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रहस्य-रोमांच >> बलिदान

बलिदान

दुर्गा प्रसाद खत्री

प्रकाशक : लहरी बुक डिपो प्रकाशित वर्ष : 1985
पृष्ठ :96
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 15394
आईएसबीएन :0

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यह आज की बात नहीं बहुत पुरानी है मगर फिर भी मुझे इस तरह याद है मानों इस घटना को हुए थोड़े ही दिन बीते हों।

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ऐतिहासिक उपन्यास

॥श्री॥
बलिदान
पहिला बयान

यह आज की बात नहीं बहुत पुरानी है मगर फिर भी मुझे इस तरह याद है मानों इस घटना को हुए थोड़े ही दिन बीते हों।
आज मैं अधेड़ हूं पर उस समय जवान था, आज बड़ी बड़ी मोछों ने मेरे होठों को ढांक रक्खा है पर उस समय मसें भी न रही थीं, आज गृहस्थी और एक दर्जन बच्चों के जञ्जाल में पड़ा हुआ है, उस समय यद्यपि झंझटों से खाली तो नहीं फिर भी स्वतन्त्र था, जमाने को एक खेल की तरह देखता था गुजरे की याद न रहती थी और आने वाले की परवाह न थी। उस समय मैं डाक्टरी पास करके नया नया निकला था, अपने आगे किसी को कुछ न समझता था।
यह उसी जमाने का हाल है।
किसी काम से मुझे मोदपूर जाना पड़ा था। मोदपूर पूरब में एक गाव है, गांव क्या उसे छोटा मोटा एक कसबा ही कहना चाहिये क्योंकि मोदपूर में दो हजार से ऊपर की आबादी है और कई ऊंचे दर्जे के व्यापारी, बनिये, बजाज और छोटे मोटे महाजनों ने रौनक कर रक्खी है। गांव में यों तो प्राय: फूस और खपरैल ही के मकान भरे हैं मगर दस बीस पक्के और अधकचरे मकान भी अपना सिर उठाये हुए हैं जो उन्हीं सौदागरों और बनियों की जायदाद हैं। गांव में सफाई भी है क्योंकि यहां के नौजवान जमींदार 'राय सीताराम' पढ़े लिखे होने के कारण सफाई की कीमत जानते हैं और खुद भी उसके लिये खर्च और मेहनत करने को तैयार रहते हैं। मेरे एक रिश्तेदार इन्हीं के यहां नौकर थे और उन्हीं के सबब से मुझे भी कभी कभी यहां आना पड़ता था तथा इसी सबब से राय सीताराम से भी यद्यपि दोस्ती
बलिदान तो नहीं लेकिन जान पहिचान हो गई थी। इसी मोदपूर में मैंने वह घटना देखी थी जिसने मेरे पानी ऐसे दिल पर भी लकीर खींच दी थी।
मोदपूर के पूरब तरफ कुछ दूर पर आम की एक भारी पचासों बिगह की बारी है। इस बारी के एक कोने की तरफ एक छोटी बगिया और उसके अन्दर एक छोटा सा ईंट चूने का बना हुआ श्री राधाकृष्ण का मन्दिर है। मन्दिर किसी पुराने जमाने का बना हुआ है और उसके पास ही एक कूआ और दो तरफ कुछ मामूली इमारतें हैं जिनमें आने जाने वाले मुसाफिर टिक कर आराम कर सकते हैं। यह मन्दिर, मकान, बगिया और आम की बारी सब महन्थ महादेवदास का है और उन्होंने इन्हें अपने गुरू से पाया है।
जब तक मैं मोदपूर में रहता हूँ इस बगिया में अवश्य एक बार नित्य जाता हूँ क्योंकि एक तो श्री राधाकृष्ण जी की मूर्ति बड़ी अपूर्व और दर्शनीय है, दूसरे यह स्थान भी रमनीक मनोहर और निराला है। कूएं पर भांग बूटी छानने और पास की बारी में निपट कर स्नान आदि करने का भी बड़ा सुबीता है। एक नौकर महन्थ महाराज के हुक्म से हरदम यहां मुस्तैद रहता है जो आये गये मुसाफिरों के आश्रम के लिये मुकर्रर है। इसे मैं बीच बीच में कुछ दे दिया करता था जिससे यह खास मेरे नौकर की तरह मेरा सब हुक्म बजा लाने को मुस्तैद रहता था।
