Loi ka Tana - Hindi book by - Rangey Raghav - लोई का ताना - रांगेय राघव
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लोई का ताना

रांगेय राघव

प्रकाशक : राजपाल एंड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :128
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 1443
आईएसबीएन :9788170287186

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अद्वितीय कवि कबीर के जीवन पर आधारित श्रेष्ठ उपन्यास प्रख्यात साहित्यकार रांगेय राघव की यशस्वी लेखनी से

Loi ka tana

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

भूमिका

प्रस्तुत ग्रन्थ में कबीर की झाँकी है।
वैसे कबीर के जीवन सम्बन्धी तथ्य अधिक नहीं मिलते। मैं उनके साहित्य को पढ़कर जिन निष्कर्षों पर पहुँचा हूँ उन्हीं को मैंने उनके जीवन का आधार बनाया है। कबीर पहले निम्नजातीय हिन्दू बनकर रहना चाहते थे। पर रामानन्द की दीक्षा के बाद वे जात-पाँत की ओर से संदिग्ध हो गए। वे पहले अवतारवाद मानते थे। फिर वे निर्गुण की ओर झुके। फिर योगियों के रहस्यवाद और षड्चक्र साधना आदि की ओर। बाद में वे सहज साधना में चमत्कारवाद से आगे बढ़ गए। अन्त में तो वे एक नई भूमि पर पहुँच गए जिसका वर्णन यहाँ मैंने किया है। कबीर को लोगों ने गलत समझा है। कबीर में सूफीमत, वेदान्त, रहस्यवाद, नारीनिन्दा तथा अनेक बातें हैं जैसे संसार की असारता पर जोर, मायावाद आदि का वर्णन, पर ये अनेक विकास की मंजिलें हैं। वे धीरे-धीरे आगे बढ़ गए हैं। वे कितने बढ़ गए थे यह समझना तब और भी अधिक आश्चर्य देता है जब हम सोचते हैं कि वे आज से सैकड़ों बरस पहले थे। कबीर के चेलों ने ब्राह्मणों की नकल की। कबीर के विद्रोह और सत्य को दबा दिया गया। कबीर इतिहास में एक उलझन बन गया। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ब्राह्मणवादी आलोचक थे। उन्होंने कबीर को नीरस निर्गुणिया कह दिया। वे कह गए हैं कि कबीर ने राह नहीं दिखाई। कबीर ज्ञान को रहस्य में डुबाता था। साधारण जनता कबीर को समझ नहीं सकी।

यह सब ब्राह्मणवादी दृष्टिकोण है अत: त्याज्य है। अवैज्ञानिक है।
कबीर निर्गुण के परे थे। कबीर ने जो राह दिखाई वह मानवता को कल्याण की ओर ले जाने वाली थी। वे भारतीय संस्कृति के नाम पर भेदभाव वाले ब्राह्मणवाद को नहीं मानते थे। वे इस्लाम का विरोध करके भी उससे घृणा नहीं करते थे, और उसे मुक्ति का पथ भी नहीं समझते थे। कबीर ने जनता का दलित जीवन देखा था, तुलसीदास की भाँति नहीं एक जुलाहे की भाँति। वे सगुण ईश्वर को मानकर ब्राह्मणवाद के नियमों में बंध नहीं सके। पर उनका रहस्य भी ऐसा न था कि वे संसार को छोड़ देते। घर में पत्नी थी, पुत्र था। पर पत्नी और पुत्र के ही लिए डूबे रहकर दूसरों का गला काटना वे माया कहते थे। कबीर ने कहा कि इन्सान को किसी रुढ़ि की जरूरत नहीं, वह ईश्वर के लिए झगड़े, यह व्यर्थ की बात है। ईश्वर रहस्य इसीलिए है कि मनुष्य अपनी सीमित बुद्धि से उसे जान नहीं सकता, जो जानकार बनते थे उनको उन्होंने झूठा कहा। कबीर ने ही कहा था कि प्यारे आसमान पर ताकना छोड़ दे। मन की कल्पना और भरमना छोड़ दे।
ये क्या शून्यवादी के शब्द हैं ?

