सारा आकाश - राजेन्द्र यादव Sara Aakash - Hindi book by - Rajendra Yadav
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सारा आकाश

राजेन्द्र यादव

प्रकाशक : राधाकृष्ण प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2008
पृष्ठ :208
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 2800
आईएसबीएन :9788171194438

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आजाद भारत की युवा-पीढ़ी के वर्तमान की त्रासदी और भविष्य का नक्शा...

Sara Aakash

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

आजाद भारत की युवा पीढ़ी के वर्तमान की त्रासदी और भविष्य का नक्शा। आश्वासन तो यह है कि सम्पूर्ण दुनिया का सारा आकाश तुम्हारे सामने खुला है-सिर्फ तुम्हारे भीतर इसे जीतने और नापने का संकल्प हो- हाथ पैरों में शक्ति हो...
मगर असलियत यह है कि हर पाँव की बेड़ियाँ हैं और हर दरवाजा बंद है। युवा बेचैनी को दिखाई नहीं देता है किधर जाए और क्या करे। इसी में टूटती है उसका तन, मन और भविष्य का सपना। फिर वह क्या करे-पलायन, आत्महत्या या आत्मसमर्पण ?

आज़ादी के पचास वर्षों में सारा आकाश ऐतिहासिक उपन्यास भी है और समकालीन भी।
बेहद पठनीय और हिन्दी के सर्वाधिक लोकप्रिय उपन्यासों में से एक सारा आकाश चालीस संस्करणों में आठ लाख प्रतियों से ऊपर छप चुका है, लगभग सारी भारतीय और प्रमुख विदेशी भाषाओं में अनूदित है। बासु चटर्जी द्वारा बनी फिल्में सारा आकाश हिन्दी की सार्थक कला फिल्मों की प्रारम्भकर्ता फ़िल्म है।

 

नामकरण

मेरे लिए यह तीसरा उपन्यास है और पहला भी। इसकी मूल कहानी को जब मैंने ‘रफ़’ रूप में लिखा था तो नाम दिया था, ‘प्रेत बोलते हैं।’ उस कहानी ने प्रेस के दर्शन भी किए और पुस्तक का रूप भी पाया—कुछ स्नेही ने उसे जाना और पढ़ा भी; लेकिन वास्तविकता यह है कि पुस्तक बाज़ार में नहीं आई; न आएगी। अब लगभग दस साल बाद मैंने जब उसी कहानी को अलग परिवेश और प्रभाव देने के लिए एक कदम नए सिरे से लिख डाला है, नए अर्थ और अभिप्राय दिए हैं तो नाम भी नया ही दे दिया है। शायद यह नया रूप और नाम ही अधिक सही और व्यापक है...

 

‘‘सेनानी, करो प्रयाण अभय, भावी इतिहास तुम्हारा है,
ये नखत अमा के बुझते हैं, सारा आकाश तुम्हारा है।’’

 

तेरह-चौदह वर्ष पहले किशोर-मन में गूँजती कवि दिनकर की ये दो पंक्तियाँ उपन्यास के नाम की प्रेरणा हैं और इन्हीं के संदर्भ में प्रस्तुत कथा अपनी सार्थकता भी खोजती है। अपनी पीढ़ी की ओर से बोलूँ तो कहूँ : इस कहानी के ब्याज, इन पंक्तियों को पुनः विद्रोही कवि को लौटा रहा हूँ कि आज हमें इनका अर्थ भी चाहिए। यों कहानी की पृष्ठभूमि पहले चुनाव से पहले की है; लेकिन, वास्तविकता आज सन् ’60 (या नए संस्करण के समय सन् ’86) में भी बदली नहीं है। जिन्होंने अपनी ओर से बढ़कर विचार और सुझाव दिए हैं उनकी शुभकामनाएँ चाहूँगा, ताकि समय की बेचैनी और संघर्ष को और भी अधिक ईमानदारी से आँक और अरथा सकूँ....!

 

राजेन्द्र यादव

 

एक अंतरंग ‘सारा आकाश’

 

 

