गोरा - रबीन्द्रनाथ टैगोर Gora - Hindi book by - Rabindranath Tagore
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गोरा

रबीन्द्रनाथ टैगोर

प्रकाशक : डायमंड पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :378
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 3459
आईएसबीएन :81-7182-977-5

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रोचक उपन्यास

Gora

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

रवीन्द्रनाथ एक गीत हैं, रंग हैं और हैं एक असमाप्त कहानी। बांग्ला में लिखने पर भी वे किसी प्रांत और भाषा के रचनाकार नहीं हैं, बल्कि समय की चिंता में मनुष्य को केन्द्र में रखकर विचार करने वाले विचारक भी हैं। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ उनके लिए नारा नहीं आदर्श था। केवल ‘गीतांजलि’ से यह भ्रम भी हुआ कि वे केवल भक्त हैं, जबकि ऐसा है नहीं। दरअसल, ह्विटमैन की तरह उन्होंने ‘आत्म साक्ष्य’ से ही अपनी रचनाधर्मिता को जोड़े रखा। इसीलिए वे मानते रहे कविता की दुनिया में दृष्टा ही सृष्टा है ‘अपारे काव्य संसारे कविरेव प्रजापति।’ हालांकि वे पारंपरिक दर्शन की बांसुरी के चितेरे हैं फिर भी इसमें सुर सिर्फ रवीन्द्र के हैं। अपनी आस्था और शोध के सुर। कला उनके लिए शाश्वत मूल्यों का संसार था।

1861-1841
कवींद्र-रवींद्र मूलतः एक कवि थे। उनकी बहुचर्चित काव्यमयी रचना-‘गीतांजलि’ पर उन्हें 13 नवम्बर, 1913 में विश्व के सर्वोच्च ‘नोबेल पुरस्कार’ से पुरस्कृत किया गया।

गुरुदेव की दृष्टि विविधताओं में एकता को देखती है। इसीलिए उनकी रचनाओं में जहाँ चरित्रों की विविधता है, वहीं कुछ ऐसा समान भी है जो सूत्र बनकर उन्हें आपस में पिरोए रखता है, बिखरने नहीं देता। भाषा, भाव और उनकी रसमयी प्रस्तुति पाठक को शुरू से आखिर तक जकड़े रखती है। इस उपन्यास, ‘गोरा’ में एक आकर्षक प्रेम कथा के माध्यम से नई-पुरानी विचारधाराओं के संघर्ष को रवीन्द्रनाथ टैगोर ने इस तरह प्रस्तुत किया है कि समीक्षकों को इसे भारतीय साहित्य का गौरव ग्रंथ कहना पड़ा।

हरिमोहिनी ने जब गोरा से विनयपूर्वक सुचरिता को इस आशय का पत्र लिखने को कहा कि वह विवाह कर ले, तो सुचरिता के प्रति अपने निश्छल प्रेम को दबाकर बिना किसी हील-हुज्जत के उसने पत्र लिख दिया।
क्या सुचरिता ने उसकी सलाह मानी ? क्या हुआ गोरा के साथ ?

गोरा


सावन चल रहा था। वर्षाकाल होते हुए भी इन दिनों आकाश में बादलों का दूर-दूर तक पता नहीं। चमकीली धूप में कलकत्ता का आसमान साफ-सुथरा दिखाई दे रहा था। विनयभूषण एक-एक कर कॉलेज की सभी परीक्षाएं उत्तीर्ण कर चुका था। किन्तु अपने भविष्य के बारे में उसने अभी तक कुछ नहीं सोचा था। उसका अधिकांश समय घर पर ही व्यतीत होता था। दुनियादारी से वह अभी पूरी तरह अनभिज्ञ था। न तो उसकी शादी हुई न ही घर गृहस्थी के बारे में उसने कुछ सोचा ही था। समय व्यतीत करने के खयाल से वह कभी-कभी समाचारपत्रों में अपने लिखे हुए लेख भेज देता था, जो छप भी जाते थे। परंतु इतना होते हुए भी वह संतुष्ट नहीं था। उसके मन में बड़ा बनने की प्रबल इच्छा थी, इसीलिए वह कोई बड़ा और महान कार्य करना चाहता था।

