दो मित्र - विष्णु प्रभाकर Do Mitra - Hindi book by - Vishnu Prabhakar
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दो मित्र

विष्णु प्रभाकर

प्रकाशक : राजपाल एंड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :64
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 1394
आईएसबीएन :9788170283508

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बालपयोगी कहानियाँ.....

Do Mitra

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

दो मित्र

पूर्वी पंजाब के एक छोटे से कस्बे में दो मित्र रहते थे, मंहदीहसन और भागीरथलाल। मंहदीहसन एक छोटे से जमींदार थे और भागीरथलाल एक स्कूल-मास्टर। मंहदीहसन के बाप जिंदा थे और हाथ रोककर खर्च करने में विश्वास करते थे। इसके विपरीत मंहदीहसन का हाथ खुला हुआ था। उन्हें जब कभी पैसे की तंगी होती तो वे मित्र का सहारा लेते। होते-होते उन पर सैकड़ों रुपयों का क़र्ज हो गया। देते भी रहते थे पर हिसाब कभी चुकता नहीं होता था।

और सच पूछो तो हिसाब जैसी कोई चीज़ थी भी नहीं। मंहदीहसन को जब कभी रुपयों की ज़रूरत होती तो माँग लाते, न रुक्का था न तमस्सुक। वचन सब कुछ था। मित्रता भेद नहीं जानती, काग़ज पत्र भेद डालते हैं। फिर मंहदी और भागीरथ उस भेद को कैसे पास आने देते। दोनों दो शरीर एक प्राण थे। दोनों को शतरंज का शौक था। बाजी लगती तो लग ही जाती। घंटों दोनों सिर पर हाथ रखे सोचा करते, दिन डूब जाता मगर भागीरथ के वजीर को रास्ता नहीं मिलता। मंहदी कभी मुस्कराता, कभी चमककर कहता—अमां, चल भी दो, कहां जाएगा भागकर।

—हूँ—भागीरथ जवाब देता—चल कैसे दूँ। तेरा मोहरा बैठा है न ! नाग बनकर डस लेगा, पर बच्चू ! याद रखना वह मात दूँगा कि खेल भूल जाएगा।
मंहदी हँस पड़ता—भूल जाऊँगा तो तुम्हें ही सिखाना होगा।
भागीरथ भी हँस पड़ता और मात पीछे पड़ जाती।
सदा की भाँति एक दिन दोनों दोस्त बैठे खेल रहे थे। शरतंज का खेल शाही होता है। खेलने वाले भी उसके प्रभाव में आ जाते हैं। मंहदी ने जब एक बार बहुत देर तक चाल नहीं चली तो भागीरथ ने कहा—अरे भई, चलो न चाल। क्या वजीर को पकड़े बैठे हो !
मंहदी ने सोचते हुए जवाब दिया—चलता हूँ। ऐसी भी क्या जल्दी है ?
भागीरथ-जल्दी क्या करेगी, एक घंटा हो चुका है।

मंहदी—आप एक घंटे की बात करते हैं, जनाब, यहाँ एक जिन्दगी गुजर जाती है पर चाल नहीं चली जाती।
भागीरथ—आग लगे ऐसी जिन्दगी में। ऐसे लोग बुद्धू होते हैं।
मंहदी—बुद्धू नहीं जनाब, यह खेल शाही लोगों का है।
भागीरथ इसमें शाही और बे-शाही की क्या बात है। मैं जानता हूँ कि यह सब अपना बेवकूफी को छिपाने की चाल है।
इस प्रकार बात बढ़ने लगी पर बाजी नहीं बढ़ी। चाल बहुत धीरे-धीरे चलती रही। हाँ, इस बार मंहदी दबाव में थे तो दूसरी बार भागीरथ दब गए। लगे सोचने और गुनगुनाने। तब मंहदी ने कहा—मियाँ, यह मुशायरा नहीं है, शतरंज का खेल हैं। चाल चलो !
भागीरथ—चलता हूँ।
मंहदी—चल चुके ! खेलना जानते नहीं, चले खेलने।
भागीरथ—तुम बहुत जानते हो। अभी तो...।
मंहदी—अभी तो क्या ? चाल चलो।

