Beghar - Hindi book by - Mamta Kaliya - बेघर - ममता कालिया
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स्त्री-पुरुष संबंध >> बेघर

बेघर

ममता कालिया

प्रकाशक : वाणी प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2002
पृष्ठ :187
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 3048
आईएसबीएन :81-7055-900-6

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ममता कालिया का एक समकालीन उपन्यास

Beghar a hindi book by Mamta Kaliya - बेघर - ममता कालिया

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

‘बेघर’ ममता कालिया का पहला उपन्यास और उनकी दूसरी पुस्तक है। यह कृति अपनी ताजगी, तेवर और ताप से एक बारगी प्रबुद्ध पाठकों और आलोचकों का ध्यान खींचती है। इस पुस्तक के अब तक कई संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं, पेपर बैक संक्षिप्त संस्करण भी। हिन्दी उपन्यास के अब तक चले आ रहे स्वरूप को ‘बेघर’ तोड़ता और पुन:परिभाषित करता है। कथा का नायक परमजीत दिल्ली से बंबई चला जाता है। ‘अपनी पुरानी कब्ज और कच्ची-पक्की अग्रेंजी’ लेकर। वहाँ उसे एक बिल्कुल अलग किस्म की लड़की संजीवनी भरूचा अकस्मात् मिलती है। और भी कई विलक्षण लोग उसके जीवन में आते हैं – केंकी अंक्लेसरिया, वालिया, विजया केलकर, शिन्दे। इन सबके सान्निध्य में महानगर की जीवन-शैली का पूरा नया पाठ पढ़ा। संजीवनी के आगे वह कभी पद्धतिबद्ध ढंग से विवाह का प्रस्ताव तो नहीं रखता पर दोनों को महसूस होता है कि वे एक दूसरे के लिये हैं। उनका प्रेम सुखद परिणति तक पहुँचने से पूर्व ही ध्वस्त हो जाता है और वे एक-दूसरे से अलग होकर उदास जिन्दगी जीने को बाध्य हो जाते हैं। सामाजिक अर्थों में परमजीत रमा से विवाह करता है,
बच्चे भी आते हैं पर कथानायक घर के हुए भी बेघर है। रमा की रूढ़िग्रस्तता नायक के आत्मनिर्वासन पर अंतिम मुहर लगा देती है।
यह रचना बीसवीं शताब्दी के तीस वर्ष जीवित रहकर इक्कीसवीं शताब्दी में इस नये संस्करण के साथ प्रवेश कर रही है। इस पर सर्वश्री उपेन्द्रनाथ अश्क, ज्ञानरंजन, विश्वनाथ त्रिपाठी, विजयमोहन सिंह, ऋषिकेष, अरविन्द जैन जैसे सुधी मूल्यांकन कर्ता अपना अभिमत दे चुके हैं। दो नगरों का रेशा-रेशा उघाड़ती यह कथा प्रेम और विवाह के बीच के अन्तर और अन्तराल का अध्ययन प्रस्तुत करती है।
‘उपन्यास को मैंने रम कर पढ़ा और खुशी में बहुत जल्दी पढ़ लिया, कुछ घंटों में – अंत में रक्तचाप एक हल्की उदासी की तरफ ले गया। मुझे इस उदासी का मूल्यांकन करना अभी बाकी है। वही बात आपसे डिसकस भी हो सकती है।
उपन्यास के ऊपर आपका नियंत्रण इतना लगातार है कि कहा जा सकता है, आप तीसरे-चौथे गेयर में बिना बदले गाड़ी चलाती रही हैं। आपकी स्फूर्ति, त्वरा और सहज सूक्ष्मता से बहुत प्रभावित हुआ हूँ।

-ज्ञानरंजन

‘तुम्हारा यह पहला उपन्यास है। तुमने इसमें दिल्ली के परमजीत के परिवार और बंबई के जीवन में उसके निकट आने वाले कुछ पात्रों, मसलन केकी, वालिया, विजया केलकर, शिन्दे, प्रेम आर्य, परमजीत की एग्रेसिव और फूहड़ बीवी और शादी के बाद स्वयं परमजीत का कुछ ऐसा सुन्दर और यथार्थपरक चित्रण किया है कि तुम्हें अनायास दाद देने को जी चाहता है। उपन्यास को पढ़कर लगा है कि तुम बेहतर उपन्यासकार हो। तुमने केकी और रमा के चित्रण में अद्भुत कौशल का परिचय दिया है और तुम अपनी इस उपलब्धि पर उचित गर्व कर सकती हो।