आज वह खाली था, इसी कारण उसका मन उदास था। उसने बहुत सोचा पर कुछ हल न निकाल सका कि क्या करे ? उसी समय उसने अपने मकान के बाहर एक भिखारी को गीत गाते हुए सुना-

‘खांचार भितर आचिन् पाखी केमने आसे जाय।
धतें पार्ले मने बेडि दितेस् पाखीय पाय।

गीत सुनते ही उसके मन में जिज्ञासा उत्पन्न हुई कि क्यों न वह उस भिखारी को अपने पास बुलाकर, यह अपरिचित चिड़िया वाला गीत लिख ले, किंतु जैसे ही उसने भिखारी को बुलाने के लिए बाहर का रुख किया, ठीक उसी समय उसके घर के सामने एक किराए पर चलने वाली घोड़ागाड़ी की किसी रईस की घोड़ागाड़ी से टक्कर हो गई।
इस दुर्घटना में किराए पर चलने वाली घोड़ागाड़ी का एक पहिया टूट गया। इससे किराए की घोड़ागाड़ी बिल्कुल उलट तो नहीं गई, किंतु पहिया टूट जाने से वह जहां-की-तहां खड़ी रह गई। जिस रईस की गाड़ी से यह दुर्घटना हुई थी, उस रईस या उसके कोचवान ने नजर उठाकर देखा तक नहीं कि क्या हुआ। गाड़ी के कोचवान बड़ी तेजी के साथ अपनी घोड़ागाड़ी को भगाकर आगे चलता बना।

यह देखकर विनय अपने मकान से उतरकर नीचे आ गया और सड़क पर खड़ी किराए की घोड़ागाड़ी के सामने आकर खड़ा हो गया। उसने देखा कि गाड़ी के भीतर से एक युवती, जिसकी आयु सत्रह-अट्ठारह वर्ष रही होगी, निकलकर गाड़ी के भीतर से एक भद्र पुरुष को उठाने की चेष्टा कर रही थी। विनय ने आगे बढ़कर भद्र पुरुष को सहारा देकर गाड़ी से बाहर निकाला, फिर उस भद्र पुरुष से मुखातिब होकर बड़ी ही शालीनता से पूछा-‘‘आपको कहीं चोट तो नहीं आई ?’’
उत्तर में उस भद्र ने ‘नहीं’ में सिर हिलाया और मुस्कराने की असफल चेष्टा की, किन्तु पूरे तौर पर मुस्करा न सके और अचेत होकर गिरने लगे तो वह हंसी की रेखा विलीन हो गई। विनय ने उन्हें सहारा देकर गिरने से बचा लिया और उसने सहमी हुई लड़की से अपने घर की ओर इशारा करते हुए कहा, ‘‘चिंता न करे, यह सामने वाला घर मेरा है, यदि आपको कोई आपत्ति न हो तो चलिए।’’
लड़की ने स्वीकृति दे दी।
वृद्ध को बिछौने पर लिटा दिया गया। वह अभी तक बेहोश था। लड़की ने कमरे में चारों ओर नजर घुमाकर देखा। तो उसे एक कोने में सुराही पड़ी दिखाई दी। वह झटपट सुराही से पानी का एक गिलास भरकर लाई और वृद्ध के मुंह पर पानी के छींटे मारकर पंखा करने लगी। उसने विनय से नम्र स्वर में कहा-‘‘यदि आप किसी डॉक्टर को बुला दें तो आपकी बड़ी कृपा होगी।’’