रास्ते में बासु चटर्जी ने एक सवाल किया, ‘जिस समय आपने यह उपन्यास लिखा, उस समय किस तरह के घर की कल्पना की थी ?’’
बीस-इक्कीस साल के बाद भी मुझे दिक्कत नहीं हुई, ‘घर में यह कहानी घटित हुई, उसे तो शायद आज तक मैंने बाहर से भी नहीं देखा। हाँ, उस समय जो घर मेरी सारी मानसिक बनावट का अंग था, उसे जरूर आपको दिखा दूंगा।’’
फिल्म की प्रारंभिक स्थिति थी और बसु, महाजन और मैं तीनों आगरा जा रहे थे, शूटिंग के लिहाज से जगहें देखने। बासु ने बताया था, ‘‘मेरे सामने ही दो दिक़्क़तें हैं। एक मेरी अपनी है और एक फिल्म के लिए सही जगह को लेकर है। अपनी दिक़्क़त यह है कि मैं अपने-आपको कविन्स नहीं कर पाता; नव-विवाहित पति-पत्नी दोनों एक साथ, एक ही कमरे में रहें और आपस में बिलकुल न बोले। यह समय कम करना होगा। दर्शक इस ‘न बोलने’ के तर्क को गले नहीं उतार पाएगा।’’
मेरा कहना था, ‘‘वास्तविक जीवन में तो वे लोग नौ साल इसी तरह रहे, आपस में बिलकुल नहीं बोले। उपन्यास लिखते हुए आपकी तरह मुझे भी लगा था कि नौ साल वाली बात कोई मानेगा नहीं, इसलिए घटाकर वह समय साल-भर कर दिया गया।’’

‘‘दर्शक के लिए एक वर्ष भी बहुत है। कोई ठोस कारण नहीं है, इसलिए स्क्रिप्ट में छः महीने कर दिया है।’’
‘‘मैं स्क्रिप की बात नहीं समझता। जिस चीज़ को नहीं जानता, उसमें दखल नहीं देता। मैं तो केवल वही जानता हूँ, जो वास्तव में हुआ था। समर साहब तो इस समय विदेश में हैं। हाँ, प्रभाजी लौटने के बाद संयोग से आगरा में ही हैं, उनसे मिलकर हम कोई ठोस कारण तलाश करेंगे।’’

सबसे पहले हम लोग ‘पुराने घर’ गए। तब साझा घर था और चाचा-ताउओं में चार- बाहर नौकरियों पर रहा करते थे, दो वहीं थे। एक को तीन साल की उम्र में कबूतरों का साथ मिल गया था, जो अस्सी साल तक रहा। वे कबूतरों की तरह हम लोगों की भी घर में घेर-घार किए रखते। कबूतरों के बारे में वे इतना जानते थे, जितना दुनिया में बहुत कम लोग जानते होंगे। कभी आगरे का सबसे बड़ा कबूतरी फ्लीट उनका था और वे दसियों बरस से ख़लीफ़ा चुने जाते थे। पढ़ाई के सिलसिले में हमें यहीं रहना होता था। पाँच-छः आँगन का लंबा-चौड़ा मकान, मुख्य सड़क से गली के आखिरी छोर तक पहुँचना हुआ। कुछ हिस्से ‘आधुनिक’ बना दिए गए थे, कुछ वही पुरानें और बेढंगे, ककइयाँ ईंटों के बने चौबारे, तिबारे, गलियारे, नीचे दरवाज़े और बहुत पतली, खड़ी घुमावदार सीढ़ियाँ। नीचे का हिस्सा ख़ाली रहता। वहाँ नल, गुसलख़ाना, लकड़ी-कंडों की कोठरियाँ और गोदाम।

 अँधेरा रहता था और वह वहाँ कुछ जगहों को लेकर बड़ा रहस्य और आतंक समाया रहता। दो-एक जगह तो नीचे की मंज़िल पर सीढ़ियाँ ख़त्म होने के बाद भी घूमती हुई कहीं और चली जाती थीं; लेकिन वहाँ धूल और जालों से लदे तालेबंद किवाड़ थे, जिनकी चाबियाँ खो गई थीं। बताया जाता था कि तहख़ानों के दरवाज़े हैं और इनमें जमुना तक जाने कहाँ तक जाने की सुरंगे हैं। पुराने मुगल बादशाहों के ज़माने का घर है और इसमें बीरबल या टोडरमल या पता नहीं किसकी रिहाइश थी, या शाही टकसाल थी। बहरहाल, ये हर घर की ‘गौरव गाथाएँ’ हैं और उनमें सच्चाई कितनी होती है, कोई नहीं जानता। किसी छोटे-मोटे सिपहसालार का मकान रहा होगा—बीरबल-टोडरमल वहाँ क्यों आएंगे ? ख़ैर, पहले भय फिर उदासीनता के कारण मकान के कुछ हिस्से यों ही बने रहे, कुछ हिस्सों में भूत-प्रेत भी जोड़ दिए गए।

हाँ, नए हिस्से जुड़ते जाने के बावजूद मकान में दो-ढाई सौ साल पुरानेपन की गंध थी। बिना किसी योजना या प्लान के वह अजीब भूल-भुलैया बन गया था। उसी गंध और बेढंगेपन में गेंद-टप्पा, गुल्ली-डंडा लेकर भरी दोपहर में छतों पर कबूतरबाज़ी और पतंगें उड़ाने में बचपन और कैशोर्य बीता था। शायद कुछ ऐसा लगाव था कि भाइयों के आपसी बँटवारे के बाद पिताजी ने उसी मुहल्ले में दूसरा मकान बनवा लिया, तब भी मैं चार महीने ‘अपने कमरे’ में ही जमा रहा—नई जगह के साथ कोई एसोसिएशन नहीं था। फिर बाहर रहने का सिलसिला शुरू हुआ, तो एकाध-दिन के लिए आगरा रुके, यार-दोस्तों से घिरे रहे और वापस ‘पुराने मकान’ में गए दसियों साल गुज़र गए....संबंध भी उतने खींच तान वाले नहीं रह गए थे कि किसी भी तरह समय निकालकर वहां जाने की बात सोची जाती।

