नरक ले जाने वाली लिफ्ट - राजेन्द्र यादव Narak Le Jane Vali Lift - Hindi book by - Rajendra Yadav
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नरक ले जाने वाली लिफ्ट

राजेन्द्र यादव

प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2008
पृष्ठ :207
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 2724
आईएसबीएन :9788126715657

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प्रस्तुत है एक सदाबहार पुस्तक...

narak le jane vali lift Rajendra Yadav

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

मेरे लिए अनुवाद दो भाषाओं की क्षमता, संभावना और शब्द-शक्तियों को खँगालने और सही अर्थ का मंतव्य पकड़ सकने की चुनौती के रूप में आता है। यहाँ दोनों भाषाओं की अपनी बनावट ही नहीं, भौगोलिक स्थितियों और संस्कृतियों के साथ अलग समयों की यात्रा भी करनी पड़ती है। सौ-दौ सौ या हज़ार साल पहले के समाज-समय को आज के मिज़ाज में ढालना सिर्फ शब्दार्थ देना ही नहीं है। इस प्रयास में प्रायः नाश अपनी भाषा का ही होता है। हमारे दिमाग पर मूल पाठ इतना हावी होता है कि अपनी भाषा प्रक्रति की तरफ़ ध्यान ही नहीं दे पाते।

अनुवाद में मैं पहली जवाबदेही अपनी भाषा के प्रति मानता हूँ। वह मूल के प्रति ईमानदार होने के साथ अधिक से अधिक सहज, सम्प्रेषणीय और प्रवाहपूर्ण होनी चाहिए। इसके लिए ज़रूरी है कि या तो आप स्वयं मूलपाठ से मुक्त होकर अनुवाद का संशोधन करें या दूसरे ऐसे व्यक्ति से मदद लें जो मूल से आक्रांन्त न हो।

इन कहानियों के चुनावों के पीछे न कोई योजना है, न सिद्धांत। जब जो कहानी पसन्द आ गई या जितनी फुर्सत या मनःस्थिति सामने हुई उसी हिसाब से कहानी चुन ली गई। चूँकि इन सारी कहानियों के अनुवाद की अवधि मोटे रूप से दस-पन्द्रह साल (1952-65) रही है इसलिए शायद भाषा भी एक-सी नहीं है। फिर भी संभवतः पठनीय है।

 

अनुवाद प्रशिक्षण भी है...

 

अलग-अलग देशों की इन कहानियों के अनुवाद अंग्रेज़ी के माध्यम से किए गए हैं। हम सबके लिए यही अधिक सुविधाजनक है। चूँकि प्रायः सभी कुछ अंग्रेज़ी में सुलभ हो जाता है इसलिए हम कोई अन्य भाषा सीखने में सिर नहीं खपाते। इसलिए दूसरी विदेशी भाषाओं से सीधे अनुवाद बहुत कम हैं। जो हैं, वहाँ गर्व से लिखा जाता है: ‘‘मूल फ्रेंच/जर्मन/रूसी/स्पैनिश से अनुवाद’’। इनकी भाषा अक्सर बहुत खराब होती है। बीच-बीच में आनेवाले अंग्रेज़ी शब्दों को देखकर कभी-कभी शक यह भी होता है कि अनुवाद तो अंग्रेज़ी से ही किया गया है। हाँ, शायद मूल से भी मिला लिया गया होगा। प्रमाण हमारे यहाँ अंग्रेज़ी को ही माना जाता है, हालाँकि वहाँ भी जो घपले किए जाते हैं उनके उदाहरण कम नहीं हैं। दूसरी भाषाएँ सीखने की मानसिकता हिंदीवालों में दुर्लभ है। उत्तर भारत की एकाध भाषा को छोड़कर हममें से शायद ही कोई विन्ध्याचल पार की भाषाएँ जानता हो। दक्षिण में हमारी पहुँच ज़्यादा से ज़्यादा मराठी तक है।