—चाल चलो—झुँझलाकर भागीरथ ने कहा और फीला को उठाकर आठ नम्बर पर रख दिया लेकिन हाथ से छोड़ा नहीं। मंहदी ने देखा तो खुशी से चिल्ला उठा और प्यादे को उठाकर तेजी से बोला.....
पर वह एक शब्द भी नहीं बोल पाया था कि भागीरथ ने फीले को उठाकर फिर अपनी जगह पर रख दिया। एक बार तो कुछ समझ नहीं सका कि यह क्या हुआ दूसरे ही क्षण चिल्लाकर बोला—फीला वहीं रख दो।
भागीरथ—क्यों रख दूँ। अभी मैंने चाल चली कहाँ है, मैं तो देख रहा था।
मंहदी—तुमने आठ नम्बर पर फीला नहीं रखा ?
भागीरथ—जी नहीं ! मैंने उसे हाथ से नहीं छोड़ा था।
मंहदी—हाथ से नहीं छोड़ा। हाथ ले जन्मभर नहीं छोड़ो तो क्या चाल नहीं मानी जाएगी।
भागीरथ—जी हाँ, नहीं मानी जाएगी।

मंहदी—कैसे नहीं मानी जाएगी। कोई धींगा-मस्ती है। खेल सीखो, रोते क्यों हो ?
भागीरथ—रोते तुम हो। हार रहे थे तो लगे चिल्लाने।
मंहदी—हार तो तुम रहे हो। दूसरे को चकराते हो। खेलना चाहते हो तो मोहरा वहीं रख दो।
भागीरथ—नहीं रखता। धमकी क्यों देते हो ? जमींदार हो तो क्या मार डालोगे।
मंहदी—हाँ, मार डालूँगा। तुमने समझा क्या है ? मक्कारी करते हो।
यह सुनना था कि भागीरथ तेज हो उठा। उसने शतरंज को लात मारी और क्रोध से भरकर कहा—क्या बकते हो ? किस बात का जोम है तुम्हें ? क्या समझा है तुमने ? मैं भागीरथ हूँ। तुम्हारा मुँह तक नहीं देखूँगा। तुम्हारे पास तक आकर नहीं फटकूँगा।
और फिर बहुत बकझक करके जिसमें मंहदी ने भी सारा भाग लिया, भागीरथ सीधा अपने घर चला गाया। क्रोध से दोनों तिलमिला रहे थे। दोनों अपने आपको भूल चुके थे। भागीरथ बहुत देर तक घर जाकर लेटे रहे फिर जब धीरे-धीरे तेजी कुछ कम हुई तो उन्होंने उठना चाहा तभी मंहदी का पुराना नौकर सामने आकर खड़ा हो गया। वह कुछ अनमना सा था। बोला—छोटे मालिक ने यह चिट्ठी दी है।

भागीरथ उबल पड़ा—क्या है ?
नौकर—यह चिट्ठी है।
भागीरथ ने चिट्ठी ले ली। उसमें लिखा था—मैंने तुमसे बहुत कर्ज़ लिया है। अब भी मुझे तुम्हारे कई सौ रुपये देने हैं। उनकी कोई तहरीर नहीं है। शायद तुम सोचते होगे कि मैं कभी इनकार कर सकता हूँ। ठीक भी है, किसी का क्या पता। इसलिए मैं उन रुपये का रुक्का लिखकर भेज रहा हूँ।
चिट्ठी पढ़कर भागीरथ शान्त होने के स्थान पर और भी तेज हो उठे। आँखों से चिनगारियाँ उड़ने लगीं। रुक्के को पढ़ा तक नहीं। टुकड़े-टुकड़े करके बाहर फेंक दिया और चिल्लाकर कहा—मुझे क्या समझा है। मैं इतना नीच हूँ कि रुक्का लिखवाऊँगा। मैं...मैं...अपने को नवाब समझते हैं। लाट साहब ! लेकिन...लेकिन...