कबीर ने दूसरों के बल पर खानेवाले साधुओं का घोर विरोध किया था। वे तो मेहनत का खाना चाहते थे। साधारण जनता ने कबीर को समझा था। उसी ने कबीर को मुल्ला, पंडित, जोगी आदि के पुरोहित वर्ग और सत्ताधारियों से बचाया था। पर बाद में कबीर पंथियों ने कबीर को मिटा दिया। परवर्तियों में कबीर को चमत्कारों से ढक दिया गया।
कबीर ने हिन्दू-मुसलमानों दोनों को नितान्त निम्नजाति के आदमी की आँखों से देखा था। पर चेले पढ़े-लिखे थे। उस समय मुसलमान शासकों की शक्ति भी बढ़ गई थी। सारी भारतीय जातियों का संगठन हो रहा था। निम्नजातीय जनता के रूप में कबीर के अनुयायी भी दलित थे। शासन मुस्लिम था। अतः इस्लाम पर अत्याचारों के नाम चढ़ते थे। उस समय कबीर पंथ हिन्दू मत ही बन गया था।

कबीर ने तो भारत के सांस्कृतिक जन जागरण की नींव डाली है। उसके युग के बन्धन थे, और उनकी उस पर छाप है। वह धीरे-धीरे विकास करके कितना आगे आ गया था !
भाषा में उसने क्रान्ति की। बिल्कुल जन भाषा बोली। तुलसी की भाँति वक्त बेवक्त की बैसाखियाँ नहीं लगाईं। तुलसी के देवता आखिर संस्कृत बोलते थे। कबीर ने जनता के उपमान लिए और जीवन के अच्छे आचरण पर सामाजिक आचरण पर जोर दिया। जहाँ तुलसीदास सारे अनाचार की जड़ कलि को मानते थे, कबीरदास कलि का नाम नहीं लेते। वे तो मोह-लोभ-दम्भ और धन को ही इस माया और अनाचार का मूल मानते हैं।
कबीर का मुख्य सन्देश प्रेम का है।

अब प्रस्तुत पुस्तक के बारे में कुछ और बातें साफ कर दूँ।
कबीर पढ़े-लिखे न थे। कविता लिखते नहीं थे। वे तो फौरन सुनाने वालों में थे। लोग लिखा करें, उन्हें इससे बहस नहीं थी। वे तो कह देते थे। इसी से मैंने उनकी कविताएँ उनके मुँह से परिस्थितियों के बीच में सुनवाई हैं।
दूसरी बात है कमाल के द्वारा कथा कहलवाना।
कमाल कबीर का पुत्र था। कमाल के बारे में प्रसिद्ध है-

बूडा बंस कबीर का,
जब उपजा पूत कमाल।

परन्तु यह विद्वानों द्वारा कबीर की पंक्ति नहीं मानी गई। कमाल के बारे में किंवदन्ती है कि कबीर के बाद जब उसने पिता के नाम पर पंथ चालू करने से इंकार कर दिया तो कबीर के चेलों ने इसे ऐसा नाम दे दिया। कबीर की पत्नी लोई थी। कबीर की कविताओं में उसका नाम है। तथ्यों के अभाव में कबीर के जीवन का पूरा चित्र देने में कमाल ने सहायता दी है। पहले कमाल उपसंहार में अपनी परिस्थिति बताता है। तब कबीर मर चुका है और पंथ बन गया है। ‘उपसंहार से पहले’ में कबीर की मृत्यु के बाद गुरु की कविताओं को सुनाकर आपस में लड़नेवाले चेलों का वर्णन है। फिर ‘आरम्भ’ तक कबीर के विशेष रूप हैं। मरजीवा वाला अध्याय कबीर की महानता, नया पथ और उसके चिन्तन को स्पष्ट करने को है। अन्तिम अध्याय में कबीर के जीवन के मोड़ हैं।