स्वतंत्र लेखक की तरह अपने लेखन के साथ-साथ मुझे अनुवाद भी करने पड़ते थे। सौभाग्य यह था कि इन रचनाओं का चुनाव मेरा अपना ही होता था। मूल के अधिक निकट होने के लिए मैं कभी-कभी एक से अधिक अंग्रेज़ी के अनुवादों का सहारा लेता था। चेख़व के नाटकों के लिए मैंने तीन-तीन अनुवादों को सामने रखा तो तुर्गनेव के उपन्यासों और कामू के अजनबी के अनुवादों में फ्रेंच और रूसी जाननेवालों की मदद ली। फिर भी पक्का नहीं कह सकता कि इनमें मूल के साथ कितना न्याय किया जा सका है। जब कलकत्ता गया तो मेरे मित्र और बड़े भाई बने कथाकार मोहन सिंह सेंगर। वे नया समाज नाम के महत्त्वपूर्ण मासिक के संपादक थे। कहानियाँ पढ़ने की मेरी गति देखकर ही शायद उन्हें विश्व कहानी अंक की योजना बना डाली। इसमें काफी कुछ कहानियाँ चुनने के साथ मैंने छः-सात कहानियों के अनुवाद भी किए। अंक के लिए अनेक सुझाव दिए। इस अंक की बेहद प्रशंसा हुई। दिल्ली आया तो श्यामप्रकाश दीक्षित समाज नाम की पत्रिका निकाल रहे थे। वे भी झाँसी के मेरे मित्र और सरपरस्त थे। विभिन्न नामों से समाज में मेरे अनेक अनुवाद प्रकाशित होते थे। हर कहानी के तीस रुपये देते थे जो शायद आज के पाँच-छः सौ से भी अधिक हैं।

मेरे लिए अनुवाद दो भाषाओं की क्षमता, संभावना और शब्द-शक्तियों के खँगालने और सही अर्थ या मंतव्य पकड़ सकने की चुनौती के रूप में आता है। यहाँ दोनों भाषाओं की अपनी बनावट ही नहीं, भौगोलिक स्थितियों और संस्कृतियों के साथ अलग  समयों की यात्रा भी करनी पड़ती है। सौ-दो सौ या हज़ार साल पहले के समाज-समय को आज के मिजाज़ में ढालना सिर्फ शब्दार्थ देना ही नहीं है। इस प्रयास में प्रायः नाश अपनी भाषा का ही होता है। हमारे दिमाग पर मूल पाठक इतना हावी होता है कि अपनी भाषा-प्रकृति की तरफ़ ध्यान ही नहीं दे पाते। हंस के संपादन के दौरान मुझे सैकड़ों अनुवाद देखने का मौक़ा मिला है और अधिकांश को जला डालने का मन होता है। वे मूल के प्रति कितने ईमानदार हैं, नहीं कह सकता, मगर हिन्दी के साथ निश्चय ही बलात्कार करते हैं। उन्हें पढ़ते हुए हमेशा मन ही मन पुनः अंग्रेज़ी में अनुवाद करके समझने की कोशिश करनी पड़ती है कि शायद मूल में पाठ यह रहा होगा। भाषा बेहद अटपटी और अपठनीय। इन्हीं अस्वीकृत रचनाओं को जब पुस्तकाकार देखता हूँ या निकलनेवाली समीक्षाओं में प्रशंसा पढ़ता हूँ तो माथा ठोक लेता हूँ।
अनुवाद में मैं पहली जवाबदेही अपनी भाषा के प्रति मानता हूँ। वह मूल के प्रति ईमानदार होने के साथ अधिक से अधिक सहज, सम्प्रेषणीय और प्रवाहपूर्ण होनी चाहिए। इसके लिए ज़रूरी है कि या तो आप स्वयं मूलपाठ से मुक्त होकर अनुवाद का संशोधन करें या दूसरे ऐसे व्यक्ति से मदद लें जो मूल से आक्रांत न हो। इन कहानियों के चुनाव के पीछे न कोई योजना है, न सिद्धांत। जब जो कहानी पसंद आ गई या जितनी फुर्सत या मनःस्थिति सामने हुई उसी हिसाब से कहानी चुन ली गई। चूँकि इन सारी कहानियों के अनुवाद की अवधि मोटे रूप से दस-पन्द्रह साल (1952-65) रही है इसलिए शायद भाषा भी एक-सी नहीं है। फिर भी संभवतः पठनीय है। इस दौरान कुछ ऐसी भी कहानियाँ रही हैं जिनका मैं अनुवाद करना चाहता था मगर संभव नहीं हुआ। उनमें टाल्स्टाय की डैथ ऑफ इवान इलिच, स्टीफेन ज़्विग की बर्निंग सीक्रेट, काफ्का की मैटामार्फोसिस, ईवान बूनिन की जैंटिलमैन फ्रॉम सैन फ्रान्सिस्को, सॉलबैलो की लुकिंग फॉर मि.ग्रीन, अल्बर्टो मोराविया की टू विमैन, पॉल गौलिको की फ्लड, सात्र की इन्टीमेसी, कामू की गैस्ट, पार लागर क्विस्ट की बारबास जैसी कुछ लंबी और छोटी कहानियाँ हैं। और भी अनेक होंगी जिन्हें याद नहीं कर पा रहा हूँ।

