निष्कासन - दूधनाथ सिंह Niskasan - Hindi book by - Doodhnath Singh
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निष्कासन

दूधनाथ सिंह

प्रकाशक : राधाकृष्ण प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2002
पृष्ठ :143
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 3261
आईएसबीएन :8171197396

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प्रस्तुत है श्रेष्ठतम उपन्यास...

Nishkashan

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

 

....‘दायें से देखना ठीक नहीं।’ गुरु जी ने कहा।
‘और अगर दाँयें गड्ढ़ा-गुड्ढ़ी हो तो गुरु जी ?’
‘तो ज़्यादा बाँयें झुक जाओ।’ गुरु जी बोले।
‘और अगर उधर भी हो तो ?’
‘तो आगे-पीछे हो जाओ।’
‘और अगर आगे-पीछे भी हो तो ?’
‘तो सवाल यह होगा कि तुम उस सुरक्षित, विचारहीन जगह पर पहुँचे कैसे ?’ गुरुजी ने कहा। ‘यही तो मेरी भी समझ में नहीं आता गुरु जी !’

 !...‘मान लीजिए आपकी बेटी है तब ? मुफ़्ती की बेटी थी तब ? तब तो सारा प्रशासन सिर के बल खड़ा हो गया था ! अपहरण और आपूर्ति में ज़्यादा फर्क नहीं है पंडित जी ! दोनों में अनिच्छित शोषण है। दोनों में हिंसा है। दोनों में बल-प्रयोग है-सिर्फ उसके तरीके में अन्तर है। दोनों में फिरौती है-एक में प्रत्यक्ष, दूसरे में परोक्ष। आप क्या समझते हैं, जो देवी जी वहाँ प्रतिष्ठित पद पर आसीन हैं और इस कुकर्म में लिप्त हैं उनका कोई निहित स्वार्थ नहीं होगा ? सिर्फ एक घिनौने मजे के लिए वे ऐसा करती होंगी ?..लेकिन नहीं, किसी खटिक की बेटी होने का क्या मतलब ? उसे नरक में डालो और हँसो। या उसे आपकी तरह ‘अन्य मामलों’ के घूरे पर डालकर रफ़ा-दफ़ा कर दो।’ महामहिम खाँसने लगे।’

कटुए, क्रिश्चियन और कम्युनिस्ट, तीनों देशद्रोही हैं-अन्ततः यह उनका और उनकी पार्टी का खुला-छिपा राजनैतिक नारा है।

‘यह कम्युनिस्टों की साजिश है सर ! कुलपति ने कहा। महामहिम ने पीछे खड़े अपने प्रमुख सचिव को देखा, जैसे कह रहे हों, उस दिन लॉन में टहलते हुए मैंने आपको बेकार ही डाँटा था।

‘ये फ़ाइल है सर ! कुलपति ने फाइल प्रमुख सचिव की ओर बढ़ायी। ‘नहीं’ उसकी अब कोई जरूरत नहीं।’ महामहिम ने हाथ के इशारे से मना किया।
...जो कुछ असुन्दर है, अभद्र है, मनुष्यता से रहित है, वह उसके लिए (साहित्यकार के लिए) असहय हो जाता है। उस पर शब्दों और भावों की सारी शक्ति से वार किया करता है।....जो दलित है, पीड़त है, वंचित है- चाहे वह व्यक्ति हो या समूह-उसकी हिमायत और वकालत करना उसका फ़र्ज है।


प्रेमचंद

 

 

(1)

 

 

