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इतिहास और राजनीति >> ताजमहल मन्दिर भवन है ताजमहल मन्दिर भवन हैपुरुषोत्तम नागेश ओक
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पी एन ओक की शोघपूर्ण रचना जिसने इतिहास-जगत में तहलका मचा दिया...
कुछ स्पष्टीकरण
इस पुस्तक के अनेक पाठक निस्संदेह अब यह समझने में समर्थ होंगे कि शाहजहाँ की ताजमहल के सम्बन्ध में प्रचलित कथा अन्ततः उतनी विश्वसनीय नहीं जितनी कि समझी जाती थी, फिर भी उनके मन में अभी कुछ सन्देह होगा जैसा कि वे मुझको अपने पत्रों में लिखते हैं, अथवा मुझसे मेरे ऐतिहासिक शोध के सम्बन्ध में दिए जानेवाले भाषणों के अवसर पर प्रश्न करते हैं, उससे मैं अनुमान लगाता हूँ।
शाहजहाँ की प्रचलित कथा को विस्तार से निरस्त करने एवं स्पष्टतया यह निर्धारित करने, कि शताब्दियों तक दोहराए जानेवाले उस झूठ ने संसार-भर के बुद्धिशील मानव को कितनी हानि पहुंचाई है, पर भी वे सन्देह अभी बने ही हुए हैं इसलिए मैं इस अध्याय में उन प्रश्नों का उत्तर देने के लिए प्रस्तुत हूँ।
प्रश्न : जब कि आपने शाहजहाई प्रचलित कथा की त्रुटियों की ओर इंगित किया है, तब आप ऐसा कोई सुपुष्ट प्रमाण क्यों नहीं प्रस्तुत कर पाए कि ताजमहल को हिन्दू राजाओं ने मुसलमानों से पूर्व बनवाया था?
उत्तर : उपरिलिखित प्रश्न की अनेक धारणाएँ सत्य नहीं हैं। प्रथमतः, पिछले अध्यायों में इस सम्बन्ध में अनेक सुपुष्ट प्रमाण प्रस्तुत किए जा चुके हैं। उदाहरणार्थ, शाहजहाँ का दरबारी इतिहास बादशाहनामा यह स्पष्ट करने के लिए उद्धृत किया जा चुका है कि जो राजा मानसिंह का भवन कहा जाता था उसे मुमताज़ को दफनाने के के लिए उसके पौत्र जयसिंह से लिया गया। टैवर्नियर को भी यह कहने के लिए उद्धृत किया गया है कि 'ताशी-मकान' अर्थात् वह भवन जो ताजमहल कहा जाता है, जो पहले से ही विद्यमान था, शाहजहाँ ने उसे मुमताज़ को दफनाने के लिए सोद्देश्य चुना, क्योंकि वह संसार को आकर्षित करनेवाला था। तीसरा निश्चित प्रमाण है उसमें उत्कीर्ण संस्कृत शिलालेख जो यह संकेत करते हैं कि ताजमहल पूर्वकाल में तेज- महा-आलय नाम से विख्यात मन्दिर हो सकता है। चतुर्थ निश्चित प्रमाण ऐसे स्पष्ट विवरण हैं जैसे ताजमहल का त्रिशूलयुक्त बुर्ज, उसके उद्यान में 'बिल्व' वृक्षों की विद्यमानता और कब्रवाले कक्ष के चारों ओर की संगमरमरी जालियों में पुष्पों और पवित्र हिन्दू मंत्र'ॐ' का अंकन। पंचम निश्चित प्रमाण है औरंगजेब का पत्र। दूसरी धारणाएँ कि 'नकारात्मक' प्रमाण पर्याप्त नहीं हैं, उपयुक्त नहीं। संसार-भर के न्यायालयों में प्रतिदिन उस तथाकथित 'नकारात्मक' प्रमाणों के आधार पर हत्यारों और धोखेबाजों को दण्डित किया जाता है। बाद में भी यदि कोई कही-सुनी बात विदित हो जाती है तो उसके आधार पर अपराधियों का पता लगाया जाता है और अपराध की तिथि के वर्षों बाद भी उनको दण्डित किया जाता है। उस आदमी की बात लीजिए जो चिथड़ों में मूल्यवान् हीरा बेचने का यत्न कर रहा हो। उस स्थिति की अयोग्यता किसी भी नागरिक को उस हीरा बेचनेवाले पथिक को रोकने और उस पर धोखाधड़ी या चोरी आ आरोप लगाने के लिए पर्याप्त है। इस स्थिति में या तो उसका भिखारियों का-सा परिधान धोखा है या फिर वह होरा जाली है या फिर वह व्यक्ति उस हीरे का वास्तविक स्वामी नहीं है। ऐसी स्थिति में कोई उस सन्देहास्पद व्यक्ति को इसलिए नहीं छोड़ देगा, क्योंकि उसने उसको हीरा चुराते हुए नहीं देखा है। 'नकारात्मक' के सम्बन्ध में साधारण जन जो भूल करते हैं वे ही वास्तव में दिनानुदिन स्वीकार किए जाने वाले निश्चित प्रमाण होते हैं। दूसरा बिन्दू जो ध्यान देने योग्य है वह यह है कि जबकि, शाहजहाँ का ताजमहल-सम्बन्धी दावा अस्वीकार हो गया तब वह भवन, जो कि हिन्दुस्तान में स्थित है, तो स्वाभाविक ही वह हिन्दू सम्पत्ति हो जाता है।
प्रश्न : आपने ताजमहल के सम्बन्ध में संक्षिप्त हिन्दू इतिहास क्यों नहीं दिया?
उत्तर : वह इसलिए कि ताजमहल के सम्बन्ध में जो कुछ खोजा जाना चाहिए वह अभी तक खोजा नहीं गया है। ताजमहल की सभी कुंजियाँ होनी चाहिए, तथा खोज के साधन और ताजमहल के कोने-कोने में जाकर देखने का अधिकार होना चाहिए। इससे अनेक भूगर्भस्थ कक्ष जिन्हें शाहजहाँ ने ईंट और चूने से बन्द कर दिया था, उन्हें खोलकर खोज करने की आवश्यकता है। मैं यह समझता हूँ कि कुछ निश्चयात्मक प्रमाण उन बन्द किए गए कक्षों में छिपे हुए हैं। उनमें संस्कृत शिलालेख, हिन्दू प्रतिमाएँ, पाण्डुलिपियाँ और मुद्राएँ तथा उस भवन का प्राग्-शाहजहाँकालीन इतिहास हो सकता है। ताजमहल भवन में स्थित बहुमंजिला कुआँ साफ कर उसके तल में भी ऐसे ही प्रमाण खोजे जाने चाहिए। अब तक मैं जिस कार्य में सफल हुआ हूँ वह है मेरी यह स्थापना कि ताजमहल निश्चित ही हिन्दू भवन है और शाहजहाँ ने उसे हथियाया था। किस हिन्दू राजा ने और किस उद्देश्य से इसे बनवाया था यह अभी खोज करना शेष है।
प्रश्न : जब शाहजहाँ इस भवन को अपनी पत्नी के मकबरे के रूप में बदलना चाहता था तो उसने त्रिशूल, बुर्ज तथा अन्य हिन्दू चिह्नों को क्यों नहीं हटाया?
