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पथ के दावेदार

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : किताबघर प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2012
पृष्ठ :318
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 1609
आईएसबीएन :9788170167143

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पथ के दावेदारों पर आधारित उपन्यास...

Path Ke Davedar

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

 

‘पथेर दावी’ उपन्यास-सम्राट स्व. श्री शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय की सर्वश्रेष्ठ रचना है। शरत बाबू के उच्चकोटि के, मौलिक, स्वदेशानुराग और देश सेवा के भावों से ओत-प्रोत होने के कारण इस उपन्यास का बड़ा महत्त्व समझा जाता है। जिस समय इस उपन्यास का प्रथम संस्करण बंगला में प्रकाशित हुआ था, उस समय एक तहलका-सा मच गया था और इसे खतरे की चीज समझकर ब्रिटिश-सरकार ने इस पुस्तक को जब्त कर लिया था। यह उपन्यास इतना महत्त्वपूर्ण समझा गया कि विश्व-कवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने भी, शरत बाबू की इस रचना की मुक्त-कंठ से प्रशंसा की।

अब तक इस महत्त्वपूर्ण उपन्यास का हिन्दी में कोई अच्छा अनुवाद प्रकाशित नहीं हुआ था। उसी अभाव की पूर्ति के लिए हमने सरल, सुन्दर अनुवाद—‘पथ के दावेदार’ के नाम से प्रकाशित किया है। इसमें पाठकों को पढ़ने से वही आनन्द मिलेगा, जो शरतबाबू की मूल पुस्तक पढ़ने से मिलता है।

 

एक

 

 

अपूर्व के मित्र परिहास करते—‘तुमने एम. एस-सी. पास कर लिया; लेकिन फिर भी लम्बी चोटी रखते हो। क्या चोटी द्वारा मस्तिष्क में विद्युत संचार होता है ?’
अपूर्व जवाब देता—‘एम. एस-सी. की पुस्तकों में चोटी के विरुद्ध तो कुछ लिखा नहीं मिलता। फिर विद्युत संचार के इतिहास का तो अभी तक आविष्कार ही नहीं हुआ। विश्वास न हो तो एम. एस-सी. पढ़ने वालों से पूछकर देख लो।’
मित्र कहते—‘तुम्हारे साथ तर्क करना व्यर्थ है!’

अपूर्व हंसकर कहता—‘यह बात सच है, फिर भी तुम्हें अकल नहीं आती।’
अपूर्व सिर पर चोटी रखे हुए, कॉलेज में छात्रवृत्ति तथा मेडल प्राप्त करके परिक्षाएं भी पास करता। घर में एकादशी आदि व्रत और सन्ध्या-पूजा आदि नित्य कर्म भी किया करता था। खेल के मैदानों में फुटबाल, क्रिकेट, हॉकी आदि खेलने में उसका जितना उत्साह था, प्रातःकाल मां के साथ गंगा-स्नान करने में भी उससे कुछ कम नहीं था। उसकी संध्या-पूजा देखकर भौजाइयां परिहास में कहतीं—‘बबुआ जी, पढ़ाई-लिखाई तो समाप्त हुई, अब चिमटा-कमण्डल लेकर संन्यासी हो जाओ। तुम तो विधवा ब्राह्मणी से भी आगे बढ़े जा रहे हो!’
अपूर्व हंसकर कहता—‘आगे बढ़ जाना आसान नहीं है, भाभी! माताजी के कोई कन्या नहीं है, आयु भी उनकी काफी है, अगर किसी दिन बीमार पड़ जाएंगी, तो पवित्र भोजन बनाकर दे सकूंगा। रही चिमटा-कमंडल की बात, सो वह तो कहीं गया नहीं?’