मैं जानता हूँ कि इस संकलन की लगभग सारी कथा-रचनाएँ क्लासिक-तर्ज़ की हैं और ‘अद्भुत’ या ‘बिज़ार’ तत्त्व उनकी बुनावट है। आधुनिक संवेदना की प्रयोगशील कहानियों के लिए जैसा संकलन की जितेन्द्र भाटिया ने ‘‘सोचो, साथ क्या जाएगा’’ शीर्षक से तैयार किया है वह मेरे लिए ईर्ष्या का विषय है ! सचमुच उन कहानियों को पढ़कर हम वही नहीं रहते जो पढ़ने से पहले थे। चुनाव और अनुवाद दोनों ही लाजवाब हैं। मगर वह एक योजना के तहत किया गया काम है।
बहरहाल, इन कहानियों को पढ़ना अपने से अलग और बाहर की दुनिया की यात्राओं पर निकलना तो है ही। हर यात्रा की तरह ये यात्राएँ भी सिर्फ दूसरों का आविष्कार ही नहीं करतीं, अपने-आपको अपने लिए भी आविष्कृत करती हैं।

 

-राजेन्द्र यादव

 

रुसी कहानी
दूसरा शमादान

 

 

एन्तोन चेख़व

 

स्टाक ऐक्सचेंज न्यूज के 223 नम्बर के अंक में कुछ लपेटे हुए, उसे छाती से चिपकाए, साशा स्मीर्नोव (अपनी माँ का इकलौता बेटा) ने डॉक्टर कौशेलकोव की बैठक में प्रवेश किया। उसने अपनी सूरत कुछ ऐसे ढंग से मनहूस बना रखी थी कि देखकर हँसी आती थी।
‘‘अरे तुम ? कहो भाई ?’’ डॉक्टर ने उसका स्वागत किया : ‘‘अब तबियत कैसी है ? कोई नई बात ?’’

साशा ने पलकें झपकीं, छाती पर हाथ रखा और भाव-विह्लल स्वर में बोला, ‘‘जनाब, मेरी माँ ने आपको नमस्कार कहा है, और मुझसे कहा है कि मैं आपको उनकी ओर से शुक्रिया दे दूँ। अपनी माँ का अकेला ही बेटा हूँ, और आपने मेरी जान बचा ली है। हम दोनों ही नहीं जानते, किस प्रकार आपका शुक्रिया अदा करें।’’
‘‘अरे....अरे...भाई, सब ठीक है।’’ मन ही मन अपार प्रसन्नता का अनुभव करते हुए भी डॉक्टर ने उसे बीच में ही रोक दिया। ‘‘मेरी जगह कोई भी होता तो यही करता। और ऐसा कुछ खास तो मैंने किया भी नहीं।’’

‘‘मैं अपनी माँ का इकलौता बेटा हूँ। हम लोग ग़रीब आदमी हैं और आपने जो कुछ किया है उसका बदला तो निश्चय ही नहीं चुका सकते। इसकी हमें बड़ी कसक है डॉक्टर साहब। लेकिन फिर भी मेरी माँ और मैं-अपनी माँ का इकलौता बेटा-हम दोनों हार्दिक आग्रह करते हैं कि आप इस तुच्छ भेंट को हमारी कृतज्ञता के चिन्ह के रूप में स्वीकार कर लें। यह चीज-ताँबे की नायाब वस्तु-एक दुर्लभ कलाकृति है....’’
‘‘वो सब तो ठीक है, लेकिन तुम्हें वाकई यह सब करने की ज़रूरत नहीं थी।’’ डॉक्टर ने ज़रा चेहरा बिगाड़ा : ‘‘वहाँ जाकर यह सब करने की ज़रूरत ही क्या थी।’’
‘‘नहीं...नहीं...सचमुच मेहरबानी करके आप इसे अस्वीकार मत कीजिए।’’ बंडल खोलते हुए साशा मुँह ही मुँह में कहता रहा :‘‘इसे अस्वीकार करके आप मेरी माँ की ही नहीं, मेरी भावनाओं को भी ठेस पहुँचाएँगे डॉक्टर साहब। यह बड़ी ही उत्कृष्ट कलाकृति है। पुराने ताँबे की बनी है। यह हमें अपने स्वर्गीय पिताजी से मिली थी, इसे हम लोग उनकी अमूल्य यादगार की तरह सँभालकर रखे हुए थे। मेरे पिताजी पुराने काँसे की चीजें खरीद-खरीदकर कला-पारखियों के हाथों बेचा करते थे। अब मैं और मेरी माँ भी इसी काम को कर रहे हैं।’’