-उपेन्द्रनाथ अश्क


हिन्दी उपन्यास पुन:परिभाषा के जिस मोड़ पर आज खड़ा है, ‘बेघर’ की शुरुआत वहीं से होती है। व्यक्ति के अन्तर्मन की गहराइयों और आधुनिक समाज और इतिहास के बीच उसके अस्तित्व का तह-दर-तह अन्वेषण – यही बेघर का कथ्य और ‘मिशन’ – दोनों है। यह ‘मिशन’ दुहरे रचनात्मक स्तरों पर ‘बेघर’ में अभिव्यक्त होता चलता है। पहला स्तर है व्यंग्य और दूसरा करुणा। और दोनों का ही अन्तर-गुँथाव भाषा के आंतरिक सुथरेपन से संभव हो सका है। परमजीत या संजी, वालिया या रमा, चरित्रों से अधिक अस्तित्व की बेबस, खेलती हुई झाँकियाँ हैं, जिनकी परिणति तार्किक उतनी नहीं है जितनी असंबद्ध। इस असम्बद्धता के भीतर से एक व्यंग्यपूर्ण उदास करुणा का सृजन ही शायद ममता कालिया का लक्ष्य है। और यहीं यह उपन्यास समसामयिकता का अतिक्रमण
भी करता है, जो हर ‘मौलिक’ रचना की पहली शर्त है।

भूमिका


‘बेघर’ के पच्चीस वर्ष अर्थात् कौमार्य की अग्नि परीक्षा – अरविन्द जैन

ममता कालिया का उपन्यास ‘बेघर’ (1971) अपने रजत जयंती वर्ष (1996) तक निरंतर उपलब्ध ही नहीं बल्कि प्रासंगिक और चर्चा का विषय भी रहा है। 1971 के बाद राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय स्तर पर नारी मुक्ति आंदोलन, यौन क्रान्ति, गर्भपात के कानूनी अधिकार, शिक्षा, सामाजिक मूल्यों में भारी बदलाव, स्त्री चेतना का विकास, मीडिया में स्त्रियों की हिस्सेदारी और हस्तक्षेप, आर्थिक आत्मनिर्भरता, टूटते-बनते नए नैतिक मापदंड और चौतरफा दबाव के कारण महानगरों के उच्च माध्यम और नवधनाढ्य वर्ग में कहीं कुछ-कुछ बदलता सा लगता है। लेकिन अभी भी अधिकांश मध्यवर्गीय परिवारों की मानसिक बनावट और बुनावट मध्ययुगीन परंपरा और संस्कारों की यथास्थिति बनाए हुए है।

‘बेघर’ की पीठ पर लिखा था/ है: ‘‘पति-पत्नी के शारीरिक संबंध को केंद्र में रखकर लिखा गया यह उपन्यास आधुनिक समाज में पुरुष की संस्कारबद्ध जड़ता और संदेह वृत्ति को उघाड़ता है। परमजीत अपनी नवविवाहित पत्नी संजीवनी के कुँआरेपन को पुरानी कसौटी पर रखता है और उसे लगता है कि वह ‘खरी’ नहीं है, अर्थात् उसके जीवन में वह ‘पहला’ पुरुष नहीं है। संजीवनी के प्रति परमजीत का यह संदेश कीड़े की तरह उसे स्वयं ही खोखला करने लगता है और यह तनाव उसे इस तरह जोड़ता (तोड़ता) है कि दोनों में संबंध-विच्छेद हो जाता है। लेकिन पत्नी संजीवनी के बाद परमजीत जिस दूसरी स्त्री से शादी करता है, वह उसे एक पुरजा बना डालती है, यहाँ तक कि उसकी निजता और पहचान सब कुछ समाप्त हो जाता है। वस्तुत: स्त्री के कुँआरेपन को लेकर समाज में रूढ़ धारणाएं हैं, वे न सिर्फ अवैज्ञानिक हैं बल्कि अमानवीय भी हैं।’’

(राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित पेपर बैंक संस्करण 1985) उपन्यास पढ़ने के बाद पता चला (चलेगा) कि संजीवनी परमजीत की ‘नवविवाहिता पत्नी’ नहीं प्रेमिका है, सो ‘संबंध-विच्छेद’ होने का प्रश्न ही नहीं है। परमजीत जिस ‘दूसरी स्त्री’ (रमा) से शादी करता है वह दरअसल उसकी पहली शादी ही है। स्त्री भले ही दूसरी (तीसरी....चौथी....या पाँचवीं हो)। यह सब कैसे और किसने किया – प्रकाशक या लेखिका ही जाने। अगले संस्करण में ‘भूल सुधार’ होने की उम्मीद तो की ही जा सकती है।
हिन्दी में ‘बेघर’, प्रथम उपन्यास है जो ‘कौमार्य के मिथक’ की पुरुष समाज में व्याप्त रूढ़ धारणाओं पर प्रश्नचिह्न लगा गहरी चोट करता है। यह उपन्यास मध्यवर्गीय समाज के मानसिक संस्कारों में शिक्षित-दीक्षित पुरुषों की परंपरागत सोच-समझ और स्त्री के प्रति भोगवादी, सामंती तथा अमानवीय व्यवहार के कारण ऐतिहासिक, धार्मिक और सामाजिक पृष्ठभूमि में घर से बेघर की जाती रही संजीवनियों की अंतहीन व्यथा कथा है, जिसे अपने ‘कथा समय’ में नायक, अनायक या प्रतिनायक परमजीत की ‘‘अचानक मौत के बाद ‘घर’ की सारी सुखद धारणाओं के बाद एक अनाथ ‘बेघर’ परंपरा का उत्तराधिकारी’’ माना गया है। (‘कथा समय,’ विजय मोहन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, संस्करण 1993, पृष्ठ 105) सवाल है कि ‘बेघर’ परंपरा का उत्तराधिकारी (या भार) किसे मिलता है ?

वरिष्ठ अलोचक विजयमोहन सिंह के अनुसार ‘बेघर’ का परमजीत ‘नायक’ नहीं है। अनायक भी नहीं है......बीमार, विकृत या संकीर्ण नहीं है – पूरे उपन्यास में उसकी ‘नार्मेलसी डॉमिनेंट’ रहती है....वह (तो) ‘‘परंपरागत मिथकों से परिचालित निर्णयों को ही जीता और भोगता है।’’ परमजीत ‘स्वस्थ, सहज और रुचि संपन्न’ है। उसका प्यार ‘लस्ट’ ‘फ्लर्टेशन’... और ‘अतिशय भी नहीं है। उनका प्रेम एक ‘वयस्क समझदारी’ और ‘टेंडरनेस’ के भीतर विकसित होता है।......लेकिन ‘‘उसका यह क्रमश: सघन बनता हुआ प्रेम टूट जाता है’’ क्योंकि ‘‘संजीवनी द्वारा ‘समर्पण’ के पहले मौके पर पाता है कि वह

संजीवनी के लिए ‘पहला’ नहीं है’’ और परिणामस्वरूप ‘कौमार्य का मिथक’ उसे संजीवनी से ‘विरक्त’ बना देता है। इसके बाद ‘‘बंबई की सजी संभ्रांत लड़कियों को देखकर उसे दहशत होती है, जैसे कपड़ों के पार वे कोई भयंकर भेद छुपाए हैं।’’
परमजीत के अवचेतन में ‘प्रेम’ और ‘घर’ एक सपना है और सपने में संजीवनी अश्लील यौन आकांक्षाओं की तृप्ति करती इच्छावस्तु। वह संजीवनी के साथ कभी ‘‘किसी कोने में सटकर बैठने’’ की बात करता है और कभी ‘‘घर तो रोज जाती हो,