अपूर्व मां से जाकर कहता—‘मां, यह तुम्हारा अन्याय है ! भाई जो चाहें करें, लेकिन भौजाइयां तो मुर्गा नहीं खातीं। क्या तुम सदा अपने हाथ से ही भोजन बनाकर खाओगी ?’
मां कहती—‘एक समय एक मुट्ठी चावल उबाल लेने में मुझे कोई कष्ट नहीं होता ! और जब लाचार हो जाऊंगी तब तक तेरी बहू घर में आ ही जाएगी।’
अपूर्व कहता—‘तो फिर एक ब्राह्मण पण्डित के घर से बहू मंगवा क्यों नहीं लेती मां—उसे खिलाने का तो मुझमें बल है नहीं; लेकिन तुम्हारा कष्ट देख सोचता हूं कि चलो, भाइयों से सिर बोझा बनकर ही रह लूंगा।’
मां कहती—‘ऐसी बात न कह रे अपूर्व ! एक बहू क्या, तू चाहे तो घर भर को बैठाकर खिला सकता है।’
‘कहती क्या हो मां ? तुम सोचती हो कि सम्भवतः भारत में तुम्हारे पुत्र जैसा और कोई है ही नहीं ?’—कहकर वह शीघ्रता से चला जाता।

अपूर्व के विवाह के लिए लोग आकर, बड़े भाई विनोद को परेशान किया करते। विनोद आकर मां से कहता—‘मां, कहां कौन-सी शिष्टाचार और जब-तप वाली लड़की है, उससे अपने लड़के का विवाह करके किस्सा खत्म करो। नहीं तो मुझे घर छोड़कर भाग जाना पड़ेगा। बड़ा होने के कारण बाहर लोग समझते हैं कि मैं ही सम्भवतः घर का पुरखा हूं।’
पुत्र के इन वाक्यों से करुणामयी अधीर हो उठी; पर उस समय उसने अपने को विचलित तनिक भी न किया। मधुर स्वर में बोलीं—‘लोग उचित ही समझते हैं, बेटा ! उनके बाद तुम ही तो घर के मालिक हो; लेकिन अपूर्व के सम्बन्ध में किसी को वचन न देना। मैं रूप नहीं चाहती, धन नहीं चाहती—बात मैं स्वयं देख-सुनकर ठीक करूंगी।’
‘अच्छी बात है मां ! लेकिन जो कुछ करो, वह दया करके जल्दी कर डालो।’—कहकर विनोद रुष्ट होकर चला जाता।
नहाने के घाट पर, एक अत्यंत सुलक्षणा कन्या पर करुणामयी की दृष्टि कई दिनों से पड़ रही थी। लड़की अपनी मां के साथ गंगा स्नान को आती थी। वह उनकी ही जाति की है, यह पता वे गुप्त रूप से लगा चुकी थीं। उनकी इच्छा थी कि यदि निश्चित हो जाए, तो आगामी बैशाख में ही विवाह कर डालें।

इसी समय अपूर्व ने आकर, एक अच्छी नौकरी पाने की सूचना दी।
मां प्रसन्न होती हुई बोलीं—‘अभी उस दिन तो पास हुआ है; इसी बीच तुझे नौकरी किसने दे डाली ?’
अपूर्व हंसकर बोला—‘जिसको आवश्यकता थी।’ यह कहकर उसने सारी घटना विस्तारपूर्वक बतायी कि उसके प्रिन्सिपल साहब ने ही उसके लिए यह नौकरी ठीक की है। बोथा कंपनी ने बर्मा के रंगनू शहर में एक नया कार्यालय खोला है, वह किसी विद्वान तथा सच्चरित्र बंगाली युवक को, समस्त उत्तर-दायित्व देकर भेजना चाहती है। रहने के लिए मकान तथा चार सौ रुपया वेतन मिलेगा, और छः महीने बाद दो सौ रुपये की वृद्धि होगी।
बर्मा का नाम सुनकर मां का मुंह सूख गया, वे बोलीं—पागल तो नहीं हो गया है; वहां मैं तुझे भेज सकूंगी ? ऐसे रुपये की मुझे कोई आवश्यकता नहीं।’

