उड़ियो पंख पसार - ओशो Udiyo Pankha Pasar - Hindi book by - Osho
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उड़ियो पंख पसार

ओशो

प्रकाशक : डायमंड पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2002
पृष्ठ :305
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 3548
आईएसबीएन :81-7182-945-7

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ओशो द्वारा साधकों को जिज्ञासाओं-समस्याओं पर दिए गये दस प्रश्नोत्तर प्रवचनों का अपूर्व संकलन.....

Udiyo Pankh Pasar

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

मेरे पास आये हो तो मैं तुम्हें परमात्मा नहीं देना चाहता, मैं तुम्हें जीवन देना चाहता हूँ। और जिसके पास भी जीवन हो, उसे परमात्मा मिल जाता है। जीवन परमात्मा का पहला अनुभव है। और चूँकि मैं तुम्हें जीवन देना चाहता हूँ, इसलिए तुम्हें सिकोड़ना नहीं चाहता, तुम्हें फैलाना चाहता हूँ। तुम्हें मर्यादाओं से बाँध नहीं देना चाहता; तुम्हें अनुशासन के नाम पर गुलाम नहीं बनाना चाहता हूँ; तुम्हें सब तरह की स्वतंत्रता देना चाहता हूँ; ताकि तुम फैलो, विस्तीर्ण होओ।

एक निमंत्रण

उड़ियो पंख पसार

‘हम छोटे-छोटे पंखों के लोग...विराट आकाश है। अनंत अज्ञात है। असीम, सागर है। हमारी छोटी-सी डोंगी, छोटी पतवारें ! अज्ञात में उतरने में डर लगता है। हां, बहुत से जिस घाट से उतरते रहे हों और बहुत-से यात्री उल्लेख छोड़ गए हों कि भय न करना, हम उतरे और पहुंचे—तुम भी उतरोगे तो पहुंच जाओगे; उनकी गवाहियां हों, प्रमाण-पत्र हो—तो थोड़ा ढांढस बनता है । नए के लिए कोई साक्षी नहीं होता। कैसे हो सकता है !
‘और मैं तुमसे यह कहना चाहता हूँ कि सत्य सदा नवीन है। नितनूतन है, ताजा है। ऐसा ताजा है जैसे सुबह की ओस, कि सुबह-सुबह खिले गुलाब के फूल की पंखुड़ियां ! सत्य सदा वर्तमान है। उसका कोई अतीत नहीं है। उसकी कोई परंपरा नहीं होती।

‘सत्य में उतरने का साहस चाहिए। भय लगेगा यह स्वाभाविक है। भय के बावजूद उतरने का साहस जुटाना पड़ेगा। और जो भय के बावजूद उतरने को राजी हैं, वह जरूर पहुंच जाता है। क्यों ? क्योंकि अगर हम परमात्मा की तलाश कर रहे हैं तो एक बात कभी मत भूलना कि परमात्मा भी हमारी तलाश कर रहा है। अगर हम अस्तित्व के सत्य को खोजने चले हैं तो सत्य भी आतुर है कि हम उसे खोज लें। यह हमारे और सत्य के बीच लुका-छिपी का खेल है। यह लीला है।
‘घबराने की कोई आवश्यकता नहीं है। और जितना विराट अज्ञात हो उसमें से उतनी विराट तुम्हारी आत्मा हो जाएगी। जितनी बड़ी चुनौती स्वीकार करोगे उतना ही बड़ा तुम्हारा नवजन्म हो जाएगा।
‘पुराने में चुनौती नहीं होती। पुराने में तो चुनौती हो ही नहीं सकती। जंग लगी होती है। नए में चुनौती होती है, धार होती है, चमक होती है, पुकार होती है। और नए पर चलने का साहस ही संन्यास है।

