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जीवनी/आत्मकथा >> सत्य के प्रयोग सत्य के प्रयोगमहात्मा गाँधी
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my experiment with truth का हिन्दी रूपान्तरण (अनुवादक - महाबीरप्रसाद पोद्दार)...
दक्षिणके प्रान्त उस समय भी मुझे घर सरीखे मालूम होते थे। दक्षिण अफ्रीका के सम्बन्ध के कारण तामिल-तेलुगु आदि दक्षिण प्रदेश के लोगों पर मेरा कुछअधिकार है, ऐसा मैं मानता आया हूँ। और, अपनी इस मान्यता में मैंने थोडी भी भूल की है, ऐसा मुझे आज तक प्रतीत नहीं हुआ। निमंत्रण स्व. कस्तूरी आयंगारकी ओर से मिला था। मद्रास जाने पर पता चला कि इस निमंत्रण के मूल में राजगोपालाचार्य थे। राजगोपालाचार्य के साथ यह मेरा पहला परिचय कहा जा सकताहै। मैं इसी समय उन्हें प्रत्यक्ष पहचानने लगा था।
सार्वजनिक काम में अधिक हिस्सा लेने के विचार से और श्री कस्तूरी रंगा आयंगार इत्यादिमित्रों की माँग पर वे सेलम छोड़कर मद्रास में वकालत करनेवाले थे। मुझे उनके घर पर ठहराया गया था। कोई दो दिन बाद ही मुझे पता चला कि मैं उनके घरठहरा हूँ, क्योंकि बंगला कस्तूरी रंगा आयंगार का था, इसलिए मैंने अपने को उन्हीं का मेंहमान मान लिया था। महादेव देसाई ने मेरी भूल सुधारी।राजगोपालाचार्य दूर-दूर ही रहते थे। पर महादेव ने उन्हें भलीभांति पहचान लिया था। महादेव ने मुझे सावधान करते हुए कहा, 'आपको राजगोपालाचार्य सेजान-पहचान बढा लेनी चाहिये।'
मैंने परिचय बढाया। मैं प्रतिदिन उनके साथ लड़ाई की रचना के विषय में चर्चा करता था। सभाओ के सिवा मुझे औरकुछ सूझता ही न था। यदि रौलट बिल कानून बन जाय, तो उसकी सविनय अवज्ञा किस प्रकार की जाये? उसकी सविनय अवज्ञा करने का अवसर तो सरकार दे तभी मिल सकताहै। दूसरे कानूनो की सविनय अवज्ञा की जा सकती है? उसकी मर्यादा क्या हो? आदि प्रश्नो की चर्चा होती थी।
श्री कस्तूरी रंगा आयंगार नेनेताओं की एक छोटी सभा भी बुलायी। उसमें भी खूब चर्चा हुई। श्रीविजयराधवाचार्य ने उसमें पूरा हिस्सा लिया। उन्होंने सुझाव दिया कि सूक्ष्म-से-सूक्ष्म सूचनाये लिखकर मैं सत्याग्रह का शास्त्र तैयार कर लूँ।मैंने बताया कि यह काम मेरी शक्ति से बाहर है।
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