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श्रंगार - प्रेम >> देवदास

देवदास

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : वाणी प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2002
पृष्ठ :139
मुखपृष्ठ :
पुस्तक क्रमांक : 3000
आईएसबीएन :000000

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वंशगत भेदभाव एवं लड़की बेचने की कुप्रथा पर आधारित उपन्यास...

Devdass Sharatchandra

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश


शरत् बाबू के उपन्यासों में जिस रचना को सब से अधिक लोकप्रियता मिली है वह है देवदास। तालसोनापुर गाँव के देवदास और पार्वती बालपन से अभिन्न स्नेह सूत्रों में बँध जाते हैं, किन्तु देवदास की भीरू प्रवृत्ति और उसके माता-पिता के मिथ्या कुलाभिमान के कारण दोनों का विवाह नहीं हो पाता। दो तीन हजार रुपये मिलने की आशा में पार्वती के स्वार्थी पिता तेरह वर्षीय पार्वती को चालीस वर्षीय दुहाजू भुवन चौधरी के हाथ बेच देते हैं, जिसकी विवाहिता कन्या उम्र में पार्वती से बड़ी थी। विवाहोपरान्त पार्वती अपने पति और परिवार की पूर्णनिष्ठा व समर्पण के साथ देखभाल करती है। निष्फल प्रेम के कारण नैराश्य में डूबा देवदास मदिरा सेवन आरम्भ करता है,जिस कारण उसका स्वास्थ्य बहुत अधिक गिर जाता है। कोलकाता में चन्द्रमुखी वेश्या से देवदास के घनिष्ठ संबंध स्थापित होते हैं। देवदास के सम्पर्क में चन्द्रमुखी के अन्तर सत प्रवृत्तियाँ जाग्रत होती हैं। वह सदैव के लिए वेश्यावृत्ति का परित्याग कर अशथझूरी गाँव में रहकर समाजसेवा का व्रत लेती है। बीमारी के अन्तिम दिनों में देवदास पार्वती के ससुराल हाथीपोता पहुँचता है किन्तु देर रात होने के कारण उसके घर नहीं जाता। सवेरे तक उसके प्राण पखेरू उड़ जाते हैं। उसके अपरिचित शव को चाण्डाल जला देते हैं। देवदास के दुखद अन्त के बारे में सुनकर पार्वती बेहोश हो जाती है। देवदास में वंशगत भेदभाव एवं लड़की बेचने की कुप्रथा के साथ निष्फल प्रेम के करुण कहानी कही गयी है।

देवदास


वैशाख मास की दोपहरी की भीषण गरमी में पाठशाला के एक कमरे में फटी चटाई पर बैठकर ऊंघते और जम्हाई लेते देवदास ने कमरे में घुटते रहने की अपेक्षा खुले आसमान में पतंग उड़ाने का मज़ा लेने का निश्चय किया और फिर स्कूल से छुट्टी पाने का बहाना भी गढ़ लिया।

इस समय पाठशाला में अर्धावकाश हुआ था। कुछ बच्चे अपनी-अपनी मण्डली बनाकर उछल-कूद और कोलाहल कर रहे थे, तो कुछ वृक्ष के नीचे गुल्ली डण्डा खेल रहे थे। देवदास को जलपान के लिए बाहर जाने की अनुमति देना बन्द कर दिया गया था; क्योंकि एक बाहर गया यह छोकरा वापस पाठशाला की ओर मुंह नहीं करता था। इसे गोविन्द पण्डित बहुत बार देख-परख चुके थे। देवदास के पिता ने भी अर्धावकाश में लड़के को बाहर न जाने के लिए अपनी सहमति दे रखी थी। इस अवधि में देवदास को अपनी कक्षा के मॉनीटर भोला की देख-रेख में रहना पड़ता था।