साशा ने एक गम्भीर विजेता के भाव से उस वस्तु को कागज की तहों से बाहर निकाला और उसे सावधानी से डॉक्टर की मेज पर रखा दिया। यह एक अत्यंत ही कुशलता और कलापूर्ण ढंग से तैयार किया गया पुराने ताँबे का शमादान-या कहिए, दीपाधार था। एक आधार के ऊपर खड़ी हुई दो नग्न नारी-मूर्तियाँ उसमें इस तरह जड़ दी गई थीं कि उनके वर्णन की न तो मुझमें शक्ति है और न उस दिशा में मेरी खास रुचि ही। वे दोनों दिगंबर नारी-मूर्तियाँ ऐसे विलासपूर्ण सम्मोहन से मुस्करा रही थीं और ऐसी मुद्रा बनाए थीं कि लगता था अगर शमादान को उठाए रखना उनके लिए एक विवेश कर्तव्य न होता तो निश्चय ही वे उस आधार से नीचे कूद पड़तीं और कमरे को अपने ऐसे उत्तेजक, अश्लील श्रृंगारिक अभिनय से भर देतीं कि पाठकों, उसकी कल्पना भी कर सकना आपके लिए सम्भव नहीं है।
जैसे ही उस भेंट पर डॉक्टर ने एक निगाह डाली, कुछ सोचते हुए-से अपने दाहिने कान के पीछे खुजलाया, थोड़ी बगलें झाँकीं, और हिचकिचाते हुए अपनी नाक साफ की।

‘‘हाँ, चीज तो सचमुच बेहद कलापूर्ण है।’’ उसने धीरे-धीरे कहा :‘‘लेकिन....मैं इसे रख कैसे सकता हूँ अपने पास ? साधारण चीज तो यह है नहीं...या यों कहो कि साधारण लोगों के समझने की यह चीज नहीं है...।’’
‘‘उफ्, आप ऐसा क्यों कहते हैं डॉक्टर...।’’
‘‘वह महा मायावी-पापी बूढ़ा साँप भी इससे अधिक किसी और शैतानी चीज की कल्पना नहीं कर सकता था। अच्छा, तुम्हीं सोचो, अगर कोई इस ‘महान कलाकृति’ को अपनी मेज पर सजा ले तो इसका मतलब हुआ कि अपने सारे कमरे को गंदा कर ले...।’’
‘‘डॉक्टर साहब, कला के संबंध में आपके विचार बड़े ही विचित्र हैं।’’ साशा को उनकी इस बात से क्रोध आ गया : ‘‘यह तो एक कलाकृति है। ज़रा एक बार निगाह तो डालिए। इसमें कैसी मोहिनी है, कैसा सौंदर्य है कि एक सम्मानपूर्ण समर्पण की भावना से आत्मा भर उठती है और कंठ गद्गद हो आता है। जब आप ऐसा अलौकिक सौंदर्य देख लेते हैं तो हर सांसारिक चीज आपके दिमाग से अपने आप उतर जाती है...ज़रा देखिए, तो सही, कैसी गति है, कैसी अलौकिक निष्ठा और कैसी दिव्य अभिव्यंजना है।’’