उत्तर : शाहजहाँ ने कभी ऐसा झूठा दावा नहीं करना चाहा था कि ताजमहल उसका अपना है, क्योंकि वह स्पष्ट स्वीकार करता है कि उसने इसे जयसिंह से लिया था। सर्वाधिक, शाहजहाँ यदि झूठे से भी यह चाहता कि वह ताजमहल को अपनी निर्मिति माने तो वह एक असम्भव कार्य था, क्योंकि शाहजहाँ के समकालीनों ने स्वयं जयसिंह से ताजमहल के अधिग्रहण में भाग लिया और मुमताज़ की कब्र बनवाई थी। हिन्दू धार्मिक चिह्नों के प्रति मुसलमानों की घृणा के फलस्वरूप शाहजहाँ ताजमहल के बुर्ज पर से त्रिशूल उखाड़ना चाहता भी तो ऐसा नहीं कर सकता था, क्योंकि इससे गुम्बद पर छिद्र पड़ जाता और परिणामस्वरूप वर्षा में भीतर पानी भर जाता। शाहजहाँ और उसके दरबारी इतने घाघ थे कि वे अपनी इच्छानुसार अपनी धर्मान्धता से विमुख नहीं हो सकते थे। यदि बुर्ज का त्रिशूल उखाड़ दिया जाता तो उस समय के मुसलमानों में कोई ऐसा नहीं था जो कि उस छिद्र को भरने की तकनीक जानता हो। त्रिशूल की के केन्द्र से ३१ फीट ऊँची थी। इतनी ऊँचाई पर स्थिर रहना, जो कि त्रिशूल की छड़ से काफी दूर गुम्बद की गहराई में थी, काफी कठिन था। इसलिए गुम्बद को कोई हानि पहुँचाए बिना त्रिशूल को उखाड़ना सम्भव नहीं था।
प्रश्न : क्या बुर्ज की छड़ मुस्लिम चाँद का चिह्न नहीं है?
उत्तर : बुर्ज की छड़ मुस्लिम चाँद का चिह्न नहीं है। मुस्लिम चाँद समानान्तर नहीं होता। उसका वृत्त लगभग पूर्ण होता है, केवल थोड़ा-सा स्थान इसके सिरे पर तारे के लिए छूटा हुआ होता है। एक विशेषता यह कि मुस्लिम चिह्न चाँद मध्य में छड़ से विभाजित करके नहीं रखा जाता। ताजमहल के गुम्बद के ऊपर लगा त्रिशूल हिन्दुओं का पवित्र चिह्न है जो मध्य में छड़ के समानान्तर पीतल का त्रिशूल अर्द्धवृत्त- सा दिखाई देता है। ताजमहल के पूर्वी छोर पर लाल पत्थर के दालान में त्रिशूल का पूरा आकार खुदा हुआ है। कोई बड़ी निकटता से इसे देखकर यह अनुमान लगा सकता है कि गुम्बद का त्रिशूल कैसा दीखता है। वहीं एक कुप्पी की तरह की छड़ी भी देखी जा सकती है जिसके छोर पर पवित्र कलश है जिसमें दो कमलपत्र दोनों ओर को झुके हैं और शीर्ष पर श्रीफल को सहारा दिए हुए हैं। हिमालय की तलहटी में स्थित हिन्दू और बौद्ध मंदिरों में इसी प्रकार के त्रिशूल स्थित हैं।
प्रश्न : गुम्बद के ऊपर का त्रिशूल क्या तत्कालीन ब्रिटिश शासकों द्वारा बिजली की कड़क को सहारने के लिए नहीं लगाया गया?
उत्तर : यह अनेक भ्रान्त धारणाओं में से एक है। गुम्बद पर स्थित त्रिशूल प्राचीन हिन्दुओं द्वारा भले ही इस कार्य के लिए निर्धारित किया हो किन्तु उसे वहाँ पर अंग्रेजों ने नहीं लगाया है।
प्रश्न : क्या त्रिशूल पर फारसी लिपि में अल्ला-हो-अकबर (ईश्वर महान् है) उत्कीर्ण नहीं है?
उत्तर : तो क्या? शाहजहाँ द्वारा ताजमहल को विकृत किए जाने पर उसने उसमें तथा उससे सन्नद्ध कक्षों में सर्वत्र फारसी के अक्षर उत्कीर्ण कराए हैं। यदि त्रिशूल पर भी इसी प्रकार परसियन के शब्द उत्कीर्ण हैं तो इसका यह अभिप्राय नहीं कि ताजमहल शाहजहाँ ने बनवाया था। दूसरी ओर अक्षरों के ऊपर दुबारा अक्षर उत्कीर्ण करना यह सिद्ध करता है कि शाहजहाँ भवन को विकृत करनेवाला था, क्योंकि 'अल्ला-हो- अकबर' शब्द लाल पत्थरवाले दालान में अंकित त्रिशूल की प्रतिमूर्ति पर उत्कीर्ण नहीं है। यदि शाहजहाँ ताजमहल का निर्माता होता तो गुम्बद पर पीतल के त्रिशूल पर अंकित शब्द दालान की प्रतिमूर्ति में भी अंकित होने चाहिए थे।
प्रश्न : 'शाहजहाँ ने ताजमहल बनवाया' यह कहानी किसने प्रचलित की?