हाथ में स्लेट लेकर उठ खड़े हुए देवदास ने देखा कि उस कमरे में उसके अध्यापक महोदय ऊंघ रहे हैं और मॉनीटर भोला दूर किसी टूटी-फूटी बैंच पर अन्य अध्यापक की भूमिका निभा रहा है। वह कभी अनमने भाव से बाहर खेलते लड़कों को देखता और कभी अपनी उड़ती निगाह देवदास और पार्वती पर डालता था। पार्वती एक महीना पहले ही पण्डितजी के आश्रय में रहने और शिक्षा ग्रहण करने आयी है। पण्डितजी से प्रभावित होने के कारण ही वह इस समय ‘बोधोदय’ पाठ्यपुस्तक के अन्तिम ख़ाली पृष्ठ पर स्याही से, मज़े से सो रहे पण्डितजी का चित्र बना रही थी और एक कुशल चित्रकार की भाँति रह-रहकर इस तथ्य की जांच कर रही थी कि वह अपने प्रयास में कितनी सफल रही है। यद्यपि वह अपने मनमाफिक चित्र नहीं बना पायी थी, तथापि जैसा बन पड़ा था, उसे ही देख-देखकर वह काफी प्रसन्न हो रही थी।
इसी समय स्लेट हाथ में लेकर खड़े देवदास ने भोला को ज़ोर से पुकारते हुए हिसाब न हो पाने की शिकायत की, तो भोला ने गम्भीर होकर पूछा, ‘‘कौन-सा हिसाब नहीं हो रहा है ?’’
‘‘मन, सेर, छटांक का।’’
‘‘लाओ, अपनी स्लेट मुझे दिखाओ।’’
देवदास ने अपनी स्लेट उसे थमा दी और भोला हिसाब लगाने में जुट गया। ठीक इसी समय देवदास ने तीन बरसों से निरन्तर टूटी बैंच पर बैठते आ रहे भोला को धक्का दे दिया। बैंच के नीचे पण्डितजी कभी सुविधा होने पर अपने मकान बनाने के लिए सस्ते दाम पर मिल रहा चूना खरीदकर लिया था, जिसकी रखवाली उस पर पड़ी बैंच पर बैठा भोला पूरी सावधानी से करता आ रहा था। हिसाब करने में खोया भोला देवदास के धक्के से संभल न सका और चूने के उसी ढेर में जा धंसा। बस, फिर क्या था, इस दृश्य का आनन्द लेती हुई पार्वती ताली बजाकर हंसने और उछलने-कूदने लगी। पेड़ के नीचे खड़े लड़के भी खूब ज़ोर से हंसने लगे। पण्डितजी की नींद खुल गयी और वह क्रुद्ध दृष्टि से चारों ओर देखने लगे। उन्होंने टूटी बैंच के नीचे चूने में धंसे और बाहर निकलने के लिए हाथ-पैर पटकते किसी को देखा, तो वह चिल्लाकर पूछने लगा, ‘‘यह काहे का शोर मचाया जा रहा है ?’’

पण्डितजी के प्रश्न का उत्तर भला कौन देता ? वहां कमरे में केवल पार्वती उपस्थित थी, जो अपनी मस्ती में तालियाँ बजाते हुए धरती पर लोट रही थी। उत्तर न पाकर क्रुद्ध हुए वह पुनः चिल्लाये, ‘‘अरे ! हुआ क्या है ?’’
इसी बीच अपने ऊपर से चूना हटाने में सफल हुआ भोलानाथ बैंच से बाहर निकला, तो उसे देखकर पण्डितजी फिर चिल्लाकर बोले, ‘‘बदमाश कहीं का ! तू चूने में कैसे धंस गया था ?’’
भोला पीड़ा से चिल्लाने लगा, तो पण्डितजी ने और अधिक क्रुद्ध स्वर 
में डांटते हुए पूछा, ‘‘बदमाश ! कुछ बोलता और बताता क्यों नहीं ?’’
‘‘मैं देवदास का सवाल हल कर रहा था कि उस साले ने मुझे धक्का देकर नीचे गिरा दिया।’’
‘‘उस बदमाश ने फिर शैतानी की ?’’
सारी बात को समझकर पण्डितजी भोला के प्रति सहानुभूति दिखाते हुए बोले, ‘‘अच्छा, वह गधा तुझे धकेलकर बाहर भाग गया है।’’
भोला ज़ोर से रोने-बिलखने लगा।

