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जीवनी/आत्मकथा >> सत्य के प्रयोग

सत्य के प्रयोग

महात्मा गाँधी

प्रकाशक : डायमंड पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2009
पृष्ठ :390
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 1530
आईएसबीएन :9788128812453

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my experiment with truth का हिन्दी रूपान्तरण (अनुवादक - महाबीरप्रसाद पोद्दार)...

'प्याज़चोर'


चम्पारन हिन्दुस्तान के ऐसे कोने में स्थित था और वहाँ की लड़ाई को इस तरह अखबारोंसे अलग रखा जा सका था कि वहाँ से बाहर से देखनेवाले कोई आते नहीं थे। पर खेड़ा की लड़ाई अखबारों की चर्चा का विषय बन चुकी थी। गुजरातियो को इस नईवस्तु में विशेष रस आने लगा था। वे पैसा लुटाने को तैयार थे। सत्याग्रह की लड़ाई पैसे से नहीं चल सकती, उसे पैसे की कम से कम आवश्यकता रहती है, यहबात जल्दी उनकी समझ में नहीं आ रही थी। मना करने पर भी बम्बई के सेठो ने आवश्यकता से अधिक पैसे दिये थे और लड़ाई के अन्त में उसमें से कुछ रकम बचगयी थी।

दूसरी तरफ सत्याग्रही सेना को भी सादगी का नया पाठ सीखनाथा। मैं यह तो नहीं कह सकता कि वे पूरा पाठ सीख सके थे, पर उन्होंने अपनीरहन सहन में बहुत कुछ सुधार कर लिया था।

पाटीदारो के लिए भी यह लड़ाई नई थी। गाँव-गाँव घूमकर लोगों को इसका रहस्य समझाना पड़ता था।सरकारी अधिकारी जनता के मालिक नहीं, नौकर हैं, जनता के पैसे से उन्हें तनख्वाह मिलती हैं -- यह सब समझाकर उनका भय दूर करने का काम मुख्य था। औरनिर्भय होने पर भी विनय के पालन का उपाय बताना और उसे गले उतारना लगभग असम्भव सा प्रतीत होता था।

अधिकारियों का डर छोड़ने के बाद उनके द्वारा किये गये अपमानो का बदला चुकाने की इच्छा किसे नहीं होती ! फिर भीयदि सत्याग्रही अविनयी बनता है, तो वह दूध में जहर मिलने के समान हैं। पाटीदार विनय का पाठ पूरी तरह पढ़ नहीं पाये, इसे मैं बाद में अधिक समझसका। अनुभव से मैं इस परिणाम पर पहुँचा कि विनय सत्याग्रह का कठिन से कठिन अंश है। यहाँ विनय का अर्थ केवल सम्मान पूर्वक वचन कहना ही नहीं हैं। विनयसे तात्पर्य है, विरोधी के प्रति भी मन में आदर, सरल भाव, उसके हित की इच्छा औऱ तदनुसार व्यवहार।

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