लोगों की राय

कहानी संग्रह >> रैनबसेरा

रैनबसेरा

अब्दुल बिस्मिल्लाह

प्रकाशक : वाणी प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2001
पृष्ठ :171
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 3073
आईएसबीएन :81-7055-173-0

Like this Hindi book 7 पाठकों को प्रिय

339 पाठक हैं

प्रेम, साम्प्रदायिकता और संघर्ष की कहानियों का संग्रह...

Rainbasera

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश


ये कहानियाँ भारतीय मानसिकता को बहुत दूर-दूर तक व्याख्यायित करने वाली कृतियाँ हैं जिनमें प्रेम, साम्प्रदायिकता और संघर्ष—सब कुछ समाया हुआ है और अब्दुल बिस्मिलाह के पात्र लगातार उनसे जूझ रहे है। इस जद्दोजहद में अब्दुल बिस्मिलाह खुद भी शामिल हैं—अपने खरे प्रगतिशील जीवन-मूल्यों के साथ। शायद इसीलिए इन कहानियों को पढ़ने का मतलब है अपने समय और अपने समाज की अन्तर्गाधा को पढ़ना।

पगला राजा

एक गाँव है पांडेपुर। नाम से तो ऐसा लगता है कि इस गाँव के निवासी सब ब्राह्मण ही होंगे, लेकिन ऐसा नहीं है। भिन्न-भिन्न जातियों के लोग यहाँ रहते हैं और अपने-अपने तरीके से जीवन यापन करने के लिए स्वतंत्र हैं।
इस गाँव की अपनी एक गरिमा है, अपना एक महत्त्व है। किसी-न-किसी रूप में यह गाँव इतिहास से भी जुड़ा हुआ है और सांस्कृतिक धरोहरों से भी। इस गाँव में अनेकानेक रईस भी पैदा हुए और संत भी। दूर-दूर तक इस गाँव की महिमा बखानी जाती है और यहाँ के लोगों को इस बात का गर्व भी है।

परन्तु दुर्भाग्य से इस गाँव का एक आदमी पागल हो गया है। नाम है भुल्लन ! पेशे से बढ़ई। लकड़ी के काम में माहिर। अपने पागलपन में भी वह जितना खूबसूरत हल बना सकता है, दूसरा बढ़ाई नहीं बना सकता।
घर में उसके पत्नी है, बेटे हैं, बेटियाँ हैं, एक बकरी है और द्वार पर एक कुत्ता है। कपड़े तो वह ढंग के नहीं पहनता, पर सिर पर पगड़ी जरूर रहती है। आदमी वह सीधा-सादा है, उदार है, लेकिन कभी-कभी ऐसी हरकतें करता है कि लोग उसे पागल समझते हैं।

इन हरकतों का सिलसिला कब आरम्भ हुआ, कहा नहीं जा सकता। फिर भी, लोगों को इतना मालूम है कि भुल्लन के व्यवहार में बुनियादी परिवर्तन बहुत पहले ही दिखाई पड़ने लगा था। इसी सदी का शायद वह मध्यकाल था। चारों ओर किसी उत्सव-सा वातावरण बना हुआ था और लोग जरूरत से कुछ ज्यादा ही खुश नजर आ रहे थे। लेकिन भुल्लन चूँकि जरूरत से कुछ ज्यादा ही सीधा-सादा है इसलिए वह सारा तामझम उसकी समझ में नहीं आ रहा था।
सुबह का वक्त था। सूरज उग रहा था। मंद-मंद हवा में कुएँ के पास वाला नीम लहरा रहा था। धरती से मीठी-मीठी खुशबू उठकर आसपास के खेतों में बड़ी ठसक के साथ उड़ रही थी। ऐसी सुहानी वेला में भुल्लन अपनी दहलीज पर गुम-सुम बैठा आकाश के धब्बों को देख रहा था और पांडेपुर में मची हुई हलचलों के सम्बन्ध में सोच रहा था कि आखिर इसका नतीजा क्या निकलेगा ? तभी कुछ लोग आकर उसके सामने खड़े हो गए थे। वे लोग सफेद-झक कपड़े पहने हुए थे और किसी नये युग के दूत के समान प्रतीत हो रहे थे।

भुल्लन ने आकाश के धब्बों को देखना बन्द कर दिया था और उठकर खड़ा हो गया था। उसके हाथ अपने आप ही जुड गए थे।
‘‘तुम उदास क्यों हो भुल्लन ?’’
उनमें से एक दूत ने यह बात कही तो भुल्लन थोड़ा चौंक गया। ये तो अपने रघुनाथ बाबा हैं। ये दूत कब से हो गए ? उसके मन ने यह सवाल करने की कोशिश की, पर जवाब के लिए भुल्लन के पास वक्त नहीं था। उस वक्त उसके मुँह में स्वयं एक सवाल फिसल रहा था।
‘‘यह चहल-पहल क्यों है बाबा ?
रघुनाथ बाबा मुस्कराए।