अपूर्व भयभीत होकर बोला—तुम्हें आवश्यकता नहीं; पर मुझे तो है, मां ! तुम्हारी आज्ञा से मैं भिखारी बन सकता हूं ! पर जीवन में ऐसा सुयोग्य फिर न मिलेगा। तुम्हारे लड़के के जाने से बोथा कंपनी का काम नहीं रुकेगा; पर प्रिन्सिपल साहब मेरी ओर से वचन दे चुके हैं, उनकी लज्जा का ठिकाना न रहेगा। फिर घर की दशा तो तुम जानती ही हो मां !’
‘लेकिन सुनती हूं कि वह म्लेच्छों का देश है।’
अपूर्व ने कहा—‘किसी ने झूठमूठ ही कह दिया है। तुम्हारा देश तो म्लेच्छों का देश नहीं है, फिर भी जो मनमानी करना चाहते हैं, उन्हें कोई नहीं रोक सकता है।’
‘फिर इसी बैशाख में मैंने तेरा विवाह करने का निश्चय किया है।’
अपूर्व बोला—एकदम निश्चय ? अच्छी बात है। एक-दो महीने के बाद जिस दिन तुम बुला भेजोगी, उसी दिन आकर तुम्हारी आज्ञा का पालन करूंगा।’
करुणामयी बाहर से देखने में पुराने विचारों की अवश्य थी; लेकिन बड़ी बुद्धिमती थीं। कुछ देर मौन रहकर धीरे-धीरे बोलीं—‘जब जाना ही है, तो अपने भाइयों की सम्मति ले लेना।’

यह कुल गोकुलदीघी के सुप्रसिद्ध वन्द्योपाध्याय घराने में है, और वंश-परम्परा से ही वे लोग अत्यन्त आचार-परायण कहलाते हैं। शैशव से जो संस्कार उनके हृदय में जम गया था, वह पति तथा पुत्रों जहां तक आहत और लांक्षित होने को था, हुआ, केवल इस अपूर्व के कारण ही वे किसी प्रकार सब कुछ सहन करती हुई, अब भी घर में ही रह रही थीं। आज वह भी उनकी दृष्टि की ओट, अनजान देश को चला जा रहा है। इस बात को सोच-सोचकर, उनके भय की सीमा न रही। बोलीं—‘अपूर्व, मैं जितने दिनों जीवित रहूं, तू मुझे दुःख न देना बेटा !’ यह कहते ही उनके नेत्रों से दो बूंद आसूं ढलक पड़े।
अपूर्व के नेत्र भी सजल हो उठे; वह बोला—मां, आज तुम इस लोक में हो; लेकिन एक दिन तुम्हारे स्वर्गवास की पुकार आ पहुँचेगी; उस दिन अपने ‘अपूर्व’ को छोड़कर तुमको वहां जाना होगा। लेकिन एक दिन के लिए भी यदि तुमको पहचान सका हूं मां, तो फिर वहां बैठकर भी, इस पुत्र के लिए कहीं तुम आंसू न बहाती रहना।’ इतना कहकर वह दूसरी ओर चला गया।

उस दिन सन्ध्या समय, करुणामयी अपने नियमित सन्ध्या-पूजन तथा माला जपना आदि कार्य मनोयोगपूर्वक न कर सकी। अपने बड़े लड़के के कमरे के द्वार पर वे चुपचाप जा पहुंची। विनोद कचहरी से लौटकर, जलपान के पश्चात् क्लब जाने की तैयारी कर रहा था; मां को देखकर एकाएक चौंक उठा।
करुणामयी ने कहा—‘एक बात पूछने आयी हूं बिनू !’
‘कौन-सी बात, मां ?’

मां अपने नेत्रों के आंसू, यहां आने से पूर्व भली-प्रकार पोंछकर आयी थीं; लेकिन उनका गीला कण्ठ-स्वर छिपा न रहा। बड़े बेटे से क्रमानुसार सम्पूर्ण घटना का वर्णन करके, अन्त में अपूर्व के मासिक वेतन का उल्लेख करके भी, जब उन्होंने म्लान मुख से कहा—‘यही सोच रही हूं बेटा, कि इन कुछ रुपयों के लोभ में उसको भेजूं या नहीं।’ तब विनोद का धैर्य जाता रहा। उसने शुष्क स्वर में कहा—‘मां, तुम्हारे अपूर्व जैसा लड़का भारतवर्ष भर में और दूसरा नहीं है, लेकिन पृथ्वी पर रहकर, इस बात को भी बिना माने नहीं रह सकते कि पहले चार सौ, फिर छः महीने दो सौ रुपया, और, यह उस लड़के से बहुत बड़ा है।’