विनय ने अपने नौकर को तुरन्त डॉक्टर को लाने के लिए भेज दिया। कमरे के भीतर एक मेज पर एक बड़ा आईना रखा हुआ था, जिसके सामने कुर्सी पर वह लड़की बैठी थी। विनय लड़की के पीछे खड़ा हो मंत्र-मुग्ध-सा उस शीशे में उसके रूप को निहारने लगा।
बचपन से ही विनय कलकत्ता में किराए के मकान में रहकर पढ़ा-लिखा था। संसार के साथ अब तक उसका परिचय केवल पुस्तकों के साथ ही है। किसी भले घर की बहू-बेटी के साथ उसकी जान-पहचान या मेल-जोल नहीं था।
थोड़ी देर बाद वृद्ध ने धीरे-धीरे स्वयं ही आंखें खोलीं और ‘बेटी’ कहकर लम्बी सांस छोड़ी। लड़की की आंखों में आंसू छलक आए। उसने वृद्ध से पूछा-‘‘पिताजी ! तुम्हें कहीं चोट लगी है क्या ?’’

‘‘मैं कहां हूं ?’’ कहकर वृद्ध ने उठने की चेष्टा की, पर विनय ने उन्हें उठने से रोकते हुए कहा-‘‘उठिए मत कुछ देर यूं ही लेटे रहिए, डॉक्टर साहब आते ही होंगे।’’
तब वृद्ध को उस दुर्घटना की याद आई। उन्होंने कहा-‘‘सिर में कुछ पीड़ा-सी हो ही है पर चोट भारी नहीं है। डॉक्टर को बुलाने की तो कोई जरूरत नहीं थी।’’

डॉक्टर साहब अपने डॉक्टरी साज-सामान के साथ कमरे में दाखिल हुए। फिर वृद्ध का मुआयना किया और बोले-‘‘विशेष कोई बात नहीं है। गरम दूध के साथ थोड़ी-सी ब्रांडी मिलाकर पिलाने से सब ठीक हो जाएगा।’’
और फिर दवा की एक छोटी-सी शीशी और उसे मरीज को देने का निर्देश देकर डॉक्टर साहब चले गए। डॉक्टर के जाते ही वृद्ध बेचैन से हो उठे। लड़की अपने पिता के मनोभाव समझकर बोली-‘‘पिताजी ! आप चिंता न करें। डॉक्टर की फीस और दवा के दाम घर पहुंचकर मैं यहां भिजवा दूंगी।’’

कहकर लड़की ने विनय की तरफ देखा। दृष्टि में संदेह का अंशमात्र न दिखा।
संकोचरहित, स्थिर एवं शक्तिपूर्ण दृष्टि।
लड़की विनय के चेहरे की ओर देख रही थी। विनय कुछ कहना चाहता था पर मन के भाव साफ-साफ शब्दों में प्रकट न कर सका। वृद्ध ने विनय से कहा-‘‘देखिए, मेरे लिए ब्रांडी की जरूरत नहीं है।’’
लड़की ने बीच ही में रोककर कहा-‘‘क्यों पिताजी, डॉक्टर साहब तो कह गए हैं ?’’

वृद्ध ने विनय की ओर देखकर कहा। ‘‘डॉ. यों ही कहा करते हैं। मुझमें कुछ कमजोरी आ गयी है। जो केवल गरम दूध पीने से ही दूर हो जाएगी, अब आपको और कष्ट क्यों दूँ। हमारा घर तो पास ही है। टहलते-टहलते चले जाएंगे।’’
लड़की ने विरोध किया-‘‘पिताजी, यह नहीं हो सकता।’’
उसके बाद वृद्ध ने फिर कुछ नहीं कहा-‘‘विनय स्वयं जाकर गाड़ी ले आया। गाड़ी पर चढ़ने से पहले वृद्ध ने विनय से पूछा-‘‘आपका नाम क्या है ?’’
विनय ने बताया-‘‘मेरा नाम विनयभूषण चट्टोपाध्याय है, और आपका ?’’