उत्तर : यह कहानी बाद में किसी उत्साही दरबारी में प्रचलित की लगती है जिसे यह अपमानजनक प्रतीत हुआ कि शाहजहां जैसे बादशाह द्वारा अपनी पत्नी को पुराने भवन में दफन करने की बात प्रचलित हो। उसके बाद निरन्तर पुनरावृत्ति होते रहने से कपोल-कल्पना सत्य प्रतीत होने लगी। सर्वाधिक उस कपोल-कल्पना का मूल भी मनगढन्त ही रहा। सभी मध्यकालीन हिन्दू भवनों को मुस्लिम कब्रों के साथ सम्बद्ध कर दिया गया। उन भवनों के दर्शकों के मन में यह बात बैठा दी जाती रही कि उसके भीतर कोई-न-कोई व्यक्ति दफन है। समय बीतते यह गलत विश्वास जड़ पकड़ गया कि भवन का निर्माण कब्र के लिए किया गया। वास्तव में भवन तो पहले से ही विद्यमान था। भीतर की कब्र तो बाद में हथियाये गए हिन्दू भवन में स्थापित कर दी गई। बहुत से भवनों की तो कमें भी नकली हैं। त्रिकोणात्मक कब्रों के ढेर तो केवल दर्शकों को धोखा देने के लिए बनाए गए जिससे कि उन भवनों पर सदा-सर्वदा के लिए मुसलमानों का ही अधिकार बना रहे। इस कार्य में तो मध्यकालीन मुसलमानों ने हिन्दुओं की उस भावना का लाभ उठाया कि गलत या सही कैसा भी धार्मिक स्थल हो, हिन्दू उसको नहीं छेड़ता। एक ही रात में धोखे के मकबरे बनाने का प्रयोग और भवनों तथा परती पड़ी भूमि पर अधिकार करने की प्रवृत्ति आज भी उन लोगों में विद्यमान है।
प्रश्न : अनुसन्धान एवं ज्ञानार्जन के प्रति अगाध प्रेम होने पर भी क्या कारण है कि पाश्चात्य विद्वान् ताजमहल के सम्बन्ध में प्रचलित शाहजहाँई कथा की असत्यता को भाँप नहीं पाए?
उत्तर : यह विश्वास करना गलत है कि सर्वसाधारण पाश्चात्य जन भारतीयों की अपेक्षा ज्ञानार्जन एवं शिक्षा के प्रति अधिक लगाव रखते हैं। कोई भी पाश्चात्य उतना ही तुच्छ और दम्भी होता है जैसा कि कोई भी अन्य मानव प्राणी। किसी विदेश से आया हुआ कोई भी अन्य व्यक्ति भारत-स्थित किसी भवन के विषय में किसी इस या उस व्यक्ति का होने की किंचित् ही परवाह करता है। वह तो केवल भवन की दर्शनीयता के प्रभाव में रुचि रखता है। पाश्चात्य दर्शक को यौन-प्रेम की भावुक कहानी से आसानी से बहलाया जा सकता है। इस दिशा में उसकी मानसिक स्थिति किसी भी साधारण भारतीय से भी निम्न-स्तर की होती है। पाश्चात्य व्यक्ति यह नहीं समझ सकता कि स्त्री के प्रति पुरुष का यौन-आकर्षण पुरुष को दुर्बल एवं अयोग्य बनानेवाला होता है। यौन-भावना कभी भी कार्यशीलता के लिए प्रेरक नहीं हो सकती, विदेशों से आनेवाले पर्यटक के पास भवन के मूल निर्माता के सम्बन्ध में स्थानीय विवाद में पड़ने अथवा उसका अध्ययन करने के लिए न तो समय होता है और न भावना ही सर्वाधिक ऐसे पर्यटक सरकारी कथन पर अधिक निर्भर रहते हैं और उसके विपरीत कथन को सन्देह की दृष्टि से देखते हुए उसे अप-प्रचार समझते हैं। तदपि कुछ पाश्चात्यों ने मुझे लिखने का साहस किया है कि वे ताज के सम्बन्ध में मेरी धारणा से प्रभावित हैं।
प्रश्न : इतिहास के अध्यापक और प्राध्यापकों ने आपके कथन को क्यों स्वीकार नहीं किया?
उत्तर : इतिहास के अनेक अध्यापक और प्राध्यापक स्पष्ट संकेत कर चुके हैं मेरी इस मान्यता पर कि ताजमहल हिन्दू भवन है, उनका दृढ़ विश्वास है। मेरी मान्यता पर अपनी सहमति वे पत्रों तथा व्यक्तिगत सम्पर्क द्वारा और अपनी पुस्तकों, लेखों, शोध-पत्रों तथा भाषणों द्वारा प्रकट कर चुके हैं। अधिकांश वे लोग जो खुले तौर पर अपने ही किसी कारण से, यथा या तो वे कम बोलने के अभ्यासी हैं या फिर बहुत दिनों से प्रचलित विश्वास का विरोध करने का सामर्थ्य नहीं, या फिर उन्हें डर है कि उनके अधिकारी उन्हें दण्डित करेंगे, या फिर अपने क्षेत्र से बहिष्कृत कर दिए जाने के डर से, या फिर अत्यधिक राजनीतिक और धार्मिक प्रवृत्ति के कारण वे अनुभव करते हों कि इसका श्रेय हिन्दुओं को प्राप्त होता है। इससे वे मेरा पक्ष ग्रहण करने में असमर्थ हैं। विश्वविद्यालयों के इतिहास के कुछ प्रमुख प्रोफेसर तथा वे जो भारत के पुरातत्त्व, अभिलेखागार और पर्यटन विभाग चला रहे हैं, भयाकुल हैं कि यदि उन्होंने ताज संबंधी शाहजहाँई कथा का खोखलापन स्वीकार कर लिया तो उन्हें आर्थिक तथा अन्य रूप से पर्याप्त हानि सहनी पड़ेगी। आजीविका चलानेवाले सांसारिक बुद्धि के ये लोग चुप रहना या फिर सरकारी कथन को पढ़ना ही श्रेयस्कर समझते हैं। सामान्य जन-जीवन में किसी हलचल के बिना शान्ति के रहना पसन्द करता है यहाँ तक कि वह किसी सत्य के लिए भी आन्दोलन करने को उद्यत नहीं। यदि सरकार द्वारा ताजमहल के सम्बन्ध में कोई नई खोज उसके सम्मुख रख दी जाएगी तो वह उसको भी बिना किसी लगाव के पढ़ाना आरम्भ कर देगा।
साधारणतया अधिसंख्य मुसलमान ताज के सम्बन्ध में नए उद्घाटित तथ्य की अनदेखी करते हैं, क्योंकि इससे उनकी प्रतिष्ठा को वैयक्तिक हानि होने की सम्भावना है। उनमें से कुछ तो इस खोज को अस्वीकार करने अथवा दबाने तक के लिए तैयार हो जाएँगे।
पुरातत्त्व विभाग तथा अभिलेखागार के उच्चाधिकारी तथा स्कूल ऑफ ओरिएंटल एण्ड अफ्रीकन स्टडीज, लंदन, दि इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस्ड स्टडीज, शिमला और रायल एशियाटिक सोसाइटी, लंदन, हमारी ताजमहल-संबंधी खोज को बड़ी झिझक के साथ देख रहे हैं, क्योंकि आजीवन तो वे उसी असत्य का पोषण करते आए हैं जो कि ताज के सम्बन्ध में शाहजहाँई कथा प्रचलित रही है। जो विश्वविद्यालयों में इतिहास-विभाग के अध्यक्ष हैं, और अन्य संस्थानों तथा कार्यालयों में उनके जो सहयोगी हैं, उन पुस्तकों के आधार पर जो उन्होंने प्रकाशित कराई हों, वे प्रपत्र जो कदाचित् उन्होंने लिखे हों, वे शोध-छात्र जिनका उन्होंने मार्गदर्शन किया हो, शाहजहाई कथा के प्रति प्रतिबद्धता के कारण निष्ठा से यह स्वीकार करने का साहस नहीं कर सकते कि वे अब तक एक निराधार मान्यता का पोषण और प्रचार कर रहे थे।
एक साधारण-सी मानव दुर्बलता के कारण जिसने अध्यापकों, प्राध्यापकों और इतिहास पर कार्य करनेवाले अधिकारियों को अपनी आँखें, कान और मस्तिष्क को ताज-सम्बन्धी नई खोज से बन्द करने के अनेक उद्देश्य सम्मुख आए हैं।
प्रश्न : शिवाजी सदृश शासकों ने ताज पर पुन: अधिकार क्यों नहीं किया? यदि यह हिन्दू भवन था तो उनको इसका ज्ञान होना चाहिए था?