मां दुखी होकर बोलीं—लेकिन सुनती हूं, कि वह तो एकदम म्लेच्छों का देश है।’
विनोद ने कहा—‘मां, संसार में तुम्हारा जानना-सुनना ही तो अंतिम सत्य नहीं हो सकता।’
पुत्र के अन्तिम वाक्य से मां अन्यन्त्र पीड़ित होकर बोलीं—‘बेटा, जब से तुम लोग समझदार हुए, इसी एक ही बात को सुन-सुनकर भी जब मुझे चेत न हुआ तो अब इस अवस्था में वह शिक्षा और न दो। मैं यह जानने आयी हूं कि अपूर्व का मूल्य कितने रुपये है। मैं केवल यह जानने आयी थी कि उसको इतनी दूर भेजना उचित होगा या नहीं ?’

विनोद ने झुककर दाहिने हाथ से मां के दोनों पैर छूकर कहा—‘मां, तुमको दुखी करने के लिए यह बात नहीं कही। यह सच है कि पिताजी के साथ ही हम लोगों का मेल बैठता था, और हम लोगों ने उनसे सीखा है कि घर-गृहस्थी में रुपया एक आवश्यक वस्तु है। बिनू इस हैट-कोट को पहनकर, सम्भवतः अभी इतना बड़ा साहब नहीं हो गया कि छोटे भाई को खिलाने के भय से उचित-अनुचित का विचार नहीं कर सके। लेकिन फिर भी कहता हूं कि उसको जाने दो। देश में जैसी हवा बह रही है मां, इससे वह कुछ दिनों के लिए देश छोड़कर, कहीं दूसरी जगह काम ही में लग जाए, तो इससे उसका भी हित होगा और हम लोग भी सम्भवतः सपरिवार बच जाएंगे ! तुम तो जानती हो मां, उस स्वदेशी आन्दोलन के समय वह कितना छोटा था; फिर भी उसके ही प्रताप से, पिताजी की नौकरी जाने की नौबत आ गयी थी।’
करुणामयी बोलीं—‘नहीं-नहीं, अब अपूर्व यह सब नहीं कर सकता।

विनोद बोला—‘सभी देशों में कुछ लोग ऐसे रहते हैं मां, जिनकी जाति ही अलग होती है—अपूर्व उसी जाति का है ! देश की मिट्टी ही इनके शरीर का मांस है, देश का जन्म ही इनकी धमनियों का रक्त है। देश के विषय में इनका कभी भी विश्वास मत करना मां, नहीं तो धोखा खाओगी। बल्कि अपने इस म्लेच्छ बिनू को, उसने उस चोटीधारी, गीता पढ़े एम. एस-सी. पास अपूर्व से अधिक ही अपना समझना।’
पुत्र की इन बातों पर मां ने विश्वास तो नहीं किया; पर एक समय इसी को लेकर उनको अनेक कष्ट भोगने पड़े थे। इसलिए मन-ही-मन शंकित हो उठीं। देश के पश्चिम क्षितिज पर जो एक भयानक मेघ का लक्षण प्रकट हुआ है, इसे वे जानती थीं। उनको पहले याद पड़ा कि उस समय अपूर्व के पिता जीवित थे; लेकिन इस समय वे भी नहीं है।
विनोद ने मां का मनोभाव जान लिया; पर क्लब जाने की शीघ्रता में बोला—‘अच्छा मां, वह कल ही तो जा नहीं रहा है। सब लोग बैठकर, जो स्थिर करेंगे, हो जाएगा।’ कहकर वह शीघ्रतापूर्वक बाहर निकल गया।

 

दो

 

 