उस लड़की से क्षमा याचना सहित जिसकी यह कहानी है।
फ़िलहाल उस लड़की को आप यहाँ देखिए-एक बड़े से पुराने, आलीशान बँगले के सजे-सजाये रसोईघर में, जिसे आजकल ‘किचेन’ कहते हैं। कुछ अटपटे ढंग से वह किचेन में खड़ी है। साथ में दो नौकरानियाँ भी हैं। अधिक्षिका यानि की ‘मैम’ उनमें से एक को ‘खानसामिन’ बुलाती हैं और दूसरी को ‘माई’। तो खानसामिन और माई, दोनों उस लड़की को डबडाबाई आँखों से देख रही हैं। इसके बावजूद माई की आँखें निर्विकार हैं, मानो ऐसे दृश्यों की वह आदी हो चुकी हो-निर्विकार, उदास और सुन्न। लेकिन खानसामिन किचेन से उस बड़े सजे-सजाये ड्राइंग रूम को जोड़ने वाले लम्बे गलियारे के उस छोर पर चुन्नटदार पर्दे को देखती हुई, अपना होंठ मोड़ कर उजले दाँत निपोरती है, जैसे चिढ़ी हुई बंदरिया निपोरती है। बीच-बीच में कुछ भुनभुनाती है।

दोनों औरतें खटर-पटर करती हुई प्लेटें सजा रही हैं- सलाद और भुने हुए मेवे, तली हुई कलेजी और अवन में मसाला लपेट कर पकाई हुई मुर्गें के टाँग। दोनों औरतों से बार-बार गलती हो जा रही है। कभी इधर की चम्मच उधर, कभी छुरी-काँटा ग़लत, कभी पानी की बोतल और इसी तरह कुछ।  लेकिन लड़की सिटपिटाई हुई खड़ी है। उसने बहुत हल्की चिकनी शिफ़ॉन की साड़ी और रंग मिला कर ब्लाउज़ पहना हुआ है, जो आज के पहले उसने कभी नहीं पहना। उसका चेहरा बड़े सलीके से रँगा-चुना है, बालों को खींच कर चिपका कर एक मोटी-लाँबी चोटी की गयी है जो कमर तक लटक रही है। लड़की के चेहरे और बालों में अजब-सा खिंचाव महसूस हो रहा है। खड़े-खड़े अचानक उसे लगता है कि अभी कोई उसकी चुटिया पकड़ कर खींच रहा है और नीचे गिरा देगा। वह अपने गालों या ललाट या चेहरे पर कहीं भी हाथ नहीं फेर सकती। आँखों के कोयों को छूना या खुजलाना मना है क्योंकि दोनों और तीर की तरह काजल की रेखा खिंची है। जबड़े फैलाना, ऐंठना-मैठना या उबासी लेना मना है। इससे चेहरे की लीपापोती चिर सकती है। अभी हल्का खुशनुमा जाड़ा शुरू हुआ है। मैम इस खुशगवार मौसम के संयोग पर खुश हैं क्योंकि लड़की को पुलोवर नहीं पहनाना पड़ेगा और उसका तन अपने पूरे मौसम के साथ मेहमान के सामने खुलेगा।

 

2

 

 

लड़की के पीस इतनी मँहगी साड़ियाँ या वैभव के गमकते प्रसाधन नहीं हैं।
दो-चार घिसी हुई सूती साड़ियाँ हैं। नयी और फ़्रेश सिर्फ़ एक है, बाकी उसकी बड़ी बहन की उतरन हैं। लड़की कभी-कभार पहनती भी है तो उन्हीं साड़ियों को। ब्लाउज़ भी बहन के उतरन हैं। एक बार अपनी सहेली के साथ सिनेमा जाने के लिए उसने साड़ी पहनी तो रिक्शे पर बैठते ही ब्लाउज़ का एक हुक् टूट गया। वह रास्ते भर सिकुड़ी बैठी रही और सिनेमा घर में भी। बड़ी बहन उसको देखती है तो ख़ुश होती है। वह सोचती है चलो, छोटी बहन मेरी तरह सुखंड़ी नहीं है और उसे कोई-न-कोई पसन्द कर लेगा। बहरहाल, लड़की अपनी बड़ी बहन के इस सोच को याद करके उस दिन तब तक उदास रही, जब तक वह हॉस्टल नहीं लौटी और उस टूटे हुक् वाले ब्लाउज़ को उतार नहीं दिया। उतारने के बाद उसे अपनी गोलाइयों और अर्धचंद्रांगों से बड़ी कोफ़्त हुई, जब कि हॉस्टल के कमरों, लम्बें चौड़े बरामदों में अक्सर इनका खेल करती हुई लड़कियाँ इतराती फिरती हैं। अक्सर ये अंग व्यसन की हद की व्याख्या, अफ़वाह और खिलखिलाहटों के विषय होते हैं।