उत्तर : यह प्रश्न भ्रान्त धारणा पर आधारित है। भारत में विशाल भवनों एवं दुर्गों का आधिक्य है, भारत में ताजमहल-सदृश शताधिक सुन्दर भवन हैं। उनमें से अनेक का तो मुस्लिम इतिहासकारों ने ही उल्लेख किया है। आश्चर्यचकित होते हुए मुस्लिम इतिहासकारों ने, उदाहरणार्थ, उल्लेख किया है कि विदिशा तथा मथुरा में भव्य एवं उच्च भवन मन्दिर थे। जिनको यदि २०० वर्ष तक भी ९ सहस श्रमिक कार्यरत रहें तो उन्हें दुबारा नहीं बना सकते। इसलिए यह सोचना गलत है कि भारत में ताजमहल ही एक ऐसा भव्य भवन था जिसके लिए सभी भारतीय एकाग्नचित्त होकर रक्षा के लिए सन्नद्ध रहते ताकि वह धर्मान्ध मुस्लिम आक्रान्ताओं के हाथों न पड़ जाए। जबकि सारा भारत उत्तर में अटक से दक्षिण में आरकौट तक अपने सभी भवनों, मन्दिरों और दुर्गों सहित मुसलमानों के अधिकार में जा पड़ा तो यह प्रश्न तर्कसंगत नहीं कि ताजमहल को क्यों नहीं बचाया जा सका? और यह थोपा हुआ अनुमान, क्योंकि किसी हिन्दू को ताजमहल के विषय में ज्ञान नहीं था अतः यह हिन्दू भवन नहीं होगा, गलत है। शिवाजी सदृश वीर योद्धा तो वास्तव में उस समय धर्मान्ध आक्रामकों के अधिकार से समस्त भारत को मुक्त करने के लिए युद्ध की तैयारी कर रहे थे, ऐसा करने में उनका मुख्य उद्देश्य था सिन्धु से कन्याकुमारी तक उन सभी भवनों एवं क्षेत्रों को नियन्त्रण एवं अधिकार में लेना। सर्वाधिक शिवाजी सदृश शासक उतनी शक्ति संगठित नहीं कर पाए थे कि मुगलों को खदेड़ सकें जैसाकि १८५८ तक मुगल शासन के निरन्तर बने रहने से स्पष्ट है।
प्रश्न : यदि ताजमहल 'मानसिंह मंजिल' के नाम से विख्यात था तो जयपुर दरबार के कागजातों में इसका कुछ प्रमाण प्राप्त हो सकता था?
उत्तर : हाँ, वहाँ प्रमाण प्राप्त हो सकता था। किन्तु दुर्भाग्य से राजकीय जयपुर अभिलेखागार, जिसका नाम पोथीखाना है, वह शासक के अधीन होने के कारण वहाँ न तो कोई व्यक्ति कुछ देख सकता था और न ही कुछ अध्ययन कर सकता था। इसका कारण सम्भवतया यह था कि उन कागजों में, राजघराने का आन्तरिक विवरण तथा धर्मान्ध मुगलों के प्रति व्यवहार का विवरण जो कि समकालीन राजपूत समाज में नितांत तुच्छ और घृणित समझा जाता था, अंकित है। ऐसा विवरण किस प्रकार दबाया गया इसका एक स्पष्ट प्रमाण इस बात से प्राप्त होता है कि जिन राजकुमारियों को बलात् मुगल हरम में ले जाया गया था उनके नामों तक का लोप हो गया है। इसलिए ऐसे समय में जब जयपुर राज और राजपरिवार की महिलाओं को धर्मान्ध मुस्लिम आक्रांताओं द्वारा बड़ी क्रमबद्धता से हथियाया और भ्रष्ट किया जा रहा था तब बड़े कौशल से ताजमहल अधिग्रहण के लुप्त प्रमाण जो कि बड़ी चतुराई से विकृत कर दिए गए होंगे। उन्हें बड़ी कठिनाई से किसी कुशल शोधकर्ता द्वारा एकत्रित करके उनमें सामंजस्य स्थापित करने की आवश्यकता है। मैं उन समकालीन लोगों से, जो स्वयं को इतिहासकार मानते हैं, मिला हूँ या उनको सुना है जो दावा करते हैं कि उन्हें 'पोथीखाना' के कुछ प्रमाणों पर दृष्टि डालने का अवसर प्राप्त हुआ है। वे बड़ी अस्पष्टता से बताते हैं कि उन्होंने कुछ ऐसे कागजात देखे हैं जिसे जयसिंह द्वारा शाहजहाँ को आगरा में ताजमहल बनाने के लिए भूमि बेचने का विक्रयनामा कहा जाता है। ऐसे एक व्यक्ति जिनसे मैं मिला हूँ, डॉक्टर आशीर्वादीलाल श्रीवास्तव हैं, जो अनेक वर्ष से आगरा विश्वविद्यालय में इतिहास विभाग के अध्यक्ष हैं। जब पूछा गया कि उस कागज में उसका क्या क्रय मूल्य अंकित है तो उन्होंने कहा कुछ भी नहीं। ऐसे व्यक्ति की तद्विषयक बुद्धि का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है जो कि ऐसे अस्पष्ट प्रमाणों पर अंधविश्वास करते हैं। ऐसे क्रयनामे का उल्लेख करना जिसमें क्रय-मूल्य अंकित न हो, ठीक उसी प्रकार है जिस प्रकार हैमलेट के बारे में बात करते हुए कहना कि वह डेनमार्क का राजकुमार नहीं था। ऐसे व्यक्ति जो ऐंग्लो-मुस्लिम कथनों से प्रभावित हों वे ऐसे विषयों के शोध करने में समर्थ नहीं हो सकते जिससे बड़ी सावधानी और असीम बुद्धिचातुर्य की आवश्यकता होती है। कानूनी ज्ञान जो भ्रान्त प्रमाणों को अलग कर सके