10 प्रतिनिधि कहानियाँ (राजेन्द्र यादव) - राजेन्द्र यादव 10 Pratinidhi Kahaniyan (Rajendra Yadav) - Hindi book by - Rajendra Yadav
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10 प्रतिनिधि कहानियाँ (राजेन्द्र यादव)

राजेन्द्र यादव

प्रकाशक : किताबघर प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2013
पृष्ठ :134
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 3474
आईएसबीएन :9788170162117

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राजेन्द्र यादव की दस प्रतिनिधि कहानियाँ...

10 Pratinidhi Kahaniyan - A Hindi book by Rajendra Yadav - 10 प्रतिनिधि कहानियाँ - राजेन्द्र यादव

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

‘दस प्रतिनिधि कहानियाँ’ सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिंदी कथा-जगत् के शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है।

इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें जो पाठकों, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ऐसी कहानियाँ भी हो, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का एहसास बना रहा हो। भूमिका स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है।
‘किताबघर’ प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार राजेन्द्र यादव ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : ‘सिंहवाहिनी, ‘मैं तुम्हें मार दूँगा, ‘वहाँ तक पहुँचने की दौड़’, ‘रोशनी कहाँ हैं ?, ‘संबंध’, ‘सीज फायर’, ‘मेहमान’, ‘एक कटी हुई कहानी’, ‘छोटे-छोटे ताजमहल’ तथा ‘तलवार पंचहज़ारी’।

हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक राजेन्द्र यादव की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद संतोष का अनुभव करेंगे।

 

मेरी दस प्रतिनिधि कहानियाँ

अपनी सारी कहानियों में से कुछ चुनकर पाठकों के सामने प्रस्तुत करने के पीछे प्राय: शेष कहानियों के साथ अन्याय होता है। ये चुनाव न तो लेखक का विकास दिखा पाते हैं, न उसका सही प्रतिनिधित्व करते हैं। चुनी हुई कहानियाँ, श्रेष्ठ कहानियाँ, प्रतिनिधि कहानियाँ, चर्चित कहानियाँ, प्रिय कहानियाँ या किन्हीं और नामों से आने वाले संकलनों में इतना अधिक दुहराव होता है कि पाठक उस लेखक के प्रति लगभग असम्मान पालने लगता है-उन्हीं कुछ कहानियों को कितनी बार पढ़वायेंगे आप ? वह अपने-आपको ठगा हुआ महसूस करता है।

‘दस प्रतिनिधि कहानियाँ’ मेरा भी इस तरह का शायद सातवाँ संकलन है। मगर कोशिश यही है कि दुहराव कम-से-कम हो। इस दृष्टि से, एक थीम के आसपास कहानियों के चुनाव में मुझे ज़्यादा ईमानदारी लगती है। प्रेम कहानियां चौखटे तोड़ने त्रिकोण (वैवाहिक त्रिकोण की कहानियाँ) या आपत्तिजनक कहानियाँ इसी तरह के संकलन हैं।

प्रस्तुत दस प्रतिनिधि कहानियों के चुनाव में मैंने यही ध्यान रखा है कि प्राय: दुहराव कम-से-कम हो और कथ्य अलग हों। संभव हो तो कहानियों के अलग-अलग रूपों से भी पाठक परिचित हो सकें। ‘‘मैं तुम्हें मार दूँगा।’’ लगभग 49 के आसपास लिखी गई थी। विभाजन की मानसिकता और सांप्रदायिक माहौल उस समय के हिन्दी-उर्दू-पंजाबी लेखकों का एकमात्र सरोकार थे। कहानी बीकानेर से प्रकाशित ‘नई चेतना’ त्रैमासिक में आई। ‘रोशनी कहाँ है ?’ मैंने डूबकर और पात्रों को कई स्तरों पर आत्मसात करते हुए लिखी थी, मगर दूसरी चर्चित कहानियों के शोर में इसकी तरफ अपेक्षित ध्यान नहीं दिया गया। इस दृष्टि से ‘जहाँ लक्ष्मी कैद है’, ‘एक कमजोर लड़की की कहानी’, ‘छोटे-छोटे ताजमहल’, ‘प्रतीक्षा,’ ‘टूटना’, और ‘ढोल’ जैसी कहानियों ने मेरा काफी नुकसान ही किया। इनकी चर्चाओं में बाकी कहानियाँ प्राय: पीछे धकेल दी गईं। वे भी इतनी कमज़ोर नहीं थीं। एक ही परिवार में हर तरफ से एकाध बच्चे को ही जब बहुत मेधावी इंटैलिजेंट, हमेशा प्रथम आने वाला बताया जाता है तो शेष बच्चे या तो उद्धत हो जाते हैं या स्थगित...

