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इतिहास और राजनीति >> ताजमहल मन्दिर भवन है ताजमहल मन्दिर भवन हैपुरुषोत्तम नागेश ओक
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पी एन ओक की शोघपूर्ण रचना जिसने इतिहास-जगत में तहलका मचा दिया...
अपनी पुस्तक के पृष्ठ १२४ पर श्री काले लिखते हैं-"उद्धृत शिलालेख आगरा के बटेश्वर गाँव से प्राप्त हुआ और वर्तमान में वह लखनऊ संग्रहालय में है। यह राजा परमार्दिदेव का विक्रम संवत् १२१२, आश्विन मास की शुक्लपक्ष की पंचमी रविवार का है। इसमें कुल ३४ श्लोक हैं जिनमें चन्द्रात्रेय (राज) वंश का मूल और उसके मुख्य-मुख्य शासकों का वर्णन है। यह शिलालेख बटेश्वर में एक मिट्टी के स्तूप में दबा हुआ पाया गया। बाद में इसे जनरल कनिंघम ने लखनऊ संग्रहालय में जमा करा दिया, जहाँ यह आज भी है। दो भव्य स्फटिक मन्दिर जिन्हें परमार्दिदेव ने बनवाया-एक भवन विष्णु का तथा दूसरा भगवान् शिव का - बाद में मुस्लिम आक्रमण के समय भ्रष्ट कर दिए गए। किसी चतुर (दूरदर्शी) ने, मंदिरों से सम्बन्धित इस शिलालेख को मिट्टी के ढेर में दबा दिया। यह वर्षों तक दबा रहा जबकि सन् १९०० में, उत्खनन के समय जनरल कनिंघम को यह प्राप्त हुआ।"
बटेश्वर जो कि अब आगरा नगर का ही एक भाग है, ताजमहल से लगभग चार मील की दूरी पर है।
श्री काले, जिनकी पुस्तक का उद्धरण हमने ऊपर दिया है, विशेषतया लिखते हैं कि वह स्थान जहाँ वह शिलालेख पाया गया, ऐसा लगता है कि किसी दूरदर्शी व्यक्ति ने बड़ी सावधानी से और जानबूझकर, ध्वंसकारी मुस्लिम आक्रमण के समय दवा दिया।
यद्यपि विद्वान् लेखक श्री काले ने दोनों भवनों को, जिनका उल्लेख शिलालेख में है, मन्दिर कहा है, हम उनको 'विष्णोः प्रासादः' राजा के प्रासाद के रूप में कहना चाहेंगे, क्योंकि (विष्णु राजा का द्योतक है और) यदि शिलालेख का अभिप्राय विष्णु मन्दिर ही होता तो, यह कहने की आवश्यकता न होती, जैसा कि इसमें कहा गया है, कि भवन के अन्दर भगवान विष्णु की प्रतिमा थी। अस्तु, यह साधारण-सी बात है।
इस शिलालेख का महत्त्व इस बात से और भी बढ़ जाता है जब यह आज से ८१८ वर्ष पूर्व आगरा में स्फटिक श्वेत पत्थर के दो भवनों के निर्माण का उल्लेख करता है। जनरल कनिंघम द्वारा बनाई गई चन्द्रात्रेय (या चन्देलों) की राजवंशावलियों को श्री काले ने अपनी पुस्तक के पृष्ठ १४०-१४१ पर उद्धृत किया है जिसमें परमार्दिदेव को सन् ११६५ या ११६७ का बताया है।
प्रसंगवशात्, यह शिलालेख बड़ी प्रभावपूर्ण रीति से उन अविवेकपूर्ण तथा अन्धविश्वासपूर्वक कथित कथनों को मिथ्या सिद्ध करता है जो यह कहते हैं कि भारत में संगमरमर के पत्थरों से भवन-निर्माण का कार्य मुसलमानों ने ही आरम्भ किया था। हम अपनी अन्य दो पुस्तकों में पहले ही यह सिद्ध कर चुके हैं कि भारत के मुस्लिम शासकों ने एक भी भवन, नहर, दुर्ग, प्रासाद, मकबरा या मस्जिद चाहे वह लाल पत्थर का हो अथवा संगमरमर का, नहीं बनवाया। उन्होंने पूर्ववर्ती हिन्दू भवों का रूप-परिवर्तन कर उनका दुरुपयोग किया।
हमारी दृष्टि से बटेश्वर के शिलालेख में जिन दो भवनों का उल्लेख है वे अपनी स्फटिकीय भव्यता सहित अभी भी आगरा में विद्यमान हैं। वे हैं तथाकथित एतमादुद्दौला का मकबरा और ताजमहल।
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