और ऐसी तीव्र तर्कबुद्धि जो छूटे हुए तथा भ्रामक तन्तुओं को तुरन्त पहचान सके, ऐसे लोगों में नहीं पाई जाती। वे सब कागजात जिनका मुगलों से जयसिंह का लेन-देन से सम्बन्ध है, विशेषतया वे जो सन् १६२८ और १६३२ के मध्य के हैं, उनकी बड़ी सूक्ष्मता से जाँच होनी चाहिए जिससे कि ताजमहल के अधिग्रहण के सम्बन्ध में जयपुर की ओर से कोई संकेत प्राप्त हो सके। भूतपूर्व जयपुर-नरेश और बीकानेर स्थित राजस्थान राज्य अभिलेखागार के निदेशक ने तो मुझे बताया है कि इस प्रकार का कोई क्रयनामा विद्यमान नहीं है। यह भी सम्भव हो सकता है कि ताजमहल का निर्माण जयपुर राजघराने ने नहीं कराया हो, किन्तु वह उनके अधिकार में विजय, क्रय अथवा विनिमय या दहेज के रूप में आया हो।
प्रश्न : यदि ताजमहल भव्य हिन्दू भवन है तो यह कैसे सम्भव हुआ कि इसके पूर्व इसका कोई उल्लेख नहीं है?
उत्तर : इतिहासकार और जनसाधारण जिनका यह विश्वास जम गया था कि ताजमहल को शाहजहाँ ने बनवाया था, वे मानसिक रूप से इतने असमर्थ हो गए थे थे कि वे इसका कोई पूर्व-सन्दर्भ सोच ही नहीं पाए। इसके बाद यदि वे खुले मस्तिष्क से अपनी उन सन्दर्भ-पुस्तकों को पुन: पढ़ें तो सम्भवतया ताजमहल के सम्बन्ध में उन्हें अनेक तथ्य प्रकट हो जाएँ। स्वयं हमने प्रस्तुत पुस्तक में यह दिखाया है कि शाहजहाँ के प्रपितामह बाबर ने ताजमहल का उल्लेख किया है, वास्तव में बाबर की मृत्यु ताजमहल में हुई थी। बाबर की पुत्री गुलवदन बेगम ने भी ताजमहल की ओर संकेत किया है। यदि इसी प्रकार पूर्ववर्ती विवरणों एवं इतिहासों का बुद्धिमत्तापूर्ण पुनः अध्ययन किया जाए तो अन्य अनेक सन्दर्भो का ज्ञान हो सकता है। सर्वाधिक, जब सड़कों तथा मुहल्लों का नाम तक प्रत्येक नए शासन के साथ बदलता रहा हो तो यह जानना कठिन हो जाता है कि जिसे हम आज ताजमहल कहते हैं, उस समय उसका क्या नाम होगा। एक कठिनाई यह भी है कि एक ऐसे नगर में जहाँ अनेक भव्य भवन हों, तो तत्कालीन विवरण में किसी भवन विशेष के अस्तित्व का ज्ञान कर पाना नितान्त कठिन हो जाता है। लेखक तो प्रत्येक ऐसे भवन के विषय में यही कहेगा कि वह विशाल और विस्तृत है। तदपि एक कठिनाई और यह है कि यदि मुस्लिम आक्रमण और नरसंहार से उथल-पुथल के वातावरण में ताजमहल जैसा भवन एक से दूसरे के अधिकार में जाता है और एक बार वह मन्दिर के रूप में प्रयुक्त हुआ हो और फिर बाद में भवन के रूप में या फिर इसके विपरीत तब उस भवन का स्रोत मिलना कठिन हो जाता है।
प्रश्न : जिस हिन्दू राजा से ताजमहल का अधिकार छिन गया उसने कोई कागजात क्यों नहीं छोड़े या अपने अधिकार का दावा क्यों नहीं किया?
उत्तर : यह पूछना तो ठीक वैसा ही है कि मुहम्मद बिन कासिम से प्रारम्भ कर अन्त तक सहस्रों मुस्लिम आक्रमणों में जिन्होंने काश्मीर से कन्याकुमारी तक अपने दुर्ग, मन्दिर, भवन, घर, दुकानें, उद्यान या खेत खो दिए, आज सामने आकर अपने भव्य, वंशजों के माध्यम से उन सबके दावे के लिए आग्रह क्यों नहीं करते? जब देश का बहुत बड़ा भाग विदेशी आक्रामकों के हाथ में चला गया और प्रजा का संहार हो गया या युद्ध में मारी गई और अधिकृत भवनों पर शताधिक वर्षों से शत्रुओं ने अधिकार कर लिया तब क्या किसी निष्कासित व्यक्ति के वंशज से यह अपेक्षा रखी जा सकती है कि वह अपने पूर्वजों के भवन के द्वार के बाहर इस आशा में लटका रहे कि किसी समय कालान्तर में उसे या उसके वंशजों को उस भवन का अधिकार मिल जाएगा! क्या महामारी, नर-संहार, उपद्रव, भूकम्प आदि समस्त जीवन-मूल्यों को नहीं बदल देते और क्या वे लोगों को उनके अपने ही जीवन-काल में उनके अपने स्थान से विस्थापित नहीं कर देते ? क्या परिवारों का विनाश नहीं होता? क्या परिवार अनेक शाखाओं में विभक्त होकर अपने पूर्वजों के नाम तक भी स्मरण रखने में असमर्थ नहीं होते? और ऐसे परिवर्तन में जो वर्षों के अन्तराल से विस्तीर्ण हो, क्या किसी के लिए यह सम्भव है कि वह मूल कागजों को सुरक्षित रख पाए? क्या वे खो नहीं सकते, चुराए नहीं जा सकते, जल नहीं सकते अथवा दीमकों या कीड़ों द्वारा नष्ट नहीं किए जा सकते अथवा पानी से नष्ट नहीं हो सकते?