‘मैं तुम्हें कोई नक्शा भी नहीं देता, क्योंकि आकाश का कोई नक्शा नहीं होता। आकाश में पगडंडियाँ भी नहीं होतीं। राजपथ की बात ही दूर छोड़ दो, पगडंडियां भी नहीं होतीं, आकाश में पक्षी उड़ते हैं तो पैरों के चिह्न भी नहीं छूट जाते। ऐसा नहीं है कि तुमसे पहले लोग परमात्मा को नहीं पाए हैं। मगर बस आकाश में पक्षी बहुत उड़े हैं, मगर उनके पैरों के चिह्न नहीं छूट गए हैं। बुद्ध के, कि लाओत्सु के, कि जीसस के, कि मुहम्मद के कोई चिह्न नहीं छूट गए हैं आकाश में। आकाश वैसा का वैसा ही खाली है। तुम भी उड़ोगे, तुम भी चिह्न नहीं छोड़ जाओगे। अच्छा ही है कि चिह्न नहीं छूटते। नहीं तो लोग सिर्फ नकलची होंगे। लोग दूसरों के पैरों पर पैर रख कर चलते रहेंगे। उनकी खुद की आत्मा का जन्म कब होगा ! लोग केवल कार्बन-कापी रह जाएंगे। लोग सिर्फ पाखंडी होंगे। लोगों के जीवन में धार कैसे आएगी ? उनकी आत्मा का जन्म कैसे होगा ? लोग थोथे रह जाएंगे। उनके भीतर बल नहीं पैदा होगा। संघर्षों से बल पैदा होता है।

‘मैं जिस संन्यास की बात तुमसे कह रहा हूँ, वह संघर्ष का निमंत्रण है। तुम्हें जूझना पड़ेगा। समाज तुम्हारे विपरीत होगा। भीड़ तुम्हारे विपरीत होगी। अतीत तुम्हारे विपरीत होगा। परंपराएं तुम्हारे विपरीत होंगी। मंदिर-मस्जिद तुम्हारे विपरीत होंगे। तुम केवल अकेले रह जाओगे। लेकिन अकेले होने का मजा है। अकेले चलने का एक अलग रस है—अलग ही मस्ती है ! अकेले चलने में ही तुम्हारे भीतर सिंहनाद होगा। भेंडें भीड़ में चलती हैं; सिंह तो अकेले चलते हैं। नहीं सिंहों के लेहड़े ! उनकी कोई भीड़-भाड़ नहीं होती।

‘अकेले चलने का साहस हो तो ही मेरा संन्यास तुम्हारे लिए मार्ग बन सकता है। सब तरह की लांछनाएं सहने का साहस हो, तो ही ! पुराने संन्यास में तो सुविधा है, सम्मान मिलेगा। अहंकार की तृप्ति होगी। मेरे संन्यास में तो लोग कहेंगे : ‘‘पागल हो ! तुम विक्षिप्त हो गए हो। तुमने भी अपना होश खो दिया ! तुम सम्मोहित हो गए हो। तुम भी किन बातों में पड़ गए हो ! अरे अपने बाप-दादों की लीक को छोड़ दिए।’’ और बाप-दादों की लीक का मतलब होता है भेड़ बने रहो। बाप-दादे उनके बाप दादों की लीक पर चल रहे थे और उनके बाप-दादे उनके बाप-दादों की लीक पर। बस भेड़ बने रहो !
‘संन्यास लीक छोड़ कर चलने का नाम है। लीक छोड़कर चलने में थोड़ा भय तो लगेगा। भीड़-भाड़ में अच्छा लगता है : इतने लोग साथ हैं, अकेले नहीं हो। लगता है कोई खतरा नहीं है; सुरक्षा है। अकेले हुए कि चारों तरफ खतरा दिखाई पड़ता है। कोई संगी नहीं, कोई साथी नहीं।

‘मगर अकेले होना हमारा आंतरिक सत्य है। हम अकेले ही पैदा हुए हैं। हम अकेले ही हैं और अकेले ही हमें संसार से विदा हो जाना है। इस अकेलेपन को जिस दिन तुम जीने लगोगे, संन्यस्त हो गए। जुटाओ साहस।

‘तुम जिसको अब तक संन्यास कहते रहे हो, वह सिर्फ मुर्दा होने की प्रक्रिया है, मैं जिसको संन्यास कहता हूँ, वह जीवन है—अहोभाव है, आनंद है, उत्सव है, वसंत है।

