Sun Mutiyare - Hindi book by - Santosh Shailja - सुन मुटियारे - संतोष शैलजा
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सुन मुटियारे

संतोष शैलजा

प्रकाशक : परमेश्वरी प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :400
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 3542
आईएसबीएन :81-88121-60-6

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सुन मुटियारे उस मुटियार की कहानी है जो जन्मी-पली पंजाब के गाँव में और पढ़ी-गुनी देश की राजधानी में...

Sun Mutiyare

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

‘सुन मुटियारे’ उपन्यास उस तरुणी (मुटियार) की कहानी हैं, जो जन्मी-पली पंजाब के गाँव में और पढ़ी-गुनी देश की राजधानी में। पंजाब भी बँटवारे से पहले का पंजाब-जब अनबँटी जमीन थी और अनबँटे ही दिल थे....जब खेतों में भरपूर अनाज था और दिलों में भरपूर प्यार था....जब पंज दरिया की धरती गाती-नाचती रहती थी।

कथानक की धुरी तो है मुटियार लेकिन उसके इर्द-गिर्द एक भरा-पूरा परिवार है समाज है, जिसमें विविध पात्र हैं-गाँव के भी, शहर के भी। उनकी हँसी और आँसू समस्याएँ और समाधान, सुख और दुःख-सब कुछ ऐसे साथ जुड़ा चला आता है, जैसे कवि के शब्दों में-जस केले के पात में छुपे पाक दर पात। इस प्रकार कथानक का मुख्य पात्र एक नहीं रहता, बल्कि अनेक पात्रों के रूप में प्रकट होता है। अतएव यह कहानी जीवन के विराट् पट पर रंग-बिरंगें धागों से बुनी रंगीन चादर फुलवारी की तरह उभरती है। इसका एक सिरा पंजाब के गाँव से जुडा है तो दूसरा राजधानी के महानगर से। इसीलिए कहानी में गाँव के लोकगीत और पंजाबी भाषा के शब्द स्वयमेव ही आ गए हैं, जैसे सावन की घटाओं के साथ मोर का नृत्य और कोयल की कुहुक आ जाती है।

अपनी बात


‘सुन मुटियारे’ ‘कनक छड़ी’ की ही अगली कड़ी है। यह उस तरुणी (मुटियार) की कहानी हैं, जो जन्मी-पली पंजाब के गाँव में और पढ़ी-गुनी देश की राजधानी में। पंजाब भी ‘बँटवारे’ से पहले का पंजाब-जब अनबँटी जमीन थी और अनबँटे ही दिल थे....जब खेतों में भरपूर अनाज था और दिलों में भरपूर प्यार था....जब पंज दरिया की धरती गाती-नाचती रहती थी।
कथानक की धुरी तो है मुटियार लेकिन उसके इर्द-गिर्द एक भरा-पूरा परिवार है समाज है, जिसमें विविध पात्र हैं-गाँव के भी, शहर के भी। उनकी हँसी और आँसू समस्याएँ और समाधान, सुख और दुःख-सब कुछ ऐसे साथ जुड़ा चला आता है, जैसे कवि के शब्दों में-जस केले के पात में छुपे पाक दर पात। इस प्रकार कथानक का मुख्य पात्र एक नहीं रहता, बल्कि अनेक पात्रों के रूप में प्रकट होता है। अतएव यह कहानी जीवन के विराट् पट पर रंग-बिरंगे धागों से बुनी रंगीन चादर फुलवारी की तरह उभरती है। इसका एक सिरा पंजाब के गाँव से जुड़ा है तो दूसरा राजधानी के महानगर से। इसीलिए कहानी में गाँव के लोकगीत और पंजाबी भाषा के शब्द स्वयमेव ही आ गए हैं, जैसे सावन की घटाओं के साथ मोर का नृत्य और कोयल की कुहुक आ जाती है।

 इससे भाषा के विद्वानों को मुझसे शिकायत हो सकती है, किन्तु मैं विनम्र निवेदन करना चाहती हूँ कि मेरे पात्रों ने जो कहा, उसे वैसे ही मेरी लेखिनी ने लिख दिया है- उनके दिल की बात को तोड-मरोड़कर शहरी जामा पहनाना मुझे ‘अमानत के खयानत’ लगा। वस्तुत: भाषा भावानुगामिनी होना चाहिए- बस !