प्रश्न : क्या आपका अभिप्राय यह है कि शाहजहाँ ने किसी प्राचीन हिन्दू भवन को ध्वस्त करके उस स्थान पर ताजमहल बनवाया?
उत्तर : नहीं। इस पुस्तक का मुख्य बिन्दु है पाठकों को यह विश्वास दिलाना कि जैसा ताजमहल आज है, जैसा उसे आज हम सब देखते हैं, यह वही भवन है जिसे शाहजहाँ ने हथियाया था। यदि उसने इसमें कुछ किया है तो मैं कहूँगा उसने इसे विकृत किया, इसे कुछ कम भी किया, किन्तु उसने कुछ अपनी तरफ से इसकी सुन्दरता और आकार में वृद्धि नहीं की। मूल हिन्दू ताजमहल इससे कहीं अधिक सुन्दर था। इसकी मोती जैसी श्वेत दीवारें अब कीड़े-मकोड़ों जैसी रेखाओं से काली-सी लगने लगी हैं। मूल हिन्दू मन्दिर प्रासाद में बहुत-से मण्डप आदि थे जो इसके चारों ओर बिखरे ध्वंसावशेषों से प्रकट होता है। जो ताजमहल आज हम देखते हैं वह कटा- छंटा और बिगाड़ा हुआ स्मारक है। इसकी भूगर्भस्थ संगमरमर के चबूतरे के नीचे यमुना के स्तर तक की अनेक मंजिलें छिपी, अपेक्षित और बन्द पड़ी हैं। सुन्दर रंग की चित्रकारी जो उन भूगर्भस्थ कक्षों की दीवारों को शोभित करती थी, धर्मान्धों ने रगड़कर नष्ट कर दी है।
प्रश्न : कोई ताजमहल को मुस्लिम मकबरे के रूप में देखता है और कोई हिन्दू मन्दिर प्रासाद परिसर के रूप में, तो क्या इससे कुछ अन्तर पड़ जाता है ?
उत्तर : निश्चित ही इससे बहुत अन्दर पड़ता है। यदि किसी से यह कहा जाता है कि तुम मकबरा देख रहे हो तो वह कमरों के भीतर जिसमें कब्रों के ढेर ढके हैं, झाँकता है और बाहर आकर समझने लगता है कि आज का उसका दिन सफल रहा। इससे वह ताजमहल की भव्यता और सुन्दरता को भूल जाता है। इससे किसी के मन में यह बुद्धिमत्तापूर्ण विचार भी नहीं उठता कि वह किसी अन्य दृष्टिकोण से, जबकि वह विशाल भव्य भवन में जो कि ताजमहल जैसे आयाम का हो, समझने का यत्न नहीं कर सकता। यदि किसी को यह ज्ञान हो कि यह मन्दिर प्रासाद परिसर है तो उसके पास इतना अधिक समय होता है और वह प्रत्येक विस्तार के लिए सावधान हो जाता है कि हर एक मंजिल के हर एक कोने के वराण्डे, गलिहारे, बड़े कमरे, पोर्टिको, संलग्न-कक्ष, भूगर्भस्थ कक्षा, प्रवेश-द्वार, अश्वशाला, बाहरी कक्ष आदि-आदि पर पूर्ण दृष्टि रखकर अपनी तृप्ति का अनुभव कर सकता है। इसके बाद ताजमहल देखने जानेवाला प्रत्येक दर्शक न केवल सम्पूर्ण ताज-परिसर को देखने के लिए पर्याप्त समय लेकर जाएगा जिससे कि वह भीतर-बाहर तथा एक छोर से दूसरे छोर तक और ऊपर- नीचे तक भली प्रकार देख सके अपितु वह उस परिसर की बाहर से भी परिक्रमा कर उसकी परिधि के बाहर बड़ी दीवार को घेरे लाल पत्थरों से बने अनेक भवनों को भी देखने जाएगा। यदि जनता अपने इस अधिकार के प्रयोग का निश्चय कर ले तो सरकार को विवश होकर ताजमहल के बन्द, अवरुद्ध और छिपाई हुई मंजिलों के द्वार खोलने पड़ेंगे। यदि सरकार प्रवेश-शुल्क लेती है तो फिर क्या कारण है कि वह जनता का प्रवेश केवल शव-गृहों तक ही सीमित करती है? तब तक जन-साधारण और सरकार यह धारणा बनाए रखेंगे कि ताजमहल मकबरे के अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं है, तब तक तो सीमित प्रवेश की बात समझ में आ सकती थी, किन्तु अब तो जनता और सरकार दोनों ही जागृत हों और ताज मन्दिर प्रासाद के सम्बन्ध में अपना-अपना कर्तव्य निबाहें।
प्रश्न : यदि शाहजहाँ ने हिन्दू मन्दिर प्रासाद का दुरुपयोग कर उसको मकबरा बना भी दिया तो फिर उसे वैसा ही क्यों न रहने दिया जाए, गड़े मुर्दे उखाड़ने से क्या लाभ?
उत्तर : इस प्रश्न से अनेक महत्त्वपूर्ण प्रश्न उठते हैं। प्रथमतः, जिस प्रकार कोई देश जो अपनी स्वतन्त्रता विदेशी के हाथों खो चुका हो वह उसे पुनः प्राप्त करना आत्मसम्मान का प्रश्न बना लेता है, उसी प्रकार जो भवन विकृत कर दिया गया हो उसे उसके मूलरूप में लाने की भी बात है। द्वितीयतः, ताजमहल को हिन्दू प्रासाद अथवा मुस्लिम मकबरे के रूप में देखकर उससे उसके वास्तुशिल्प, उसकी लागत, , तथा जो स्थान उपलब्ध किया गया है उसकी उपादेयता एवं आकार के विषय में सोचने का महान् अन्तर हो जाता है। तीसरी बात यह है कि जहाँ सत्य को रहस्य बना कर छिपा दिया गया हो वहाँ खोज की प्रक्रिया निरन्तर जारी रहनी चाहिए और ताजमहल उसमें अपवाद नहीं माना जाना चाहिए। चतुर्थतः, इतिहास का स्पष्टतया भूतकाल से सम्बन्ध होता है, इसलिए जब इतिहास की बात हो तो यह कहना नितान्त अनुचित है कि विगत को क्यों कुरेदा जाए? इतिहास विगत को कुरेदने से न कम है न ज्यादा। यदि जनता अपनी बुद्धि से कभी यह समझती कि इतिहास अनावश्यक अथवा व्यर्थ का विषय है तो यह कानून से प्रतिबन्धित होता, क्योंकि किसी भी देश ने अभी तक ऐसा नहीं किया, तो यह प्रमाणित है कि जनता ऐतिहासिक अनुसन्धान के पक्ष में है। सत्य, जहाँ वह असत्य की तह के नीचे दबा हुआ है, उसका उद्घाटन हो।
प्रश्न : इतिहासकारों की अनेक पीढ़ियाँ ताजमहल के सम्बन्ध में सत्य की खोज क्यों नहीं कर पाई जो आपने की है?