कोशिश मैंने यह भी की है कि लेखन के दौरान किए गए विभिन्न कथा-प्रयोगों से भी पाठक का परिचय हो। मुझे लगता है ऐसा चुनाव किसी समीक्षक या प्रबुद्ध पाठक को करना चाहिए-लेखक को तो अपना लिखा सभी प्रिय, महान्, श्रेष्ठ और यहाँ तक कि पठनीय भी लगता है।
बहरहाल, अपनी सवा सौ कहानियों में से दस चुनकर परोसना है-तो ज़्यादती ही।

 

-राजेन्द्र यादव

 

 

सिंहवाहिनी

 

 

एक थी राजकुमारी। बहुत चंचल बहुत फुर्तीली, बहुत सुंदर और बहुत विदुषी। उसकी एक ही इच्छा थी, ऐसा कुछ किया जाए जो अद्भुत हो, नया हो और अभी तक किसी ने न किया हो। सभी ने स्वयंवर किए हैं, सभी राजकुमारों के साथ घोड़ों पर बैठकर चली गई हैं और सभी ने बाद में रानी बनकर महलों की शोभा बढ़ाई है। यही सब होना है तो इतने साधन होने का क्या लाभ है ? किसी ने भी तो ऐसा अद्भुत कुछ नहीं किया कि लगे हाँ, अपने किए में वह अकेली थी। राजकुमारी ने दुनिया के अच्छे-से-अच्छे फूल लगाए, बागबानी की, अजूबे इकट्ठे किए, शहरों और जंगलों में भटकी, पहाड़ों और समुद्रों में चक्कर लगाए। लेकिन जो वह करना चाहती थी, वही नहीं हुआ। राजा और राजमाता ने तरह-तरह के वर सुझाए, हर तरह उसका मन बहलाने की कोशिश की लेकिन राजकुमारी थी कि उदास और दु:खी ही होती चली गई। माँ-बाप चिंतित सहेलियाँ परेशान, मंत्री दु:खी। इतना सब-कुछ है, लेकिन वही नहीं है जो राजकुमारी चाहती है...

‘‘राजकुमारी जी, आप मुँह से तो कुछ बोलिए ! आपके मुँह से निकली बात जरूर पूरी होगी।’’ उसकी घनिष्ठतम सहेली ने एक दिन हमराज बनने के लिए पूछा।
‘‘मुझे खुद कुछ नहीं पता..मैं ऐसा कुछ चाहती हूं जिसमें ख़तरा हो, रोमांच हो,...’’
‘‘तो भी..’’
‘‘शेर पालूंगी...जिंदा शेर पालूंगी।’’ झुंझलाकर राजकुमारी के मुँह से निकला। अचानक बात उसे खुद ही बहुत सम्मोहक लगी। वह शेर पालेगी और उसे अपने पास रखेगी, साथ रखेगी। जो सुनेगा दंग रह जाएगा। इतिहास में उसका नाम होगा, ‘शेरों वाली राजकुमारी’...सिंहवाहिनी..
सहेली भय से चौंक उठी। मुँह से निकला, ‘‘यह कौन मुश्किल है ? कल ही शेर आ जाएगा। लेकिन राजकुमारी, शेरों जैसे कुत्ते मिल जाएँगे,..एक से एक बड़े और भयानक...