‘‘दोस्त, इस सबको मैं बड़ी अच्छी तरह समझता हूँ।’’ डॉक्टर ने उसकी बात मानकर कहा : ‘‘लेकिन तब भी मैं घर-गृहस्थीवाला आदमी हूँ। मेरे छोटे-छोटे बच्चे हैं और वे इसी कमरे में खेलते हैं। मेरे पास महिला रोगिणयाँ भी आती हैं।’’
‘‘हाँ, यह बात तो ठीक है। अगर इसको मोटी निगाह से देखें तो...’’ साशा ने स्वीकार किया : ‘‘तब तो सचमुच यह महान कलाकृति एक दूसरे ही रूप में दिखाई देगी।...लेकिन डॉक्टर साहब, आप साधारण लोगों से ऊपर उठकर देखिए न, फिर सबसे बड़ी बात यह कि इस भेंट को अस्वीकार करके आप मेरी माँ को ही आंतरिक कष्ट नहीं पहुँचाएँगे, बल्कि खुद मुझे भी हार्दिक दुःख होगा। मैं अपनी माँ का इकलौता बेटा हूँ। और आपने मेरी जान बचाई है। हम लोगों के पास जो कुछ भी सबसे अधिक कीमती था, हम आपकी सेवा में समर्पित करने ले आए हैं। और...हाँ, मुझे दुःख केवल इतना ही है कि इस शमादान का जोड़ा मुझे नहीं मिल पाया...।’’

‘‘शुक्रिया दोस्त, मैं तुम्हारा बहुत ही आभारी हूँ। तुम्हारी माँ की खातिर...मगर सचमुच...खुदा कसम..तुम खुद भी तो सोचो। मेरे बच्चे हैं जो इधर-उधर खेलते हैं। महिला मरीज हैं। खैर, ठीक है। उसे रखा रहने दो। इस सबको लेकर अब तुमसे बहस भी क्या की जाए।’’
‘‘जी हाँ, इसमें बहस करने जैसी कोई बात ही नहीं है।’’ साशा खिल उठा ‘‘ज़रा शमादान को इधर रखकर देखिए...इस फूलदान की बगल में..हाँ, यहाँ...कैसे अफसोस की बात है कि इसका जोड़ा नहीं मिल रहा। वाकई बहुत अफसोस है। अच्छा डॉक्टर साहब, नमस्कार...।’’
साशा के चले जाने के बाद डॉक्टर बड़ी देर अपने दाहिने कान के पीछे की ओर खुजलाता हुआ सोचता रहा : ‘चीज तो निस्संदेह बड़ी शानदार है...।’ उसने मन ही मन कहा : ‘इसे कहीं इधर-उधर डाल देना तो बड़ा बुरा होगा...लेकिन इसे घर में कहीं छोड़ना...करीब-करीब असंभव ही ...हुम्...विकट समस्या है। अब या तो मैं इसे किसी को भेंट कर दूँ या किसी को दान में दे डालूँ।’

काफी देर सोच-विचार करने के बाद उसे अपने एक मित्र वकील उहोव का ध्यान आया। उहोव ने डॉक्टर का कुछ कानूनी काम किया था और एक तरह से वह उसका कर्जदार भी था।
‘‘यही बिल्कुल ठीक रहेगा।’’ डॉक्टर ने निश्चय किया : ‘‘चूँकि वह मेरा मित्र है, इसलिए शायद पैसा लेना ठीक न समझे। इस लिहाज से भी मेरे लिए यही सबसे अच्छा तरीका है कि इस चीज को उसे ही भेंट कर डालूँ। इस शैतानी झंझट को मैं उसके यहाँ डाल ही आऊँगा। इसके अलावा वह अकेला आदमी है....और इतनी गहराई से सोचनेवाला उसके यहाँ कोई है भी नहीं....’’
अविलम्ब डॉक्टर ने कपड़े पहने, शमादान उठाया और उहोव की ओर चल दिया।
‘‘नमस्कार दोस्त,’’ वकील को घर पर ही पाकर वह बोला : ‘‘मैं तुम्हें तुम्हारे परिश्रम के लिए धन्यवाद देने यहाँ चला आया...पैसे तो तुम लोगे नहीं, उस हालत में कम से कम मेरी यह छोटी-सी चीज ही स्वीकार कर लो भेंट के रूप में...। क्या सुना, भाई, चीज छोटी ज़रूर है, लेकिन है बेहद शानदार...।’’