‘‘तुम्हें नहीं मालूम ? आश्चर्य है ! तुम्हारे ही कारण यह जश्न हो रहा है और तुम्हीं को कुछ पता नहीं है !’’
भुल्लन की अक्ल पंचर हो गयी। यह तो सास्तर वाली बात लगती है। जो समझ में न आये वही तो शास्त्र है।
‘‘बाबा, तनिक फिर से समझाइये।’’
भुल्लन ने माथे पर अपनी हथेली इस प्रकार रख ली मानो उगते हुए सूर्य का ताप भी अचानक तीव्र हो उठा हो।
‘‘तुम्हारी समझ में नहीं आया भुल्लन !’’

भुल्लन ने माथे से हथेली हटा ली। सिर हिला दिया।
‘‘अरे भाई, तुम राजा हो गए हो। यह राज्य अब तुम्हारा है, इस पर अब किसी दूसरे का अधिकार नहीं रहा।’’
भुल्लन की अक्ल इस बार ‘भस्ट’ हो गयी। और भुल्लन पागल हो गया। उसके दिमाग में पता नहीं कहाँ से यह वहम पैदा हो गया कि वह राजा है। कुछ लोग कहते हैं, चूँकि उसका बड़ा बेटा असमय में ही चल बसा इसलिए उसका दिमाग फिर गया और कुछ लोगों का विचार है कि उसकी बड़ी लड़की मेले में गायब हो गयी इसलिए वह पागल हो गया। लेकिन यह किसी को नहीं मालूम है कि भुल्लन की बीघा भर जमीन को जब ठाकुर हरबंससिंह ने अपने खेत के साथ मिला लिया तो रघुनाथ बाबा के उस कानून ने उसकी कोई सहायता नहीं की जिसकी रोशनी में भुल्लन को समझाया गया था कि अब इस धरती पर उसका राज्य आने वाला है। और अपनी जमीन की मेंड़ पर खड़े होकर जिस रोज पहली बार भुल्लन ने मुँह में फेन भर आने की हद तक अपना भाषण दिया था उस रोज उसके मुँह से जो अन्तिम बात निकली थी, वह कुछ इस प्रकार थी-

‘‘ठाकुर हरबंससिंह को समझ लेना चाहिए कि भुल्लन से झगड़ा मोल लेना हँसी-खेल नहीं है। अब इस धरती पर अंग्रेजों का नहीं भुल्लन का राज्य है। भुल्लन यहाँ का राजा है। राजा से मोंछ फँसाने की कीमत ठाकुर साहब को चुकानी ही पड़ेगी।’’
और भीड़ के होंठों पर हँसी की एक गहरी लकीर उभर आयी थी। भुल्लन ने उस लकीर को देखा था और आँखों में उसकी नोक को झेलता हुआ गायक हो गया था।
तब से उसकी चाल-ढाल में एक खास किस्म का बदलाव दिखाई पड़ने लगा है। सबसे बड़ा परिवर्तन तो यही देखा लोगों ने कि भुल्लन के सिर से अब एक क्षण के लिए भी पगड़ी उतरती है। पगड़ी को वह शाही सिम्बल समझता है और डरता है कि उसे उतारते ही कहीं वह पुनः न प्रजा में बदल जाए। यही कारण है कि कुर्ता वह भले ही न पहने धोती उसकी भले ही तार-तार हो जाए; लेकिन पगड़ी को कोई आँच नहीं आने पाती।

फिर भी, काम में उसके कोई अन्तर नहीं आया। चारपाई से लेकर हल बनाने तक का सारा काम वह उसी लगन से करता है जैसे पहले किया करता था। अब भी उसका बसूला उसी तेजी से चलता है और रंदे में वही गुण अब भी विद्यमान है। लेकिन स्वभाव चूँकि शाही हो गया है, इसलिए मेहनत करके भी भूखों मरता है।
एक दिन, गाँव के बहुत बड़े रईस श्री मातादीन शुक्ल ने भुल्लन से अपनी पलँग ठीक करायी और शाम को मजूरी देते वक्त मुस्कराते हुए कहा, ‘‘महाराज, हम गरीबों पर दया कीजिए, दो-चार रुपयों से आपका तो कुछ बिगड़ नहीं जाएगा।
और भुल्लन अपनी पगड़ी को सँभालता हुआ घर आ गया। चेहरे पर एक विचित्र प्रकार का संतोष तैर रहा था उस रोज !
तब से पूरे पांडेपुर में यह बात प्रसिद्ध हो गयी है कि भुलना राजा आदमी है एकदम शाही तबीयत का। और तभी से भुल्लन प्रजा की तरह काम करता है और मजूरी छोड़कर राजा की तरह घर चला आता है।