‘‘नहीं, शेर ही पालूंगी...छोटा-मोटा नहीं, जंगल का सबसे बड़ा और खूँखार शेर, ऐसा कि लोग देखें तो भय से साँस रुक जाए...’’
‘‘शेर पकड़वाना तो मुश्किल नहीं है, लेकिन राजकुमारी,’’ सहेली ने सोचकर बताया, ‘‘उसे रखना मुश्किल काम है, पिंजरें में रखना होगा..’’
‘‘नहीं खुला रखूंगी और अपने साथ ही रखूँगी।’’ आत्मविश्वास से उसकी आँखें अजीब हिंस्र-भाव से चमक उठीं, ‘‘देखूँ तो सही, प्यार से शेर को बस करने की बात सच है या झूठ...’’
राजकुमारी के चेहरे की ओर देखती सहेली चुप रह गई। वह होश में बोल रही है या बेहोशी में, लेकिन वह केवल बोल नहीं रही, कहीं अपने-आपको वचन दे रही है। सहेली गहरी साँस लेकर चुप हो गई। उसने अगले दिन राजा को बताया और शिकारियों के दल-के-दल शेर पकड़ने दौड़ पड़े। जंगलों का सबसे बड़ा और खूंखार शेर पकड़वाकर मँगवाया गया। चुस्त तगड़ा और बिजली की कौंध जैसा फुर्तीला..सचमुच ऐसे शेर बहुत कम देखने को मिलते हैं। पकड़ने वालों को राजा ने मुँहमाँगा इनाम दिया।

राजकुमारी पिंजरे के पास गई तो बदबू के मारे उसका सिर फटने लगा; पास से देखा, पल-भर को साँस रुक गई। उसे लगा, आधा उत्साह ठंडा पड़ गया है; इसे पालना तो बहुत मुश्किल होगा। नाक और मुंह पर कपड़ा रखे वह कुछ देर उसकी खूँखार आँखों, छुरे-से दाँतों और गुस्से में फनफनाती मूँछों को देखती रही-लेकिन आँखें थीं कि उसके चिकने गठीले और तगड़े शरीर से हटती ही नहीं थी। बँधे सांपों सी सलवटें कैसी तड़पती थीं, फैलती-सिकुड़ती पुतलियों के भीतर जैसे अंगारे चमकते हों। लौटकर वह रात-भर परेशान रही, शेर पाला जाए या नहीं ? कहाँ जंजाल में फँसेगी। लेकिन सारे समय जैसे अँधेरे में सलवटों-सा कुछ तड़पता था और दो दहकते अंगारे उसके होश की तहों में उतरते जाते थे। उसके भीतर कुछ था जो किसी ऐसे ही ‘खतरे’ की तलाश में उसे पागल बनाए था। पता नहीं क्या था उस भयानक और खूँखार में कि वह आकर्षण में बँधी बार-बार वहीं चली जाती और बिना पलकें झपकाए उसे देखती रहती-मुग्ध और सम्मोहित। तनी हुई नसें झनझनाती रहतीं और शरीर पसीने से तर-बतर हो जाता। अपनी इस हालत पर खुद ही झेंपती वह इस तरह लौट आती जैसे मीलों का सफर करके थक गई हो।

सारे दिन शेर दहाड़ता, गुस्से से हुंकार मारता। पिंजरें की सलाखें झनझनाती रहतीं और पूरे राजमहल गूंजते रहते। कच्चा मांस खाता था, सारे पिंजरे को गंदा रखता था और मुँह से लार टपकाता रहता। बदबू थी कि पास खड़े रहना मुश्किल ! उसके गुस्से और झुँझलाहट को देखकर दिल धक्-धक् करता कि अभी इसने पिंजरा तोड़ा और आसपास दो-चार का सफाया किया। लेकिन जब तृप्ति और आलस में होता बड़ा निरीह और भोला लगता, गद्दी जैसे पंजों से मुँह पोंछता, पूँछ घुमाकर मच्छर-मक्खियां उड़ाता, गुस्से में गदा जैसी इधर-उधर पड़ती पूंछ चँवर की तरह मुलायम हो जाती-सागर की गरज की तरह उसकी गुर्राहट गूँजती। उसकी हर स्थिति को देखकर राजकुमारी को भय और कुतूहल साथ-साथ होते।
काफी समय तो राजकुमारी असमंजस में ही पड़ी रही।