अंत में एक बात कहे बिना बात पूरी न होगी। यह उपन्यास बहुत पहले लिखा जाना था, क्योंकि इसकी कहानी मन में तो घटाओं की तरह बरसों से उमड़ रही थी, लेकिन यह बदरी बरसी जाकर सात समंदर पार ‘बोस्टन’ शहर (यू.एस.ए.) में मेरी बेटी के घर। वहाँ के एकांत और बर्फबारी के सौंदर्य से प्रेरित होकर मेरी कलम ऐसे चले की आधे से अधिक उपन्यास दो मास में ही लिखा गया। ‘मुटियार’ का बाकी सफर अपने देश लौटकर पूरा हुआ। आज इसे सहृदय पाठकों के हाथों में सौंपते हुए मैं ईश्वर एवं अपने पति की हृदय से कृतज्ञ हूँ, जिनकी प्रेरणा ही मेरी जीवन-शक्ति है।

यामिनी परिसर
 पालमपुर

-संतोष शैलजा

सुन मुटियारे


गाँव के कच्चे-पक्के घरों पर उतर रही साँझ का आँचल ऐसा लग रहा था जैसे चहचहाते पक्षियों के झुंड़ पर माँ ने अपने पँखों का साया फैला दिया हो। डूबते सूरज के साथ ही भाईयाजी की बेचैनी भी बढ़ गई। भाबी ने आले में रखी जोत में घी डाल के दीया जलाया ही था कि भाईयाजी जल्दी से आकर पूछने लगे, ‘‘मैंने कहा मोहन की भाबी, कुड़ी आई नहीं अभी शहर से ?’’
मोहनदेई ने धीमे स्वर में उत्तर दिया, ‘‘नहीं जी......पर मोहन चला गया है उसे लाने........’’ तभी आँधी की तरह एक युवती आँगन में आ पहुँची और आते ही भाईयाजी के मुँह में गुलाबजामुन डालते हुए चहक उठी, ‘‘भाईयाजी ! देखो, आज मैं क्या लाई हूँ !’’
उसे देखते ही भाईयाजी का गुस्सा कपूर की तरह उड़ गया और आँखें चमक उठीं। गुलाबजामुन खाते ही बोले, ‘‘वो तो मैं खा ही रहा हूँ.....कमली धी ! साँझ हुई देख झट से गुलाबजामुन ले आई मेरे लिए......’’

‘‘नहीं-नहीं, भाईयाजी, इसकी बात नहीं कर रही.....वो तो मैं हमेशा ही आपके लिए शहर से लेके आती हूँ....मैं तो इस दूसरे लिफाफे की बात कर रही हूँ.....इसे खोलो और पढ़ के देखो।’’ कहते हुए उसने बड़े उत्साह से एक खाकी लिफाफा हाथ में दे दिया।

