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जीवनी/आत्मकथा >> सत्य के प्रयोग

सत्य के प्रयोग

महात्मा गाँधी

प्रकाशक : डायमंड पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2009
पृष्ठ :390
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 1530
आईएसबीएन :9788128812453

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my experiment with truth का हिन्दी रूपान्तरण (अनुवादक - महाबीरप्रसाद पोद्दार)...

तीसरे दर्जे की विडम्बना


बर्दवान पहुँचकर हमें तीसरे दर्जे का टिकट लेना था। उसे लेने में परेशानी हुई।जवाब मिला, 'तीसरे दर्जे के यात्री को टिकट पहले से नहीं दिया जाता।' मैं स्टेशन मास्टर से मिलने गया। उनके पास मुझे कौन जाने देता? किसी ने दयाकरके स्टेशन मास्टर को दिखा दिया। मैं वहाँ पहुँचा। उनसे भी उपर्युक्त उत्तर मिला। खिड़की खुलने पर टिकट लेने गया। पर टिकट आसानी से मिलने वालान था। बलबान यात्री एक के बाद एक घुसते जाते और मुझ जैसो को पीछे हटाते जाते। आखिर टिकट मिला।

गाड़ी आयी। उसमें भी जो बलबान थे वे घुस गये। बैठे हुओ और चढने वालो के बीच गाली गलौज और धक्का मुक्की शुरू हुई।इसमे हिस्सा लेना मेरे लिए सम्भव न था। हम तीनों इधर से उधर चक्कर काटते रहे। सब ओर से एक ही जवाब मिलता था, 'यहाँ जगह नहीं हैं।' मैं गार्ड केपास गया। उसने कहा, 'जगह मिले तो बैठो, नहीं तो दूसरी ट्रेन में जाना।'

मैंने नम्रता पूर्वक कहा, 'लेकिन मुझे जरूरी काम है।' यह सुनने के लिएगार्ड केपास समय नहीं था। मैं हारा। मगनलाल से कहा, 'जहाँ जगह मिले, बैठ जाओ।' पत्नी को लेकर मैं तीसरे दर्जे के टिकट से ड्योढे दर्जे में घुसा। गार्डने मुझे उसमें जाते देख लिया था।

आसनसोल स्टेशन पर गार्ड ज्यादा किराये के पैसे लेने आया। मैंने कहा, 'मुझे जगह बताना आपका धर्म था। जगह नमिलने के कारण मैं इसमे बैठा हूँ। आप मुझे तीसरे दर्जे में जगह दिलाइये। मैं उसमें जाने को तैयार हूँ।'

गार्ड साहब बोले, 'मुझ से बहस मत कीजिये। मेरे पास जगह नहीं है। पैसे नदेने हो, तो गाड़ी से उतरना पड़ेगा।'

मुझे तो किसी भी तरह पूना पहुँचना था। गार्ड से लड़ने की मेरी हिम्मत न थी।मैंने पैसे चुका दिये। उसने ठेठ पूना तक का डयोढ़ा भाड़ा लिया। यह अन्याय मुझे अखर गया।

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