 लेकिन लड़की कातर-भाव से सुबकती हुई उस रात बिस्तर में गिर गयी। उसकी बड़ी बहन इस दुनिया के विरक्त, अपने घर, बाप से दूर गोपेश्वर में अध्यापिका है और घर के अलावा अपनी इस छोटी बहन को पढ़ाई का ख़र्चा  भी भेजती है। लड़की को एक ही सुकून है कि चलो, गोपेश्वर में बड़ी बहन के कपड़ों की इतनी तहें होगी कि उसका उकठाहुआपन ढँका रहता होगा। आप समझ सकते है कि यह सकून कितने बेतुके ढंग से हृदय-द्रावक है।
लेकिन यह लड़की तो बिलल्ली है। घिसा-पिटा सलवार-कुर्ता पहन कर, खुले बाल और सूखे-मुरझाये होठों पर जबान फेरती, इधर-उधर फिरती रहती है। उसे अपने तन की फ़िकर नहीं। माँ-बाप और एक भाई, जो संयोग से हलद्वानी में पान-पाँडे है, और बहन, जो हाईकोर्ट से स्थगन-आदेश ले कर किसी तरह नौकरी से चिपकी है- लड़की को उन सबकी फ़िकर है। पढ़ाई की है

. बाप, जो ठेले पर सब्जियाँ सजाये मुहल्ले-मुहल्ले बेचता है, उसके दमे की फ़िकर है। जब वह हाँफ़ते-हाँफ़ते बेदम हो जाता है तो माँ ठेला ले जाती है। अक्सर बासी सब्ज़ियाँ लोग उलट-पलट कर नकार देते हैं। फिर घाटा उठाना पड़ता है। बड़ी बहन पढ़ने में ज़हीन थी। ऐडमिशन हुआ, सुरक्षित कोटे से हॉस्टल में जगह मिली तो ख़र्च का सावाल उठा। भाई ने कहा, मैं उठाता हूँ, बाप ने कहा, मैं उठाता हूँ लेकिन कुल जोड़-जोड़कर फिर भी कमती पड़ता था। बहन ने मेस में एक वक्त खाने का फ़ैसला किया और लाचारीपूर्वक अपने प्रण पर अटल रही। हरी-भरी आई थी और उकठ गयी। लड़कियाँ खिलखिलाती हुई कहतीं ‘कुछ है ही नहीं, किसलिए लड़की है ?’ तीन साल बाद छोटी बहन, यानी हमारी कहानी की लड़की भी आई और अतिथि छात्रा के रूप में अपनी बहन के कमरे में चिपक गयी। हॉस्टल के अधिकांश कमरों में एक-एक, दो-दो, अतिथ छात्राएँ चिपकी हुई हैं। डार्मेटरी में तो बीसियों उनकी खटियों के बीच निकलने की जगह नहीं है। सभी लड़कियाँ या तो अपने पायताने या सिरहाने चप्पलें उतारकर बिस्तर में घुसती हैं।