इसे पालना तो अच्छी-खासी मुसीबत हो जाएगी। कभी वह अपनी राजसी साज-सजावट को देखती, खूबसूरत गलीचे रंग-बिरंगे परदे और फूलों खुशबुओं में महकता माहौल। शेर के आने से सब उलट-पुलट हो जाएगा, दुर्गंध-ही-दुर्गंध भर जाएगी। यह भी मन में आया कि शेर को बगीचे के पिंजरे में ही रहने दे और फूलों-क्यारियों की तरह या दूसरे पालतू जानवरों की तरह रोज उसे भी देख आया करे। न तो शेर को तकलीफ होगी और न अपनी व्यवस्था के अस्त-व्यस्त होने का डर रहेगा। लेकिन कोई था कि न उसे सोने देता था, न जागने। रात-दिन उसे बेचैन रखता और मन होता कि पिंजरे के पास ही खड़ी रहे। यह भी कोई बात हुई ! इस तरह तो जंगल में जाने कितने शेर हैं और महलों में जाने कितनी राजकुमारियाँ हैं ! उनसे क्या ? उसे तो अपना शेर चाहिए, तभी तो वह रस्सियों में बंधा नहीं, कुत्ते-बिल्ली की तरह आसपास खुला खेलता शेर...तभी तो वह सारी दुनिया में, इतिहास में शेरवाली राजकुमारी कहकर जानी जाएगी..सहेली की गवाही में उसने अपने-आप को यही तो वचन दिया है।

सच पूछो तो राजकुमारी को न अब उस वचन की याद थी और न इस बात का खयाल था कि उसे कुछ अद्भुत-अनोखा करना है। वह तो बेहोश थी और सामने वह खतरा था जिसकी उसके भीतर किसी को तलाश थी। रोज़ वह पिंजरे के पास जाती और एकटक बँधी उसे देखा करती, उसके गुस्से-नाराज़ी, संतोष और विश्राम सभी समझने की कोशिश करती। जितना ही शेर को पालना, परेशानी, मुसीबत और दिक्कतों-भरा लगता, उतनी ही उसकी ज़िद बढ़ती जाती। जो भी हो, अब इसे पालना तो है ही। स्थिति पर अब उसका कोई बस नहीं है। सारी व्यवस्था उलट-पुलट हो जाएगी, सारा समय घिर जाएगा, न जाने कितने खतरे और झंझट बढ़ जाएँगे, लेकिन कोई बात नहीं। शेर को पालतू बनाने के संतोष और शेर के साथ रहने के यश ने नशे की तरह उसे बेबस कर डाला था। शेर से नहीं, अपने भीतर की आदिम और हिंस्र पशुता से उसे जूझना है और इसके लिए योनियों की तरह तपस्या करनी होगी ताकि वह सर्व-शक्तिमती सिंहवाहिनी हो जाए....

और अपनी बात उसे इस रूप में इतनी अच्छी लगी कि उसने सहेली से कहा। वह छूटते ही बोली, ‘‘भीतर की आदिम पशुता को जीतने और सिंहवाहिनी होने का सपना तो बेशक बड़ा मादक है, लेकिन राजकुमारी जी, एक बात का ध्यान रखिए, शेर का सवार न मरता है न जीता...ऐसा शेर जब विद्रोह कर बैठता है तो उसके अयाल पकड़े बैठे रहने के सिवा कोई रास्ता नहीं बचता, उतरते ही खा जाएगा...जब तक ऊपर बैठे रहो तब तक वह कुछ नहीं कर पाता, लेकिन आदमी और पशु की ताकत में अंतर तो है ही, एक दिन हारना तो आदमी को ही होता है...’’
राजकुमारी सपने की दूरियों से बोली, ‘‘आदमी को क्यों हारना होगा ? नहीं, आदमी को बिलकुल नहीं हारना होगा। यह लड़ाई विवेक और पशुता की लड़ाई है, और इसमें हारेगा पशु ही..उसे पालतू होना ही होगा...’’
सहेली मुस्कराई, ‘‘देख लीजिए...मन में पशुता और विवेक का आपने जैसा बँटवारा कर लिया है, असलियत में होता वैसा नहीं...’’

