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जीवनी/आत्मकथा >> सत्य के प्रयोग सत्य के प्रयोगमहात्मा गाँधी
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my experiment with truth का हिन्दी रूपान्तरण (अनुवादक - महाबीरप्रसाद पोद्दार)...
मेरा हृदय फूल उठा। मैं यह सोचकर खुश हुआ कि मुझेपैसा उगाने के धन्धे से मुक्ति मिल गयी और यह कि अब मुझे अपनी जवाबदारी पर नहीं चलना पड़ेगा, बल्कि हर परेशानी के समय मुझे रास्ता दिखाने वाला कोईहोगा। इस विश्वास के काऱण मुझे ऐसा लगा मानो मेरे सिर का बड़ा बोझ उतर गया हो।
गोखने ने स्व. डाक्टर देव को बुलाकर कह दिया:'गाँधी का खाताअपने यहाँ खोल लीजिये और इन्हें आश्रम के लिए तथा अपने सार्वजनिक कार्योके लिए जितनी रकम की जरूरत हो, आप देते रहिये।'
अब मैं पूना छोड़कर शान्तिनिकेतन जाने की तैयारी कर रहा था। अंतिम रात को गोखले नेमुझे रुचने वाली एक दावत दी और उसमें उन्होंने जो चीजे मैं खाता था उन्हीं का अर्थात् सूखे और ताजे फलों के आहार का ही प्रबन्ध किया। दावत की जगहउनके कमरे से कुछ ही दूर थी, पर उसमें भी सम्मिलित होने की उनकी हालत न थी। लेकिन उनका प्रेम उन्हें दूर कैसे रहने देता? उन्होंने आने का आग्रहकिया। वे आये भी, पर उन्हें मूर्छा आ गयी ऐर वापस जाना पड़ा। उनकी ऐसी हालत जब-तब हो जाया करती थी। अतएव उन्होंने संदेशा भेजा कि दावत जारी हीरखनी हैं। दावत का मतलब था, सोसाइटी के आश्रम में मेंहमानघर के पासवाले आँगन में जाजम बिछाकर बैठना, मूंगफली, खजूर आदि खाना, प्रेमपूर्ण चर्चायेकरना और एक दूसरे के दिलो को अधिक जानना।
पर गोखले की यह मूर्छा मेरे जीवन के लिए साधारण अनुभव बनकर रहने वाली नथी।
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