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इतिहास और राजनीति >> ताजमहल मन्दिर भवन है ताजमहल मन्दिर भवन हैपुरुषोत्तम नागेश ओक
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पी एन ओक की शोघपूर्ण रचना जिसने इतिहास-जगत में तहलका मचा दिया...
इतिहास-शोधन के लिए तीसरा आवश्यक उपकरण है तर्क। तर्क को विज्ञानों का विज्ञान कहा जाता है, क्योंकि इसका विषय दोषरहित तर्क होता है। जो कि किसी भी क्षेत्र में किसी उचित निष्कर्ष पर पहुँचने के लिए आधारभूत आवश्यकता होती है।
इस सम्बन्ध में प्रत्यक्ष उदाहरण उपयुक्त होगा। यदि किसी मृतक के पास यह लिखा मिलता है कि उसने आत्महत्या की है इसके लिए किसी को दोषी न माना जाए, किन्तु यदि शव की पीठ पर छुरे का घाव पाया जाता है तो तर्कपूर्ण निष्कर्ष तो यही निकलेगा कि मृतक की हत्या की गई है और लेख जालसाजी है। किसी जटिल अभियोग में यह इस प्रकार भी हो सकता है कि मृतक ने आत्महत्या की नीयत से टिप्पणी अपने पास रखी किन्तु इसी बीच उसकी हत्या कर दी गई। ऐसी स्थिति में टिप्पणी वास्तविक होने पर भी न्याय के मर्मज्ञ, मृतक की पीठ पर घाव होने के कारण यह मानने में असमर्थ होंगे कि उसने आत्महत्या की। इस प्रकार का तार्किक और विधि-विवेक लिखित ऐतिहासिक साक्ष्यों के सम्बन्ध में उपेक्षित है, जिसके कारण स्पष्टतया वास्तविक निष्कर्ष पर पहुँच पाना नितान्त कठिन है।
इतिहास-शोधन-पद्धति को चौथी आवश्यकता है स्वतन्त्र चिन्तन। दुर्भाग्य से भारत में इतिहास का प्रत्येक स्नातक या अध्यापक अथवा इतिहास के किसी विभाग या संस्थान का अधिकारी जनसाधारण द्वारा अथवा स्वयमेव भी इतिहासज्ञ समझा जाता है। वाल्श की धारणा* है-"इतिहासकारों में प्राय: उस अन्तर्दृष्टि का अभाव पाया जाता है जो पूर्ण पुन:स्थापन के लिए आवश्यक है। और वे विश्लेषणात्मक क्रमबद्ध विवेचन करने की अपेक्षा लकीर के फकीर बने रहते हैं। ऐतिहासिक चिन्तन के लिए अन्तर्दृष्टि का होना मुख्य है।
* वही 'प्रैक्टिसिंग हिस्टोरियन', पृष्ठ ३२
कौलिंगवुड* ने ब्रैडले का सन्दर्भ देते हुए कहा है कि इतिहासकार का श्रेय वह है जो कुछ वह अपने साथ प्रमाण के अध्ययन का भाव लाता है और वह जो कुछ वह स्वयं ही है।"
* 'हिस्ट्री-इट्स परपज एण्ड मैथड', पृष्ठ १६०, वही।
इतिहास-शोधन का पाँचवा स्वत:सिद्ध तत्त्व है कि शोधकर्ता इतिहासज्ञ निराधार परम्परागत विचारों के प्रति झूठी निष्ठा-भावना से ग्रस्त न हो। दूसरे शब्दों में, इतिहासकार एक प्रकार का विद्रोही होना चाहिए न कि ट्रेड यूनियनिस्ट जो व्यक्ति अपनी मान्यताओं के स्तर को उठाने से घबराता है वह इतिहास का ही नहीं किसी भी क्षेत्र का वास्तविक शोधकर्ता नहीं हो सकता। डॉ. रैनियर शोधकर्ता को पुनराश्वस्त करते हुए कहता है कि "अपने पूर्ववर्ती शोधकर्ता के प्रति अन्धसमर्पण इतिहासज्ञ से अपेक्षित नहीं है।" प्रोफेसर वाल्श का भी यही कथन है कि "सच्चे इतिहासकार को उसको सौंपे गए तथ्यों एवं धारणाओं की परख के लिए हर प्रकार के सामान्य एवं तकनीकी ज्ञान का स्वतन्त्रतापूर्वक उपभोग करना चाहिए। परन्तु भारत में इसके विपरीत परम्परा प्रचलित है, यथा परम्परागत बातों का अन्धानुकरण करना और यदि उस परम्परागत विचार पर सन्देह व्यक्त करे तो उसको ही सन्देह की दृष्टि से देखा जाता है।"
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- आनुसंधानिक प्रक्रिया
- कुछ स्पष्टीकरण
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