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इतिहास और राजनीति >> ताजमहल मन्दिर भवन है ताजमहल मन्दिर भवन हैपुरुषोत्तम नागेश ओक
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पी एन ओक की शोघपूर्ण रचना जिसने इतिहास-जगत में तहलका मचा दिया...
प्रायः यह तर्क प्रस्तुत किया जाता है कि पश्चिमी एशिया में कुछ ऐसे स्मारक हैं, जो मध्यकालीन भारत के समरूप यथा तथाकथित कुतुबमीनार और ताजमहल के समान हैं, इसलिए भारत के वे मुसलमान शासक ही हो सकते हैं जिन्होंने इन स्मारकों का निर्माण कराया। इस विचार के पोषक यह सहज ही भुला देते हैं कि मुहम्मद गजनी, तैमूरलंग तथा अन्य आक्रामकों ने अभिलेखों में यह स्वीकार कर रखा है कि भारत में प्रवेश करते ही भारतीय नदियों के घाट देखकर ही उनकी आँखें फटी-सी रह गई। मन्दिरों और प्रासादों का तो कहना ही क्या। भारतीय निपुणता एवं श्रम की तुलना में पश्चिमी एशिया की भवन-निर्माणकला तो प्राथमिक अवस्था में ही थी। जब भारतीय क्षत्रियों ने पश्चिमी एशिया पर अधिकार किया तो उस समय विस्मयकारी स्मारकों का निर्माण किया गया।* किन्तु उनके शासन में शिथिलता के कारण विद्रोह का युग प्रारम्भ हो गया। विस्तृत रूप से कोलाहल और विध्वंस के कारण अशान्ति फैली जिसमें समस्त कला और शिक्षा का विनाश हो गया। अपने भूखण्ड में जीवित रहने का साधन अनुपलब्ध होने के कारण और कोई भी कार्य शान्तिपूर्वक सम्पन्न न हो पाने के कारण बड़े-बड़े सरदारों के नेतृत्व में बड़े दलों के रूप में भारत जैसे समृद्ध देशों पर ललचाई आँखें दौड़ाई।
* लेखक की पुस्तक 'भारतीय इतिहास की भयंकर भूलें' में एक विशिष्ट अध्याय में इस विषय पर विस्तार से चर्चा की गई है।
अपने आत्मचरित में तैमूरलंग ने लिखा है कि हिन्दुओं का संहार करते समय वह पत्थरों के कारीगर तथा भवन निर्माण से सम्बन्धित अन्य कर्मचारी एवं कलाकारों को छोड़ दिया करता था ताकि उन लोगों को पंजाब तथा अन्य उत्तरी क्षेत्रों के मार्ग से पश्चिम एशिया में ले जाकर उनसे जैसे उसने भारत में विशाल स्मारक देखे हैं, उनके समान भव्य मकबरे और मस्जिदें बनवाई जा सकें। क्योंकि तैमूरलंग तथा अन्य आक्रमणकारी एक समान पद्धति का अनुसरण करते रहे इसलिए तैमूरलंग का पर्यवेक्षण उस पद्धति का परिचायक है जिसमें समस्त मध्यकालीन मुस्लिम आक्रमणकारी सैकड़ों और सहस्रों की संख्या में भारतीय शिल्पज्ञों को पश्चिम एशिया भेजकर उन्हें इस्लाम में परिवर्तित कर उन्हें वहीं बसाकर भारत से लूटे गए वैभव और उपकरणों के माध्यम से वे पश्चिमी एशिया में स्मारक-निर्माण के लिए उन्हें विवश करते थे।
भारतीय इतिहास और शिल्पकला के विद्वान् तथा विद्यार्थियों को यह अनुभव करना चाहिए कि भारत-अरब शिल्पकला के सिद्धांत को विपरीततया लागू करने की आवश्यकता है। भारत के स्मारक भारत-अरब शैली की मुसलमानी नकल और नमूने पर बने होने की अपेक्षा अरब क्षेत्रों के स्मारक ही भारतीय नमूने पर भारतीय उपकरणों तथा धन की सहायता से भारतीय कलाकारों द्वारा बनाए गए थे। इससे भारतीय मध्यकालीन स्मारकों से पश्चिमी एशिया के देशों में पाए जानेवाले स्मारकों की समानता, यदि वह है तो, का स्पष्टीकरण हो जाता है।
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