स्नानघर और संडास के लिए सुबह-सुबह लम्बी लाइन लगती हैं। लड़कियाँ अक्सर नाक दबाए खड़ी रहती हैं। कई बार एक दूसरे की चिचौरी करती हैं। बहरहाल....तो ये चिपकी हुई सारी लड़कियाँ ग़ैरकानूनी संवासिनियाँ हैं अक्सर यूनीवर्सिटी द्वारा ‘छापा’ घोषित होता है इस ‘छापे’ या ‘हमले’ की ख़बर, बक़ायदा अख़बारों के ‘यूनीवर्सिटी कॉलम में छपा दी जाती है। चिपकी हुई लड़कियाँ हँसती हैं। वे मैम के पास जाती हैं। ‘छापे’ की तारीख के दिन सिनेमा हॉल भर जाते हैं। मैम सभी को हिदायत देती हैं- ‘सबका सामान स्टोर-रूम में कोई अतिरिक्त सामान कमरों में नहीं। चूड़ी, चप्प्ल, बक्से, गूदड़ चादरें- सब बाहर। कोई चिड़िया कैम्पस में नहीं। चाहे क्लॉस में या बाउण्ड्री के बाहर। सब कुछ बाहर-बाहर।’ लड़कियाँ और लड़कियों से चिपकी हुई लड़कियाँ इस नर्म-गर्म आदेश के बाद खिलखिलाती हुई भागती हैं। चिपकी हुई लड़कियों का यूनिवर्सिटी अतिथि शुल्क जो भी हो, अधीक्षिका यानी मैम उन्हें बता देती हैं कि चिपकने की कीमत क्या है। कीमत मंजूर हो तो आओ और चिपक जाओ, न मंजूर हो तो चूल्हे भाड़ में जाओ। बाहर भेड़िये हैं, दिन-दहाड़े उठा ले जायेंगे।

 अपने माँ-बाप से बोलो। इस यूनिवर्सिटी में पढ़ाने भेजेंगे तो कीमत भी जाननी चाहिए। जाओ, भागो। लड़कियाँ अपमान का घूट पीती हुई बाहर निकलती हैं तो खानसामिन और माई और दाइआँ मुस्कराती हैं। आदत एक ऐसी चीज़ हैं, जो बन जाती है तो बन जाती है। मुस्कराने की आदत भी वैसी ही है तो जब एक लड़की आकर अपनी बहन के कमरे में चिपक गई तो उन्हें भी कीमत बताई गयी। दोनों बहनों ने सुना और बाहर हुईं। शाम का अँधेरा घना था और पूरे परिसर में घने पेड़ो के नीचे सन्-सन् थी। वे बगल की इमारत में ‘आंटी की शॉप’ पर पहुँचीं। सारी लड़कियाँ रोज़मर्रा के इस्तेमाल की चीज़े ‘आंटी की शॉप’ से लेती थीं। वहां महीने का उधार चलता था, अतः लड़कियों को फ़ुर्सत और निश्चिन्तता रहती थी। उन्होंने आंटी से इस बारे में पूछा।
‘मुझे क्या पता, सही होगा भई ! आंटी ने कहा।
‘एकमुश्त आंटी ?’ बड़ी बहन ने फिर पूछा।
आंटी ने होंठ बिदेर दिये।

वे चुपचाप इधर-उधर खर-पतवार और सूखी-कुरमुराती पत्तियों की आवाज़ों के साथ परिसर के पेड़ों के नीचे टहलती रहीं। अगर छोटी बहन भी एक वक़्त खाना छोड़ दे, तब भी एक मुश्त इतने पैसे कहाँ से आयेंगे ? कोई किस्तों में तो चुकाता है नहीं। वे कमरे में लौटीं और चुपचाप पड़ गयीं थोड़ी देर बाद दोनों उठीं और दूसरी लड़कियों से पूछा। चिपकने वाली लड़कियों में से ज़्यादातर ने मुँह बनाया। वे सभी महिमामंडित सवर्ण घरों में से आती हैं और गप्प के दौरान अक्सर ‘हमारा ख़ान्दान, हमारा ख़ान्दान’ बोलती हैं। उन्होंने मुँह बनाया और दोनों बहनों को ऊपर से नीचे तक देखा भी। कुछ ने नाक-भौं सिकोड़ी। कुछ ने रुमाल या दुपट्टा या तौलिया उठा नाक पर यों लगाया जैसे मुँह पोंछने जा रही हों। दोनों बहने इस कमरे से उस कमरे भटकती रहीं। फिर वे उन कमरों की ओर गयीं जिनमें उन्हीं की बिरादरी रहती थी। एक ओर किनारे पर जिधर संडास पड़ता था, उधर तीन-चार कमरे थे। एक लम्बा-अँधेरा गलियारा था, जिसके अन्त में दो-तीन झाड़ू और तीन-चार बाल्टियाँ रखी थीं। एक मोटा चिलबिल का पेड़ अपनी छाँह फैलाये पसरा था। दोनों बहने उन सभी कमरों में गयीं और हर जगह एक ही जवाब मिला।