उस छोटी-सी चीज को देखते ही वकील ऐसा खुश हो उठा कि वर्णन नहीं किया जा सकता।
‘‘वाह, क्या चीज है !’’ वह खिल उठा : ‘‘क्या कमाल है यार लोगों के दिमाग में भी कम्बख़्त कैसी-कैसी बातों आ जाती हैं। भई, बहुत ही अनोखी, आश्चर्यजनक है। इतनी लाजवाब चीज तुम्हें मिली कहाँ ?’’
खैर, जब काफी प्रसन्नता प्रकट कर चुका तो वकील ने ज़रा चिन्तित-सी दृष्टि दरवाजे की ओर डाली।
‘‘बात बस एक ही है भाई।’’ उसने कह ही तो डाला :‘‘तुम्हें अपनी यह भेंट वापस ले जानी होगी। मैं इसे ले नहीं सकूँगा।’’
‘‘क्यों ?’’ डॉक्टर ने बुरा मानकर कहा।
‘‘हाँ...इसकी वजह...यहाँ कभी-कभी मेरी माँ आ जाती है...महिला मुवक्किल भी तो हैं और इसके अलावा घर की नौकरानी के सामने मुझे संकोच लगता है।’’

‘‘नहीं...नहीं...नहीं...तुम अस्वीकार नहीं कर सकते।’’ डॉक्टर ने अपनी बाँहें चढ़ा लीं : ‘‘और अगर तुमने इसे अस्वीकार कर दिया तो यह तुम्हारी सरासर बेवकूफी है। यह एक कलाकृति है...देखो न कैसी गति है...क्या अभिव्यंजना है...मैं अब एक बात भी आगे नहीं सुनना चाहता....इसे लेने से इनकार करके तुम मुझे काफी कष्ट पहुँचाओगे।’’
‘‘काश, इसकी कुछ खास-खास जगहों पर ज़रा-सी पालिश ही कर दी जाती या वहाँ शर्म ढँकने के लिए अंजीर की पत्तियाँ ही लगा दी जातीं....।’’
लेकिन डॉक्टर बाँहें चढ़ाता हुआ जल्दी-जल्दी उहोव के घर से चला आया। वह इस संतोष से घर पहुँचा कि इस भेंट से तो पीछा छूटा।
डॉक्टर के चले जाने के बाद वकील ने उस शमादान को ज़रा गौर से देखा, उसकी उँगलियों ने उसे चारों ओर से परखा और जैसा कि डॉक्टर के साथ हुआ था, उसने भी दिमाग लड़ाया कि आख़िर इस भेंट को कहाँ ठिकाने लगाए।
‘बड़ी ही खूबसूरत चीज है।’ उसने विचार किया : ‘और इसे इधर-उधर फेंक देना वास्तव में उसके साथ बड़ी ज्यादती होगी। लेकिन इसे यहाँ कहीं रखना भी तो उचित नहीं है। सबसे अच्छा रास्ता तो यह है कि इसे किसी को भेंट दे दिया जाए।...ठीक है, याद आ गया...आज ही शाम को मैं इस शमादान को हास्य-अभिनेता शाश्किन को भेंट दे आऊँगा। वह कम्बख़्त तो ऐसी चीजों के पीछे पागल ही रहता है। हाँ, यही बिल्कुल ठीक रहा...आज रात को उसका इससे कुछ न कुछ फायदा ही होगा...।’

और उसने फौरन ही इस विचार पर अमल भी कर डाला। बड़ी मेहनत से लपेटा गया शमादान उस संध्या को बड़ी धूमधाम से शाश्किन को भेंट दे दिया गया। और उस पूरी साँझ उस हास्य-अभिनेता के श्रृंगार कक्ष में इस भेंट की प्रशंसा करने आनेवाले पुरुषों का ताँता लगा रहा, औरत की तरह गूँज उठनेवाली हँसी और आनंद से हाल भरा रहा। लेकिन ज्यों ही कोई औरत आकर पूछती कि ‘‘क्या मैं भीतर आ सकती हूँ ?’’ हास्य-अभिनेता की भारी-भरकम ऊँची आवाज उसे चौंका देती : ‘‘नहीं...नहीं...देवीजी, ज़रा मैं कपड़े-वपड़े ठीक-ठाक नहीं पहने हूँ।’’
लेकिन जब एकबारगी ही यह तमाश खत्म हो गया तो हास्य-अभिनेता बार-बार कंधे झटकने और बुरे-बुरे मुँह बनाने लगा।