‘मेरा संन्यास वसंत है। मेरा संन्यास फागुन मास है। मेरा संन्यास फूलों की भाँति है। यह जीवन का उत्सव है। यह परमात्मा के प्रति धन्यवाद है, अनुग्रह का भाव है, यह त्याग नहीं है। यह भोग नहीं है। यह त्याग और भोग का अतिक्रमण है। यह इस भांति भोगना होगा  कि भोगो भी और बंधने भी न पाओ। गुजरना है तो ऐसे संसार से गुजर भी जाओ और संसार की धूल तुम पर जमने भी न पाए। संसार तुम्हें छूने भी न पाए, अछूते निकल जाओ। गीत गाते हुए निकल जाओ। यह कोई रोता हुआ संन्यास नहीं है। यह कोई उदासीन संन्यास नहीं है। यह नाचता हुआ संन्यास है।
‘यह तो एक नृत्य है, एक उत्सव है, एक महारास है ! तैयारी हो जीवन के आनंद को अंगीकार करने की, तो आओ, द्वार खुले हैं; तो आओ, स्वागत है ! तो आओ, बुलावा है, निमन्त्रण है।’

ओशो


सोवत हौ केहि नींद, मूरख अग्यानी।
भोर भए परभात, अबहिं तुम करो पयानी।।
अब हम सांची कहत हैं, उड़ियों पंख पसार।
छुटि जैहो या दुक्क तें, तन-सरवर के पार।।


भगवान, हमें संतश्रेष्ठ धनी धरमदास के इस पद का अभिप्राय समझाने की अनुकंपा करें, हम तो धरती पर भी पांव घसीट कर चलते हैं; आप यहां किस आकाश और किन पंखों की बात कर रहे हैं ?


हम चल तो पड़े हैं जज्बा-ए-दिल, जाना है किधर मालूम नहीं
आगाजे-सफर पर नाजा हैं, अंजामे-सफर मालूम नहीं
हम चल तो पड़े हैं जज्बा-ए-दिल...
कब जाम भरे कब दौर चले, कब आए इधर मालूम नहीं
उठे भी अगर ठहरे भी कहां, साकी की नजर मालूम नहीं
हम चल तो पड़े हैं जज्बा-ए-दिल....
हम अक्ल की हद से भी गुजरे, सहरा-ए जुनूं भी छान लिया
अब और कहां ले जाएगी, साकी की नजर मालूम नहीं
हम चल तो पड़े हैं ज्ज्बा-ए-दिल..
मुमकिन हो तो इक लमहे के लिए, तकलीफें तबस्सुम कर लीजै
हम में से अभी तक कितनों को मफहूमे सहर मालूम नहीं
हम चल तो पड़े हैं जज्बा-ए-दिल...
जज्बात के सौ आलम गुजरे, एहसास की सदियाँ बीत गईं
आंखों से अभी उन आंखों तक, कितना है सफर मालूम नहीं
हम चल तो पड़े हैं जज्बा-ए-दिल, जाना है किधर मालूम नहीं
आगाजे सफर पर नाजां है, अंजामे-सफर मालूम नहीं
हम चल तो पड़े हैं जज्बा-ए-दिल...


पहला प्रश्न :भगवान्


सोवत है केहि नींद, मूरख अग्यानी।
भोर भए परभात, अबहिं तुम करो पयानी।।
अब हम सांची कहत हैं, उड़ियों पंख पसार।
छुटि जैहो या दुक्ख तें, तन-सरवर के पार।।


भगवान, हमें संतश्री धनी धरमदास के इस पद का अभिप्राय समझने की अनुकंपा करें। हम तो धरती पर भी पांव घसीट कर चलते हैं; आप यहां किस आकाश और किन पंखों की बात कर रहे हैं ?

 आनन्द मैत्रेय,

मनुष्य बना ही है आकाश में उड़ने को। न उड़े आकाश में तो फिर पैर घसीट कर ही चलना पड़ेगा। जमीन पर ही चलते रहना मनुष्य के स्वभाव के प्रतिकूल है, अनुकूल नहीं। इसलिए जीवन इतना बोझिल है, इतना भारग्रस्त है।
जीवन में दुख का एक ही अर्थ है कि हम स्वभाव के अनुकूल नहीं हैं, प्रतिकूल हैं। दुःख सूचक है कि हम स्वभाव से चूक रहे हैं; कहीं हम मार्ग से उतर गए हैं; कही पटरी से उतर गए हैं। जैसे ही स्वभाव के अनुकूल होंगे, वैसे ही आनंद, वैसे ही अमृत की वर्षा होने लगेगी, लेकिन मनुष्य के पंख पक्षियों जैसे पंख नहीं हैं कि प्रकट हों; अप्रकट हैं। देह के नहीं चैतन्य के हैं। जिस आकाश की बात चल रही है, वह बाहर का आकाश नहीं, भीतर का आकाश है—अंतराकाश है जैसा आकाश बाहर है, वैसा ही आकाश भीतर भी है—इससे भी विराट, इससे भी विस्तीर्ण, इससे भी अनंत-अनंत गुना बड़ा। बाहर के आकाश की तो शायद कोई सीमा भी हो। वैज्ञानिक अभी निश्चित नहीं हैं कि सीमा है या नहीं।