उत्तर : वह इसलिए कि उन्होंने अपनी मूर्खता को अपनी अनुसन्धानवृत्ति के साथ चलने दिया, वे प्रचलित कथा पर विश्वास करते रहे और सन्देहों को टालते रहे। वे ताजमहल की लागत, उसकी निर्माण-अवधि, उसका वास्तुशिल्पी, ताज में कहीं भी शाहजहाँ द्वारा उसके बनाए जाने के उल्लेख का अभाव, और मुमताज़ की मृत्यु तथा उसके दफन किए जाने की तिथि के बारे में मौन जैसी विशाल त्रुटियों के विषय में वे लुभावने स्पष्टीकरणों से चिपके रहे।
प्रश्न : ताजमहल के सम्बन्ध में जब प्रमुख-प्रमुख इतिहासकार आपसे पहले अनुसन्धान कर चुके हैं, तब आप क्या नया प्रमाण प्रस्तुत कर सकते हैं?
उत्तर : मुझसे पूर्व ऐतिहासिक अनुसन्धानकर्ताओं का कार्य बड़ा त्रुटिपूर्ण रहा है। वे तो पूर्ण सन्तुष्ट प्रमाणित हुए। वे प्रमुख सन्देह व्यक्त करने और उनका प्रत्येक का उत्तर ढूँढने में असमर्थ रहे। मैं यह दावा नहीं करता कि मैं कोई विशेष प्रमाण लेकर आगे आया हूँ। मेरा काम तो उस पुलिस अधिकारी जैसा है जिसे किसी अपराध के विषय में किसी अज्ञात व्यक्ति द्वारा सूचित किया जाता है तब वह उस स्थान पर अपने साथ केवल एक पेंसिल और नोट-बुक लेकर जाँच के लिए पहुंचता है। जांच के अधीन घटना का साक्ष्य ढूँढ़ना होता है। जाँच करनेवाले पुलिसमैन के घर से यह कार्य नहीं किया जा सकता। उसी प्रकार जब मुमताज़ मेरे जन्म से लगभग २८७ वर्ष पूर्व दिवंगत हुई और वह सब-कुछ जो ताज के विषय में कहा गया, वह आगरा से टिंबकटू तक के विश्वविद्यालयों एवं अभिलेखागारों में संगृहीत है तब मैं कौन-सा नया साक्ष्य प्रस्तुत कर सकता हूँ? (मैं कहता हूँ कि मेरा जन्म मुमताज की मृत्यु से लगभग २८७ वर्ष बाद हुआ, क्योंकि मेरी जन्म-तिथि अनेक स्थानों पर ठीक प्रकार से लिखी गई है। मुमताज की मृत्यु-तिथि तो इतिहास को भी विदित नहीं, हालाँकि ताजमहल की मृत नायिका के रूप में उसको खूब उछाला गया है। मेरा कार्य तो केवल साक्ष्य एकत्रित करना, उन्हें क्रमबद्ध करना, उनका विश्लेषण करना और अपनी बात पर तर्क करना, पाठकों को मध्यस्थ मानकर उनसे आग्रह करना कि क्या जो प्रमाण प्रस्तुत किए हैं उनके आधार पर शाहजहाँ ने ताजमहल स्वयं बनवाया था या कि उसने केवल उसे हथियाया था, तक ही सीमित है। किन्तु मैं इस बात की और अवश्य संकेत करूँगा कि साक्ष्यों की समीक्षा और पुनरीक्षण की अवधि में मुझे विदित हुआ कि कुछ बहुत से महत्त्वपूर्ण स्रोत बड़ी चतुराई से विकृत किए गए और दबाए गए या फिर मूर्खता एवं असावधानी से उपेक्षित कर दिए गए। उदाहरणार्थ, ताजमहल के सम्बन्ध में टैवर्नियर का उद्धरण यों ही चलते-फिरते उद्धृत किया गया और इतने वर्षों तक उसको पूर्णतया गलत तरीके से समझाने का यत्न किया गया। बादशाहनामे की स्वीकारोक्तियाँ तो भुला दी गईं या दबा दी भाईं। एक वयोवृद्ध इतिहासकार, जिन्होंने दो या तीन बार बादशाहनामे का अध्ययन किया है, उन्होंने स्वेच्छया और स्पष्टतया मेरे सामने स्वीकार किया कि शाहजहाँ का अपना बादशाहनामा (दरबारी इतिहास), खण्ड एक के पृष्ठ ४०३ पर स्वीकार करता है कि ताजमहल हथियाया गया हिन्दू भवन था। दुर्भाग्य से मैं अनेक ऐसे मुसलमानों से मिला जो स्वयं को इतिहासकार मानते हैं, और जब उनको उक्त उद्धरण दिखाया गया तो उन्होंने उस पर कुछ कपटपूर्ण टिप्पणी करने का यत्न किया। इससे स्पष्ट होता है कि किस प्रकार भारत में कुछ ऐसे लोग हैं जिनकी मनोवृत्ति नितान्त साम्प्रदायिक है। वे इतिहास को विगत घटनाओं का पवित्र सत्य मानने को अपेक्षा इसको इस प्रकार विकृत करने में लगे हैं जिससे कि वह उनकी अपनी आकांक्षा, रुझान और दुराग्रह की पूर्ति कर सके। मैं एक ऐसी संस्था, जिसमें इतिहास के शिखरस्थ विद्वान् सम्मिलित हैं, (१९६६) में इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस के मैसूर अधिवेशन में गया, जहाँ मैंने बादशाहनामे से उद्धृत कि 'ताजमहल हिन्दू भवन था', चार पंक्तियों का प्रपत्र वितरित किया। उनकी प्रतिक्रिया आश्चर्यचकित और दुखित करनेवाली थी। बिना उसको स्वीकार अथवा अस्वीकार किए उन्होंने केवल मुँह बिचका दिया। मुझे लगा कि उनके इस बुद्धिमत्तापूर्ण मौन का विशेष कारण था। किसी संस्था अथवा विभाग के अध्यक्ष होने के नाते उनकी बड़ी ख्याति थी। अपने जीवनकाल में जो कुछ उन्होंने पढ़ा-पढ़ाया और विश्वास किया उसके विपरीत यह स्वीकार करना कि ताजमहल हथियाया गया हिन्दू भवन था, उनको असुविधाजनक और घबरानेवाला प्रतीत हुआ। उस घटना से मुझे विश्वास हो गया कि जन-साधारण भले ही वह उच्चशिक्षित और प्रतिष्ठित हो, वह प्रचलित भ्रांतियों से ही चिपका रहना चाहता है विपरीत इसके कि वह सत्य का पक्ष ग्रहण करे चाहे इसमें उसको असुविधा ही क्यों न हो। उनके लिए ऐतिहासिक सत्य पढ़ाना या उसका प्रचार करना कोई महत्त्व नहीं रखते। जो उनके लिए विचारणीय है, वह है उनका अहम्।
प्रश्न : क्या आप यह विश्वास नहीं करते कि मुमताज के प्रति शाहजहाँ का प्रेम इतना पर्याप्त था कि उसकी स्मृति में ताजमहल बनाए?