कमाल ही बोलता है। मैं नहीं बोलता। अपने युग के बंधनों में रहकर जो कमाल कह सकता है वह कहता है, बाकी मैं भूमिका में कहे दे रहा हूँ। कबीर निस्संदेह तत्कालीन जीवन में क्रान्ति का बीज था। दुर्भाग्य से बाद में फिर वह वर्गसंघर्ष जातिसंघषों में दब गया। तब वर्गसंघर्ष का मतलब वर्णसंघर्ष ही था।

रांघेय राघव


उपसंहार



‘मैं कमाल हूँ। मेरे बाप का नाम कबीर था और माँ का नाम लोई था।’
‘तुम क्या करते हो ?’
‘काशी में जुलाहे का काम करता हूँ।’
‘फिर यहाँ क्यों आए हो ? यह तो हरिद्वार है।’
‘जानता हूँ, लेकिन क्या करूँ ? भटका फिरता हूँ।’
‘क्यों, ऐसी क्या मुसीबत आ गई तुमको।’
‘मैं तुम्हें कैसे बताऊँ ?’
‘शादी हो गई ?’
‘नहीं।’

‘तो बताने को बाकी क्या रह गया ! घर में प्रबन्ध नहीं है तो अपने- आप साधु बन जाओगे। लेकिन कबीर का नाम तो हम लोगों ने सुना है। वह तो आदमी साधु था न ?’
‘हाँ, सन्त थे और कवि थे।’
‘अच्छा ! कविता भी करता था ?’
‘अरे क्या तुम काशी कभी नहीं गए ?’
‘मैं तो और भी ऊपर ऋषीकेश में रहता हूँ।’
‘तुमने उनका नाम नहीं सुना।’

‘सुना तो सही। पर उधर तो हम पण्डों में उसकी तारीफ नहीं है। वह तो मठों और मंदिरों का शत्रु था। हमने तो यही सुना था कि आदमी बड़ा अक्खड़ और फक्कड़ था।’
कमाल हंसा।
पण्डा चौंका। पूछा क्यों हँसते हो ?
‘मैं यही तो सोचता था।’
‘क्या ?’
‘तुम कहते हो वह गद्दीदारों का दुश्मन था। ठीक यही न ?’
‘हाँ-हाँ।’
‘और जानते हो, काशी में उनके चेलों ने क्या किया है ?’
‘नहीं।’

‘उन्होंने कबीर के नाम पर ही पंथ चला दिया है, गद्दी लगा बैठे हैं।’
कमाल फिर हँसा, उसकी आवाज में व्यंग्य और विक्षोभ था। पण्डा कुछ ताज्जुब में आ गया।
कमाल ने फिर कहा, ‘जानते हो उन्होंने मुझसे क्या कहा ?’
‘क्या कहा ?’
‘कहने लगे-कबीर का बेटा कमाल ही लायक आदमी है, वही कबीर साहब की जगह अब उनके मन्त्र का प्रचार कर सकता है।’

‘कैसे मन्त्र ?’ पण्डा ने पूछा, ‘मन्त्र का अधिकार तो ब्राह्मण को है।’
‘तो तुम्हारी मन्त्र-परम्परा तुम्हें ही मुबारक हो पण्डित ! मेरा बाप तो कभी इन चीजों से प्रभावित नहीं हुआ और फिर मैं कैसे होता ?’
‘क्यों नहीं, आखिर तो बाप का बेटा ठहरा।
‘मैंने कहा- नहीं बाबा मुझे गद्दी-वद्दी नहीं चाहिए मेरा बाप गद्दीधारियों के ही खिलाफ तो जन्म जिन्दगी  लड़ता रहा।’
‘अरे तुम जुलाहे हो ! तुम्हारी बयणजीवी जातियाँ पंजाब से लेकर बंगाल तक धीरे-धीरे मुसलमान हो गई हैं।’
‘क्यों न हो ? पण्डित ! क्या कोई बुरा काम करते हैं जुलाहे तुमने उन्हें नीचा समझा तो वे क्या करते ?’

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