वृद्ध ने कहा-‘‘मेरा नाम परेशचंद्र भट्टाचार्य है। पास ही मकान नं. अड़सठ में रहता हूं। कभी फुरसत होने पर मेरे घर पधारेंगे तो मुझे बड़ी खुशी होगी।’’ लड़की ने विनय की ओर देखा और अपनी दोनों आंखें उठाकर चुपचाप इस न्योते का समर्थन किया। विनय उसी समय उस गाड़ी पर बैठकर उन लोगों के घर जाने को तत्पर था, पर ऐसा करना शिष्टाचार के अनुकूल होगा या नहीं, यह सोचकर खड़ा रहा। गाड़ी रवाना होते हुए उस लड़की ने दोनों हाथों से विनय को प्रणाम किया। विनय नमस्कार के आदान-प्रदान लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं था, इसी कारण वह बड़बड़ा गया और कोई उत्तर न दे सका। अपनी त्रुटि को लेकर वह बार-बार अपने को धिक्कारने लगा। विनय ने इन लोगों से मुलाकात होने के समय से विदा होने के समय तक के अपने आचरण की व्याख्या की तो लगा कि आदि से अंत तक उसके व्यवहार में केवल असभ्यता ही प्रकट हुई है। किस समय क्या करना चाहिए था, इसी बात को लेकर वह मन-ही-मन केवल व्यथा अनुभव करने लगा। उसके मन में वही भिक्षुक का गीत ध्वनित होने लगा-

खांचार भितर आचिन् पाखी केमने आसे जाय।

दिन चढ़ गया, गाड़ियों का तांता तेजी के साथ दफ्तरों की ओर आता-जाता दिखाई देने लगा। विनय का मन आज काम में नहीं लग रहा था।
अचानक उसकी दृष्टि सड़क पर पड़ी। उसने देखा एक सात-आठ वर्ष का लड़का खड़ा हुआ उसके घर का नंबर देख रहा है। विनय ने ऊपर से कहा-‘‘यही घर है।’’ फिर तेजी से नीचे की ओर लपका। उसके मन में इस बारे में बिल्कुल संदेह नहीं हुआ कि लड़का उसी का घर ढूँढ़ रहा है। नीचे जाकर अत्यंत आग्रह के साथ वह उस लड़के को ऊपर ले आया और प्रश्नसूचक दृष्टि से उसके चेहरे की ओर देखने लगा। लड़के ने कहा-‘‘मुझे दीदी ने भेजा है।’’ इतना कहकर उसने एक पत्र विनय की ओर बढ़ा दिया।

विनय ने पत्र लेकर लिफाफे पर दृष्टि डाली। स्त्रियों की लिखावट और अंग्रेजी भाषा में साफ उसका नाम लिखा था। भीतर चिट्ठी-पत्री कुछ न थी, सिर्फ कुछ रुपये थे।
लड़का जाने को उद्यत हुआ, पर विनय ने आग्रहपूर्वक उसे रोका और प्रेमपूर्वक दूसरे कमरे में ले गया। लड़के का रंग बहन की अपेक्षा कुछ सांवला था, लेकिन नयन-नक्श बहुत कुछ मिलते-जुलते थे। उसे देखकर विनय के मन में आप-ही-आप एक तरह का स्नेह और आनंद उत्पन्न हुआ।

लड़का खूब तेज था। उसने कमरे में प्रवेश करते ही दीवार पर एक चित्र देखकर प्रश्न किया-‘‘यह किसका चित्र है ?’’
विनय-‘‘यह मेरे मित्र का चित्र है।’’ तुम उन्हें नहीं पहचानते। मेरे मित्र का नाम गौरमोहन है। हम लोग उन्हें गोरा कहकर पुकारते हैं। हम दोनों बचपन से एक साथ ही पढ़े हैं।’’’
लड़का-‘‘अब भी पढ़ते हैं ?’’
‘‘अब नहीं पढ़ता।’’
‘‘आप सब पढ़ चुके ?’’ आश्चर्य से लड़के ने पूछा।
‘‘हां, सब पढ़ चुका।’’ विनय ने मुस्कराकर उत्तर दिया।
लड़के ने आश्चर्यचकित होकर एक गहरी सांस ली। शायद वह सोच रहा था कि वह कितने दिनों में इतनी विद्या पढ़ सकेगा।