भोला ने उठकर अपने शरीर को झाड़-पोंछकर भली प्रकार साफ़ करने की पूरी चेष्टा की, किंतु रंग और चूने के कुछ निशानों के लगे रहने के कारण वह भूत-जैसा दिखाई देने लगा।
पण्डितजी ने एक बार दोहराया, ‘‘हां, वह धूर्त लड़का तुझे गिराकर नौ-दो-ग्यारह हो गया है।’’
आं-आं करते हुए भोला और भी ज़ोर-ज़ोर से रोने लगा।
पण्डितजी ने भोला को आश्वस्त करते हुए कहा, ‘‘इसका उसे समुचित दण्ड दिया जायेगा।’’
भोला हाय-हाय करता हुआ रोता रहा।
पण्डितजी ने पूछा, ‘‘बाक़ी लड़के कहां हैं ?’’

इसी बीच हांफते हुए लौटे लड़कों ने उदासी के स्वर में बताया कि देवा उनकी पकड़ में नहीं आया। वह उन पर ईंटें फेंकता है, इसलिए चोट लगने के डर से वे लौट आये हैं।
‘‘पकड़ में नहीं आया, क्या ?’’ पण्डितजी ने पुनः पूछा, तो एक लड़के ने उसके द्वारा ईंटें फेंकने की बात दोहरा दी। इस पर पण्डितजी की डांट और उनके चुप रहने की बात सुनकर वह बेचारा डर के मारे एक ओर खिसक गया।
पण्डितजी ने पहले पार्वती की डांट-डपट की और फिर भोला के हाथ को पकड़कर देवदास के पिता से शिकायत करने चल दिये।

देवदास के पिता ज़मींदार नारायण मुखर्जी घर के बाहर बैठे हुक़्क़ा गुड़गुड़ा रहे थे। एक नौकर पंखा कर रहा था। दिन के तीन बजे एक छात्र के साथ गोविन्द पण्डित को आया देखकर वह चकित हो उठे। कायस्थ पण्डितजी ने जाति-धर्म का निर्वाह करते हुए पहले मुखर्जी महाशय को सादर प्रणाम किया और फिर भोला को आगे करके सारी घटना को विस्तार से सुनाकर अपने आने का प्रयोजन बताया।
सुनकर मुखर्जी महाशय काफ़ी व्यथित हुए और चिन्तित स्वर में बोले, ‘‘देवदास के उद्धत हो जाने को मैं भी पसन्द नहीं करता।’’
गोविन्द पण्डित ने पूछा, ‘‘तो अब मेरे लिए क्या आदेश है ?’’
हुक़्क़े की नली एक ओर रखते हुए ज़मींदार साहब ने पूछा, ‘‘इस समय वह कहां है ?’’
‘‘मुझे क्या मालूम ? मैंने जिन लड़कों को उसे पकड़ने के लिए भेजा था, उन्हें तो उसने मार-मारकर भगा दिया है।’’
कुछ देर तक दोनों ओर चुप्पी छायी चुप्पी को तोड़ते हुए मुखर्जी महाशय बोले, ‘‘ठीक है, उसे घर आने दो, मैं उसकी ख़बर लेता हूँ।’’

पण्डितजी भोला का हाथ पकड़कर पाठशाला लौट आये और उन्होंने क्रोधावेश में यह घोषणा करके सभी छात्रों को संत्रस्त और हक्का-बक्का कर दिया, ‘‘देवदास के पिता भले ही यहां के ज़मींदर हों, किन्तु अब वह देवदास को अपनी पाठशाला में कभी नहीं घुसने देंगे।’’ असंयत होने के कारण उस दिन गुरुजी ने छुट्टी भी निश्चित समय से कुछ पहले कर दी। छात्र आपस में इस विषय पर तरह-तरह की बातें करने लगे।
एक लड़का बोला, ‘‘यार ! कुछ भी कहो, देवा है हिम्मतवाला।’’
दूसरे लड़के ने कहा, ‘‘आज उसने भोला की ऐसी-तैसी कर दी।’’
एक और लड़का बोला, ‘‘ओफ़, ढेला भी कितनी ज़ोर से फेंकता है ?’’
एक और लड़के ने भोला का पक्ष लेते हुए कहा, ‘‘भोला भी देवा से बदला लिये बिना मानने वाला नहीं।’’
एक अन्य छात्र बोला, ‘‘अरे, जब देवा इस पाठशाला में आयेगा ही नहीं, तो फिर बदला लेने-न-लेने का प्रश्न ही कहां उठता है ?’’