उसके बेटों को यह बात अच्छी नहीं लगती, लेकिन भुल्लन का विरोध करना आसान नहीं है। हालाँकि उन्हें पता है कि राज्य भुल्लन का नहीं, रघुनाथ बाबा और ठाकुर हरबंससिंह का आया है। सिंहासन वही है, सिर्फ गद्दी बदल गयी है। आसन पर तो सिंह ही बैठे हुए हैं अब भी। लेकिन भूल्लन के वहम का कोई इलाज नहीं है।

एक बार तो भुल्लन ने एक आश्चर्य काम किया। किसी ने उससे कह दिया, ‘‘भुल्लन यह कैसा अंधेर है ? राजा तो तुम हो और गद्दी पर करोड़ीमल जी बैठे हैं। कभी अपनी राजधानी की भी खबर ले आओ।’’ बस क्या था, उसने करोड़ीमल जी के खिलाफ एक दरख्वास्त लिखवायी, यह राज्य मैंने करोड़ीमल जी को इसलिए दिया कि वे इसकी व्यवस्था करेंगे, प्रजा की भलाई में लगे रहेंगे, राज्य में स्वतन्त्रता को बरकरार रखेंगे और प्रजा के अधिकारों की रक्षा पूरी निष्ठा के साथ करेंगे, लोगों के लिए भोजन-वस्त्र एवं घर की समुचित व्यवस्था करेंगे तथा राज्य में धर्म निरपेक्षता की भावना का विकास करेंगे। परन्तु करोड़ीमल जी ने सारी शर्तें भुला दी हैं। वे राजमद में चूर हैं और राज्य का कार्य भार उनके वश से बाहर हो गया है। अतः उन्हें आदेश दिया जाय कि वे मेरा राज्य मुझे वापस कर दें।’’

इस दरख्वास्त की चर्चा बहुत दिनों तक रही पांडेपुर में और भुल्लन से इस सम्बन्ध में अनेक प्रकार की बातें करके नवयुवकों ने अपना खूब मनोरंजन किया। पर गाँव के समझदार लोग उससे आतंकित हो गये। हालाँकि आतंक कोई कारण नहीं था। भुल्लन के बारे में यह आम राय थी कि वह पागल होते हुए भी बेहद सिनसियर और सीरियस है। अल्पशिक्षित होते हुए भी मूर्ख नहीं है और चीजों को बारीकी से पकड़ने में कुशल है।

जिन दिनों भुल्लन के दिमाग को लेकर पांडेपुर में विवादास्पद बातें चल रही थीं उन्हीं दिनों की बात है कि गाँव के दो पक्षों में संघर्ष हो गया। दरअसल संघर्ष तो सदा ही तो पंक्षों में होता है-चाहे वह गाँव का संघर्ष का हो या देश का, लेकिन उसका महत्त्व तब काफी बढ़ जाता है जब वह सेवा के लिए किया जाता है। पहले अनार एक होता था, बीमार सौ होते थे, अब बीमार तो एक ही है, अनार सौ हो गये हैं। और हर अनार का दावा है कि रोगी का एक मात्र इलाज वही है। यह एक समस्या है इस युग की ! इस धरती की !

पांडेपुर को भी पिछले दिनों इसी समस्या से दो-चार होना पड़ा। दरअसल गाँव में ग्राम विकास समिति नामक एक संस्था की स्थापना हुई और यह संविधान बना कि गाँव के कुछ खास लोग गाँव का विकास करेंगे और गाँव की समस्याओं का अध्ययन करके उन्हें दूर करने का प्रयास करेंगे। विचार तो अच्छा ही था, लेकिन उन खास लोगों के दो दल बन गये और हर दल यह चाहने लगा कि सेवा का अवसर उसी दल को मिलना चाहिये। हर दल का दावा था कि गाँव का समुचित विकास केवल वही दल कर सकता है। गाँव की समस्याओं का अध्ययन एवं निवारण करने में केवल वही दल सक्षम है और वही एक दल ऐसा है जिसमें साहस से लेकर ईमानदारी तक सारे गुण मौजूद हैं।


प्रथम पृष्ठ

अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book

A PHP Error was encountered

Severity: Notice

Message: Undefined index: mxx

Filename: partials/footer.php

Line Number: 7

hellothai