राजकुमारी हँस पड़ी, ‘‘मुझसे बहस मत कर। मेरा अपने पर बस नहीं है। जो होता है होने दो ! हार-जीत का फैसला करने का मुझे होश नहीं है। मुझे कुछ नहीं सूझता।’’ फिर कुछ सोचने लगी, ‘मुझे लगता है, इसे मैं पाल लूँगी। पहले पास जाते ही बदबू से दिमाग की नसें फटती हुई लगती थीं, आसपास खड़े रहना मुश्किल था। कच्चे मांस का इस तरह भचड़-भचड खाना देखा नहीं जाता था, उबकाई आती थी, दाँत, आँखें, पंजे और पूरे शरीर को देखकर भय और घिन से फुरहरी आती थी-वह सब कम होता जा रहा है। अब वैसा कुछ अजीब भी नहीं लगता। भयानक और हिंस्र का भी अपना एक सौंदर्य है, इसे अब मैं ज़्यादा शिद्दत और ज़्यादा गहराई से देख पाती हूँ। लगता है उसी ने मुझे अंधा कर दिया है। रोज़ घंटों बैठकर उसे ताकते रहने में मुझ एक अजीब गोपन-सुख मिलता है, वह मेरी आदत होती जा रही है। उसके बिना मुझे अपना दिन और अपना होना अधूरा लगता है। लगता है जैसे अब हम दोनों एक-दूसरे को पहचानने लगे हैं। उसकी आंखों में अब परिचय की एक मुलायम-सी चमक आ जाती है। उसका सारा होलिया बदल जाता है। वह मेरी राह देखता है और जब तक मैं पहुंच नहीं जाती, खाने-पीने की चीजें सामने पड़ी रहती हैं...’

सहेली अजनबी की तरह उसके चेहरे और सारे शरीर को गौर से देखती रही, ‘‘खैर, आप समझती हैं कि आसार अच्छे हैं तो देख लीजिए, लेकिन मेरा कहना मानिए। अपनी ही तरह का एक मनुष्य चुनिए और उसके गले में वरमाला डालिए..शेरों को दूर से या चित्रों में देखना अच्छा लगता है, उन्हें पालतू बनाना सिर्फ पागलपना है..।’’
‘‘वही सही...‘‘राजकुमारी ने गहरी साँस ली, ‘‘इस सबको आधे में छोड़ना अब मेरे हाथ में नहीं रहा। एक बार हम स्थिति को मानकर उसे जन्म दे देते हैं, तो वह खुद-ब-खुद पौधे की तरह बढ़ती है। उसका बढ़ना हमारे चाहने पर नहीं रहता। हम उसे दूर से देखते भी नहीं रह सकते, उसके बढ़ने में औज़ार बन जाने की मजबूरी ही हमारे सामने रह जाती है। रोज़ सोते हुए सोचती हूँ कि कल से यह बंद, अपना समय रहा, न मनोरंजन। सारे वक़्त बस, वही तो दिमाग़ में रहता है। लेकिन अगले दिन पता नहीं कौन है जो मुझे ठेलकर वहीं जा पहुंचाता है।’’

सहेली ने मुँह पर आई बात रोक ली। बाहर का पशु नहीं, आपके भीतर का पशु है जो आपको मजबूर कर देता है, इसी पशु से दो-दो हाथ करने को बेचैन वही हो रहा है और उसे आप नाम देती हैं विवेक। राजकुमारी की मजबूरी को कहीं वह समझती भी तो थी। ऊँचे पहाड़ को देखकर जैसे चोटी पर जा पहुंचने को बड़े विशाल समुद्र को देखकर तैर जाने की जैसी दुर्निवार ललकार आदमी अपने भीतर महसूस करता है, वैसे ही किसी चुनौती के सामने बेचारी राजकुमारी मजबूर हो गई है। खतरे के पास खिंचे चले जाना, उससे खेलना भी तो उतना ही स्वाभाविक है जितना उससे कतरा जाना, बच निकलना। बिना सीधा अनुभव किए आदमी अपना मन नहीं समझा पाता। दूसरे का अनुभव कहाँ-कब कुछ सिखा पाता है ? एक आत्मविश्वास है जो फिर-फिर उन्हीं अनुभवों से गुज़रने को ठेलता जाता है।

