गढ़वाल की लोक कथाएं - 2 भागों में - शिवानन्द नौटियाल Gadhwal ki Lok Kathaein - 2 Parts - Hindi book by - Shivanand Nautiyal
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गढ़वाल की लोक कथाएं - 2 भागों में

शिवानन्द नौटियाल

प्रकाशक : आत्माराम एण्ड सन्स प्रकाशित वर्ष : 1996
पृष्ठ :48
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 2945
आईएसबीएन :0

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गढ़वाल की लोक कथाएं

Gadhwal ki Lok Kathaein - Part 1

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

वाणी का घावः कभी नहीं भरता

एक गरीब ब्राह्मण था। उसकी एक जवान बेटी थी। वह बहुत ही खूबसूरत और सर्वगुण-सम्पन्न लड़की थी। ब्राह्मण अपनी बेटी का ब्याह अच्छे परिवार में करना चाहता था। परन्तु उसके पास देने के लिए कुछ भी नहीं था। इसलिए वह बहुत चिन्तित रहने लगा। जब उसको कहीं से भी कोई सहारा नहीं मिला तो उसने शहर में जाकर धन कमाने की सोची। उनके गाँव से शहर का रास्ता जंगल में से होकर जाता था।

जब ब्राह्मण घनघोर जंगल में पहुँचा तो प्यास और थकावट के कारण वह एक तालाब के किनारे बहुत बड़े वृक्ष की छाया में लेट गया। जमीन में लेटते ही उसे गहरी नींद आ गयी। जब उसकी नींद खुली तो उसने अपने सामने एक शेर को बैठे देखा। शेर को देखते ही ब्राह्मण बहुत ही घबरा गया। परन्तु शेर ने ब्राह्मण से कहा कि किसी प्रकार भी घबराए नहीं। वह उसका दोस्त है। ब्राह्मण को शेर ने जब भरोसा दिलाया, तो वह उसके सामने रोने लगा।

शेर ने ब्राह्मण को बहुत समझाया कि रोने से कुछ भी नहीं होता, हिम्मत रखने से सारे संकट दूर हो जाते हैं। शेर ने जब ब्राह्मण से रोने का कारण पूछा, तो ब्राह्मण ने अपनी दुखभरी कहानी उसे सुना दी। शेर को ब्राह्मण पर दया आ गयी, और उसने काफी धन-दौलत देकर ब्राह्मण को विदा किया। परन्तु एक शर्त रखी, कि लड़की की शादी में उसे भी बुलाना पड़ेगा। ब्राह्मण ने खुशी-खुशी शेर की शर्त को मान लिया।

ब्राह्मण जब अपने घर लौटा तो बहुत प्रसन्न था। उसने बहुत जल्दी अपनी लड़की की शादी तय कर दी। विवाह के दिन बाराती आए, शेर को भी बुलाया गया। चारों ओर खूब चहल-पहल थी। किन्तु बारातियों को कुछ दुर्गन्ध-सी मालूम पड़ी। बारातियों ने जब उस दुर्गन्ध के विषय में ब्राह्मण से पूछा तो उसने कहा कि हमारे घर में मरा हुआ चूहा पड़ा हुआ है। इसलिए ऐसी दुर्गन्ध आ रही है। शेर ने जब ऐसी बात सुनी तो उसे दुख हुआ।

दूसरे दिन जब बाराती विदा हो गए तो शेर ने भी कहा कि ब्राह्मण मैं भी अब जा रहा हूँ। मुझे भी विदा करो। ब्राह्मण ने कहा कि मैं आपको विदाई में क्या दे सकता हूँ ? यह तो सब आपकी ही कृपा का फल है कि मैं अपनी बेटी का विवाह कर सका हूँ। शेर ने कहा कि ब्राह्मण देवता आज की इस खुशी की याद में हमारे ऊपर तुम कुल्हाड़ी से प्रहार करो। ताकि हमेशा यह दिन मुझे याद रहे।

शेर की बात को सुनकर ब्राह्मण बहुत घबराया, परन्तु शेर अपनी बात पर डटा रहा। शेर ने कहा कि यदि तुम कुल्हाड़ी से नहीं मारोगे तो मैं तुम्हें खा जाऊँगा। ऐसे शब्द सुनकर ब्राह्मण विवश हो गया और उसने शेर के कन्धे के ऊपर कुल्हाड़ी से चोट कर दी। चोट लगते ही शेर अपने जंगल में चला गया।

