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जीवनी/आत्मकथा >> सत्य के प्रयोग

सत्य के प्रयोग

महात्मा गाँधी

प्रकाशक : डायमंड पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2009
पृष्ठ :390
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 1530
आईएसबीएन :9788128812453

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my experiment with truth का हिन्दी रूपान्तरण (अनुवादक - महाबीरप्रसाद पोद्दार)...


मैंने चरखे की बात सुनाई और कहा, 'मैं आपके विचारो से सहमत हूँ। मुझे मिलोकी दलाली नहीं करनी चाहिये। इससे फायदे के बदले नुकसान ही है। मिलो का मालपड़ा नहीं रहता। मुझे तो उत्पादन बढाने में और उत्पन्न हुए कपड़े को खपाने में लगना चाहिये। इस समय मैं उत्पादन के काम में लगा हुआ हूँ। इस प्रकारकी स्वदेशी में मेरा विश्वास है, क्योंकि उसके द्वारा हिन्दुस्तान की भूखो मरनेवाली अर्ध-बेकार स्त्रियो को काम दिया जा सकता है। उनका काता हुआ सूतबुनवाना और उसकी खादी लोगों को पहनाना, यही मेरा विचार है और यही मेरा आन्दोलन है। मैं नहीं जानता कि चरखा आन्दोलन कहाँ तक सफल होगा। अभी तोउसका आरम्भ काल ही है, पर मुझे उसमें पूरा विश्वास है। कुछ भी हो, उसमें नुकसान तो है ही नहीं। हिन्दुस्तान में उत्पन्न होने वाले कपड़े में जितनीवृद्धि इस आन्दोलन से होगी उतना फायदा ही है। अतएव इस प्रयत्न में आप बताते है वह दोष तो है ही नहीं।'

'यदि आप इस रीति से आन्दोलनचलाते हो, तो मुझे कुछ नहीं कहना है। हाँ, इस युग में चरखा चल सकता है यानहीं, यह अलग बात है। मैं तो आपकी सफलता ही चाहता हूँ।'

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