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जीवनी/आत्मकथा >> सत्य के प्रयोग

सत्य के प्रयोग

महात्मा गाँधी

प्रकाशक : डायमंड पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2009
पृष्ठ :390
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 1530
आईएसबीएन :9788128812453

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my experiment with truth का हिन्दी रूपान्तरण (अनुवादक - महाबीरप्रसाद पोद्दार)...


मेरा डेरा मालवीयजी में अपनेही कमरे में रखा था। उनकी सादगी की झाँकी काशी विश्वविद्यालय के शिलान्यास के समय मैं कर चुका था। लेकिन इस बार तो उन्होंने मुझे अपने कमरे में हीस्थान दिया था। इससे मैं उनकी सारी दिनचर्या देख सका और मुझे सानन्द आश्चर्य हुआ। उनका कमरा क्या था, गरीबो की धर्मशाला थी। उसमें कही रास्तानहीं रहने दिया गया था। जहाँ-तहाँ लोग पड़े ही मिलते थे। वहाँ न एकान्त था। चाहे जो आदमी चाहे जिस समय आता था औऱ उनका चाहे जितना समय ले लेता था।इस कमरे के एक कोने में मेरा दरबार अर्थात खटिया थी।

किन्तु मुझे इस प्रकरण में मालवीयजी की रहन-सहन का वर्णन नहीं करना है।अतएव मैं अपने विषय पर आता हूँ।

इस स्थिति में मालवीयजी के साथ रोज मेरी बातचीत होती थी। वे मुझे सबका पक्षबड़ा भाई जैसे छोटे को समझाता है वैसे प्रेम से समझाते थे। सुधार-सम्बन्धी प्रस्ताव में भाग लेना मुझे धर्मरूप प्रतीत हुआ। पंजाब विषयक कांग्रेस कीरिपोर्ट की जिम्मेदारी में मेरा हिस्सा था। पंजाब के विषय में सरकार से काम लेना था। खिलाफत का प्रश्न तो था ही। मैंने यह भी माना कि मांटेग्यूहिन्दुस्तान के साथ विश्वासघात नहीं करने देगे। कैदियो की और उनमें भी अलीभाईयो की रिहाई को मैंने शुभ चिह्न माना था। अतएव मुझे लगा कि सुधारोको स्वीकार करने का प्रस्ताव पास होना चाहिये। चितरंजन दास का ढृढ मत था कि सुधारो को बिल्कुल असंतोषजनक और अधूरे मान कर उनकी उपेक्षा करनीचाहिये। लोकमान्य कुछ तटस्थ थे। किन्तु देशबन्धु जिस प्रस्ताव को पसन्द करे, उसके पक्ष में अपना वजन डालने का उन्होंने निश्चय कर लिया था।

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