लोगों की राय

जीवनी/आत्मकथा >> सत्य के प्रयोग

सत्य के प्रयोग

महात्मा गाँधी

प्रकाशक : डायमंड पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2009
पृष्ठ :390
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 1530
आईएसबीएन :9788128812453

Like this Hindi book 3 पाठकों को प्रिय

160 पाठक हैं

my experiment with truth का हिन्दी रूपान्तरण (अनुवादक - महाबीरप्रसाद पोद्दार)...


ऋषिकेशऔर लछमन झूले के प्राकृतिक दृश्य मुझे बहुत भले लगे। प्राकृतिक कला को पहचानने की पूर्वजो की शक्ति के विषय में और कला को धार्मिक स्वरूप देनेकी उनकी दीर्धदृष्टि के विषय में मैंने मन-ही-मन अत्यन्त आदर का अनुभव किया।

किन्तु मनुष्य की कृति से चित को शांति नहीं मिली। हरिद्वार की तरह ऋषिकेश में भी लोग रास्तो को और गंगा के सुन्दर किनारो कोगन्दा कर देते थे। गंगा के पवित्र जल को दूषित करने में भी उन्हे किसी प्रकार का संकोच न होता था। पाखाने जानेवाले दूर जाने के बदले जहाँ लोगोंकी आमद-रफ्त होती, वही हाजत रफा करने बैठ जाते थे। यह देखकर हृदय को बहुत आधात पहुँचा।

लछमन झूला जाने हुए लोहे का झूलता पुल देखा। लोगों से सुना कि यह पुल पहले रस्सियो का था और बहुत मजबूत था। उसे तोड़कर एकउदार-हृदय मारवाड़ी सज्जन में बडा दान देकर लोहे का पुल बनवा दिया और उसकी चाबी सरकार को सौप दी।

रस्सियो को पुल की मुझे कोई कल्पना नहीं है, पर लोहे का पुल प्राकृतिक वातावरण को कलुषित कर रहा था और अप्रियमालूम होता था। यात्रियो ने इस रास्ते की चाबी सरकार को सौप दी, यह चीज मेरी उस समय की वफादारी को भी असह्य लगी।

वहाँ से भी अधिक दुःखद दृश्य स्वर्गाश्रम का था। टीन की चादरो की तबेले जैसी कोठरियो कोस्वार्गश्रम का नाम दिया था। मुझे बतलाया गया कि ये साधको के लिए बनवायी गयी थी। उस समय उनमें शायद ही कोई साधक रहता था। उनके पास बने हुए मुख्यभवन में रहनेवालो ने भी मुझ पर अच्छा असर न डाला।

पर हरिद्वार के अनुभव मेरे लिए अमूल्य सिद्ध हुए। मुझे कहाँ बसना और क्या करना चाहिये,इसका निश्चय करने में हरिद्वार के अनुभवो ने मेरी बड़ी मदद की।

...Prev | Next...

<< पिछला पृष्ठ प्रथम पृष्ठ अगला पृष्ठ >>

अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book