न जाओ एक दिन’’ कहकर मन ही मन सुख टटोलता है। कहता है, ‘‘मैं वीकली नहीं ‘लाइफ’ और ‘प्लेब्वॉय’ पढ़ता हूँ।’’ पढ़ता नहीं ‘‘सिर्फ रेलवे स्टेशन पर पन्ने पलट लेता था।’’ हालाँकि ‘प्लेब्वॉय’ की भारत में बिक्री पर आरंभ से ही प्रतिबंध है। परमजीत संजीवनी में ‘प्लेब्वॉय’ की न्यूड मॉडल ही तलाशता रहता है, जो सजीव नारी देह बन एक दिन ‘‘रात में उसके कंबल के अंदर होगी।’’ मन में दबी कुत्सित इच्छाएँ कहती हैं कि ‘‘हमें इतना पास बैठना चाहिए कि मैं तुम्हें गोद में डाल तुम्हारे ऊपर हाथ फेर सकूँ कहीं भी।’’ लड़की ‘सहमत’ है और ‘उत्तेजित’ लड़के को किसी तरह टालती है। प्रेमिका सहज

स्वभाव में पूछती है ‘‘पर जाएँगे कहाँ ?’’ लेकिन पुरुष प्रेमी का एक ही लक्ष्य है ‘तुम्हारे में’। धीरे-धीरे सारी सीमाएँ लाँघ आवाज दबाकर कहता है, ‘’अकेले में, तुम्हारे तलवे सहलाकर, तुम्हारे बाल खोलकर, तुम्हारा ब्लाउज मसलकर तुम्हें एक ही पल में लड़की से औरत बना दूँगा, संजी।’’ लड़की ऐसी ‘उघड़ी बातें’ सुनकर ‘सिर से पैर तक काँप’ जाती है। काँपेगी ही क्योंकि ‘‘परमजीत ने अपनी बातें उसके कपड़ों के अंदर तक पहुँचा दी थीं।’’

परमजीत के उपरोक्त सपनों, सुझावों और संवादों को किसी भी दृष्टिकोण से ‘स्वस्थ, सहज और रुचि संपन्न’ पुरुष की प्रेमाभिव्यक्ति नहीं कहा जा सकता। यह स्त्री देह के आखेट पर निकले, किसी शिकारी का शतरंज ही हो सकती है और वस्तुत: है भी। इसके बावजूद परमजीत ‘‘बीमार....विकृत या संकीर्ण नहीं है’’ – तो क्या है ? उसका प्रेम ‘लस्ट’, ‘फ्लर्टेशन’ और ‘अतिशय’ भी नहीं है – तो क्या है ? क्या ऐसे ही प्रेम एक ‘वयस्क समझदारी’ और ‘टेंडरनेस’ के भीतर विकसित होता है ? अब भी अगर ‘हाँ’ है, तो कहना पड़ेगा कि ‘वयस्क समझदारी’ समाज और साहित्य के विवेक में अभी पैदा ही नहीं हुई - ‘विकसित’ कैसे होगा !

स्त्री देह पर विजय और सुख की कामना में परमजीत प्रेमजाल फैलाता है, चक्रव्यूह रचता है और छुट्टी के दिन संजीवनी को घेर अपने (मुर्दा घाट से) दफ्तर तक ले आता है। यहाँ से भागने या बच निकलने का शायद कोई रास्ता नहीं। चक्रव्यूह में फँसी संजीवनी को ‘जगह-जगह चूम’ उसके ‘होंठ काट’ कहता है, अब ‘‘बटन खोलने दो’’। इसके बाद विजयी भाव से सर्वाधिकार सुरक्षित होने की घोषणा करता है, ‘‘ये होंठ भी मेरे हैं, ठोढ़ी भी मेरी है....।’’ स्त्री देह पर पुरुष अपना मालिकाना हक ऐसे ही तो ‘रजिस्टर्ड’ करता है।

‘आग्रह,’ ‘गुस्सा’ और कभी न बोलने का ‘डर’ या छोड़ देने की धमकी के सामने स्त्री स्वयं ‘नर्वस’ या ‘निढ़ाल’ हो जाती है या प्रेम से अटूट विश्वास के हाथों छली जाती है। ‘प्लेब्वॉय’ के पन्ने पलटने वाला परमजीत ‘‘पर्त दर पर्त कपड़े उतरने (उतारने) पर ‘चमत्कृत’ होता’’ है। होता रहा है अब तक। ऐसे में संजीवनी का ‘संघर्ष’ क्या अर्थ रखता है ?