अलबर्ट आइंस्टीन का तो ख्याल था कि सीमा है, हम सीमा तक पहुंच नहीं पाए हैं, कभी न कभी पहुंच जाएंगे। क्योंकि विज्ञान की दृष्टि में, कोई भी वस्तु असीम कैसे हो सकती है ? वस्तु है तो सीमा होगी ही। सीमा ही तो वस्तु को निर्मित करती है। नहीं तो वस्तु की परिभाषा क्या ? अगर असीम हो तो न होने के बराबर हो जाएगी।
लेकिन बाहर के आकाश की बात वैज्ञानिकों पर छोड़ दो। उस गोरखधंधे में अध्यात्म के खोजी को पड़ने की जरूरत भी नहीं है। वह उसकी चिंता का विषय भी नहीं है, न वह उसकी जिज्ञासा है। न निर्णय हो जाए कि बाहर के आकाश की सीमा है या सीमा नहीं है, तो उसे कुछ मिलेगा। उस निष्पत्ति से कुछ सार नहीं है। लेकिन भीतर के आकाश की कोई सीमा नहीं है। यह तो निश्चित हो गया, क्योंकि जो भी भीतर गया है—किसी देश में, किसी काल में—उस सभी का निरपवाद रूप से एक ही अनुभव, एक ही साक्षात्कार है भीतर का आकाश अनंत है। उस भीतर के आकाश में उड़ने की क्षमता लेकर आदमी पैदा होता है; और चलता है बाहर के आकाश में, इससे घसिटता है। क्षमता में और वास्तविकता में मेल नहीं हो पाता। यह जो तालमेल नहीं है, यही हमारा दुख है। यही पीड़ा है, यही संताप है, तालमेल हो जाए, दुःख मिट जाए संगीत का जन्म हो, छंद उपजे, रस बहे, फूल खिलें।

ऐसा ही समझो जैसे गुलाब के पौधे में कोई जुही के फूल लगाने की चेष्टा कर रहा हो। न लगेंगे फूल। आए कितना ही वसंत, हो कितना ही वर्षा, उमड़-घुमड़ मेघ कितने ही मल्हार गाएं, माली कितना ही खून-पसीना करे—नहीं, गुलाब में जुही के फूल न लगेंगे, चंपा के फूल नहीं लगेंगे। गुलाब में तो गुलाब के ही फूल लग सकते हैं। और अगर जुही के फूल लगाने की चेष्टा की तो खतरा यह है कि कहीं ऐसा न हो कि गुलाब के फूल भी न लगें। क्योंकि तुम्हारी चेष्टा तो जुही के लिए होगी। तुम तो लगती हुई कलियों को भी तोड़ डालोगे कि ये तो जुही की नहीं हैं। तुम तो खिलते फूल को भी नष्ट कर दोगे, क्योंकि वे तुम्हारी उपेक्षाओं के अनुकूल नहीं होंगे, कि वे तुम्हारी आकांक्षाओं के परिपूरक नहीं होंगे।