‘‘तुम्हारा नाम क्या है ?’’ अचानक विनय ने पूछा।
‘‘मेरा नाम सतीशचंद्र मुखोपाध्याय है।’’
उसके बाद धीरे-धीरे बाकी परिचय का आदान-प्रदान हुआ। तब विनय को पता चला कि परेश बाबू इन लोगों के पिता नहीं हैं। उन्होंने इन दोनों भाई-बहनों को बचपन से ही पाला है। लड़की का नाम राधा रानी था, परेश बाबू की स्त्री ने उसका नाम बदलकर सुचरिता नाम रखा है।
देखते-ही-देखते विनय के साथ सतीश की खूब घनिष्टता हो गई। सतीश जब घर जाने को उद्यत हुआ, तब विनय ने कहा-‘‘अकेले चले जाओगे ?’’
बालक ने गर्व के साथ कहा-‘‘मैं तो अकेले ही आया हूं, जा क्यों न सकूँगा ?’’
विनय ने कहा-‘‘चलो तुम्हें घर पहुँचा आऊं।’’
विनय भी लड़के के साथ चल दिया।
घर के द्वार पर पहुंचकर सतीश ने पूछा-‘‘आप अन्दर न चलेंगे क्या ?’’
विनय ने कहा-‘‘फिर किसी दिन आऊंगा।’’
घर लौटकर विनय ने वह लिफाफा जेब में से निकाला और बहुत देर तक देखता रहा। प्रत्येक अक्षर की रेखाएं जैसे उसके हृदय पर अंकित हो गई। उसके बाद रुपयों का वह लिफाफा उसने बड़े यत्न से अपने संदूक में रख दिया।

2


वर्षा ऋतु होने के कारण कल सवेरे से ही आसमान में बादल छाए हुए थे और शाम होते-होते बूंदा-बांदी शुरू हो गई थी। काफी रात गए तक बूंदें पड़ती रही थीं, किंतु आज सुबह से बूंदा-बांदी बंद थी। ऐसे समय में न घर में मन लगता है और न बाहर जाने को मन चाहता है। ऐसे ही समय में दो मित्र तिमंजिले मकान के एक कमरे में बैठे बातें कर रहे थे। उनकी दोस्ती बचपन से कायम थी।

दोनों मित्र जब छोटे थे, तब स्कूल से लौटकर मकान की छत पर खेले-कूदे थे, परीक्षा के पहले दोनों अपने पाठ को रटते हुए इसी छत पर घंटों टहलते थे, गर्मियों में कॉलेज से लौटकर रात को इसी छत पर भोजन करते थे। जब कॉलेज की पढ़ाई समाप्त हो गई, तब से इसी छत पर महीने में एक बार, हिंदू-हितैषी-सभा के अधिवेशन होते आ रहे हैं, इन दोनों मित्रों में एक उसका सभापति है और दूसरा उसका मंत्री है।

सभापति का नाम गौरमोहन है। मित्र लोग उसे गोरा कहकर बुलाते हैं। अपने इर्द-गिर्द के लोगों से वह बिल्कुल भी मेल नहीं खाता। उसका डील-डौल आश्चर्यजनक है। कॉलेज के संस्कृत-अध्यापक उसे रजतगिरि कहकर पुकारा करते थे। उसका रंग कुछ उग्र प्रकार का गोरा है। सुनहली आभा के अभाव ने उसे स्निग्ध कोमल नहीं होने दिया है। उसका कद छः फुट लम्बा है। आवाज भी इतनी मोटी और गंभीर है कि अचानक कान में पड़ने से व्यक्ति चौंक पड़े। उसके चेहरे का गठन काफी दृढ़ है। आंखों के ऊपर भौंहों की काली रेखाएं जैसे हैं ही नहीं और वहां पर का कपाल दोनों कानों की तरफ चौड़ा हो गया है। होंठ पतले और सदा बंद रहने वाले हैं। आंखें छोटी किंतु पैनी हैं। उसकी दृष्टि जैसे तीर के अग्रभाग की तरह अति दूर अदृश्य को लक्ष्य किए हुए है, साथ ही दमभर में लौटकर पास की चीज पर भी बिजली की तरह चोट कर सकती है। ऐसे व्यक्तित्व पर ध्यान गए बिना नहीं रहा जा सकता। हजारों के बीच में भी वह आदमी अलग ही पहचान लिया जाएगा।