परमजीत (पुरुष) उसे ‘मसलकर’ रख देगा। संजीवनी द्वारा, ‘समर्पण’ के ऐसे विवश क्षणों में परमजीत को लगा ‘‘जैसे उसने गर्म मोम में अपने को डाल दिया है, वह उसमें फँसता गया।’’ और अगले ही क्षण ‘‘पहला न होने की निराशा के सन्नाटे के साथ-साथ उसे अपनी जिंदगी का सारा नक्शा मुचड़ा हुआ दिखाई दे रहा था।’’
अच्छा हुआ (या बुरा) ‘‘पहला न होने की निराशा’’ का बहाना मिल गया वरना घर, परिवार, प्रतिष्ठा, समाज और व्यक्तिगत विवशताओं के चोर दरवाजों से भागना पड़ता। ‘पहले न होने’ का मतलब ‘‘संजीवनी की उससे अलग एक व्यक्तिगत दुनिया रही होगी जिसका भागीदार कोई और रहा होगा।’’ या जिससे पहले कोई और पुरुष भोग चुका है – वह ‘जूठन’ है और ‘मैं जूठन क्यों खाऊँ’, या खाता रहूँ। निस्संदेह वह तो एक अनछुई कुँआरी कन्या के ‘भ्रम’ में यहाँ तक आ गया था - ‘विजय’ हासिल करने। उसे क्या पता था
कि कोई पहले ही उसे ‘खोज’ चुका है। अब ‘परास्त’ होकर कैसे लौटे ? और कैसे ऐसी ‘धोखेबाज लड़की’ के साथ शादी करके ‘घर’ बसाये ?

विवाह पूर्व देह संबंधों के बारे में अनेक शोध अनुभव बताते हैं। कि पुरुष कुँआरी लड़कियों से विवाह करना ही बेहतर मानते हैं। विवाह पूर्व देह संबंधों के बाद अधिकांश पुरुष अक्सर ‘एक और विजय’ पर ही निकल जाते हैं। यही नहीं ज्यादातर स्त्री-पुरुष (विशेषकर स्त्रियाँ) विवाह के बाद अपने प्रेम प्रसंगों का आपस में उल्लेख तक नहीं करते।

विवाह पूर्व प्रेम संबंधों की बात स्त्रियाँ भले ही अनसुनी कर दें, लेकिन पुरुष पत्नी की ‘गलती’ को ‘आसानी से माफ’ नहीं कर सकता या करता। इस संबंध में ‘प्री मैरिटल इंटरकोर्स एंड इंटर पर्सनल रिलेशनशिप्स’, (लेस्टर ए. किरकेन डेल, न्यूयार्क) एक उल्लेखनीय प्रामाणिक शोध प्रबंध कहा जा सकता है। कौमार्य के मिथक और उसकी भयावह मानसिक प्रतिक्रियाओं के बारे में सिमोन द बुइवार ने ‘सेकंड सेक्स’ में काफी विस्तार से विश्लेषण किया है।
व्यक्तिगत संपत्ति के उत्तराधिकार को पुरुष सत्ता द्वारा गढ़े कायदे-कानून के अनुसार बनाए-बचाए रखने के लिए कौमार्य, यौनशुचिता, वगैरह आवश्यक नैतिक मापदंड माना जाता रहा है। यह सिर्फ स्त्रियों के लिए एक ही जरूरी है – पुरुषों के लिए नहीं। यहाँ स्त्री इस नियम का उल्लंघन करती हैं वहाँ उसे फौरन घर से ‘बेघर’ कर दिया जाता है – यानी विवाह संस्था से बाहर। कुल्टा, वेश्या, कालगर्ल, जैसे नाम देकर उन्हें साँझी संपत्ति या उपभोग की वस्तु बना दिया जाता है।