अपने ब्राह्मणत्व की अत्यन्त सावधानी से रक्षा करता हुआ, अपूर्व एक जलयान द्वारा रंगनू के घाट पर जा पहूंचा। बोथा कम्पनी के दरबान तथा एक मद्रासी कर्मचारी ने अपने इस नये मैनेजर का स्वागत किया। तीस रुपये का एक कमरा ऑफिस के खर्चे से यथासम्भव सजा हुआ तैयार है, यह समाचार देने में भी उन लोगों ने विलम्ब नहीं किया।

समुद्र-यात्रा की झंझटों के पश्चात् वह घर में खूब हाथ-पैर फैलाकर सोना चाहता था। ब्राह्मण साथ था। घर में अत्यन्त असुविधा होते हुए भी, इस विश्वस्त आदमी को इसके साथ भेजकर मां को कुछ-कुछ सान्त्वना  मिली थी। केवल रसोइया ब्राह्मण ही नहीं; बल्कि भोजन बनाने योग्य कुछ चावल, दाल, घी, तेल, पिसा हुआ मसाला, यहां तक कि आलू-परवल भी साथ देना वे नहीं भूली थीं। गाड़ी आने पर कर्मचारी विदा हो गए; पर ऑफिस के दरबान जी मार्ग दिखलाते हुए साथ थे। दस मिनट में ही गाड़ी जब मकान के सम्मुख आकर खड़ी हो गयी तो अपने तीस रुपये भाड़े के मकान को देखकर, अपूर्व हतबुद्धि-सा खड़ा रह गया। मकान अत्यन्त मद्दा था, छत नही है, सदर नहीं है, आंगन समझो या जो कुछ—इस आने-जाने के मार्ग के अतिरिक्त और कहीं तनिक भी स्थान नहीं है। एक संकरी काठ की सीढ़ी, मार्ग से आरम्भ होकर सीधे तिमंजले पर चली गयी है, इस पर चढ़ने-उतरने में ही कहीं एकाएक पैर फिसल जाए, तो पहले पत्थर का बना राजपथ, उसके बाद उसके ही अस्पताल में, फिर तीसरी अवस्था न सोचना ही अच्छा है ! नया आदमी है, इसलिए वह प्रत्येक पग अत्यन्त सावधानी से रखते हुए, दरबान के पीछे-पीछे चढ़ने लगा। दरबान ने ऊपर चढ़ने के बाद दाहिनी ओर, दो मंजिले के एक दरवाजे को खोलकर बताया कि साहब, आपके रहने का यही कमरा है।

बाईं ओर संकेत करके अपूर्व ने पूछा—‘इसमें कौन रहता है ?’
दरबान बोला-‘एक चीनी साहब हैं’
अपूर्व ने पूछा—‘ऊपर तिमंजिले पर कौन रहता है ?’
दरबान ने कहा—‘एक काले-काले साहब है।’

अपने कमरे में प्रवेश करते ही अपूर्व का मन अत्यन्त खिन्न हो उठा। लकड़ी के तख्ते लगाकर, एक-दूसरे की बगल में, छोटी-बड़ी मिलाकर तीन कोठरियां बनी हुई हैं। इस मकान की सभी वस्तुएं लकड़ी की हैं। आग का स्मरण आते ही सन्देह होता है कि इतना बड़ा सर्वांग सुन्दर जाक्षागृह, सम्भवतः दुर्योधन भी अपने पाण्डव भाइयों के लिए तैयार न करा सके होंगे। इसी मकान में इष्ट-मित्र, आत्मीय स्वजनों तथा भाभियां और मां आदि को छोड़कर रहना पड़ेगा ! अपने को संभालकर, वह थोड़ी देर इधर-उधर टहलकर एक वस्तु को देखकर कुछ स्वस्थ हुआ कि नल में अब भी पानी है; स्नान और भोजन दोनों ही हो सकते हैं। अपुर्व ने रसोइये से कहा—‘महाराज, मां ने तो सभी वस्तुएं साथ में दी हैं। तुम नहाकर कुछ बनाने का प्रयत्न करो; तब तक मैं दरबान को लेकर सामान ठीक कर लूं।’

रसोई में कोयला मौजूद था; लेकिन चूल्हे में कालिख लगी थी। पता नहीं यहाँ पहले कौन रहता था, और क्या पकाया था सोचकर उसे अत्यन्त घृणा हुई। महाराज से कहा कि एक उठाने वाला दमचूल्हा होता तो बाहर वाले कमरे में बैठकर कुछ दाल-चावल अलग बना लिया जाता। लेकिन कौन जाने, इस देश में वह मिले या नहीं ?