और राजकुमारी का वह पागल-परिचय चलता रहा। अब राजकुमारी को देखकर शेर का सारे चेहरे-मोहरे पर जो भाव आ जाता, उसे वह पुलककर स्वागत से मुस्कराने का नाम देती। एक दिन उसने डरते-डरते पिंजरें के सींखचों में हाथ बढ़ाया, तो प्यार से शेर उसे चाटने की कोशिश करने लगा। अपने-आप एक बार बढ़ा हुआ हाथ पीछे आया, फिर आगे गया। ओह, खुरदरी जीभ के स्पर्श ने उसके रोंगेटे खड़े कर दिये, सारा शरीर झनझना उठा। शेर उसका हाथ चाटता रहा और उसे विश्वास नहीं हो रहा था। आसपास सब चकित ! हाथ में खरोचें आ गई थीं, लेकिन राजकुमारी सारे दिन अपनी विजय पर उमँगती रही। रह-रहकर राजकुमारी अपने हाथ को देखती और उस रोमांच को याद करने की कोशिश करती। पागल बना देने वाले किसी स्पर्श का उसे ध्यान नहीं, लेकिन वह स्पर्श कुछ उसी तरह का नशीला था। रह-रहकर सारा शरीर फुरहरी से सिहर उठता। शेर का उठना, बैठना, खाना पीना अब उसे बहुत ही स्वाभाविक लग रहा था। शेर का अपना ढंग-ढर्रा है उसमें वह कर भी क्या सकती है ?

और महीनों की जान-पहचान, परिचय-घनिष्ठता के बाद वह दिन आया, जब राजकुमारी निस्संकोच उसके पिंजरे में चली गई। उसने शेर की पीठ पर हाथ फेरा, कान पर थपथपाया और अपने हाथों से कच्चा मांस खिलाया। न उसे घिन हुई न कै करने की तबीयत हुई, और न जल्दी से भागकर बाहर जाने की घबराहट...उसने अपने मन को समझा लिया था, शेर को अगर पालतू बनाना है तो उसे ही अपने को शेर की ज़रूरतों, आदतों के हिसाब से ढालना होगा। शेर के लिए तो इतना ही काफी है कि पिंजरे में बंद है और उसे फाड़ नहीं खाता।

तब उसने शेर की ज़रूरतों को ध्यान में रखकर एक कमरा बनवाया, बिलकुल अपने कमरे के पास, ताकि हमेशा उसके ही पास रह सके। उसकी जिंदगी का एकमात्र उद्देश्य ही जैसे उसे पालतू बनाना रह गया था। जिस दिन वह खुले शेर को केवल एक जंजीर के सहारे कमरे में लाई, उस दिन सारे राज्य में भयानक सनसनी थी। लाखों लोगों की भीड़ इकट्ठी हो गई थी। विदेशी अफसर, राजदूत, सैलानी और दर्शक जमा थे और राजकुमारी विश्व-विजय के गर्व से शेर को अपने महलों में ले जा रही थी। अब वह शेरवाली राजकुमारी थी। इतनी भीड़ और शोर-शराबे से शेर भड़क न जाए, यही उसे डर था और इसका उसने इंतज़ाम कर लिया था। लेकिन उसे विश्वास यह भी था, ऐसा कुछ नहीं होगा। उसे लगा, शेर भी उसके मन के विश्वास को समझता है। उसने एकाध बार गुस्से से भीड़ को देखा भी, लेकिन फिर जब सिहरन भरी राजकुमारी की तरफ मुंह घुमाया तो उसे लगा, जैसे हँसकर विश्वास दिला रहा हो..