या फिर ऐसी ‘प्रेम दीवानियों’ को उत्तर प्रेदश, बिहार, पंजाब और हरियाणा में गोली मार दी जाती है या टुकड़े-टुकड़े कर कुत्तों को खिला दिया जाता है या तंदूर में भून दिया जाता है। सेक्स और हिंसा के बीच गहरे अंत: संबंधों को समझने के लिए हत्या और आत्महत्या के पीछे छिपे अवैध यौन संबंधों को एक महत्त्वपूर्ण और प्रमुख कारण के रूप में देखना पड़ेगा। आश्चर्यजनक है कि अवैध संबंधों के कारण अस्सी प्रतिशत मामलों में प्रेमी/पति अपनी प्रेमिका/ पत्नी की हत्या कर देते हैं।

खुद आत्महत्या करने से पहले पुरुष पत्नी और बच्चों को मार डालते हैं ताकि कोई और उसकी सम्पत्ति का उपयोग/उपभोग न कर सके। ‘‘वेन मैन किल : सिनिरियो आफ मैसक्यूलिन वायलेंस - 1994’’ – इस संदर्भ में बेहद रोचक और गंभीर समाजशास्त्रीय अध्ययन है।
संजीवनी को ‘कुछ भी कहने का मौका’ दिए बिना ‘विरक्त’ हो परमजीत अपने घर चला गया। फिर मिलने की कोई वजह भी शेष नहीं बची थी उसके लिए। दूसरी स्त्री (रमा) से शादी करता है। सुहागरात के बाद ‘‘सुबह सीधी-सादी कुँआरी लड़कियों की तरह उसने रात काफी तकलीफ बर्दाश्त की थी।’’ मान लो, यह दूसरी स्त्री भी कुँआरी न होती तो परमजीत क्या करता ? क्या कर लेता – इस आधार पर तो तालाक होता नहीं।
शादी की है, सो संजीवनी की तरह छोड़ कर भाग भी नहीं सकता। खैर...आखिर परमजीत को कुँआरी लड़की मिल ही गई, भले ही उसकी पत्नी के लिए वह कितना खेला खाया क्यों न हो। इसके बाद परमजीत, घर, नौकरी, बच्चे, टीवी, फ्रिज, एअरकंडीशनर, सिग्रेट, शराब और फिर एक दिन ‘हार्ट अटैक’ के साथ रामनाम सत्। मरने तक उसे ‘संजीवनी को खो देने का अफसोस नहीं था।’
दूसरी ओर संजीवनी खुद ‘अपराध बोध’ से शायद कभी मुक्त नहीं हो पाई। वह बार-बार झुँझलाती, बड़बड़ाती और उसकी नफरत भरी याद में विपिन आ खड़ा होता जो ‘उसकी दुनिया खत्म कर’ मारिशस जाकर बैठ गया। वह इस ‘दुर्घटना’ को याद करके पीली पड़ जाती। वह सोचती रही कि कल परमजीत को यह सब कह देगी ‘‘उसे समझना ही होगा कि संजीवनी के लिए यह पहला ही अनुभव था’’ उसके ऊपर ‘आकस्मिक आक्रमण’ हुआ था। वह विपिन के साथ ‘एकांत कमरे में’ नहीं थी, उसने रेस्तरां के केबिन में ही उसे जबरन दबोच लिया था और ‘खड़े-खड़े ही दुर्व्यवहार’ किया था। वह कह भी देती तो क्या परमजीत विश्वास करता, संजीवनी की नजर में यह ‘अप्रिय व छोटी-सी दुर्घटना’ हो सकती है
लेकिन परमजीत (पुरुष) के लिए तो सदियों से स्थापित धार्मिक, सामाजिक, पारिवारिक और नैतिक व्यवस्था और पुरुष सत्ता द्वारा निर्धारित कानून मर्यादी का ‘उल्लंघन’ है जिसे अनदेखा कर ‘क्षमा’ नहीं किया जा सकता। अंतत: संजीवनी भीड़ में गुम चेहरा नहीं, सिर्फ पीठ से पहचानी जाती है और ‘पहचान में भूल’ नहीं हो सकती। परमजीत जो एक ‘आदर्श पति’ है, की स्मृति में संजीवनी नाम की स्त्री नहीं....व्यक्ति नहीं, सिर्फ ‘होठों पर उसकी नर्म त्वचा का स्वाद’, ‘रेशमी बालों का स्पर्श’ और एक हिंसक यौन इच्छा शेष है जिसमें वह उसे ‘‘दाँतों से काट-काट कर लहूलुहान कर इस कदर प्यार (?) करे कि वह नाजुक सी लड़की बेहोश हो जाए।’’
‘बेघर’ में संजीवनी चुपचाप खून के घूँट पीकर रह जाती है क्योंकि महानगरों में भी उस समय कौमार्य के मिथक से औरत इतनी मुक्त नहीं हुई थी, जितनी आज दिखाई देती हैं। तब नैतिक मर्यादा तोड़ना और तोड़ कर स्वीकार करना ही असंभव था। धीरे-धीरे बाद में विवाह के वायदे पर देह संबंध बनाती लड़कियों के साथ लड़कों ने विश्वासघात किया, तो वे चुप रहने की अपेक्षा उन्हें अदालत तक खींच ले गईं। मान-सम्मान की कीमत पर, इस प्रतिरोध का भले ही कोई न्यायपूर्ण हल न मिला हो लेकिन बदनामी के भय से मुक्त होने की कोशिश तो की। समय के साथ-साथ संजीवनी और ‘श्वेता लोढ़ा’ की