‘एकमुश्त।’ कहने वाली लड़की एक खास तरह की बेबसी से दोनों बहनों को घूरती।
‘तुमको उनके बीच में कमरा कैसे मिला ?’ एक लड़की ने आश्चर्य प्रकट किया।
‘नहीं बता सकती।’ बड़ी बहन ने कहा।
‘यानी तुम ऊपर की ओर चढ़ रही हो।’ संवासिनी ने तीखे लहजे में कहा।
‘और भी सात-आठ कमरे हैं।’ बड़ी बहन ने शान्त स्वर में कहा।
‘और अलग-अलग ?’ संवासिनी ने पूछा।
‘नहीं, लाइन से।’ बड़ी बहन बोली।
‘वही तो।’

और हमारे बीच का कोई उनके सात भी चिपका है ?’ एक ओर लड़की ने पूछा।
‘मैत्रेयी मार डालेगी, किसी ने कहा।
मैत्रेयी मिश्रा हॉस्टल की जनरल सेक्रेटरी थी। एम० एम० नाम चलता था उसका।
‘मैम एलाउ नहीं करेंगी।’ कोई बोली।
‘चलो तुम्हारी ओर के कमरे संडास के बगल में तो नहीं हैं।’ उस पहली लड़की ने कहा।
‘नहीं, लेकिन उधर धूप कभी नहीं आती। सामने लोहे के पत्तरों वाली जाफ़री है।’ बड़ी बहन से कहा
‘जाफ़री क्यों ?’

‘नहीं जानती। शायद उधर लड़कियों से मिलने वाले आते हैं, उनसे पर्दा करने के लिए।’
‘पर्दा ?’ उस लड़की ने आश्चर्य प्रकट किया।
 ‘मुझे समझ में नहीं आता बड़ी बहन मुस्कुरायी।
‘उधर सौदे का पर्दा-सौदे का।’ एक लड़की ने कहा।
‘अँधेरा हो हवा रुकी हो और दम घुटता हो, लेकिन पर्दा तो होगा !’ उस लड़की ने चेहरा विकृत करके कहा।
बड़ी बहन ने उस लड़की के कंधे पर हाथ रखा।

‘क्या फ़र्क है ? कोई है ?’ उस लड़की ने हाथ हटाते हुए कहा। सवाल लेकिन जहाँ का तहाँ था। दस हज़ार रूपये-एकमुश्त। और वह भी आये तो कहाँ से ? इसी जगह कहानी में वह लड़का आता है। चुनाव के दिनों में वह अक्सर आता था। मंच चारों ओर लाल झंड़ों से सजाया जाता था। इसमें मैम के पति भी चुपके-चुपके मदद करते थे। ये लड़के उनको कॉमरेड कह कर सम्बोधत करते हैं। कॉमरेड शार्दूल विक्रम सिंह। लड़कियाँ बताती हैं कि किसी का भी मंच सजे, कॉमरेड शार्दूल विक्रम सिंह सबकी मदद करते हैं। इसके पीछे तर्क यह होता है कि छात्राओं के इस परिसर में कोई लफड़ा न हो। तो वह लड़का भी उन्हीं दिनों आता था। प्रत्याशी के बोलने से पहले मजमा जुटाने का काम उसीका था। वह बड़ी सधी हुई भाषा में बड़ी-बडी बातें दहाड़ता था। मीटिंग के अन्त में मुस्कराते हुए सुगन्धित पर्चे बाँटता था। तभी उससे अनायास ही परिचय हुआ। यूनिवर्सिटी कैम्पस में भी जब-तब फिर लाइब्रेरी में। कभी-कभी अचानक मिल जाने पर वह हालचाल पूछता है। खाते-पीते घर का ठीक-ठाक लड़का है-बड़ी बहन ने अँधेरे में रास्ता धाँगते हुए सोचा।