‘‘अब मैं इस गंदी चीज को रखूँ कहाँ ?’’ उसने बार-बार दुहराया : ‘‘मैं एक सभ्य परिवार के साथ रहता हूँ। ज़रा-ज़रा सी देर बाद यहाँ अभिनेत्रियाँ आती हैं। यह फोटोग्राफ भी तो नहीं है कि आप इसे झट दराज में भी तो नहीं छिपा सकते...’’
‘‘अरे हुजूर, ज़रा आगे चले जाइए और बाजा़र में जाकर इसे बेच डालिए।’’
बाज़ार जाने के कपड़े पहनाते हुए उसके कपड़े पहनानेवाले नौकर ने सुझाया : ‘‘बस्ती के सिरे पर एक बुढ़िया रहती है। वह पुराने काँसे की मूर्तियाँ खरीदने का व्यापार करती है। गाड़ी को उधर से ले जाइए और स्मीर्नोव को पूछ लीजिए...उसे तो हर आदमी जानता है।’’
हास्य-अभिनेता ने इस सुन्दर सलाह पर अमल कर डाला।

दो दिनों बाद डॉक्टर अपने बैठकखाने में बैठे-बैठे भौंह पर एक उँगली रखे हुए पित्त और उसकी औषधियों के संबंध में विचार कर रहे थे कि अचानक ही धड़ाक से किवाड़ खुले और साशा स्मीर्नोव ने कमरे में प्रवेश किया। वह जैसे उल्लास से खिला पड़ रहा था, उसका चेहरा दमक रहा था और प्रसन्नता उसकी आत्मा से जैसे फूटी पड़ रही थी। वह हाथों में अख़बार में लपेटी हुई कोई चीज लिए था।
‘‘डॉक्टर साहब’’, हाँफते हुए उसने कहा :‘‘मेरी ख़ुशी की कल्पना कीजिए, यह सिर्फ़ आपकी ही ख़ुशकिस्मती थी कि आख़िरकार आपके शमादान का दूसरा जोड़ा प्राप्त करने में हम लोग सफल हो ही गए। मेरी माँ की ख़ुशी का तो ठिकाना ही नहीं है। मैं अपनी माँ का इकलौता बेटा हूँ...और आपने मेरी जान बचाई है...’’
और कृतज्ञता की भावना से काँपते हुए शासा ने शमादान डॉक्टर के सामने मेज पर रख दिया।
डॉक्टर ने अपना खुला मुँह बंद कर लिया। उसने कुछ कहना चाहा, लेकिन कुछ भी नहीं कहा। मानो, कह सकने के लिए उसे शब्द ही नहीं मिल पा रहे थे।

 

भौंदू
एन्तोन चेख़व

 

 

थिगलियाँ लगा हुआ पाजामा और टाट-जैसी मोटी खादी की कमीज पहने हुए एक दुबला-पतला छोटा-सा किसान, जिसके शरीर में केवल खाल ही रह गई है, ख़ुफिया विभाग के मजिस्ट्रेट के सामने खड़ा है। उसके घने बालोंवाले चेहरे पर और झुकी आती भौंहों के पीछे से मुश्किल से दिखाई देती आँखों से निपट मूर्खता झलकती है। उसके झाड़ू जैसे उलझे बालों ने, जिन्होंने न जाने कब से कंघी नहीं देखी है, उसकी सूरत शक्ल को मकड़े-जैसा बना दिया है, जिससे वह और भी भयानक दिखाई देता है। वह नंगे पाँव है।
‘‘डैनिस ग्रिगोर्येव’’, मजिस्ट्रेट पूछना शुरू करता है-‘‘इधर पास आ जाओ और मेरे प्रश्नों का जवाब दो। इसी जुलाई महीने की सातवीं तारीख़ को, चौकसी के लिए घूमते हुए रेलवे के चौकीदार ईवान सिम्योनोविच एकिनफ़ोव ने तुम्हें एक सौ इकतालीसवें मील-पत्थर के पास बोनट के उन पेचों को खोलते पाया जिनसे पटरियाँ स्लीपरों में ढँकी रहती हैं। यह रहा वह पेंच। इस पेंच के साथ उसने तुम्हें गिरफ्तार कर लिया। क्या यह सच है ?’’