नित्य नियमानुसार इस बार भी दो साल के बाद जब मैं मोदपूर आया तो दूसरे दिन सन्ध्या समय इस बगिया की तरफ चला। यह गांव से लगभग कोस भर के पड़ती थी इससे यहां आने के लिये कुछ जल्दी ही चलना पड़ता था, इसीलिये आज भी मैं जल्दी ही रवाना हुआ और सूरज डूबने के कई घन्टे भर पहिले वहां पहुंच गया। मुझे यह खबर न थी कि नियमावली में कुछ फर्क पड़ गया है अस्तु मैं मामूली तौर पर धड़धड़ाता हुआ बगिया का फाटक पार कर अन्दर चला गया और मन्दिर की तरफ बढ़ा मगर सभामंडप के पास पहुंचते ही कुछ ऐसी आवाजें सुनने में आईं कि रुक जाना पड़ा। दो आदमियों के बातचीत की आवाज मन्दिर के अन्दर से आ रही थी जो इस प्रकार थी
एक आवाज : (जो भारी और किसी ज्यादा उम्र के आदमी की मालूम होती थी ) बेईमान पाजी, इतना भारी कमीनापन ! अबे तेरे को शर्म नहीं आती किं. इतना होने पर भी कहता है गलती हुई ! अबे पाजी ! यह गलती है कि बेईमानी ! भूल है कि नमकहरामी !! तेरे को क्या बरसों से मैंने इसी लिये अपना चेला बना रक्खा है कि तू मेरी ही आँखों में धूल झोंके और मेरे ही गले पर छुरी चलावे ! बेहया ! तुझे तो चिल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिये !!
दूसरा : (जो कम उम्र और आवाज से डरा हुआ सा मालूम होता था) माफ कीजिये गुरूजी ! गलती हुई, धोखा हो गया ! मैं यह नहीं समझता था कि आप भी.....
पहिला : ( डपट कर ) फिर वही बके जाता है !! मैंने नहीं समझा ! अबे तेरी समझ कहां चली गई थी जो तैंने इतना नहीं समझा कि तेरे गुरूजी ने जो उसे महीनों से यहां टिकाया हुआ है सो कुछ समझ के कि बिना समझे. किसी मतलब से कि बेमतलब ! क्या तू इतना समझ नही सकता था कि मैंने जो यहां परायों का आना जाना बन्द कर दिया-नौकर तक को हटा दिया-सो क्यों? इतनी निगरानी रखता हूं सो किस लिये ! दिन में चार चार फेरे लगाया करता हूँ सो किस वास्ते !! नामाकूल ! पाजी !!
दूसरा : जी....जी....आप तो....मगर......!
पहिला : अबे चुप रह मगर तगर के बच्चे ! ज्यादा बोलेगा तो जुबान निकाल लूंगा, बड़ा मगर वाला आया है !!
दूसरा : गुरूजी आप तो एक मामूली बात के लिये इतना गर्म हुए जाते हैं !!
पहिला : मामूली बात है ! मामूली बात है ! अबे बोलता क्यो __ नहीं, यह क्या मामूली बात है !!
दूसरा : आप तो व्यर्थ ही नाराज हो रहे हैं ! जरा सा मैंने झांक लिया और झांक कर जरा सा हंस दिया इसी पर आप बिगड़ खड़े हुए हैं ! खैर अब आपकी इच्छा मालूम हो गई, अब मैं उधर कभी पैर भी न रक्खूगा! माफ कीजिये, ठण्ढे होइये !!
पहिला : पैर नहीं रक्खूगा ! अबे पैर रखने में बाकी ही क्या रहा! क्या तेरा कोई विश्वास है ! अच्छा बता तू कल रात को कहां था?
दूसरा : (कुछ हिचकिचाते हुए) जी....मैं चांदनी रात की बहार

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