मानसिक गुलामी कम हो रही है। श्वेता लोढ़ा बनाम राजकुमार (1991) के मामले में राजकुमार ने श्वेता से बिना विवाह किए ही दहेज संबंध स्थापित किया। श्वेता गर्भवती हो गई। राजकुमार ने दूसरी स्त्री से विवाह कर घर बसा लिया। इस पर श्वेता ने राजकुमार पर बलात्कार का मुकदमा दायर किया और प्रमाण के लिए राजकुमार और उससे उत्पन्न पुत्र के डीएनए टेस्ट की माँग की।
इस मुकदमें में राजस्थान उच्च न्यायालय ने न्यायमूर्ति ने अपने निर्णय में लिखा, ‘‘श्वेता में एक वह माँ नहीं बोल रही जो बच्चे के किसी कानूनी अधिकार के लिए उसके माता-पिता को निर्धारण करवाना चाहती है। यह एक स्त्री के प्रतिरोध का परिणाम है, जो वह राजकुमार के खिलाफ ले रही है, जिसने उसका कौमार्य, अस्मिता और पवित्रता भंग करने के बाद किसी दूसरी स्त्री से शादी कर ली है।’’ न्याय और कानून की व्याख्या अभी भी मर्दवादी ढाँचे में पूर्वाग्रहों और मनुवाद से आतंकित है।
पश्चिम का इतिहास गवाही देता है कि यौन क्रांति एक सीमा तक ही स्त्री मुक्ति का संबल बन पाई। गर्भ निरोधक गोलियों से लेकर ‘एड्स’ तक की यात्रा में नारी की आजादी का मतलब मर्दों को पहले से अधिक आजादी और फायदे में निकला। एक तरफ स्त्रियों को उनकी देह का स्वयं मालिक बताकर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के ब्रांड बेचने के लिए नग्न-अर्धनग्न ‘मॉडल’ में बदला जा रहा है, मगर दूसरी तरफ घर में पत्नी, माँ, बहू, बेटी के लिए वही सदियों पुरानी नैतिक मर्यादा, यौन शुचिता और पतिव्रत के कड़े नियम लागू हैं। इन दोनों अंतर्विरोधी और जटिल स्थितियों में नारी अस्मिता और मुक्ति से प्रश्न अधिक पेचादी और घातक सिद्ध हो रहे हैं। कौमार्य बचाए रखने के लिए घर में कैद होकर रहें या घर सा बाहर निकलने की