उत्तर : इस प्रश्न के अनेक उत्तर हैं। यह प्रश्न मेरे अथवा आपके विश्वास करने का नहीं है। प्रत्येक बात के लिए इतिहास को प्रमाण की आवश्यकता होती है। यह दावा करना कि शाहजहाँ का मुमताज़ के प्रति प्रगाढ़ प्रेम था, स्वयं में कल्पना है। चाहे आप किसी भी इतिहास-पुस्तक में पढ़ें, आपको स्मरण होगा कि यदि इतिहास में कहीं कुछ उल्लेख किसी मुगल का अपनी पत्नी के प्रति विशेष लगाव का आया है तो वह केवल जहाँगीर और नूरजहाँ के सम्बन्ध में है। वे जो यह दावा करते हैं कि शाहजहाँ का मुमताज के प्रति असांसारिक प्रेम था, उनको वे अनेक सन्दर्भ स्मरण कराने होंगे जब शाहजहाँ ने शासन के कार्यों में ढील देकर मुमताज़ के पार्श्व में अपने दिन बिताए हों। उस स्थिति में इतिहास में यह उल्लेख होगा कि उस विलास-कक्ष के बाहर एक पहरेदार खड़ा रहता होगा अथवा वहाँ कोई बोर्ड लटका होगा जिसमें इस प्रकार लिखा होगा, "बादशाह बेगम की बाँहों में लिपटे हैं" "व्यस्त हैं "क्षमा कीजिएगा" "परेशान न कीजिए..." क्योंकि ऐसा कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है और न ही शाहजहाँ और मुमताज़ की प्रेम-गाथा की कोई पुस्तक ही उपलब्ध है जैसी कि रोमियो-जूलियट या लैला-मजनूं की, तो यह विश्वास करना गलत होगा कि शाहजहाँ-मुमताज़ में कोई विशेष प्रेम था। यह भी स्मरण रखना होगा कि पुरुष का नारी के प्रति आकर्षण पुरुष को दुर्बल और अक्षम बनानेवाली भावना है। यौन-प्रेम, मांसल प्रेम, नारी के प्रति यौनाकर्षण पुरुष को बलशाली नहीं बनाता, केवल उच्च भावनाएँ ही जैसे ईश्वर के प्रति या अपने देश के प्रति या अपनी माता अथवा पुत्र के प्रति प्रेम ही वह प्रेरणाप्रद भावना है जो उससे कुछ बड़ा काम करवा देती है। स्त्री के प्रति यौनाकर्षण तो मनुष्य को अपराध की ओर धकेलता है, और नहीं तो बलात्कार, आत्महत्या अथवा हत्या तो करवा ही देता है। यह नितान्त भ्रामक है कि ताजमहल की उत्पत्ति शाहजहाँ और मुमताज़ के प्रेम से हुई है, क्योंकि स्त्री-पुरुष के प्रेम से केवल दो चीजें उत्पन्न होती हैं, लड़का या लड़की, कोई भवन नहीं। इसे आप अपने परीक्षण से पुष्ट कर सकते हैं।
प्रश्न : ताजमहल के सम्बन्ध में शाहजहाँई कपोल-कथा का प्रसारक आपकी दृष्टि में कौन हो सकता है?
उत्तर : इसका उत्तरदायित्व, कि बिना बात इतनी बड़ी गप्प घड़ लेना, निश्चित ही मध्यकालीन अथवा पूर्व-मुस्लिम चापलूसी-मिश्रित दरबारी बहादुरी पर है और शोधकर्ता भी अपने कार्य के प्रति असावधानी के उत्तरदायी हैं जो उन्होंने केवल किंवदन्ती पर विश्वास करके किसी प्रमाण की मांग नहीं की तथा वे कवि भी दोषी हैं जो अपनी कविता की ऊँचाई के प्रलोभन में अपनी कल्पना की उड़ान को यौन- प्रेम के सम्बन्ध में किसी प्रकार की लगाम नहीं लगा पाए और ऐतिहासिक तथ्यों एवं विवरणों पर दृष्टिपात नहीं कर पाए।
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- प्राक्कथन
- पूर्ववृत्त के पुनर्परीक्षण की आवश्यकता
- शाहजहाँ के बादशाहनामे को स्वीकारोक्ति
- टैवर्नियर का साक्ष्य
- औरंगजेब का पत्र तथा सद्य:सम्पन्न उत्खनन
- पीटर मुण्डी का साक्ष्य
- शाहजहाँ-सम्बन्धी गल्पों का ताजा उदाहरण
- एक अन्य भ्रान्त विवरण
- विश्व ज्ञान-कोश के उदाहरण
- बादशाहनामे का विवेचन
- ताजमहल की निर्माण-अवधि
- ताजमहल की लागत
- ताजमहल के आकार-प्रकार का निर्माता कौन?
- ताजमहल का निर्माण हिन्दू वास्तुशिल्प के अनुसार
- शाहजहाँ भावुकता-शून्य था
- शाहजहाँ का शासनकाल न स्वर्णिम न शान्तिमय
- बाबर ताजमहल में रहा था
- मध्ययुगीन मुस्लिम इतिहास का असत्य
- ताज की रानी
- प्राचीन हिन्दू ताजप्रासाद यथावत् विद्यमान
- ताजमहल के आयाम प्रासादिक हैं
- उत्कीर्ण शिला-लेख
- ताजमहल सम्भावित मन्दिर प्रासाद
- प्रख्यात मयूर-सिंहासन हिन्दू कलाकृति
- दन्तकथा की असंगतियाँ
- साक्ष्यों का संतुलन-पत्र
- आनुसंधानिक प्रक्रिया
- कुछ स्पष्टीकरण
- कुछ फोटोग्राफ











