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जीवनी/आत्मकथा >> सत्य के प्रयोग

सत्य के प्रयोग

महात्मा गाँधी

प्रकाशक : डायमंड पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2009
पृष्ठ :390
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 1530
आईएसबीएन :9788128812453

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my experiment with truth का हिन्दी रूपान्तरण (अनुवादक - महाबीरप्रसाद पोद्दार)...


ऊपर वाइसरॉय को लिखे जिस पत्र का उल्लेख किया गया है, उसका सार नीचे दियागया है :

'युद्ध-परिषद में उपस्थिति रहने के विषय में मेरी अनिच्छा थी पर आपसे मिलने के बाद वहदूर हो गयी और उसका एक कारण यह अवश्य था कि आपके प्रति मुझे बड़ा आदर है। न आने के कारणो में मजबूत कारण यह था कि उसमें लोकमान्य तिलक, मिसेजबेसेंट और अली भाई निमंत्रित नहीं किये गये थे। इन्हें मैं जनता के शक्तिशाली नेता मानता हूँ। मुझे तो लगता है कि सरकार ने इन्हें निमंत्रितन करने में सरकार ने गंभीर भूल की है और मैं अभी भी सुझाता हू कि प्रान्तीय परिषदे की जाये तो उनमें इन्हें निमंत्रित किया जाये। मेरा यहनम्र मत है कि कोई सरकार ऐसे प्रौढ़ नेताओं की उपेक्षा नहीं कर सकती, फिर भले उनके साथ उसका कैसा भी मतभेद क्यों न हो। इस स्तिथि में मैं सभा कीसमितियों में उपस्थित नहीं रह सका और सभा में प्रस्ताव का समर्थन करके संतुष्ट रहा। सरकार के सम्मुख मैंने जो सुझाव रखे है, उनके स्वीकृत होतेही मैं अपने समर्थन को अमली रूप देने की आशा रखता हूँ।

'जिस साम्राज्य में आगे चलकर हम सम्पूर्ण रूप से साझेदार बनने की आशा रखते है,संकट के समय में उसकी पूरी मदद करना हमारा धर्म है। किन्तु मुझे यह तो कहना ही चाहिये कि इसके साथ यह आशा बंधी हुई है कि मदद के कारण हम उपनेध्येय तक शीध्र पहुँच सकेगे। अतएव लोगों को यह मानने का अधिकार है कि आपके भाषण में जिन सुधारो के तुरन्त अमल में आने की आशा प्रकट की गयी है, उनसुधारो में कांग्रेस और मुस्लिम लीग की मुख्य माँगो का समावेश किया जायेगा। यदि मेरे लिए यह सम्भव होता तो मैं ऐसे समय होमरूल आदि का उच्चारणतक न करता। बल्कि मैं समस्त शक्तिशाली भारतीयो को प्रेरित करता कि साम्राज्य के संकट के समय वे उसकी रक्षा के लिए चुपचाप खप जाये। इतना करनेसे ही हम साम्राज्य के बड़े-से-बड़े और आदरणीय साझेदार बन जाते और रंगभेद तथा देशभेद का नाम-निशान भी न रहता।

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