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जीवनी/आत्मकथा >> सत्य के प्रयोग सत्य के प्रयोगमहात्मा गाँधी
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my experiment with truth का हिन्दी रूपान्तरण (अनुवादक - महाबीरप्रसाद पोद्दार)...
मेरेप्रस्ताव में खिलाफत और पंजाब के अन्याय को ध्यान में रखकर ही असहयोग की बात कही गयी थी। पर श्री विजयराधवाचार्य को इसमे कोई दिलचस्पी मालूम नहुई। उन्होंने कहा, 'यदि असहयोग ही कराना है, तो अमुक अन्याय के लिए ही क्यों किया? स्वराज्य का अभाव बड़े -से - बडा अन्याय है। अतएव उसके लिएअसहयोग किया जा सकता है।' मोतीलालजी भी स्वराज्य की माँग को प्रस्ताव में दाखिल कराना चाहते थे। मैंने तुरन्त ही इस सूचना को स्वीकार कर लिया औरप्रस्ताव में स्वराज्य की माँग भी सम्मिलित कर ली। विस्तृत, गंभीर और कुछ तींखी चर्चाओं के बाद असहयोग का प्रस्ताव पास हुआ। मोती लाल जी उसमें सबसेपहले सम्मिलित हुए। मेरे साथ हुई उनकी मीठी चर्चा मुझे अभी तक याद है। उन्होंने कुछ शाब्दिक परिवर्तन सुझाये थे, जिन्हें मैंने स्वीकार कर लियाथा। देशबन्धु को मना लेने का बीड़ा उन्होंने उठाया था। देशबन्धु का हृदय असहयोग के साथ था, पर बुद्धि उनसे कर रही थी कि असहयोग को जनता ग्रहण नहींकरेगी। देशबन्धु और लालाजी ने असहयोग के प्रस्ताव को पूरी तरह तो नागपुर में स्वीकार किया। इस विशेष अवसर पर लोकमान्य की अनुपस्थिति मेरे लिए बहुतदुःखदायक सिद्ध हुई। आज भी मेरा मत है कि वे जीवित होते, तो कलकत्ते की घटना का स्वागत करते। पर वैसा न होता और वे विरोध करते, तो भी मुझे अच्छाही लगता। मुझे उससे कुछ सीखने को मिलता। उनके साथ मेरे मतभेद सदा ही रहे, पर वे सब मीठे थे। उन्होंने मुझे हमेशा यह मानने का मौका दिया था कि हमारेबीच निकट का सम्बन्ध है। यह लिखते समय उनके स्वर्गवास का चित्र मेरे सामने खड़ा हो रहा है। मेरे साथी पटवर्धन ने आधी रात को मुझे टेलीफोन पर उनकेअवसान का समाचार दिया था। उसी समय मैंने साथियो से कहा था, 'मेरे पास एक बड़ा सहारा था, जो आज टूट गया।' उस समय असहयोग का आन्दोलन पूरे जोर से चलरहा था। मैं उनसे उत्साह और प्रेरणा पाने की आशा रखता था। अन्त में जब असहयोग पूरी तरह मूर्तिमंत हुआ, तब उसके प्रति उनका रुख क्या रहा होता सोतो भगवान जाने, पर इतना मैं जानता हूँ कि राष्ट्र के इतिहास की उस महत्त्वपूर्ण घड़ी में उनकी उपस्थिति का अभाव सब को खटक रहा था।
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