दरबान बोला—‘दाम मिलने पर दस मिनट में लाया जा सकता है।’ रुपया लेकर वह चला गया। तिवारी रसोई बनाने का उपक्रम करने लगा और अपूर्व कमरा सजाने में लग गया। काठ के आले पर कपड़े सजाकर रख दिये, बिस्तर खोलकर चारपाई के ऊपर बिछाया, एक नया टेबल-क्लॉथ मेज पर बिछाकर कुछ पुस्तकें और लिखने का सामान उस पर रखा, और उत्तर की ओर खुली हुई खिड़की के दोनों पल्लों को अच्छी तरह खोलकर, उनके दोनों कानों में कागज ठूंसकर, सोने वाले कमरे को नयनाभिराम बनाकर शय्या पर लेटकर उसने सुख की सांस ली। दरबान में लोहे का चूल्हा ला दिया। इसी समय याद पड़ा कि मां ने अपने सिर की शपथ देकर पहुँचते ही तार करने को कहा था। इसलिए चटपट दरबान को साथ लेकर वह बाहर निकला, और महाराज से कहता गया कि एक घण्टे के पहले ही लौट आऊंगा।

आज किसी ईसाई-पर्व के उपलक्ष्य में छुट्टी थी। अपूर्व ने देखा कि यह गली देशी तथा विदेशी साहबों और मेमों का मुहल्ला है। यहां के प्रत्येक घर में विलायती उत्सव का कुछ-न-कुछ चिह्न अवश्य दिखाई पड़ता है। अपूर्व ने पूछा—‘अच्छा दरबानजी ! सुना है कि यहां पर बंगाली लोग भी तो बहुत हैं। वे सब किस मुहल्ले में रहते हैं ?’

उसने बतलाया कि यहां पर मुहल्ला जैसी कोई व्यवस्था नहीं है। जिसकी जहां इच्छा होती है, वहीं रहता है; लेकिन अफसर लोग इस गली को ही पसन्द करते हैं। अपूर्व स्वयं एक अफसर था, स्वयं कट्टर हिन्दू होते हुए भी, किसी धर्म के विरुद्ध उसका द्वेष नहीं था। फिर भी अपने को इस प्रकार ऊपर-नीचे, दाहिने-बायें, भीतर-बाहर—चारों ओर से ही ईसाई पड़ोसियों के बीच, अत्यन्त घृणा अनुभव कर उसने पूछा—‘और दूसरी जगह कहीं क्या डेरा नहीं मिलेगा,  दरबान ?’
दरबान बोला—‘खोजने से मिल सकता है; लेकिन इतने भाड़े में, ऐसा मकान मिलना मुश्किल है।’
अपूर्व जब तारघर पहुँचा, तो तार-बाबू खाना खाने चले गये थे। एक घण्टे प्रतीक्षा करने के बाद जब आये, तो घड़ी देखकर बोले—‘आज छुट्टी है; दो बजे से ऑफिस बन्द हो गया।’

अपूर्व ऊबे हुए स्वर में बोला—‘यह अपराध आपका है। मैं एक घण्टे से बैठा हूं।’
बाबू बोला—‘लेकिन मैं तो, केवल दस मिनट हुआ, यहां से गया हूं।’ अपूर्व ने उसके साथ झगड़ा किया, झूठा कहा, रिपोर्ट करने की धमकी दी; लेकिन सब व्यर्थ समझकर चुप हो गया। वह भूख-प्यास तथा क्रोध से जलते हुए बड़े तारघर में पहुंचा। यहां से, अपने निर्विघ्न पहुंचने का समाचार जब मां को भेज सका, तब कहीं उसको सन्तोष हुआ।
 

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