बच्चों की इस मण्डली के साथ अपने हाथ में स्लेट और किताब थामे पार्वती भी चल रही थी। उसने एक लड़के का हाथ पकड़कर पूछा, ‘‘
‘‘मणि ! क्या अब देव भैया को सचमुच पाठशाला से निकाल दिया जायेगा ?’’
मणि ने उत्तर दिया, ‘‘ऐसा नहीं हो सकता।’’
इस उत्तर से असंतुष्ट हुई पार्वती एक ओर खिसक गयी।
पार्वती के पिता नीलकण्ठ चक्रवर्ती का पक्की ईंटों का मकान ज़मींदार मुखर्जी की हवेली से सटा हुआ था। उसके दस-पाँच बीघे धरती भी थी और दो-चार घर यजमान भी थे। इसके अतिरिक्त उन्हें ज़मींदार से भी कुछ प्राप्ति हो जाती थी, इसलिए वह सुख, शान्ति और निश्चितन्तता से जीवन बिताते थे।

पार्वती को पाठशाला पहुँचाने और ले जाने का दायित्व घर के नौकर धर्मदास पर है। पिछले दस-बारह वर्षों से वह अपने इस दायित्व को नियमित रूप से निभाता आ रहा है। आज पार्वती को पाठशाला ले जाते हुए धर्मदास ने पूछा, ‘‘पारो ! तुम्हारे देव भैया कहां हैं ?’’
‘‘भाग गये हैं।’’
सुनकर चकित हुए धर्मदास ने कहा, ‘‘क्या मतलब ?’’
देवदास के द्वारा की गयी भोलानाथ की दुर्दशा का वर्णन करते हुए पार्वती को हंसी आ गयी। वह बोली, ‘‘एकदम चूने के ढेर पर...हा, हा, हा। भोला कैसा भूत लगता था ? आह—आह, क्या मजेदार दृश्य था, धर्मा !’’ कहते हुए वह ताली पीटने लगी।

पूरी बात न समझने पर भी पार्वती को हंसता देखकर धर्मदास भी हंसने लगा। हंसी रुकने पर उत्सुक हुए धर्मदास ने पूछा, ‘‘बिटिया रानी ! कुछ बताओ तो सही, आखिर हुआ क्या था ?’’
‘‘देव भैया ने ज़ोर से धक्का देकर भोला को चूने के ढेर के बीच गिरा दिया।’’ कहकर पार्वती एक बार फिर हंस दी।
सारी बात को अब ठीक ढंग से समझ लेने के बाद धर्मदास ने पूछा, ‘‘इस समय देवदास कहाँ है ?’’
‘‘मैं क्या जानूं।’’
‘‘तुम्हें सब मालूम है, इस समय उसे खूब भूख लगी होगी। उसका पता-ठिकाना बता दो बिटिया।’’
‘‘हां, भैया को भूख लगने की बात तो सच है किन्तु फिर भी मैं उसका पता नहीं बताऊंगी।’’
‘‘लेकिन, क्यों नहीं बताना चाहती हो ?’’
‘‘बताने पर मुझे उनसे बुरी तरह पिटना पड़ेगा। हां, मैं उन्हें खाना दे आ सकती हूं।’’

