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जीवनी/आत्मकथा >> सत्य के प्रयोग सत्य के प्रयोगमहात्मा गाँधी
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my experiment with truth का हिन्दी रूपान्तरण (अनुवादक - महाबीरप्रसाद पोद्दार)...
बेतिया में गोशाला तो आज भी चलती है परवह आदर्श दुग्धालय नहीं बन सकी है। चम्पारन के बैलो से आज भी उनकी शक्ति से अधिक काम लिया जाता हैं। नामधारी हिन्दू आज भी बैलो को निर्दयता पूर्वकपीटते है और धर्म को बदनाम करते है। यह कसक मेरे मन में सदा के लिए रह गयी। और, जब जब मैं चम्पारन जाता हूँ तब तब इन अधूरे कामों का स्मरण करकेलम्बी साँस लेता हूँ और उन्हें अधूरा छोड देने के लिए मारवाड़ी भाइयो और बिहारियों का मीठा उलाहना सुनता हूँ।
पाठशालाओ का काम को एक यादूसरी रीति से अन्य स्थानो में चल रहा है, पर गोसेवा के कार्यक्रम ने जड़ही नहीं पकड़ी थी, इसलिए उसे सही दिशा में गति न मिल सकी।
अहमदाबाद में खेड़ा जिले के काम के बारे में सलाह मशविरा हो ही रहा था किइस बीच मैंने मजदूरो का काम हाथ में ले लिया।
मेरी स्थिति बहुत ही नाजुक थी। मजदूरो का मामला मुझे मजबूत मालूम हुआ। श्रीअनसूयाबाई को अपने सगे भाई के साथ लड़ना था। मजदूरो और मालिको के बीच के इस दारूण युद्ध में श्री अंबालाल साराभाई ने मुख्य रूप से हिस्सा लिया था।मिल मालिको के साथ मेरा मीठा सम्बन्ध था।
उनके विरुद्ध लड़ने का काम विकट था। उनसे चर्चाये करके मैंने प्रार्थना की कि वे मजदूरो की माँगके संबंध में पंच नियुक्त करे। किन्तु मालिको ने अपने और मजदूरो के बीच पंच के हस्ताक्षेप की आवश्यकता को स्वीकार न किया।
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