काष्ठ कला परिचय - एम के रब Kastha Kala Parichay - Hindi book by - M K Rab
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काष्ठ कला परिचय

एम के रब

प्रकाशक : किताब महल प्रकाशित वर्ष : 2013
पृष्ठ :224
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 15985
आईएसबीएन :81-225-0018-8

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काष्ठ कला का परिचय

प्रस्तुत संस्करण


अब नाप तथा तौल आदि क्रियाओं में मेट्रिक प्रणाली के पैमानों का प्रचलन होता जा रहा है। अत: इस नवीन संस्करण में पुस्तक को पूर्णतया दुहराया तथा उपयुक्त संशोधन करके नये पैमानों का ही अधिक प्रयोग किया गया है।

'लकड़ी का नाप तथा मूल्य निकालना' और 'मापक'- सम्बन्धी अध्यायों को पुनः लिखकर मेट्रिक प्रणाली के अनुसार परिवधित कर दिया गया है। इसके अतिरिक्त अनेक रेखाचित्रों को भी नया रूप देकर इस संस्करण में प्रस्तुत किया गया है। और अब ऐसी आशा की जाती है कि इस बदले हुये समय में भी यह पुस्तक समान रूप से उपयोगी होगी।

- एम० के० रब

 

भूमिका


अन्य कलाओं के समान काष्ठ-कला भी एक ऐसी कला है जिसके द्वारा भिन्न. भिन्न प्रकार के काष्ठ के नमूने तथा सामग्रियाँ बनाने का समुचित ज्ञान प्राप्त होता है। परन्तु काष्ठ-कला के सम्बन्ध में केवल इतना ही कहना पर्याप्त नहीं। यह एक ऐसी कला है जिसके द्वारा मनुष्य का जीवन-सुधार तथा उसकी मानसिक, शारीरिक एवं नैतिक शक्तियों का विकास भी पूर्ण रूप से होता है।

कहा जाता है कि कला तथा शिल्प सीखने और उसका कार्य करने से मनुष्य केवल कलाकार हो जाता है, अर्थात् वह उस कला अथवा शिल्प-सम्बन्धी वस्तुओं को सरलतापूर्वक बना सकता है, जिसकी वह जानकारी प्राप्त करता है। परन्तु वह कला तथा शिल्प का केवल बाह्य लाभ है। बच्चों को कला तथा शिल्प की शिक्षा देने का मुख्य उद्देश्य उनकी मानसिक, शारीरिक तथा नैतिक शक्तियों को बढ़ाना है और यही वह शक्तियां हैं जिनको प्रत्येक प्राणी के लिए, चाहे वह एक छोटा बालक हो अथवा एक बूढा मनुष्य, समाज में रहने के लिए ग्रहण करना आवश्यक है।

इस प्रकार काष्ठ-कला के उद्देश्यों तथा लाभों को दो भागों में बांटा जा सकता है-- एक बाह्य या व्यावहारिक तथा दूसरा आन्तरिक अथवा शिक्षा सम्बन्धी।

बाह्य अथवा व्यावहारिक लाभ
 
बच्चे संसार में भिन्न-भिन्न प्रकार की वस्तुओं को बराबर देखते हैं। उनकी बनावट, चित्रकारी तथा उपयोगिता का उनके मस्तिष्क पर प्रभाव पड़ता है। वह बसी ही वस्तुएं स्वयं अपने हाथ से बनाने का प्रयत्न करते हैं। प्रारम्भ में उनसे बटियाँ अवश्य होती हैं, परन्तु धीरे-धीरे वह उपयोगी मोर सुन्दर वस्तुएँ बनाने लगते है। उनके हाथ की कला बढती जाती है और वे ही बालक इस अवस्था पर पहुँच जाते हैं कि अपने हाथ की बनी वस्तुओं द्वारा अपना तथा अपने परिवार का भरण-पोषण कर सकता है। कलाकार होने के कारण उनका सम्मान बढ़ता है और धन भी प्राप्त होता है। यही कला का व्यावहारिक या बाह्य लाभ है।

आन्तरिक अथवा शिक्षा-सम्बन्धी लाभ

इसको तीन भागों में बांटा जा सकता है-१. मानसिक, 2. शारीरिक तथा नैतिक। मानसिक लाभ - बच्चे बनी वस्तुओंको देखते हैं, उनके प्रत्येक भाग को भली-भांति अध्ययन तथा अभ्यास करते हैं, उनके देखने, सोचने तथा समझने की शक्तियाँ कार्य करती हैं। वह उन वस्तुओं में नवीनता भी उत्पन्न करने का प्रयत्न करते हैं। भिन्न-भिन्न वस्तुओं का चित्र उनके मस्तिष्क पर खिव हाता है। इस प्रकार उनकी मानसिक शक्तियों का विकास होता है और जीवन में उनका जान क्रमशः बढ़ता जाता है।

शारीरिक लाभ - बच्चे जब नमूने बनाते हैं, तो उनकी द्रष्टि, हाथ तथा पैर जादि बराबर कार्य करते हैं। उनको भिन्न-भिन्न नाप और डिजाइन के नाम देखने और बनाने पड़ते हैं। बनाते समय शरीर के भिन्न-भिन्न अंगो पर भार डाल कर कार्य करना पड़ता है। इस प्रकार एक अच्छा व्यायाम हो जाता है और उनका शरीर दृढ़ और सुन्दर बन जाता है। उनकी दृष्टि तीव्र और हाथ-पैर फुर्तीले हो जाते हैं। इसलिए वे प्रत्येक समय संसार का कठिन से कठिन कार्य करने के लिए भी तैयार रहते हैं।