जब तक भाईयाजी उसे खोलें, तब तक अंदर से उनका छोटा बेटा कुंदन और बड़ा मोहन बाहर निकल आए। कुंदन की ओर लिफाफा बढ़ाते हुए वे बोले, ‘‘ले पुत्तर ! तू ही पढ़ के बता कि तेरी भैण क्या तोहफा लेके आई है........’’
कुंदन ने लिफाफा खोला और उससे निकले सर्टिफिकेट को पढ़कर बोल उठा, ‘‘यह तो पंजाब यूनिवर्सिटी का सर्टिफिकेट है.....कोई सत्या सेठी ‘ज्ञानी’ के इम्तिहान में फर्स्ट डिवीजन से पास हुई है....’’ कहते हुए वह अचकाकर कभी अपनी बहन और कभी भाईयाजी का मुँह देखने लगा। इस पर बच्चों-सी ताली बजाती हुई वह हँस पड़ी, ‘‘ओए बुद्धू ! तू समझा ही नहीं....अरे, यह मेरा सर्टिफिकेट है....मैं यानी कि सत्या सेठी ‘ज्ञानी’ में फर्स्ट डिवीजन लेके पास हुई हूँ।’’ कहते हुए उसने गर्व से सिर उठाके सबकी तरफ देखा।

‘‘लेकिन......धन्नो.....’’ भाईयाजी के शब्द वह बीच में ही काटते हुए वह हँस पड़ी, ‘‘देखा ! सब आ गए चक्कर में ! असल में बात यह है भाईयाजी की मैंने कॉलेज में अपना नया नाम सत्या सेठी लिखाया था। बस, अब ‘धन्नो’ खत्म और ‘सत्या सेठी’ शुरू। अब कोई मुझे पुरानी धन्नों न पुकारे....वो मर-खप गई......’’
‘‘चुप.....चुप ! सुखी सान्दी ! मरें तेरे दुश्मन !’’ पास खड़ी भाबी बोल उठी, जिसे अब सारी बात समझ आ गई थी।
लेकिन भाईयाजी की आँखों की चमक बढ़ गई थी। मुस्कराते हुए उन्होंने बेटी का माथा चूम लिया, ‘‘वाह ! वाह ! धन्नो, नहीं....सत्या ! तूने तो वो कर दिखाया जो ठान लिया था। जींदी रहो मेरी धी ! मुझे तो हमेशा से ही यकीन था कि मेरी धी सौ पुत्तरों से भी बढ़कर है !’’

कुंदन और मोहन भाईयाजी का इशारा समझ आँखें झुकाए खिसकने लगे। तभी सत्या ने उन्हें आगे बढ़कर रोक लिया, ‘‘कहाँ चल दिए.....पहले मुँह मीठा तो कर लो....आज मैं सबके लिए लाई हूँ गुलाबजामुन।’’
उसी क्षण आँगन में एक किलकारी गूँजी, ‘‘और मेरे गुलाबजामुन ?’’
अब सत्या के चौंकने की बारी थी। आनेवाली को देखते ही सबके चेहरे खिल उठे। फ्रॉक और चूड़ीदार पजामा पहने हुए नौ साल की वह बच्ची बिलकुल जापानी गुड़िया-सी दिख रही थी-गोरा लाल चेहरा, काली मोटी-मोटी आँखें, दो चोटियों में गुँथे बाल और मुस्कराते गुलाबी होंठ !

‘‘आ गई मेरी मिस सेठी....’’ कहते हुए सत्या ने उसे उठाके छाती से लगा लिया।
साथ आए लीला के पति प्रकाश बोल उठे, ‘‘बस, इसी गोदी के लिए तो यह हफ्ता-भर दिन गिनती रहती है....’’
सत्या उसे लेकर वहीं बैठ गई और बोली, ‘‘सच्ची तृप्ति ? तू हफ्ता-भर मेरा इंतजार करती रहती है ?’’
तृप्ति ने देखा, सबकी नजरें उस पर लगी थीं, तो बड़ी चतुराई से अपनी बड़ी-बड़ी आँखें नचाते हुए उत्तर दिया, ‘‘सिर्फ आपकी ही नहीं..... भाईयाजी......भाबीजी.....मामा......मामी.......सबकी याद आती है मुझे....लेकिन सबसे ज्यादा पता है किसका इंतजार करती हूँ मैं ?’’

