, क्या बैंक भी चेयरमैन महाशय जी की कोठी में ही खुल गया है। जो मुझे वहां जाना होगा।
सन्तो : अरे भइया, आप तो बस ! वह तो है ही वहाँ। मैं तो यह कह रही थी कि क़र्ज़ लेने से पहले उनसे बात भी तो करनी होगी !
चन्द्रदेव : क्यों उनसे क्यों ? मैं तो सीधा बैंक मैनेजर से ही जाकर मिलूँगा न !...
सन्तो : (पास बैठते हुए) लेकिन भैया, सीमन्ती से नहीं मिलोगे ? और मैंने तो सुना है कि बिना जान-पहचान के गाँव में किसी को भी क़र्ज़ नहीं मिल रहा है और जिन्हें अभी तक मिला है वह पहले चेयरमैन साहब के घर होकर आये हैं।
अम्मा : (दूध की बाल्टी लिये रसोईघर में घुसती हुई) सन्तो ! ऽऽ...

सन्तो : हाँ, अम्मा ऽऽ...
अम्मा : इधर आ।
सन्तो : आई...ऽऽ
(अम्मा के पीछे सन्तो का प्रस्थान)
(सिताबी चौधरी बंटाईदार की पीठ पर धान की बोरी लिये प्रवेश)
सिताबी : (मंच पर बोरी रख कर) राम-राम चन्नर बाबू ! शहर से कब आना हुआ !....
चन्द्रदेव : अरे सिताबी चौधरी !..राम-राम। सुबह-सुबह यह क्या लेकर आये हो !
(बिसेसर का प्रवेश)

बिसेसर : (अँगोछे से गर्दन का पसीना पोंछते हुए) कौन है, सिताबी।
सिताबी : हाँ महतो जी ! बंटाईदारी ले आये हैं। अब का कहें। पहले तो ससुरा सूखा पड़ा रहा, उस पर से कोपरेटिव से मिली खाद में भी मिलावट थी। एक तो इस बार पैदावार ही आधी हुई...और दूसरे रहा सहा ससुरा सांड़ चर गया। अब जो है सो यही है..
बिसेसर : (बिगड़कर) बस भैया बस ! बहुत सुन चुके हम तेरा रोना ! हर बार कोई न कोई बहाना लेकर बटाईदारी के नाम पर दो मुट्ठी पकड़ा जाता है तू ! अरे पूरा गाँव जानता है कि तू हमारी मज़बूरी का फ़ायदा उठा रहा है। हम कहते हैं तेरी सारी बात सही भी मान लें, तब भी, कम-से-कम दस मन धान तो तुमने खलिहान से उगाहा ही है। अरे, तू आधा नहीं देना चाहता तो यह आधा मन भी ले जा चल उठ।...
सिताबी : अब का बतायें महतो, रामकिरिया, इतना ही हुआ है।
चन्द्रदेव : सिताबी, बहुत हुआ। अब आगे से हमें बंटाईदारी पर किसी से भी खेत नहीं जुतवाना है। और जो तुम कर रहे हो, ये तो हम होने नहीं देगे।..

सिताबी : ऐसा न कहो चन्नर बाबू, तब तो हमारे बाल-बच्चे भूखे मर जायेंगे।
बिसेसर: चल जा-जा, बातें तो ऐसी बना रहा है जैसे हम भी आज बनारस से ही आये हैं। देख तू, ‘अनकर1 धन पर विक्रम राजा’..बहुत बन चुका। लुटेरा नहीं तो ! चल, जा ! हम अपने खेती, अब आप ही कर लेंगे।
सिताबी : हम तो अगले साल के लिये भी टीपा-सही करवाने के लिये आये थे..(साँस भरकर) पर अब आप लोगों की जैसी मर्जी ! (आवेश में) अरे, कोई दूसरा बटाईदार, इससे दो दाना भी
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1.पराए।

बढ़त दे दे तो सिताबी चौधरी, बकरी के मूत से अपनी आधी मूँछें मुँड़वा लेना। हुं, बड़े ज़मीनदार बने फिरते हैं !...
(मूँछे उमेठते हुए प्रस्थान)
चन्द्रदेव : अरे-अरे, कैसे आदमी हो। एक तो चोरी, उस पर से सीना ज़ोरी ! आगे बढ़ते हुए ठहरो ज़रा, देखते हैं हम।
(सिताबी जा चुका है। हाथ में पानी का लोटा लिये अम्मा का प्रवेश)
बिसेसर : अरे, छोड़ो बबुआ ! ये लोग बहुत ज़्यादा संहक गये हैं। न देव तो कुत्ते की तरह दिन-भर में चौदह चक्कर काटेंगे और दे दो तो पलट कर भौंकने लगते हैं।
अम्मा : हाँ, ऐसों के मुँह लगकर तो अपनी ज़बान को ही का़लिख लगाना होता है। परन्तु इनसे दूर ही रहना बबुआ। चलो, अब चल के हाथ-मुँह धो लो। फिर तुझे क़र्ज़ लेने बैंक भी तो जाना है।..
(मंच के एक ओर जाकर बारी-बारी से बिसेसर और चन्द्रदेव की अँजुरी में पानी उड़ेंलती है।)
(अन्धकार)





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