सन्तुष्ट हुए धर्मदास ने कहा, ‘‘ठीक है, तुम उन्हें खाना दे आना और बातों में फुसलाकर सन्ध्या के समय घर ले आना।’’
पार्वती ने धर्मदास की बात मानकर शाम के समय देवदास को घर ले आना स्वीकार कर लिया। घर पहुंचने पर पार्वती ने देखा कि उसकी मां और देवदास की मां को धर्मदास को दिये उसके वचन की जानकारी हो गयी है। दोनों के द्वारा पूछताछ किये जाने पर पार्वती को जो सूझा, वह उसने मुंह से बोल दिया। इसके बाद वह अपने पल्लू में थोड़ी-सी मुड़ी बांधकर घर के समीप स्थित जमींदार के आमों की बगिया में चल दी। उसे मालूम था कि वहीं कहीं छिपकर बैठा देवदास तमाखू पी रहा होगा। बग़िया में बने बांस के बाड़े में थोड़ी-सी जगह को साफ करके वहां बैठा हुक़्क़ा गुड़गुड़ाता देवदास उसे मिल गया। चिन्तित और परेशान देवदास पार्वती को देखकर भीतर से काफ़ी प्रसन्न होने पर भी बाहर से गम्भीर बना रहा। वह मुस्कराकर बोला, ‘‘आओ पार्वती !’’

पार्वती के समीप बैठ जाने पर, उसके आंचल की गठरी को देखते ही उसे खोलकर खाद्य-समाग्री को खाते हुए देवदास बोला, ‘‘पारो ! पण्डितजी का क्रोध शान्त हुआ या नहीं ?’’
वह बोली, ‘‘पण्डितजी ने तुम्हारे पिताजी को सारी घटना सुनाकर उनसे तुम्हारी शिकायत की है।’’
हुक़्क़े को एक ओर रखकर और आंखें तरेरकर देवदास बोला, ‘‘क्या कहा, बाबूजी से शिकायत की है ?’’
‘‘हां’’
‘‘बाबूजी ने क्या कहा ?’’
‘‘यह को मुझे मालूम नहीं, किंतु पण्डितजी ने तुम्हें अपनी पाठशाला में न आने देने की घोषणा कर दी है।’’
‘‘मैं पढ़ना भी नहीं चाहता।
इस बीच मुड़ी निपटा चुके देवदास ने पारो से सन्देस की मांग की। पारो के मुंह से सन्देस न लाने की सुनकर, उसने पानी मांगा। पारो के उसे भी न लाने की कहने परथोड़ा नराज़ होकर देवदास बोला, ‘‘जब कुछ भी नहीं लाना था, तो फिर आने की क्या आवश्यकता थी ? अब जाकर पानी ले आओ।’’

देवदास का रूखापन पारो को अच्छा नहीं लगा। वह बोली, ‘‘अब मुझसे पानी नहीं लाया जा सकता। तुम स्वयं चलकर पी आओ।
‘‘मैं वहां कैसे जा सकता हूं ?’’
‘‘क्या यहीं पड़े रहोगे ?’’
‘‘अभी तो यहीं रहना होगा, बाद में देखा जायेगा।’’
देवदास की परेशानी देखकर उसके प्रति स्नेह और सहानुभूति दिखाते हुए पार्वती की आंखें गीली हो उठीं और वह रुंधे गले से बोली, ‘‘देव भैया ! मैं भी तुम्हारे साथ रहूंगी।’’
‘‘ऐसा कभी संभव नहीं।’’
हट करती हुई पार्वती बोली, ‘‘क्यों सम्भव नहीं ? मैं यहां तुम्हारे साथ रहूंगी।’’
‘‘अच्छा, पहले मेरे लिए पानी तो ले आ।’’
‘‘मैं नहीं जाती, मेरे चले जाने पर तुम कहीं दूसरी जगह चले जाओगे।’’
‘‘मैं कहीं नहीं जाऊंगा, यहीं तुम्हारी प्रतीक्षा करूंगा।’’