जो हो सकता है, वही हो सकता है। जो नहीं हो सकता, वह नहीं हो सकता। और मनुष्य की यही दुविधा है, यही संकट है कि वह जो नहीं है, नहीं हो सकता, वही होने की कोशिश में लगा है। जो है और हो सकता है, उस दिशा में उसकी आंख भी नहीं; उस दिशा में पैर भी नहीं; उस दिशा में पंख भी नहीं खोलता। फिर रोता है, छाती पीटता है और हजार-हजार बहाने खोजता है कि शायद इस कारण सुख नहीं है; शायद धन कम है, इसलिए सुख नहीं है। फिर बहुत हैं जिनके पास पद भी है, पर सुख थोड़ा धनियों की आंखों में तो झांको। थोड़ा पद पर जो प्रतिष्ठित हैं उनके प्राणों में तो टटोलो। उनके जीवन को तो थोड़ा परखो, पहचानों। उनके जीवन में भी सुख नहीं है। तो तुम सिर्फ बहाने न खोजते रहो—समाज की व्यवस्था ठीक नहीं है इसलिए सुख नहीं है, कि आर्थिक वितरण समान नहीं है इसलिए सुख नहीं है। ये सब बहाने हैं। रूस में तो आर्थिक समानता आ गई, सुख नहीं आया। और रूस से मुझे पत्र आते हैं। सुख तो दूर, स्वतंत्रता भी खो गई। पत्र भी चोरी-छिपे आते हैं। पत्र भी सीधे नहीं आ सकते। किसी यात्री को देते हैं लोग कि रूस के बाहर जाकर तुम पत्र डाल देना, ताकि पहुंच जाएं। और पत्रों की एक ही पीड़ा है कि हम सुख को कैसे पाएं, ध्यान क्या है, शांति कैसे उपलब्ध होगी !

यह जानकर तुम चकित होओगे कि रूस में भी जगह-जगह लोगों ने संन्यास लिया है। नहीं गैरिक वस्त्र पहन सकते, नहीं माला पहनकर बाहर निकल सकते क्योंकि जीवन खतरे में पड़ जाएगा। मेरी किताबों पर पाबंदी है। मेरी किताबें प्रवेश नहीं कर सकतीं, लेकिन प्रविष्ठ हो गईं। लोग संन्यस्त हैं। रात चोरी से गैरिक वस्त्र पहन कर माला पहन कर ध्यान कर लेते हैं, कि अपने तलघरों में मिलते हैं। रूस में अनुवादित कर ली हैं उन्होंने किताबें, हाथ से लिखकर किताबें एक हाथ से दूसरे हाथ में जा रही हैं। तो समानता भी आ जाए तो भी सुख नहीं आता।

और अमरीका में कितना धन है ! अंबार लग गए हैं। मनुष्य-जाति के पास कभी इतना धन इतिहास के किसी काल-खंड में, किसी देश में, कभी भी नहीं था। लेकिन जीवन एकदम खाली-खाली है, थोथा है। जितना तोथा अमरीका में जीवन अनुभव होता है शायद कहीं और नहीं होता; कहीं और हो नहीं सकता। भिखारी को तो आशा रहती है कि आज नहीं कल, होगा धन पास तो सुख के द्वार खुल जाएंगे, कि स्वर्ग फिर मेरा है। लेकिन जिसके पास सब है उसकी तो आशा मर गई। उसकी तो आशा में भी अंकुर नहीं आ सकते हैं। अब तो उसकी निराशा शघन है, परिपूर्ण है। अब तो वह जानता है भलीभांति कि धन हो कि पद हो, नहीं सुख मिलेगा : कोई और मार्ग खोजना होगा।

इसलिए गरीब देशों में उतनी अशांति मालूम नहीं होती। पश्चिम से मेरे पास इतने लोग आते हैं—लाखों की संख्या में। चकित होते हैं यह देखकर की भारत के लोग बड़े शांत मालूम होते हैं ! इनके पास कुछ भी नहीं है, फिर इतने शांत क्यों  ? और भारत के थोथे पंडित हैं, पुरोहित हैं, तथाकथित महात्मा हैं, वे इस बात का ही उल्टा अर्थ समझते हैं। वे समझते हैं कि भारत के लोग इसलिए शांत मालूम होते हैं कि इनके जीवन में धर्म है। यह सरासर झूठी बात है, बकवास है। धर्म के कारण यह शांति नहीं हैं। यह शांति है केवल गरीबी के कारण, क्योंकि गरीब को आशा होती है। इनको भी अमीर हो जाने दो और इनकी भी शांति नष्ट हो जाएगी। क्योंकि जैसे ही कोई व्यक्ति अमीर हुआ कि बात साफ हो जाती है कि यह आशा व्यर्थ थी; यह मृग मारीचिका सिद्ध हो गई; अब मरुस्थल ही मरुस्थल है। वह जो आदमी मरुस्थल में दौड़ रहा है, और शांत दिखता है, समझ लेना कि उसे मृग-मारीचिका दिखाई पड़ रही है, कि वह रही; पास ही तो है जल का स्रोत, अब पहुँचा तब पहुंचा, अभी पहुंचा जाता हूं, थोड़ी देर और दो कदम और ! मगर जो आदमी इन सारी मृग-मारीचिकाओं में पहुंच चुका है और जाकर पाया कि सिवाय मरुस्थल के कुछ भी नहीं है, उसकी निराशा को समझोगे, उसकी हताशा को समझोगे ? उसकी आंखों से चमक चली जाएगी, उसकी आंखों से आशा के दीये बुझ जाएंगे। उसके जीवन में सपने अब नहीं पल सकते। अब कल्पनाओं में उसे कोई रस नहीं रहा। अब वह जानता है कि सब सरासर झूठ है। अब वह जहां है वहीं बैठा रहेगा। उठने तक का साहस नहीं रह जाएगा, कदम बढ़ाने तक की हिम्मत न रह जाएगी।