महाजन और बासु के साथ सारे घर को नए सिरे से घूम-घूमकर देखना सचमुच रोमांचकारी अनुभव था। एक-एक हिस्से को नए व्यक्ति की तरह अपने लिए अन्वेषित करना...बहुत पुराने अलबम से गुज़रना। किराएदार भर दिए गए थे, ख़स्ता जगहें और भी धसक और उखड़ गई थीं, सफ़ेदी-मरम्मत नहीं हुई थी—एक ज़ीने से दूसरे ज़ीने, एक आँगन या छत से दूसरे में जाते हुए इस हाल पर शर्म भी थी और गर्व भी, भाग जाने का मन भी होता था और रुक-रुककर देखने का भी—एक कचोट—कभी यह ‘मेरा घर’ था आज सिर्फ़ ‘हमारा पुराना घर’।’ रह-रहकर मुझे लगता था, जैसे घर बोलता हो; क्या मैं पूरा उपन्यास नहीं हूँ ? मैं अपराध और संकोच से अपने को सांत्वना देता रहा : कभी चार-छः महीने लगातार अपने मुहल्ले में रहूँगा, दो-तीन दशक पीछे छूटी हुई दुनियाँ को जगाऊँगा और उपन्यास लिखूँगा...एक शव-साधना ही सही...
वापस आकर बासु और महाजन कुछ नहीं बोले। चाय पीते हुए महाजन ने ही शब्द दिए, ‘फ़ैंटासिट्क...’’

‘‘यही कमरे, यही छतें, यही दालान, ज़ीने और टट्टर थे मेरी चेतना में, जब यह उपन्यास लिखा था...’’
‘‘शूटिंग के लिए यह घर नहीं मिलेगा ?’’ बासु स्क्रीन पर देख रहे थे, वहीं से पूछा।
‘‘बासु दा, ये तो बना-बनाया सेट है, बंबई में तो ऐसा सेट बन सकना ही...’’
‘‘यही मिल जाएगा...’’ मैंने दृढ़ता से कहा। हालाँकि बाद में बातें इतनी आसानी से नहीं हुईं। मुहल्ले वालों की कल्पना में फ़िल्म कंपनी का मतलब है, क्लार्क शीराज़ में ठहर कर ताजमहल और सीकरी की शूटिंग करने वाले लोग ! ‘मुगलेआज़म’ के सेट्स...पहली निराशा तो यही है कि अपने मुहल्ले और इस पुराने घर में शूटिंग ? बाद में निराशा यह कि कैसे फ़िल्मवाले हैं, जो ये कुर्ते-पतलूनें पहन कर दुकानों पर जलेबी-कचौड़ी खाते फिरते हैं...न लंबी-चौड़ी गाड़ियाँ, न झटकेदार हीरो...चलो, फिर भी छोटा-मोटा तमाशा ही सही...

घर तय हो गया। दो दिनों गलियों और मुहल्लों के चक्कर लगाते रहे। स्क्रिप्ट में कुछ बातें थीं, जो तय नहीं हो रही थीं। बासु भी मेरी ही तरह उस ‘पुराने लड़के’ को देख रहे थे, जो सिनेमा या मैच देखने मथुरा से आगरा भागकर आया करता था—घंटे-भर का रेल सफ़र। बासु का बचपन भी मथुरा में ही बीता था। हम दोनों का यथार्थ एक ही था। पहले तो ‘प्रभा’ भाभी बहुत भड़कीं कि हमने उनके ‘समर’ को बिना बताए दुबारा अमरीका भगा दिया और उनका कोई ख़याल किया, न ख़बर ली। फिर शांत हुईं। लाइन पर आईं, तो मैंने इन लोगों की समस्या बताई, ‘‘भाभीजी, आप लोग शादी के बाद नौ साल नहीं बोले, इस बात का बासूजी को विश्वास नहीं है।’’

‘‘न मानें, जो हमारे साथ हुआ, उसे हमसे ज्यादा कौन जानेगा ?’’ वे भी उन्हीं पुरानी गलियों और सींखचेदार खिड़कियों में पहुंच गईं थीं, ‘‘हम खाना दे देते थे, बिस्तर कर देते थे,. कपड़े धो देते थे, कमरा साफ कर देते, पर बोलता कोई नहीं था। ये सारे दिन कॉलेज रहते, ट्यूशनों पर जाते—सुबह के निकले रात को लौटते। आपको तो सब पता है जब बोले थे, तो आपके पास ही तो भागे गए थे सुबह-सुबह।’’
और भाभी जी ने धीरे-धीरे सारी बातें, जो उपन्यास में हैं और नहीं हैं, क्रमशः पुनः जीनी शुरू कर दीं...बासू के सामने फ़िल्म खुलती रही और मैं सोचता रहा कि जो कुछ हुआ था, यह सब उपन्यास में कहाँ आ पाया है ?