‘कल देखते हैं।’ कमरे पर लौट कर बड़ी बहन ने कहा।
‘मैं पढ़ाई छोड़ जाती हूँ।’ छोटी बहन ने बिस्तर पर गिरते हुए कहा।
‘क्यों ?’
‘मैं घर जाती हूँ।’
‘पागल बड़ी बहन उसके पास बैठ कर दुलराने लगी।
‘तुम बीमार हो।’ छोटी बहन रोने लगी।
‘नहीं तो।’ बड़ी बहन ने कहा।
‘नहीं कैसे ?’ छोटी बहन ने डबडबाई आँखें चौड़ी करके उसे देखा।
‘तुम्हें गलतफ़हमी है।’
‘तुम इसलिए घर नहीं जातीं।’

‘पागल, मैं तैयारी में लगी हूँ।’ बड़ी बहन बिस्तर से कागज-किताबें उठा कर रैक में रखने लगी।
बड़ी बहन ने ढूंढ कर दूसरे दिन लड़के को पकड़ा। उससे बात की। दो टूक लहजे में कहा कि बहन के कैरियर का सवाल है। इस शहर में बाहर रहकर बाहर से आने वाली कोई लड़की पढ़ाई नहीं कर सकती। लड़कें ने हँस कर कहा शायद इस देश के किसी भी शहर में नहीं। बड़ी बहन ने यह भी कहा कि जब वह नौकरी में आ जायेगी तो पहली वरीयता में चुका देगी। लड़के ने कहा कि ‘लेकिन यह तो घूस है, सरासर बेईमानी है, और यह काम एक ऐसे आदमी की बीवी कर रही है जो अपने को कॉमरेड कहता है। और कॉमरेड कहता ही नहीं कॉमरेड है। मैं खुद उनसे लेवी वसूलने जाता हूँ और वे नियमतः लेवी देते हैं। मैं उनके पास जाता हूँ। मैं उनसे पूछता हूँ कि यह कैसी धोखाधड़ी है ? वे हमारी यूनिवर्सिटी ‘सेल’ के प्रभारी हैं तो क्या, वे खुद ही धँधली में शामिल होंगे और हमें नैतिकता सिखायेंगे ?’ लड़के का चेहरा तमतमाया हुआ था।

और बड़ी बहन को लगा, थोड़ी ही देर में वह मंच वाली शैली में उतर आयेगा। वह चिल्लाता हुआ दौड़ पड़ेगा जैसे कोई हदसा हुआ हो। वे दोनों कैम्पस में एक मौलश्री के पेड़ के नीचे खड़े थे। उधर से आवाजाही लगी थी और लड़का लाल हो रहा था। बड़ी बहन ने उससे विनती की वह शान्त हो जाय और इसे नैतिकता का प्रश्न न बनाये। कुछ कर सकता है तो करे, वर्ना हमें अपने हाल पर छोड़ दे। छोटी बहन खुद ही पढ़ाई को छोड़ने को तैयार है। वह उसे घर भेज देगी। हम कुछ नहीं कर सकते तो जहाँ, जिस हाल में हैं, वैसे तो रह सकते हैं। नहीं निकल सकते तो देखेंगे। अपने को मारेंगे नहीं। लड़का ठण्डा हुआ। और उसी दिन अपने घर रवाना हुआ और दो दिन बाद रूपये लेकर लौटा। दोनों बहनों ने जाकर मैम को रुपये की गड्डी थमायी। मैम ने दोनों बहनों को शक की नज़र से देखा और शार्दूल विक्रम सिंह को गड्डी थमा दी। शार्दुल विक्रम सिंह लड़कियों को बिना देखे मुस्कराये।