तो जिनके पास धन है उनको गौर से देखो। जिनके पास पद है उनको जरा गौर से देखो तब तुम पाओगे कि तुमने अपने दुख के जितने कारण सोच रखे हैं वे सच्चे कारण नहीं हैं, केवल बहाने हैं, बहाने हैं वैसे ही बने रहने के जैसे कि तुम हो।
दुःख का केवल एक ही कारण है, जो बहाना नहीं है, कारण है—और वह कारण है स्वभाव के प्रतिकूल होना। जो हमारी नियति नहीं है उससे अन्यता होने की चेष्टा में दुःख है। और हम सब वही होने में लगे हैं। हमारी नियति है परमात्मा होना। हमारी नियति है आत्म-अविष्कार। हमारी नियति है अंतर्तम के आकाश में उड़ना।
इसलिए धरती पर हम पैर घसीटकर चलते हैं, आनंद मैत्रेय। इसमें कुछ आश्चर्य नहीं, क्योंकि हम बने हैं आकाश में उड़ने को।

ऐसा ही समझो कि जैसे किसी नासमझ के हाथ में हवाई जहाज पड़ जाए। मैंने सुना है कि ऐसा दूसरे महायुद्ध में हुआ। बर्मा के एक जंगल में एक छोटा हवाई जहाज छूट गया दूसरे महायुद्ध में। जंगल में रहने वाले आदिवासी हवाई जहाज का क्या करें ! हवाई जहाज है, यह भी उसकी समझ में न आए। वे तो बैलगाड़ी को ही जानते थे, सो उन्होंने हवाई जहाज में बैल जोत लिए, सोचा कि नए ढंग की बैलगाड़ी है। और बैल जोत कर उससे काम लेने लगे। छोटा-सा हवाई जहाज था, होगा दो साट का हवाई जहाज, तो उसमें बैल जोत कर और उसको चलाने भी लगे। महीनों हवाई जहाज बैलगाड़ी ही रहा। तुम उस हवाई जहाज की दुर्दशा समझो। अगर हवाई जहाज को जरा भी होश होता तो जार-जार रोता, तो उसकी आंखों में आंसू टपकते कि यह मेरी क्या गति हो रही है ! इसके लिए मैं बना हूं ? ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर...बैल जुते हवाई जहाज में। मूढ़ों के हाथ में पड़ा जाएगा तो यही होना था।

फिर शहर से कोई आदमी आया। उसे भी हवाई जहाज का भाव अनुभव तो नहीं था, लेकिन बस और ट्रक उसने देखे थे। उसने कहा कि यह तुम क्या कर रहे हो ! इसमें बैल जोतने की जरूरत नहीं है। यह तो चोटी बस है।
उसने कोशिश करके चलाने की चेष्टा की, दो –चार दिन में चल गया हवाई जहाज। तो बस की तरह कुछ दिन चला आदिवासी बहुत प्रसन्न हुए कि बिना बैल के गाड़ी चल रही है; बैल नहीं है गाड़ी चल रही है ! देखने आते आदिवासी दूर-दूर से। फिर उस आदमी ने जब शहर गया तो वहां लोगों को कहा कि ऐसा-ऐसा मामला हुआ, तब किसी ने उससे कहा कि पागल, वह बस नहीं है। तू जैसा वर्णन कर रहा है, वह हवाई जहाज है।
तो एक पायलट को लेकर वह आदमी जंगल पहुंचा और तब हवाई जहाज आकाश में उड़ सका। तब तो आदिवासियों के आश्चर्य का ठिकाना न रहा।