बहुत दिनों के बाद जब ब्राह्मण फिर निर्धन हो गया तो शहर की ओर धन कमाने के लिए चल पड़ा। रास्ते में फिर वही स्थान और वही तालाब आ गया। ब्राह्मण ने सोचा क्यों न यहाँ विश्राम कर, शेर से मिलने का प्रयास करूँ ? शायद आज भी शेर मिल जाए। और उसकी मदद करे।

ब्राह्मण का सोचना सही रहा, कुछ देर बाद वही शेर तालाब के किनारे पानी पीने के लिए आ गया। ब्राह्मण ने फिर अपनी दुख भरी कहानी सुनायी कि वह पुन: दरिद्र हो गया है। और वृद्ध होने के कारण अपनी शक्ति भी खो चुका हूँ इसलिए उसकी पुन: मदद कर दें।

शेर ने ब्राह्मण से कहा ब्राह्मण देवता ! जहाँ पर तुमने कुल्हाड़ी की चोट की थी। उस स्थान को देखें और बताएँ कि मेरे शरीर में वह चोट का स्थान कहाँ है ? ब्राह्मण ने शेर के कन्धे पर देखा तो वह कुल्हाड़ी के उस घाव को अच्छी तरह नहीं देख सका। ब्राह्मण ने कहा कि भाई शेर ! आपके कन्धे पर जो चोट थी उसका निशान भर गया है। वह अब खरोच सा दिखाई दे रहा है। इस पर शेर ने कहा कि भाई, हथियार की चोट का घाव तो भर जाता है परन्तु वाणी की चोट का घाव कभी नहीं भरता। उस दिन तुमने बारातियों के सामने मुझे मरा हुआ चूहा कहकर जो मेरा अपमान किया था। मेरी उपस्थिति को दुर्गन्ध कहा था वह बात और उस बात का घाव अभी तक नहीं भरा है। इसलिए तुम मित्र के योग्य नहीं हो।

सच, कहा है कि वाणी से कही गयी कठोर बात जब किसी को लग जाती है। तो वह वाणी का घाव जीवन-पर्यन्त कभी नहीं भरता।

हाँ में हाँ मिलाना

‘‘अकबर के दरबार में बीरबल सबसे अधिक चतुर था। उसकी बुद्धिमत्ता को देखकर अकबर बहुत प्रसन्न रहते थे। अन्य दरबारी बीरबल से चिढ़ा करते थे। यहाँ तक कि वे बीरबल को नीचा दिखाने के लिए प्रयास करते रहते थे।

अकबर बादशाह भी अपने मन में बीरबल का बहुत सम्मान करते थे। बुद्धि चातुर्य में बीरबल अकबर बादशाह से कई गुना आगे थे। अकबर ने कई बार ऐसी कोशिश की कि बीरबल हार जाएँ। परन्तु कभी ऐसा समय नहीं आया। अकबर की भी इच्छा थी कि कभी ऐसा समय आए कि बीरबल को मुँह की खानी पड़े।

एक दिन अकबर ने अपने अन्य दरबारियों से कहा कि वे ऐसे प्रश्न करें जिससे बीरबल को नीचा दिखाया जा सके। और बीरबल की बोलती बन्द हो जाए।

दरबारियों में रहीम चतुर और अनुभवी थे। उन्होंने कहा कि —‘‘जहाँपनाह, आप ऐसा प्रश्न बीरबल से पूछिए कि वह चकरा जाए। ऐसा प्रश्न मैंने कई महीनों से सोचकर तैयार किया है।’’ अकबर ने रहीम से कहा कि वह कौन-सा प्रश्न है ?