नौकर ने यह हालत देखी तो उल्टे पैर भागा। भागीरथ ने तब और भी चिल्ला कर कहा—कह देना कि मैं इतना नीच नहीं हूँ कि किसी की नीयत पर शक करूँगा।

नौकर ने घर आकर सब कुछ मंहदीहसन से कह दिया। मंहदी ने सुन लिया। क्षण भर कुछ सोचा फिर उसका सारा शरीर काँपने लगा। न जाने क्या हुआ जैसे खड़ा था वैसे ही दौड़ पड़ा। सीधे भागीरथ के घर पहुँचा और उसकी कौली भर ली। भागीरथ एक बार तो तमतमाया, अपने को छुड़ाने की कोशिश की पर फिर पिघल गया।

कुछ देर बाद नौकर ने देखा कि दोनों मित्र फिर शतरंज की बाजी लगाए अट्टहास कर रहे हैं।

 

सबसे सुन्दर लड़की

 

 

समुद्र के किनारे एक गाँव था। उसमें एक कलाकार रहता था। वह दिन भर समुद्र की लहरों से खेलता रहता, जाल डालता और सीपियाँ बटोरता। रंग-बिरंगी कौड़ियाँ, नाना रूप के सुन्दर-सुन्दर शंख चित्र-विचित्र पत्थर, न जाने क्या-क्या समुद्र जाल में भर देता। उनसे वह तरह-तरह के खिलौने, तरह-तरह की मालाएँ तैयार करता और पास के बड़े नगर में बेच आता।

उसका एक बेटा था, नाम था उसका हर्ष। उमर अभी ग्यारह की भी नहीं थी, पर समुद्र की लहरों में ऐसे घुस जाता, जैसे तालाब में बत्तख।
एक बार ऐसा हुआ कि कलाकार के एक रिश्तेदार का एक मित्र कुछ दिन के लिए वहाँ छुट्टी मनाने आया। उसके साथ उसकी बेटी मंजरी भी थी। होगी कोई नौ-दस वर्ष की, पर थी बहुत सुन्दर, बिल्कुल गुड़िया जैसी।

हर्ष बड़े गर्व से उसका हाथ पकड़कर उसे लहरों के पास ले जाता। एक दिन मंजरी ने चिल्ला कर कहा, ‘‘तुम्हें डर नहीं लगता ?’’
हर्ष ने जवाब दिया, ‘‘डर क्यों लगेगा, लहरें तो हमारे साथ खेलने आती हैं।’’
तभी एक बहुत बड़ी लहर दौड़ती हुई हर्ष की ओर आई, जैसे उसे निगल जाएगी मंजरी चीख उठी, पर हर्ष तो उछलकर उस लहर पर सवार हो गया और किनारे आ गया।
मंजरी डरती थी, पर मन-ही-मन चाहती थी कि वह भी समुद्र की लहरों पर तैर सके। जब वह वहाँ की दूसरी लड़कियों को ऐसा करते देखती तो उसे यह तब और भी जरूरी लगता था। विशेषकर कनक को, जो हर्ष के हाथ में हाथ डालकर तूफानी लहरों पर दूर निकल जाती।

वह बेचारी थी बड़ी गरीब। पिता एक दिन नाव लेकर गए, तो लौटे ही नहीं। डूब गए। तब से माँ मछलियाँ पकड़कर किसी तरह दो बच्चों को पालती थी। कनक छोटे-छोटे शंखों की मालाएँ बनाकर बेचती थी। मंजरी को वह अधनंगी काली लड़की ज़रा भी नहीं भाती थी। हर्ष के साथ उसकी दोस्ती तो उसे कतई पसन्द नहीं थी।
एक दिन हर्ष ने देखा कि कई दिन से उसके पिता एक सुन्दर-सा खिलौना बनाने में लगे हैं। वह एक पक्षी था, जो रंग-बिरंगी सीपियों से बनाया गया था। वह देर तक देखता रहा, फिर पूछा, ‘‘बाबा ! यह किसके लिए बनाया है ?’’
कलाकार ने उत्तर दिया, ‘‘यह सबसे सुन्दर लड़की के लिए है। मंजरी सुन्दर है न ? दो दिन बाद उसका जन्म दिन है। उस दिन इस पक्षी को उसे भेट में देना।’’