देवदास के कथन पर विश्वास न कर पाती पार्वती को स्थिर बैठा देखकर देवदास ने ऊंचे स्वर में बोला, ‘‘सुना नहीं, मैंने क्या कहा है ?’’
पार्वती को फिर भी स्थिर बैठा देखकर उसकी पीठ पर एक धौल जमाते हुए देवदास बोला, ‘‘जाती है या नहीं ?’’
रोते हुए पार्वती बोली, ‘‘नहीं, मैं नहीं जाऊंगी।’’
नाराज़ और रूठा हुआ देवदास कहीं दूसरी ओर चल दिया। उधर रोती हुई पार्वती सीधे देवदास के पिता के पास आ खड़ी हुई। पार्वती को काफ़ी प्यार करने वाले मुखर्जी महाशय ने उसकी आंखों में आंसू देखकर चिन्तित स्वर में उससे पूछा, ‘‘क्या हुआ बेटी ! रोती क्यों हो ?’’
‘‘देव भैया ने पीटा है।’’
‘कहां है वह ?’’
‘‘आम की बगिया में बांस की झोंपड़ी में बैठा हुक़्क़ा गुड़गुड़ा रहा है।’’

पण्डितजी की शिकायत से पहले ही उखड़े बैठे मुखर्जी महाशय पार्वती की शिकायत सुनकर तो आग बबूला हो उठे और बोले, ‘‘क्या देवा फिर से तम्बाकू पीने लगा है ?’’
‘‘हां, यह तो उनका रोज़ का काम है। उसी बांस की झोंपड़ी में भैया ने आपका हुक़्क़ा छिपा रखा है।’’
‘‘तुमने यह सब पहले क्यों नहीं बताया ?’’
देव भैया की मार की डर से पहले बताने की हिम्मत नहीं हुई।’’
वास्तव में, पार्वती द्वारा देवदास की इस बुराई की उनके पिताजी को जानकारी न देने का उद्देश्य उसे मिलने वाली सज़ा से बचाना था। आज भी क्रोध में आकर यह सब बताने के लिए वह अपने को कोसते हुए पछता रही थी। आठ साल की छोटी-सी लड़की को इतनी समझ थी, इसलिए वह रोते-रोते अपने बिस्तर पर लेट गयी और रात का भोजन न कर सकी।

:2:


अगले दिन देवदास की जमकर पिटाई हुई और उसे घर में बन्द कर दिया गया। उसकी मां के बुरी तरह से और बहुत देर तक रोने-बिलखने पर बड़ी मुश्किल से उसे छोड़ा गया। उसके दूसरे दिन वह सुबह घर से भाग निकला और पार्वती के घर पहुंचकर बाहर की खिड़की से उसने पार्वती को आवाज़ देकर पुकारा, ‘‘पारो, ओ पारो !’’
आवाज़ सुनकर पार्वती ने खिड़की खोली और उत्तर में बोली, ‘‘देव भैया !’’ देव ने उसे जल्दी से बाहर आने का इशारा किया और उसके बाहर आ जाने पर वह बोला, ‘‘तूने मेरे पिताजी को मेरे तमाखू पीने की बात क्यों बतायी थी ?’’
‘‘तूने मुझे मारा जो था।’’
‘‘वह तो तूने पानी लाने से मना कर दिया था।’’
पार्वती के चुप रहने पर देवदास बोला, ‘‘तुझमें समझ की कमी है और तू अनाड़ी है। अच्छा, फिर कभी किसी से ऐसी शिकायत मत लगाना।’’

पार्वती ने सिर हिलाकर किसी से कुछ न कहने की हामी भरी।
‘‘अच्छा, चल, आज बांस-बाड़ी से बांस काटकर ताल पर बैठकर मछली पकड़ते हैं।’’
पार्वती ने पूरी सावधानी और ताक़त से तने को अपनी ओर खींचे रखा, और फिर देवदास उसे काटने में जुट गया। पार्वती ने उससे पूछा, ‘‘क्या तुम पाठशाला नहीं चलोगे ?’’
उसके ‘नहीं’ कहने पर पार्वती बोली, ‘‘तायाजी तुम्हें जाने को कहेंगे, तो क्या करोगे ?’’
देवदास ने उत्तर दिया, ‘‘बाबूजी ने स्वयं पाठशाला न जाने की कह दी है। अब पण्डितजी मुझे पढ़ाने मेरे घर पर आया करेंगे।’’
कुछ देर के लिए चिन्तित पार्वती चुप रहने के बाद बोली, ‘‘गरमी के कारण हमारी पाठशाला का समय बदल गया है, अतः अब मुझे जाना होगा।’’
क्रुद्ध स्वर में देवदास ने ऊपर से कहा, ‘‘तुझे कहीं नहीं जाना है।’’