‘यूनिवर्सिटी ड्यूज़ जमा हैं ?’ उन्होंने पूछा।
‘हाँ सर ! बड़ी बहन ने कहा।
‘जाओ, पढ़ो-लिखो।’ मैम ने कहा।
‘यस मैम।’
और कॉमन रूम में ज़्यादा गपड़चौंथ मत करो।’
‘हम जाते नहीं मैम !’ बड़ी बहन ने कहा।
‘नहीं, जाया करो।’ मैम ने कहा।
‘जाने से खुलोगी। एक सामाजिकता विकसित होगी।’ शार्दूल विक्रम सिंह ने कहा।

लड़कियों ने उन्हें नज़र उठाकर देखा और कमरे से बाहर चली गयीं।
‘देखा ये झूठ बोलती थीं। मैम ने अपने पति से लड़कियों के चले जाने के बाद कहा।
‘इनके बाप की ग्रोसरी-शॉप होगी, और बड़ी वाली ने क्या कहा था ?’ शार्दूल विक्रम सिंह बोले।
‘बाप ठेला लगाता है।’ मैम ने कहा।
‘दिलीप कुमार के बाप की भी फलों की दुकान थी और वे अपने नन्हें लाल खटिक की भी है जो पहले एम.एल.ए. और आबकारी मंत्री हुआ करता था, और अगर मेस की सप्लाई का ठेका न होता तो वह जो टोकरे भेजता है, तब कहता है कि साहब, मैं तो ठोला लगाता हूँ, मेरी क्या औकात है !’ कॉमरेड बोले।
‘मुझसे तो यही कहता है।’ मैम बोलीं।
‘फ़ोन पर कहता है, इसी से समझ लो। विनम्र बनता है। ठेले पर सेलुलर रख के चलता है क्या ?’ कॉमरेड ने कहा।
‘चीट्स ! मैम ने कहा और उठ गयीं।

‘वो चन्दे वाले आयेंगे।’ शार्दूल विक्रम सिंह ने कहा।
‘चन्दे वाले ?’ मैम ने भौहें सिकोड़ कर पूछा।
‘वही-कॉमरेड्स।’ कॉमरेड मिनमिनाये।
‘उन चूतियों से वहीं पार्टी-ऑफ़िस में मिलो-समझे।’ मैम ने कहा।
‘गेट पर गॉर्ड से बोल दो न, वहीं से लौटा दे। कह दे, कहीं निकले हैं।’
तुम्हारे में क्या ताला लगा है ?’ मैम ने अपने पति को घूरा और ड्राइंग-रूम से बाहर निकलते हुए चिल्लाईं, ‘माई !’
‘आयी बिटिया !’ एक बूढी आवाज़ जैसे किसी तहख़ाने से आयी।

 

(3)

 

 

यह ख़बर आग की तरह फैल गई की सुखंडी ने एकमुश्त पैसे जमा कर दिये। एक कमरे में दो लड़कियाँ फ़ेस-पैक लगाये भुतनी बनी बैठी थीं। सिर्फ़ उनकी आँखें उल्लुओं की तरह घूर रही थीं। उनमें से एक दूसरे की खुली टाँगों को किसी लोशन से साफ़ कर रही थी। वह धीरे-धीरे ऊपर की ओर ले जा रही थी।
‘वाऽऽउ।’ उसके मुँह से निकला।
दूसरी लड़की आँखों से मुस्करा रही थी।

‘और अन्दर तक ?’ पहली बोली।
दूसरी लड़की ने अपनी दूसरी टाँग से उसके हाथ को ढकेला।
‘तू अपनी बारी ले लेना।’ पहली लड़की ने कहा।
‘वो तू लूँगी ही।’ दूसरी ने कहा।
‘तब तेरी लात खाने की बारी होगी।’ पहली ने कहा।
‘आजकल तेरा भौंरा कौन है ?’ दूसरी ने पूछा
‘मैम बड़ी चंट है यार !’ पहली बोली।         


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