‘‘किसका ?’’ उत्तर सुनने को सब उत्सुक हुए।
‘‘अपने गाँव का..इसकी नहर का.....खेतों का.......बोरियों का ! चलो न झाईजी, मुझे खेतों में ले चलो न !’’
उसकी बात पर सब हँस पड़े।

सत्या ने उसे छाती से लगाते हुए कहा, ‘‘आ गई मेरे खेतों की दीवानी धी ! तेरे जैसी लड़कियाँ शहरों में जाने को तरसती हैं। और एक तू है कि ‘पिंड’ (गाँव) में आने को बेचैन रहती है.....तू तो सचमुच गाँव के बागों की कोयल है........!’’
इस पर भाबी ने ठंड़ी साँस भरकर कहा, ‘‘इसकी माँ भी ऐसी ही थी.....बेबे ने उसका नाम रखा था-कोयल।’’
पल-भर के लिए सन्नाटा छा गया। लगा, जैसे बरसों का परदा हटाकर तारा सामने आ खड़ी हो ! भाबी की बूढ़ी आँखें साफ देख रही थीं- वो ही नार-नक्शा....वो ही कोयल-सी कुहकती आवाज और अपने गाँव....खेत.....खलिहान से वही गहरी ममता। बेशक आठ बरस बीत चुके थे जब तारा के निधन के बाद उसकी बेटी को शहर में मासी के पास पढ़ने भेज दिया था। परन्तु उसका दिल हरपाल गाँव आने को लालायित रहता। जैसे तन ही शहर में रहता, मन से तो वह दिन गिनती रहती कि कब शनिवार आए और वह मौसीजी के साथ गाँव चली आए। बड़ी मासी सत्या को वह अपनी माँ मानती थी और ‘झाई’ कहकर बुलाती थी।

तृप्ति को वक्ष में लगाए हुए सत्या की मुँदी आँखों में जैसे तारा आ खड़ी हुई और कानों में उसका स्वर गूँज उठा, ‘‘मुझसे वादा कर धन्नो कि तू खूब पढ़ेगी और फिर अपने पैरों पर खड़ा होकर जिएगी....मेरे जैसी जिंदगी न जीना।’’
ठंडी साँस भर वह बुदबुदाई, ‘‘मैं अपना वादा पूरा करूँगी तारा !’’
पता नहीं कब तक ऐसे ही बैठी रहती, पर तृप्ति ने उसे झकझोर दिया, ‘‘झाईजी ! चलो न नहर की ओर....जल्दी चलो ! फिर अँधेरा हो जाएँगा।’’

‘‘अँधेरा तो होने ही वाला है.......पर मुझे नींद कहाँ आएगी नहर जाए बगैर......’’ कहती हुई सत्या ने कुंदन को साथ लिया और चल पड़ी। सूर्य अस्त हो चुका था पर अभी रात का अँधेरा न फैला था। आसमान की गहरी लालिमा रात की कालिमा को आने से रोक रही थी। इस गोधूलि बेला में झुटपुटी साँझ के सौंदर्य को देख तृप्ति के पैरों में मानों पंख लग गए थे और मुँह से झरने-सी अनवरत बातें झरने लगीं, ‘‘झाईजी ! देखो आसमान के रंग ! कहीं संतरी....कहीं लाल और कहीं गहरा नीला....और...उधर नहर तो देखो तो, उसके पानी में सब रंग चमक रहे हैं.....सुनो.....सुनो मामू ! कितनी सारी चीड़ियाँ बोल रही हैं.....ये क्या कर रही हैं ?’’

कुंदन हँस पड़ा, ‘‘ये कह रही हैं कि हमसे भी ज्यादा बोलने वाली शहर की चिड़िया यहाँ कैसे आ गई ?’’
‘‘ऊहहूँ ! झाई ! देखो न, मामू मुझे क्या कह रहे हैं-‘शहर की चिडिया’....मुझे नहीं अच्छा लगता शहर !’’
‘‘क्यों भला ?’’

 

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