सुनकर पार्वती उदास हो गयी और उधर बांस की डाली थोड़ी ऊपर हुई तथा देवदास ऊंचाई से नीचे आ गिरा। उसे चोट तो नहीं लगी, लेकिन उसका शरीर जगह-जगह से छिल अवश्य गया। नीचे उतरते ही खीजे हुए देवदास ने सूखी डाली से पार्वती के शरीर के विभिन्न अंगों—सिर, पीठ, छाती, मुंह और टांगों आदि—पर ज़ोर—ज़ोर से प्रहार किया तथा अपने हाथों से उसके गालों पर थप्पड़ मारे और फिर बोला, ‘‘जाती है, तो जा, मर।’’
पार्वती पहले तो सहम गयी, किन्तु लगातार अपने शरीर पर देवदास के पड़ते घूसों और तमाचों से क्रुद्ध होकर और अपने को अपमानित अनुभव करते हुए वह बोली, ‘‘मैं अभी तायाजी के पास जाकर उन्हें सब कुछ बताती हूं।’’
इससे और अधिक भड़का हुआ देवदास पार्वती को और अधिक पीटते हुए बोला, ‘‘जा, जिससे कहना हो, कह दे। मुझे न किसी की चिन्ता है और न किसी का कोई भय।

पार्वती के कुछ दूर चले जाने पर देवदास ने उसे आवाज़ दी, जिसे सुनकर भी पार्वती नहीं रुकी, उलटे उसने अपनी चाल पहले से अधिक तेज कर दी। इस पर देवदास ने फिर से पुकारा, ‘‘पारो ! मेरी एक बात तो सुन जा।’’ किन्तु पार्वती के फिर भी न रुकने पर उदास और निराश हुआ देवदास उसे सुनाते हुए उच्च स्वर में बोला, ‘‘नहीं आती, तो न आ।’’
पार्वती के चले जाने पर देवदास ने एक-दो बांस काटे तो सही, किन्तु उसका मन खिन्न हो उठा था। उधर रोते हुए घर लौटी पार्वती के गालों पर देवदास की पिटाई से पड़ा घाव-जैसा दाग़ नीला होकर सूज गया था, जिस पर निगाह पड़ते ही पार्वती की दादी चीख उठी और बोली, ‘‘यह किस ज़ालिम की करतूत है ?’’

आंखें पोंछते हुए पार्वती के मुंह से ‘पण्डितजी’ का नाम सुनकर दादी पार्वती को अपनी गोद में लेकर क्रुद्ध स्वर में बोली, ‘‘चल, ज़रा नारायण को बताती हूं कि वह जल्लाद है या पण्डित है। बेचारी मासूम लड़की पर इतना अत्याचार !’’
दादी के गले से लिपटी पार्वती बोली, ‘‘हां, चलो।’’
मुखर्जी महाशय के पास पहुंचकर पार्वती की दादी गोविन्द पण्डित की सात पीढ़ियों को गाली देते हुए और उसके द्वारा जन्म-जन्मान्तरों में बच्चों परकिये अत्याचारों-जैसे कुकर्मों को ही उसकी ग़रीबी का कारण बताते हुए उसके लोक-परलोक के बिगड़ने का शाप देने लगी। इसके बाद मुखर्जी महाशय को सम्बोधित करते हुए बोली, ‘‘नारायण ! ज़रा देख तो सही, शूद्र होकर ब्राह्मण कन्या पर ऐसा प्रहार करते हुए उसे ज़रा भी संकोच नहीं हुआ।’’
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कुछ समय पहले तौल में आज के क्विंटल, किलो और ग्राम के स्थान पर मन, सेर और छटांक का प्रयोग होता था।


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