हर्ष की खुशी का पार नहीं था। बोला, ‘‘हाँ-हाँ, बाबा मैं जरूर यह पक्षी मंजरी को दूँगा।’’
और वह दौड़कर मंजरी के पास गया। उसे समुद्र के किनारे ले गया और बातें करने लगा। फिर बोला, ‘‘दो दिन बाद तुम्हारा जन्म दिन है।
‘‘हाँ ! पर, तुम्हें किसने बताया ?’’
‘‘बाबा ने ! हाँ, उस दिन तुम क्या करोगी ?’’
‘‘सवेरे उठकर स्नान करूँगी। फिर सबको प्रणाम करूँगी। घर पर तो सहेलियों को दावत देती हूँ। वे नाचती-गाती हैं। यहाँ भी दावत दूँगी।’’
और इस तरह बातें करते-करते वे न जाने कब उठे और दूर तक समुद्र में चले गए। सामने एक छोटी-सी चट्टान थी। हर्ष ने कहा, ‘‘आओ, उस छोटी चट्टान तक चलें।’’
मंजरी काफी निडर हो चली थी। बोली, ‘‘चलो।’’ लेकिन दो क्षण बाद अचानक तभी हर्ष ने देखा कि कनक बड़ी चट्टान पर बैठी है। कनक ने चिल्लाकर कहा, ‘‘हर्ष यहाँ आ जाओ।’’
हर्ष ने जवाब दिया, ‘‘मंजरी वहाँ नहीं आ सकती। तुम्हीं इधर आ जाओ।’’
अब मंजरी ने भी कनक को देखा। उसे ईर्ष्या हुई। वह वहाँ क्यों नहीं जा सकती। वह क्या उससे कमजोर है।

वह यह सोच ही रही थी कि उसे एक बहुत सुन्दर शंख दिखाई दिया। मंजरी अनजाने ही उस ओर बढ़ी। तभी एक बड़ी लहर ने उसके पैर उखाड़ दिए और वह बड़ी चट्टान की दिशा में लुढ़क गई। उसके मुँह में खारा पानी भर गया। उसे होश नहीं रहा।
यह सब आनन-फानन में हो गया। हर्ष ने देखा और चिल्लाता हुआ वह उधर बढ़ा, पर तभी एक और लहर आई और उसने उसे मंजरी से दूर कर दिया। अब निश्चित था कि मंजरी बड़ी चट्टान से टकरा जाएगी, परन्तु उसी क्षण कनक उस क्रुद्ध लहर और मंजरी के बीच आ कूदी और उसे हाथों में थाम लिया। दूसरे ही क्षण तीनों छोटी चट्टन पर थे। हर्ष और कनक ने मिलकर मंजरी को लिटाया, छाती मली, पानी बाहर निकल गया। उसने आँखें खोल कर देखा। उसे ज़रा भी चोट नहीं लगी थी। पर वह बार-बार कनक को देख रही थी।

अपने जन्म दिन की पार्टी के अवसर पर मंजरी बिलकुल ठीक थी। उसने सब बच्चों को दावत पर बुलाया। सभी उसके लिए कुछ-न-कुछ उपहार लेकर आए थे। सबसे अन्त में कलाकार की बारी आई। उसने कहा ‘मैंने सुन्दर लड़की के लिए सबसे सुन्दर खिलौना बनाया है। आप जानते हैं, वह लड़की कौन है ? वह है मंजरी।’’
सबने खुशी से तालियाँ बजाईं। हर्ष अपनी जगह से उठा और उसने बड़े प्यार से वह सुंदर खिलौना मंजरी के हाथों में थमा दिया। मंजरी बार-बार उस खिलौने को देखती और खुश होती।
लेकिन दो क्षण बाद अचानक मंजरी अपनी जगह से उठी। उसके हाथों में वही सुन्दर पक्षी था। वह धीरे-धीरे वहाँ आई, जहाँ कनक बैठी थी। उसने बड़े स्नेह भरे स्वर में उससे कहा, ‘‘यह पक्षी तुम्हारा है सबसे सुन्दर लड़की तुम्हीं हो।’’
और एक क्षण तक सभी अचरज से दोनों को देखते रहे। फिर जब समझे तो सभी ने मंजरी की खूब प्रशंसा की। कनक अपनी प्यारी-प्यारी आँखों से बस मंजरी को देखे जा रही थी। और दूर समुद्र में लहरें चिल्ला-चिल्लाकर उन्हें बधाई दे रही थीं।

 

मैंने झूठ बोला था

 

 