रहीम ने कहा—‘‘जहाँपनाह, आप बीरबल से पूछिए कि दुनिया में सबसे अच्छी चीज क्या है।’’ बीरबल जो भी उत्तर दें आप ‘न’ कह दीजिए। फिर आप देखिए उन्हें मुँह की खानी पड़ेगी। अकबर बादशाह इस पर राजी हो गए अगले दिन दरबार में उन्होंने बीरबल से प्रश्न किया—‘‘राजा साहब !’’ मैं कई दिनों से सोच रहा हूँ कि दुनिया में सबसे अच्छी चीज क्या है ? पर इसका कोई भी जवाब हमें अभी तक नहीं मिला है। इसलिए आप दरबार में बताएँ कि वह सबसे अच्छी चीज क्या है ?’’
बीरबल तो हाजिरजवाब थे। उन्होने तत्काल उत्तर दिया—‘‘जहाँपनाह, झूठ-मूठ हाँ-में-हाँ मिलाना ही दुनिया की सबसे अच्छी चीज है।’’ बीरबल के उत्तर से अकबर बादशाह हँसते-हँसते लोट-पोट हो गए। परन्तु दरबारी ईर्ष्या से जल उठे। उन्होंने मिलकर कहा कि बीरबल को इसका सबूत देना चाहिए। बीरबल तैयार थे ही। उन्होंने कहा—‘‘ठीक है, मैं इसका सबूत दूँगा। पर इससे पहले इस बात का सबूत अमावस की रात को बरगद के पेड़ वाले तालाब के किनारे बैठे हुए साधु दे देंगे। सबने बात मान ली अब क्या था ? अमावस के दिन गिने जाने लगे। बीरबल भी अपनी तैयारी करने लगे। एक रात उन्होंने साधु का वेश बनाया और बरगद के पेड़ के नीचे बैठ गए। वहाँ पहुँचकर उन्होंने जोर-शोर से ‘राम-राम’ कहना शुरू कर दिया। चारों ओर यह बात फैला दी कि यह साधु बड़ा सिद्ध योगी है।

अमावस के दिन बादशाह अपने दरबारियों के साथ तालाब वाले बरगद के पेड़ के नीचे पहुँचे। वहाँ सचमुच एक साधु बैठा था। सबने झुककर प्रणाम किया। साधु ने आशीर्वाद दिया और कहा—‘‘बोलो बच्चो, क्या माँगते हो ? हम तुम्हें तुम्हारे मरे हुए माँ-बाप के दर्शन करा सकते हैं।’’

दरबारियों के मुँह खुले के खुले रह गए। साधु फिर बोले—‘‘पर वह आदमी ही अपने बाप-दादाओं को देख सकेगा, जो अपने बाप की औलाद होगा।’’ साधु ने जब एक-एक करके पेड़ पर चढ़ने का इशारा किया और आकाश की ओर देखने के लिए कहा। तो सबसे पहले मौलवी साहब पेड़ पर चढ़े। साधु ने कहा, ‘‘तुम्हारे बाप तुम्हें दिखाई दे रहे हैं ?’’ मौलवी साहब ‘न’ कहने वाले ही थे कि उन्होंने सोचा कि यदि मैं न कहता हूँ तो सभी दरबारी यह समझेंगे कि मैं अपने बाप की औलाद नहीं हूँ और मेरी हँसी उड़ाएंगे। इसलिए वे बोले, ‘‘हाँ-हाँ देख रहा हूँ। अब्बा की दाढ़ी दिखाई दे रही है।’’

मौलवी साहब नीचे उतरे। फिर रहीम की बारी आई। उन्हें भी अपने बाप नहीं दिखाई दिए पर ‘न’ करने का साहस उनमें भी नहीं हुआ। वे भी हाँ-हाँ कहने लगे। बोले—‘‘हाँ देख रहे हैं। कितने कमज़ोर हो गए हैं अब्बा पहचाने नहीं जाते।

फिर क्या था सबने हाँ-में-हाँ मिलायी और सबने हाँ-हाँ कर दी।

आखिर बादशाह की बारी आई। पेड़ पर चढ़कर उन्होंने भी देखा, एक बार नहीं, दो बार नहीं, दस बार देखा और झुंझलाकर कहा—‘‘मौलवी साहब के कान खड़े हो गए, ‘‘मुझे कुछ भी नहीं दीखता।’’ मौलवी साहब के बाद सभी दरबारियों ने कहा—‘‘हमें भी कुछ नहीं दिखाई दिया।’’

वे सब साधू पर बड़ा नाराज हुए। पर देखते क्या हैँ कि पेड़ के नीचे से साधु तो गायब है परन्तु बीरबल खड़े मुस्करा रहे हैं।

बादशाह गरजे—‘‘बीरबल तुमने हमको बेवकूफ बनाया।’’

बीरबल ने झुककर सलाम किया और जवाब दिया—‘‘अन्नदाता, आपने ही इसका सबूत माँगा था।’’

मैंने तो पहले ही कहा था कि, ‘‘हाँ-में-हाँ मिलाना, झूठ बोलना ही दुनिया में सबसे प्यारी चीज है। परन्तु आपने सबूत माँगा तो इससे बड़ा सबूत मैं आपको और क्या दे सकता था ?’’

अकबर बादशाह बहुत खुश हुए और उनके दरबारी बहुत लज्जित हुए। बादशाह ने खुश होकर बीरबल को बहुत सा इनाम दिया।...

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