|
जीवनी/आत्मकथा >> सत्य के प्रयोग सत्य के प्रयोगमहात्मा गाँधी
|
160 पाठक हैं |
||||||
my experiment with truth का हिन्दी रूपान्तरण (अनुवादक - महाबीरप्रसाद पोद्दार)...
इन बयानो के लेते समय खुफिया पुलिस का कोई-न-कोईअधिकारी हाजिर रहता ही था। इन अधिकारियों को आने से रोका जा सकता था। पर हमने शुरू से ही निश्चय कर लिया था कि उन्हें न सिर्फ हम आने से नहींरोकेंगे, बल्कि उनके प्रति विनय का बरताव करेंगे और दे सकने योग्य खबरे भी उन्हें देते रहेंगे। उनके सुनते और देखतो ही सारे बयान लिये जाते थे। उसकालाभ यह हुआ कि लोगों में अधिक निर्भयता आयी। खुफिया पुलिस से लोग बहुत डरते थे। ऐसा करने से वह डर चला गया और उनकी आँखो के सामने दिये जानेवालेबयानो में अतिशयोक्ति का डर कम रहता था। इस डर से कि झूठ बोलने पर अधिकारी कही उन्हे फांद न ले, उन्हें सावधानी से बोलना पड़ता था।
मैं निलहो को खिझाना नहीं चाहता था, बल्कि मुझे तो उन्हें विनय द्वारा जीतनेका प्रयत्न करना था। इसलिए जिसके विरूद्ध विशेष शिकायते आती, उसे मैं पत्र लिखता और उससे मिलनेका प्रयत्न भी करता था। निलहो के मंडल से भी मैं मिलाऔर रैयत की शिकायते उनके सामने रखकर मैंने उनकी बातें भी सुन ली थी। उनमें से कुछ तिरस्कार करते थे, कुछ उदासीन रहते थे और कोई-कोई मेरे साथ सभ्यताऔर नम्रता का व्यवहार करते थे।
|
|||||