कामना हो तो निरंतर बलात्कार का भय झेलती रहें ? सती-सावित्री बने रहना है तो ‘चेस्टिटी बेल्ट’ या बुर्का पहने रहो। यौन स्वतंत्रता चाहिए तो ‘खतरनाक औरत’ होने-कहलाने की हिम्मत तो बटोरनी ही पड़ेगी। ‘घर’ और ‘बेघर’ के बीच चुनाव अभी भी संजीवनी को ही करना है। ‘घर’ का सुख-सुरग चाहिए या ‘बेघर’ होने की सजा – फैसला खुद कर लें.....सुन रही हो संजीवनी....श्वेता.....!!!
तसलीमा नसरीन के शब्दों में, ‘‘मैं तो ऐसे ‘प्रगतिशील’ पुरुषों को भी जानती हूँ, जिन्होंने अपनी सुहागरात में सफेद चादर का प्रयाग किया, ताकि कौमार्य के संदर्भ में संतुष्ट हो सकें। अगर उन्होंने यह देखा कि चादर पर खून नहीं था, तो उन्होंने अपनी पत्नियों के चरित्र पर प्रश्न चिह्न लगा दिया।’’ कौमार्य भंग होने का अर्थ ‘जीवन बरबाद’ होना बताते-सिखाते उपन्यास, कथा-कहानी और फिल्में इतनी हैं कि यहाँ उल्लेख संभव नहीं कौमार्य बचाए रखने की सीख सचमुच स्त्री को घर में कैद और परंपरागत परिवार और विवाह संस्था में स्त्री पर पुरुष का एकाधिकार बनाए-बचाए रखने के लिए ही दी जाती है। सीख, आदेश या उपदेश का वास्तविक उद्देश्य स्त्री को निरंतर बरबाद होने का भय दिखाते रहना ही है।

यही कारण है कि प्रभा खेतान के आत्मकथात्मक उपन्यास ‘छिन्नमस्ता’ की नायिका प्रिया कहती है, ‘‘बस, एक लालबत्ती बार-बार जल रही थी। कहीं वह मुझसे मेरा अतीत न पूछ ले। मैं अब कुँआरी नहीं। सुहागरात के दिन उसे जरूर पता लग जाएगा। पर क्या अच्छा नहीं हो कि मैं उससे सब बातें साफ-साफ बता दूँ ? लेकिन इस बात पर वह मुझे छोड़ दे तब ? मैं कहाँ जाऊँगी ?’’
यह अपराध बोध और भय की मानसिक ग्रंथियाँ स्त्री मन में इसलिए भी अधिक गहरी हैं कि बचपन से उन्हें यह कहा जाता है कि उन्हें दूसरे घर जाना है यानी पिता का घर उसका घर नहीं है और जिस दूसरे घर जाना है वह घर कौन सा, कैसा और कहाँ होगा, उसे मालूम नहीं। यह बात उसे कितना असुरक्षित कर देती है ? इसका सिर्फ अनुमान ही लगाया जा सकता है।
मौजूदा सामाजिक व्यवस्था में ‘कौमार्य भंग’ होना (चाहे बलात्कार के कारण ही क्यों न हो) स्त्री के लिए उसके भविष्य में आग लगने जैसा है, हालाँकि इसमें उसका कोई दोष नहीं होता। अधिकांशत: बलात्कार के मामले इसलिए घर के आँगन में दफना दिए जाते हैं कि परिवार की प्रतिष्ठा का क्या होगा ? कौन करेगा ऐसी लड़की से विवाह ? सगाई टूट जाएगी या पति छोड़ देगा तो वह कहाँ जाएगी ? पिता, माँ, भाई, रिश्तेदार, सब लड़की को ‘चुप’ रहने की ही सलाह (दबाव) देते हैं। क्यों ?
चित्रा मुद्गल की ‘प्रेतयोनि’, कमला चमोला की ‘अंधेरी सुरंग का मुहाना’ और विमांशु दिव्याल की कहानी ‘गंडासा’ की नायिका बलात्कार की शिकार होती हैं। परिवार ‘चुप्प’ रहने की सलाह और हर संभव भय, दबाव दिखाते हैं। तीनों कहानियों में सगाई का ‘खतरा’ ही परिवार की मूल चिंता का विषय है।


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