एक बालक था। नाम था उसका राम। उसके पिता बहुत बड़े पंडित थे। वह बहुत दिन जीवित नहीं रहे। उनके मरने के बाद राम की माँ अपने भाई के पास आकर रहने लगी। वह एकदम अनपढ़ थे। ऐसे ही पूजा-पाठ का ठोंग करके जीविका चलाते थे। वह झूठ बोलने से भी नहीं हिचकते थे।
वे पेशवा के राज में रहते थे। पेशवा विद्वानों का आदर करते थे। उन्हें वे दक्षिणा देते थे। वे विद्यार्थी को भी दक्षिणा देते थे। वे चाहते थे कि उनके राज में शिक्षा का प्रसार हो।
एक दिन बहुत से विद्वान पंडित और विद्यार्थी दक्षिणा लेने महल में पहुँचे। बड़े आदर से सूबेदार ने उन्हें बैठाया। उन्हीं में राम और उसके मामा भी थे। लेकिन वे न तो एक अक्षर पढ़ सकते थे और न लिख सकते थे। राम बार-बार धीरे-धीरे मामा से कहता, ‘‘मामा ! मैं तो घर जा रहा हूँ ।’’

मामा हर बार डाँट देते, ‘‘चुप रह ! जब से आया है टर-टर किए जा रहा है।’’
राम कहता, ‘‘नहीं मामा। मैं यहाँ नहीं बैठूँगा। मैं कहाँ पढ़ता हूँ। मैं झूठ नहीं बोलूँगा।’’
राम जब नहीं माना तो मामा ने किचकिचाकर कहा, ‘‘चुप नहीं रहेगा। झूठ नहीं बोलूँगा। हूँ ऊ...। जैसे सच बोलने का ठेका तेने ही तो ले रखा है। जानता है मैं दिन भर झूठ बोलता हूँ। कितनी बार झूठ बोलकर दक्षिणा ली। तू भी तो बार-बार झूठ बोलता है। नहीं बोलता ? सब इसी तरह कहते हैं। जो ये सब यहाँ खड़ें हैं ये सब क्या पढ़े हुए हैं।’’

राम ने कहना चाहा, ‘पर मामा...’ लेकिन मामा ने उसे बोलने ही नहीं दिया। डपटकर बोला, ‘‘अरे खड़ा भी रह। तेरे सत्य के लिए मैं घर आती लक्ष्मी नहीं लौटाऊँगा, समझे। पूरा एक रुपया मिलेगा एक चेराशाही बस, चुप खड़ा रह। बारी आने वाली है।’’
तभी पेशवा के प्रतिनिधि आ पहुँचे। उनके बैठते ही सूबेदार ने विद्वानों की मंडली से कहा, ‘‘कृपा करके आप एक-एक करके आते जाएँ और दक्षिणा लेते जाएँ। हाँ-हाँ, आप आइए, गंगाधर जी।’’
गंगाधर जी आगे आए। सूबेदार ने उनका परिचय दिया, ‘‘जी ये हैं श्रीमान गंगाधर शास्त्री। न्याय पढ़ाते हैं।’’

पेशवा के प्रतिनिध ने उन्हें प्रणाम किया। दक्षिणा देते हुए बोले, ‘‘कृपा कर यह छोटी-सी भेंट ग्रहण कीजिए और खूब पढ़ाइए।’’
शास्त्री जी ने दक्षिणा लेकर पेशवा का जय-जयकार किया और उनकी कल्याण कामना करते हुए चले गए। फिर दूसरे आए, तीसरे आए। चौथे नम्बर पर राम के मामा थे। वे जब आगे बढ़े तो सूबेदार ने उन्हें ध्यान से देखा, कहा ‘‘मैं आपको नहीं पहचान रहा आप कहाँ पढ़ाते हैं ?’’
मामा अपना रटारटाया पाठ भूल चुके थे। ‘मैं’ ‘मैं’ करने लगे। प्रतिनिधि ने बेचैन होकर पूछा, ‘‘आपका शुभ नाम क्या है ? क्या आप पढ़ाते हैं ? बताइए न।’’

लेकिन मामा क्या बतावें ? इतना ही बोल पाए, ‘‘मैं...मैं....जी मैं...जी मैं वहाँ।’’
उनको इस तरह बौखलाते हुए देखकर सब लोग हँस पड़े। पेशवा के प्रतिनिधि ने कठोर होकर कहा, ‘‘जान पड़ता है आप पढ़े-लिखे नहीं हैं। खेद है कि आजकल कुछ लोग इतने गिर गए हैं कि झूठ बोलकर दक्षिणा लेते हैं। आप ब्राह्मण हैं। आपको झूठ बोलना शोभा नहीं देता। आपको राजकोष से दक्षिणा नहीं मिल सकती पर जो माँगने आया है उसे निराश लौटाना भी अच्छा नहीं लगता। इसलिए मैं आपको अपने पास से भीख देता हूँ। जाइए।’’

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