उसका मित्र विनय भूषण एक साधारण बंगाली शिक्षित भद्र पुरुष की तरह नम्र किंतु उज्जवल है। स्वभाव और बुद्धि की तीक्ष्णता ने उसके चेहरे की आभा में एक विशेषता पैदा कर दी है। वह कॉलेज में बराबर अच्छे नंबर और वजीफा पाता रहा है। गोरा पढ़ने में किसी तरह विनय के साथ नहीं चल पाता था। वह विनय की तरह न तो किसी विषय को जल्द समझ ही पाता था और न याद ही रख सकता था। विनय ही उसका वाहन बनकर उसे कॉलेज की परीक्षाओं में अपने साथ पार कर लाया है।

उस समय गोरा कह रहा था, ‘‘जो मैं कहता हूं, वह सुनो। अविनाश ब्राह्म-समाजियों की निंदा करता था, उससे यह समझ पड़ता है कि वह स्वाभाविक अवस्था में है। तुम उसकी इस हरकत से एकाएक इस तरह पागलों की तरह बिगड़ क्यों उठे ?’’
‘‘कैसा आश्चर्य है ! मैं तो यह खयाल भी अपने मन में नहीं ला सकता था कि इस संबंध में कोई प्रश्न चल सकता है।’’ विनय ने आश्चर्य से कहा।

‘‘यदि यह बात है तो तुम्हारे मन में कुछ दोष है। एक दल के लोग समाज के बंधन को तोड़कर सब विषयों में उल्टी चाल चलेंगे और समाज के लोग अविचलित भाव से उनके प्रति सुविचार करेंगे, वह स्वाभाविक नियम नहीं है। समाज के लोग उनके बारे में अवश्य ही गलत धारणा कायम करेंगे। वे लोग सरल भाव से जो कुछ करेंगे, इनकी नजर में वह अवश्य ही उल्टा प्रतीत होगा। इच्छा के अनुसार समाज को तोड़कर उससे निकल जाने के जितने उपाय हैं, उन्हीं में यह भी एक है।’’
‘‘मैं नहीं कह सकता, जो स्वाभाविक है वही अच्छा है।’’ विनय ने कहा।

यह सुनकर गोरा तनिक क्रोध में आ गया और बोला-‘‘मुझे भले से कुछ काम नहीं है। पृथ्वी पर ऐसे भले अगर दो-चार आदमी हों तो रहें, किंतु बाकी सब स्वाभाविक ही बने रहें, मैं यही चाहता हूं। नहीं तो काम भी नहीं चलेगा, जान भी नहीं बचेगी। ब्राह्म-समाजी होकर बहादुरी दिखलाने का शौक जिन्हें है, उन्हें यह दुख सहना ही होगा। जो ब्राह्म नहीं हैं, वे उनके सभी कामों को भूल समझकर उनकी निंदा करेंगे, और उनके समर्थक भी उनके पीछे-पीछे उनकी प्रशंसा के गीत गाते चलेंगे, यह मुमकिन नहीं। जगत में ऐसा नहीं होता और अगर होता भी तो संसार के लिए सुविधा न होती।’’
‘‘मैं मन की निंदा के विषय में नहीं, व्यक्तिगत निंदा की बात कहता हूं।’’ विनय ने अपनी बात को और अधिक स्पष्ट किया।
‘‘किसी एक दल की तो निंदा ही नहीं है, वह तो मतामत का विचार है। व्यक्तिगत निंदा नहीं होनी चाहिए। अच्छा महात्माजी, ब्राह्मणों की पहले तुम निंदा नहीं करते थे ?’’ व्यंग्यात्मक लहजे में गोरा ने पूछा।
‘‘खूब करता था, लेकिन उसके लिए मैं लज्जित हूं।’’
गोरा ने अपने दाहिने हाथ की मुट्ठी बांधकर कहा, ‘‘विनय, यह नहीं होगा, किसी प्रकार नहीं।’’
  


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