राजकुमारी ने कायाकल्प की बातें बहुत पढ़ी थीं, लेकिन इस बार कायाकल्प को उसने रोज़ अपने साथ घटित होते देखा था। वह सचमुच जैसे बादलों पर चलने लगी थी। रोज़ हज़ारों लोग उससे मिलने आते, उससे एक के बाद दूसरा सवाल करते, ‘‘ऐसे भयंकर शेर को आपने कैसे पालतू बनाया ? आपको डर नहीं लगा ? घृणा नहीं हुई ? अब डर या कुछ गलत लगता है ?’’ राजकुमारी गर्व से मुस्करा-मुस्कराकर जवाब देती, ‘‘धैर्य और लगन से सब-कुछ हो सकता है। महीनों मैंने उसकी हर आदत, चाल, ढाल को गौर से देखा है, अपना और उसका अध्ययन किया है, अपने को उसके लिए तैयार किया है और चाहे जितना खूँखार जानवर हो, आपकी आदतों या मन को न समझता हो, ऐसा बिलकुल नहीं है। मैं जानती थी कि इसके लिए अपनी रुचि, संस्कार, और अहं, सभी को मुझे मारना होगा, अपने को उसके ही हिसाब से ढालना होगा..लेकिन मैंने तय कर लिया था, मैं करूँगी...’’

‘‘हाँ, हाँ, अपने को ढालते सभी हैं। लेकिन उस ढालने से इतना बड़ा काम कितने कर पाते हैं ? आपका ही यह कलेजा है, वर्ना कोई और तो शेर को देखकर ही बेहोश हो जाए...आप धन्य हैं !’’ लोग गद्गद प्रशंसा से कहते। उन्हें जैसे अपनी आँखों पर विश्वास नहीं होता, वे यही देखने के लिए विशेष रूप से खिड़की से घंटों झाँका करते, कैसे खाता है, कैसे रहता है, कैसे कब सोता-जागता है ? लगता है, शेर सोचता भी है। राजकुमारी उसके इशारों और मन को कैसे पढ़ लेती हैं ?
राजकुमारी उत्साह से विभोर होकर सारे सवालों के जवाब देती। उसने ऐसा काम किया है, जो दुनिया में हरेक के बस का नहीं है। यह भावना उसे औरों से ऊपर उठा देती। उसे लगता कि वह धन-वैभव में ही सबसे ऊँची नहीं है, उनका उपयोग किसी बड़ी सफलता और यश के लिए कर सकने में भी सबसे अनोखी है। उसकी ऊँचाई को कोई छू नहीं सकता...
धीरे-धीरे शेर उसके महलों में खुला घूमने लगा। राजकुमारी बैठी-बैठी मुग्ध होकर बेभान उसे देखती रहती..वह एक कमरे से दूसरे में मोटे-तगड़े बिलाव की तरह आता-जाता और टहलता या सोता। हाँ, दूसरे नौकर-चाकरों को देखते ही उसकी भवें तन जातीं, पूँछ के बाल और कान खड़े होने लगते। वे खुद डर के मारे उधर नहीं आते थे। एकाध बार उसने किसी को झपटकर घायल भी कर दिया। सबने मिलकर एक दिन अरदास की ‘राजकुमारीजी, आप जो कहेंगी, हम जी-जान से करेंगे, लेकिन अपनी जान तो सभी को प्यारी है।

हमारे भी बाल-बच्चे हैं। राजकुमारी समझदारी से मुस्कराई, सभी का कलेजा तो उस जैसा नहीं है, वह तो कोई एक ही होता है राजकुमार भरत की तरह..उसने खुद ही शेर का सारा काम शुरू कर दिया। लेकिन एक सलाह लोगों के कहने से मान ली। हाथ-पाँव और शरीर पर वह मोटे चमड़े के पट्टे बाँधे रहती-प्यार में भी जब शेर मुँह या पंजा मारता या हाथ या पिंडली चाटता तो घाव हो जाते। पता नहीं, कब खून का स्वाद जाग उठे और वह हिंस्र हो उठे, यह डर उसे भी था ही। हालाँकि, अब उसका विश्वास और भी बढ़ गया कि वह शेर की खुशी-नारजी़ रूठने-लाड़ करने, सबको समझने लगी है-यही नहीं, उसे ढंग से सँभाल भी सकती है। कब शेर सुस्त होता है, कब दार्शनिक बन जाता है, कब उसकी आँखों में पुरानी याद जागने लगती है, कब बच्चों की तरह खिलाड़ी बन जाता है, उसका रूठना प्रसन्न होना, सभी उसे आश्चर्य और प्रसन्नता से भर-भर जाने लगे। सारे दिन उसके सोचने-बोलने का विषय वही रहता।