‘घर’ आकर हम लोग फिर उसी न बोलने के कारण पर बहस करते रहे। अपना तर्क मैंने बाद में भी कई जगह बताया है : न बोलने का कारण किसी घटना या बात में नहीं, इतिहास और संस्कारों में है। संस्कार डालने के नाम पर हमें कुछ झूठे-सच्चे ‘महान्-आदर्श’ दे दिए जाते थे..कुछ महान् पुरुष थे, जो इतिहास के पन्नों में और हमारे भीतर हमें अपना जैसी बनाने के लिए धमाचौकड़ी मचाए रहते थे। तपोभ्रष्ट ऋषि, ब्रह्मचर्य की महिमा, शिवाजी से लेकर दयानंद तक की महानता—किसी भी विराट लक्ष्य के लिए नारी बाधा है, उसका आकर्षण, साधक और तपस्वी को रास्ते से भटका देता है और वह उसी ‘अस्थि चर्ममय देह’ के मोह में फँसकर सारी ऊँचाइयों से मुँह फेर लेता है...इसलिए हमारे राष्ट्रीय महापुरुषों या हीरोज़ ने नारी को त्यागा है, राम ने सीता को त्यागा, कृष्ण ने राधा को छोड़ा, नल ने दमयंती को, दुष्यंत ने शकुंतला हो, बुद्ध ने यशोधरा को, भर्तृहृति ने पिंगला को...नेहरू और सुभाष जैसे नेताओं के सामने यह बाधा रही है नहीं। समर भी तो आदर्शों, सपनों और महत्त्वाकांक्षाओं में जीनेवाला प्राणी है, वह बिना सींग-पूँछ हिलाए कैसे इस जाल को स्वीकार करेगा ? और हम लोगों ने तय कर लिया कि ‘चलेगा’।

लेकिन अब सवाल ‘सारा आकाश’ की आज की प्रासंगिकता को लेकर था। बासु समय बदलकर उसे आज की आधुनिक कहानी बनाना चाहते थे। शुरू में मेरा तर्क था कि उसके समय को बिलकुल न बदला जाए। फिर लगा कि समय पर उस हद तक चिपकना ही उसे अप्रासंगिक बनाएगा। नई दिल्ली, कलकत्ता, बंबई या दो-एक बड़े शहरों की बात छोड़ दीजिए और आज किसी भी नगर में देख लीजिए, क्या वास्तविकता बहुत अधिक बदल गई है ? टेरिलीन, ट्रांजिस्टर और स्कूटरों के बावजूद ज़िंगदी वही है, वैसी ही है। दो-तीन महानगर बरगदों की तरह बढ़ते चले आ रहे हैं और आस-पास का गतिशील युवा उनकी ओर दौड़ा चला आ रहा है। वहाँ की घुटन और सड़ाँध से ऊबकर मौलिक परिवर्तन करने वाला कोई नहीं रहता। युवक वहाँ अब केवल छुट्टियों में जाते हैं और वहाँ की गतिहीनता और जड़ता से दुखी होकर परिवर्तन की बात सोचते हैं कि लौटने का समय हो आता है।

खुद ‘सारा आकाश’ उपन्यास का अंत भी यही हैं। सामाजिक सुधार करने वाले युवकों की जो पीढ़ी बीस साल पहले आई थी, वह अपने यथार्थ से कटकर किसी न किसी मशीन का पुर्जा रह गई है। परंपरागत विवाह की रस्में अब ज़ोर से मनाई जाने लगी हैं। लेशनी और भँगड़ा, ज़िंदगी की दैनिक जड़ता घंटे भर के लिए तोड़कर फिर वही वापस भेज देते हैं। ब्लैक मनी की छाया में दहेज और सामाजिक हैसियत की माँ पहले बड़ गई है और मेरा विश्वास दृढ़ होता जाता है कि जब तक विवाह कराने की डोर माँ-बाप के हाथों में है, ‘सारा आकाश’ की सच्चाई ज़िंदा है। लड़के-लड़कियों को आपस में एक दूसरो को समझने की यातनाओं से गुज़रना ही है, एडजस्टमेंट की तक़लीफें करनी ही हैं।



 

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