मनुष्य जैसा है उतने पर समाप्त नहीं है। हम बैलगाड़ी ही बनाए हुए हैं उसे। घसीटते रहे हैं। चिल्लाते हैं बुद्ध पुरुष की नहीं तुम इसके लिए बने हो। अनंत संपदा के तुम मालिक हो। प्रभु का राज्य तुम्हारा है। मगर हम सुनते ही नहीं। सुने कैसे ? हमने इस बाहर के जगत में अपने बहुत-से न्यस्त स्वार्थ जोड़ रखे हैं। हमने न जाने कितने सपनों के जाल बुन रखे हैं ! सुने तो सब जाल छोड़ने पड़ें। सुनना महंगा है। सुनते हैं और अनसुनी करते हैं ! सुन भी लेते हैं और सुनते भी नहीं।
धनी धरमदास ठीक कह रहे थे। धरमदास कोई धनी नहीं थे, लेकिन भीतर के धन को पाकर ‘धनी धरमदास’ कहलाए। नहीं था कुछ उनके पास, लेकिन जो उनके पास आया उसने ही पाया कि भीतर कुछ अहर्निश बरस रहा है, कोई रसधार बह रही है ! जो आया उसने पीया। जो आया पाकर वही जीया। नए जीवन को जीया ! उनके ये वचन प्यारे हैं : ‘सोवत हौ केहि नींद !’ कैसी नींद में सोए हुए हो, क्या कर रहे हो ? क्या होने को आए थे, क्या हो गए हो ! यह कैसी नींद ? सपने को सच मान लिया ! सच को विस्मरण कर दिया ! अपने को भूल बैठे हो, औरों के पीछे दौड़ रहे हो ! और सब कहीं जाते हो, सिर्फ अपने भीतर नहीं जाते। यह कैसी नींद ? और सब जुटाते हो, ध्यान नहीं जुटाते। वही एक मात्र धन है। उसे ही पाओ तो धनी हो जाओ। सब जुटा लोगे, मगर दीन रहोगे, दरिद्र रहोगे। खाली हाथ आए, खाली हाथ जाओगे। रोते जीए, रोते आए, रोते मरोगे।

हंसते हुए भी जीया जा सकता है। हंसने का तुम्हारा जो अनुभव है वह वास्तविक नहीं है। तुम हंसते भी हो तो  उस हंसी में आनंद नहीं होता, शायद आंसुओं को छिपाने की व्यवस्था है वह।

फ्रेड्रिक नीत्से ने कहा कि लोग मुझसे पूछते हैं कि तुम क्यों हंसते रहते हो ? तो मैं उनको क्या कहूं ? इसलिए हंसता रहता हूँ कि कहीं रोने न लगूं ! अगर न हंसूं तो आंसू टपकने लगेंगे। इसलिए किसी तरह हंस कर अपने को भुलाए रखता हूं।
 जिसको तुम मनोरंजन कहते हो, वह क्या है और अपने को भुलाने के सिवाय ? कोई चला फिल्म में, कोई चला नाटक में, कोई चला नृत्य में। पूछो –कहां जाते हो ? कहते है—मनोरंजन को जाते हैं। मनोरंजन की इतनी क्या जरूरत पड़ी है। मनोरंजन की जरूरत ही किसको पड़ती है ? जो दुःखी है उसी को पड़ती है। सुखी को मनोरंजन की क्या जरूरत है ? आनंदित को मनोरंजन की क्या जरूरत है ? आनंदित व्यक्ति तीन घंटे किसी सिनेमागृह में बैठने को राजी नहीं होगा कि जहां लोग बीड़ी सिगरेट का धुआँ उड़ा रहे हैं, जो की सीटों में न मालूम कितना बीमारियों के रोगाणु भरे हुए हैं, खटमलों का आवास है जहां, जहां न मालूम कहां-कहां किस –किस तरह के गंदे लोग रोज आकर बैठ जाते हैं।

 

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