वह अक्सर ही कहती, अपने से अलग किसी दूसरे की आदतों और प्रकृति को जानना ठीक वैसा ही रोमांचक अनुभव है, जैसा किसी अजनबी और अनजान प्रदेश में यात्रा करना। उसे खुद ही खोज निकालना और उसके एक-एक हिस्से से खुद और सीधा परिचय पाते जाना..किसी ने पहले इस प्रदेश की यात्रा नहीं की और आप ही वह पहले व्यक्ति हैं, जो दुनिया भर की जोखिम उठाकर इस प्रदेश को कदम-कदम खोज रहे हैं, यह आपके लिए परम संतोष और गर्व की बात तो है ही, लेकिन किसी अनजान देश को खोज, निकालना, वहाँ घूम आना एक बात है और अपने को उसके हिसाब से ढाल लेना दूसरी..या कहूँ, बेहद ही मुश्किल काम है। मगर उस स्थान को कुछ पहाड़ी मैदानों और समुद्रों के बहाने खोजते ही नहीं जाते, पल-पल अपने को उसके हिसाब से ढालते भी जाते हैं। जानने के बाद भी तो चीजें, वही नहीं रहती; मौसम बदलते हैं और वही चीजें नई हो उठती हैं, नई तरह का व्यवहार माँगने लगती हैं..और यहाँ आकर वह भूल जाती कि वह शेर की बात कह रही है, या किसी अनजान-अनखोजे प्रदेश की प्रदेश की बनावट को जानना और अपने-आपको बदलते मौसम के अनुसार तैयार करना...

अब राजकुमारी बाकायदा शेर के ऊपर बैठकर, खुली सड़कों और बगीचों में निकलने लगी थी। जो भी देखता दंग होकर दाँतों तले उँगली दबा लेता। सब वाह-वाह कर उठते, राजकुमारी ने सचमुच कमाल कर दिखलाया है। ऐसा भयानक और खूँखार शेर कैसा पालतू बिल्ली की तरह व्यवहार करने लगा है। यह केवल राजकुमारी है, दूसरे उसे ज़रूर ही कोई देवी-देवता सिद्ध है। कैसी दुर्गा की तरह निर्भय घूमती है। कुछ लोगों ने उसके बारह हाथों की अफवाह भी उड़ा दी कि उन्होंने अपनी आँखों से देखे हैं। लोग रास्तों से भाग-भागकर घरों में घुस जाते और खिड़कियों-छज्जों से घंटों उधर देखते रहते, जिधर वह गई थी। सारी दुनिया से लोग केवल उस दृश्य को देखने चले आते। शंका से कोई-कोई कहता, ‘‘और तो सब ठीक है, लेकिन भाई, शेर तो शेर ही है। किसी दिन बिगड़कर जंगल की तरफ भाग निकला तो राजकुमारी की हड्डी-पसली का पता नहीं लगेगा। बहुत हुआ, शौक पूरा हो गया, राजकुमारी को यह सब बंद कर देना चाहिए...सारे शहर में आतंक छाया रहता है..’’

सुनकर वह लापरवाही से हँस देती-लोगों के लिए वह शेर होगा, लेकिन उसके लिए तो पालतू कुत्ते से अधिक नहीं है। एक दिन अगर मैं उसे दिखाई न दूं, तो भूखा मर जाए, किसी दूसरे की शक्ल नहीं देखे...हालाँकि, भीतर-ही-भीतर आशंका भी होती कि सचमुच ही शेर किसी दिन निरंकुश हो उठा तो उसे सँभाला कैसे जाएगा ? महलों में तो कोई-न-कोई इंतज़ाम भी हो सकता है, लेकिन खुले में बाहर ? साथ ही यह भरोसा भी था कि उसे स्थिति का सामना करना आता है। अगर शेर ने गिरा नहीं दिया तो वह सँभाल ले जाएगी। सहेली की बात याद करके हँसी भी आई। निरंकुश शेर पर बैठा आदमी न जीता है न मरता है...









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