‘‘क्याँऽऽ ?’’
‘‘क्या जैसा एकिनफ़ोव कहता है वही सब वैसा ही हुआ था ?’’
‘‘हाँ, हाँ, हुआ !’’
‘‘अच्छा ठीक है। अब बताओ, तुम वह पेंच क्यों खोल रहे थे ?’’
‘‘क्याँऽऽ?’’
‘‘क्याँ-क्याँ बंद करो-मेरे सावल का जवाब दो। किस मतलब से तुम वह पेंच खोल रहे थे ?’’
तिरछी निगाह से छत की ओर देखते हुए डैनिस मेढक की तरह टरटराता है-‘‘अगर मुझे इसकी ज़रूरत नहीं होती तो मैं इसे क्यों खोलता ?’’
‘‘तुम्हें किस काम के लिए इनकी ज़रूरत पड़ी ?’’
‘‘पेंच ? इन पेचों से हम जाल में लगाने का वज़न बनाते हैं।’’
‘‘हम कौन ?’’
‘‘हम लोग....ल्की मोवो के किसान और कौन ?’’

‘‘सुनो भाई, मेरे साथ बेवकूफी की बातें बंद करो और सोच-समझकर बोलो। जाल के बोझ की बात बताकर झूठ बोलने से कोई फायदा नहीं है।’’
‘‘ज़िंदगीभर तो मैं कभी झूठ बोला नहीं...और अब मैं झूठ बोल रहा हूँ...’’आँखें झपकता हुआ डैनिस बड़बड़ाता है-‘‘लेकिन सरकार, बिना जाल में बोझ लटकाए आप कैसे काम चला सकते हैं ? मान लीजिए, आप काँटे में चारे की जगह कोई जिंदा चीज़, कीड़ा-मकोड़ा ला भी दें फिर भी बिना किसी वज़न की चीज़ के वह नीचे तले तक पहुँचेगी कैसे ?...और आप कहते हैं कि मैं झूठ बोल रहा हूँ...?’’ डैनिस चिढ़ाता है।

‘‘अगर वह ऊपर सतह पर ही तैरता रहा तो उस कंबख्त ज़िंदा चीज़ के चारे का होगा क्या ? झींगा, सौरी, या जल सर्प वगैरा तभी तो से खाएँगे जब आपकी डोरी तले तक पहुँची हुई हो, और अगर आपका चारा सिर्फ़ सतह पर ही तैरता रहे, तो रोहू वगैरा बड़ी मछली उसे भले ही कभी-कभार खा ले-मगर हमारी नदी में रोहू है नहीं...यह मछली काफ़ी लंबी-चौड़ी जगह पसंद करती है।’’
‘‘रोहू के बारे में तुम मुझे किसलिए यह सब बता रहे हो ?’’
‘‘क्याँ ?...आपने मुझसे खुद पूछा। लोग हमारी तरफ़ तो इसी तरह मछली पकड़ते हैं। यहाँ का तो छोटे से छोटा बच्चा भी बिना बोझ लटकाए मछली नहीं पकड़ेगा। ठीक है, कोई बेवकूफ ही होगा जो बिना बोझ के भी मछली पकड़ने जा पहुँचे। सरकार, बेवकूफ़ों के लिए कोई नियम-कायदा तो होता नहीं है।’’

‘‘तो तुम यह कहते हो कि तुम यह पेंच जाल में लगाने का वज़न बनाने के लिए खोल रहे थे।’’
‘‘नहीं तो और काहे के लिए ? कंचा गोली तो खेलनी नहीं थी।’’
‘‘लेकिन तुम जाल का वज़न बनाने के लिए सीसे का कोई टुकड़ा, बंदूक की गोली..या कोई कील भी तो ले सकते थे ?’’
‘‘सीसा कोई सड़क पर पड़ा मिलता है ? उसके लिए आपको पैसे देने पड़ेंगे। कील बेकार होती है। इस पेंच से तो अच्छी कोई चीज आपको मिल ही नहीं सकती। एक तो यह भारी है-दूसरी इसमें छेद भी है...।’’
‘‘अरे अपनी ही बेवकूफी हाँके जा रहा है-जैसे आसमान से आ टपका हो या कल ही पैदा हुआ हो !
‘‘अरे कूढ़मगज, तेरी समझ में नहीं आता कि इस पेंच खोलने का नतीजा क्या होता है ? अगर वह चौकीदार पहरे पर नहीं होता, तो रेल पटरी से उतर जाती। एक्सीडेंट हो जाता और न जाने कितने लोग मर जाते ! तू लोगों को मार देता !’’

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