नैतिक लाभ- स्कूल की काष्ठ उघोगशाला में किसी वस्तु या नमूने आदि को बनाने के लिए बच्चों को आपस में मिल-जुल कर तथा नियमानुसार कार्य करना पडता है। वह आपस में एक-दूसरे की सहायता लेकर कार्य करते हैं और जो भी कार्य करते हैं, उसको नियमानुसार तथा एक विशेष क्रम से करते हैं। इस प्रकार उनमें संगठन और प्रत्येक कार्य को क्रमानुसार करने का गुण उत्पन्न हो जाता है, जो मनुष्य के जीवन का एक आवश्यक अंग है। जिस व्यक्ति में भाईचारा, सहानुभूति, दूसरों की सहायता करना तथा उचित ढंग से कार्य समाप्त करने की सूझबूझ नहीं है, वह समाज में रहने के योग्य नहीं। मनुष्य के जीवन का लक्ष्य ही यही है कि वह दूसरों के काम आये, समय पड़ने पर दूसरों की सहायता करे और जो कुछ वह करे, क्रमानुसार करे। जीवन का यह लक्ष्य और मनुष्य का यह गुण बच्चे स्कूल को उघोगशाला की चहार दीवारी के भीतर ही कला और शिल्प के कार्य से सीख लेते हैं। कलाकार केवल कलाकार ही नहीं होता, बल्कि वह समाज का सबसे बड़ा और सुन्दर व्यक्ति भी होता है। उसकी मानसिक, शारीरिक तथा नैतिक शक्तियाँ भी उतनी ही पूर्ण और सुन्दर होती हैं, जितनी उसकी कला और शिल्रप की सुन्दरता। यह कला और शिल्प का शिक्षा सम्बन्धी आन्तरिक और मुख्य लाभ है।

यदि स्कूल के छोटे बच्चों को कला तथा शिल्प का आन्तरिक अथवा शिक्षा सम्बन्धी लाभ प्राप्त हो जाय तो बाह्य या व्यावहारिक लाभ स्वयं धीरे-धीरे प्राप्त हो जायेंगे।

ऊपर बताये हुए शिल्प के उद्देश्य तथा लाभ को ध्यान में रख कर सामग्रियाँ और नमूने बनाने चाहिएं। यदि केवल किसी न किसी तरह नमूने को ठोक-पीट कर तैयार करके पैसा कमाना ही काष्ठ कला का लक्ष्य और उद्देश्य हो तो बहुत सी सामग्रियाँ अल्प समय में बन सकती हैं। किन्तु इनमें बच्चों की आन्तरिक शक्तिी को कुछ लाभ नहीं होगा और न बने नमूने तथा सामग्रियां ही दृढ़ होंगी और न उनमे नवीनता तथा सुन्दरता ही होगी।

यदि काष्ठ कला के नमूने तथा सामग्रियां इस विचार से बनाने हो कि उनसे कला और शिल्प का आन्तरिक मुख्य उद्देश्य पूरा हो, बच्चों को लाभ हो, उनका ज्ञान बढ़े, उनमें स्वच्छता, सुन्दरता तथा स्फूर्ति उत्पन्न हो, उनका अनुभव उचित और पूर्ण हो, तो हर नमूना और सामग्री बनाते समय निम्नलिखित तीन बातों पर विशेष ध्यान देना चाहिये--

१. नमूने के भाग तथा उनकी रचना- सबसे पहले सोचना चाहिए कि जो सामग्री बनती है, उसमें कितने अलग-अलग भाग होंगे, और उनके लिये किन-किन वस्तुओं की आवश्यकता होगी। भिन्न-भिन्न भाग किस-किस डिजाइन और नाप के काटे जायेंगे और उनकी मिलावट के लिए किन-किन जोड़ों का प्रयोग होगा। हर भाग की पहले से ड्राइंग बना लेनी चाहिए। फिर हर एक भाग और टुकड़े को काट छाँट कर ठीक कर लेना चाहिए। यहाँ तक रचना और बनावट का काम समाप्त हो गया। रचना करते समय भिन्न-भिन्न यन्त्रों और जोड़ों का विवरण इस पुस्तक के खंड "क" और 'घ' में दिया गया है।

२. भागों को मिलावट--जब सब भाग तैयार हो जायें तो जो भाग जिस स्थान पर फिट होना है, सरेस, कील, पेंच इत्यादि द्वारा फिट करके शिकंजे में कस दिया जाता है और जब तक सरेस सूख न जाय, शिकंजा न खोलना चाहिये। इस प्रकार सब भाग एक दूसरे से जोड़, कील, पेंच, कब्जे और सरेस के द्वारा मिल कर पूरे नमूने की आकृति बनाते है। यहाँ तक मिलावट का काम समाप्त हुआ। कील, पेंच इत्यादि और सरेस का वर्णन पुस्तक के खंड "ग" और "च" में किया गया है।

३. सजावट और सफाई-- अब अन्तिम कार्य और रह गया; वह सजावट और सफाई का है। जब नमूना तैयार हो जाय तब उसकी जितनी सफाई हो सके, करनी चाहिये। सफाई के बाद आवश्यकता के अनुसार रंग और पालिश इत्यादि करके जैसा नमूना सजाना चाहें, सजा देना चाहिए। अब नमूना पूर्ण रूप से तैयार हो गया। रंग, पालिण इत्यादि का वर्णन पुस्तक के खण्ड "ङ" में किया गया है।

जब इस प्रकार बच्चों को काष्ठ-कला की सामग्रियाँ और नमूने बनाने का पूर्ण अभ्यास हो जायगा, तभी काष्ठ-कला के मुख्य उद्देश्यों की पूर्ति होगी और बच्चे अपने भावी जीवन में अच्छे और सफल कलाकार बन सकेंगे।

आगे....

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