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जीवनी/आत्मकथा >> सत्य के प्रयोग

सत्य के प्रयोग

महात्मा गाँधी

प्रकाशक : डायमंड पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2009
पृष्ठ :390
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 1530
आईएसबीएन :9788128812453

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my experiment with truth का हिन्दी रूपान्तरण (अनुवादक - महाबीरप्रसाद पोद्दार)...

पहला अनुभव


मेरे स्वदेश आने के पहले जो लोग फीनिक्स से वापस लौटने वाले थे, वे यहाँ आपहुँचे थे। अनुमान यह था कि मैं उनसे पहले पहुँचूगा, लेकिन लड़ाई के कारण मुझे लंदन में रूकना पड़ा। अतएव मेरे सामने यह प्रश्न यह था किफीनिक्सवासियों को कहाँ रखा जाय? मेरी अभिलाषा यह थी कि सब एक साथ ही रह सके और आश्रम का जीवन बिता सके तो अच्छा हो। मैं किसी आश्रम-संचालक सेपरिचित नहीं था, जिससे साथियों को उनके यहाँ जाने के लिख सकूँ। अतएव मैंने उन्हें लिखा कि वे एण्ड्रूज से मिलें और वे जैसी सलाह दे वैसा करे।

पहले उन्हे कांगड़ी गुरूकुल में रखा गया, जहाँ स्वामी श्रद्धानन्द जी ने उनकोअपने बच्चों की तरह रखा। इसके बाद उन्हें शान्तिनिकेतन में रखा गया। वहाँ कविवर ने और उनके समाज ने उन्हें वैसे ही प्रेम से नहलाया। इन दो स्थानोंमें उन्हें जो अनुभव प्राप्त हुआ, वह उनके लिए और मेरे लिए भी बहुत उपयोगी सिद्ध हुआ। कविवर, श्रद्धानन्द जी और श्री सुशील रुद्र को मैं एण्ड्रूज कीत्रिमूर्ति मानता था। दक्षिण अफ्रीका में वे इन तीनों की प्रशंसा करते कभी थकते ही न थे। दक्षिण अफ्रीका के हमारे स्नेह-सम्मेलन के अनेकानेक स्मरणोंमें यह तो मेरी आँखों के सामने तैरा ही करता हैं कि इन तीन महापुरुषों के मान उनके हृदय में और ओठों पर सदा बने ही रहते थे। एण्ड्रूज ने मेरेफीनिक्स कुटुम्ब को सुशील रुद्र के पास ही रख दिया था। रुद्र का अपना कोई आश्रम न था, केवल घर ही था। पर उस घर का कब्जा उन्होंने मेरे कुटुम्ब कोसौंप दिया था। उनके लड़के-लड़की एक ही दिन में इनके साथ ऐसे धुलमिल गये थे कि ये लोग फीनिक्स की याद बिलकूल भूल गये।

मैं बम्बई के बन्दरगाहपर उतरा तभी मुझे पता चला कि उस समय यह परिवार शान्तिनिकेतन में था। इसलिएगोखले से मिलने के बाद मैं वहाँ जाने को अधीर हो गया।

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