काली उपासना - राधाकृष्ण श्रीमाली Kali Upasana - Hindi book by - Radhakrishna Shrimali
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काली उपासना

राधाकृष्ण श्रीमाली

प्रकाशक : डायमंड पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :159
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 3654
आईएसबीएन :81-288-1229-7

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प्रस्तुत है काली उपासना...

kali Upasana

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

वैदिक साहित्य में उपासना का महत्त्वपू्र्ण स्थान है। हिन्दू धर्म के सभी मतावलम्बी—वैष्णव, शैव, शाक्त तथा सनातन धर्मावलम्बी—उपासना का ही आश्रय ग्रहण करते हैं। यह अनुभूत सत्य है कि मन्त्रों में शक्ति होती है। परन्तु मन्त्रों की क्रमबद्धता, शुद्ध उच्चारण और प्रयोग का ज्ञान भी परम आवश्यक है, जिस प्रकार कई सुप्त व्यक्तियों में से जिस व्यक्ति के नाम का उच्चारण होता है, उसकी निद्रा भंग हो जाती है, अन्य सोते रहते हैं, उसी प्रकार शुद्ध उच्चारण से ही मन्त्र प्रभावशाली होते हैं और देवों को जाग्रत करते हैं। क्रमबद्धता भी उपासना का महत्त्वपूर्ण भाग है। दैनिक जीवन में हमारी दिनचर्या में यदि कहीं व्यतिक्रम हो जाता है तो कितनी कठिनाई होती है, उसी प्रकार उपासना में भी व्यतिक्रम कठिनाई उत्पन्न कर सकता है।

अतः उपासना पद्धति में मन्त्रों का शुद्ध उच्चारण तथा क्रमबद्ध प्रयोग करने से ही अर्थ चतुष्टय की प्राप्ति कर परम लक्ष्य-मोक्ष को प्राप्त किया जा सकता है। इसी श्रृंखला में प्रस्तुत है—काली उपासना।

लेखकीय


भारत की पावन-पुण्य-भूमि पवित्र धरती पर ऋषियों, महर्षियों, वेदज्ञों, देवज्ञों, ब्राह्मणों, याज्ञिकों ने अनेक धार्मिक ग्रन्थ वेद-वेदांग, पुराण, स्मृतियां, शास्त्र आदि रचे जो मानवमात्र कल्याण, उपकार, सुख-सुविधा, शान्ति, आध्यात्मिकता की ओर बढ़ने, ईश-भक्ति, संस्कृति की पहचान, आनन्द, भौतिक उन्नति आदि के हेतु हैं। उनकी शक्ति अद्वितीय है, चिरनवीन है, असंदिग्ध है। आज इस मशीनी युग में कलिकाल में, विज्ञान की होड़ में पापाचार, युद्ध का उन्माद, नैतिकता का पतन, मानवीय मूल्यों का पतन, ईर्ष्या, होड़, अस्त्र-शस्त्रों की होड़, अर्थ का व्यामोह, नाते-रिश्तों का अवमूल्यन, पतन का वातावरण, यत्र-तत्र सर्वत्र दिखाई दे रहा है। तब देवताओं, ऋषी, मुनियों, तपस्वियों की यह पावन स्थली भारतभूमि भी अछूती नहीं रही। जहां घर-घर वेद ध्वनि गूंजती थी, हवनाग्नि से उत्पन्न धुआं जहां वातावरण को पावन करता था, शस्य-श्यामला भूमि पर जहां गंगा-यमुना नर्मदा जैसी पावन नदियां बहती हैं। हिन्दमहासागर जिसके चरण पखारता है, हिमालय जिसका किरीट है, देवता भी जहाँ अवतरित होने में गौरव अनुभव करते थे, जो भूलोक का स्वर्ग था, इस धरती पर वसुधैव कुटुम्बकम का नारा गूंजता था। जहां अधर्म, झूठ, दम्भ, पाखण्ड, अनाचार, अत्याचार, चोरी, डकैती, हत्या, लूटपाट, हिंसा का नाम भी नहीं था, जहाँ लोग घरों में ताले नहीं लगाते थे।

पिता के जीते-जी पुत्र की मृत्यु नहीं होती थी, वहीं उसी पुण्य धरती पर बहने वाली गंगा मैली हो गई है। स्त्रियों के साथ बलात्कार; बाल-हत्या, चोरी, डकैती, लूट-पाट, छल-प्रपंच, नीचतापूर्ण व्यवहार, भाई-भाई का गला काटने को तैयार है, अधोगति की ओर मानवता तीव्रता से बढ़ती जा रही है, नाते-रिश्ते झूठे पड़ गए हैं। बाप बेटी से, भाई बहन से कुकर्म करते विचार नहीं करता, विवेक साथ छोड़ चुका है। इन सबके लिए शायद प्रभाव आवश्यक नहीं है। ईश्वर का भय नहीं रहा। भौतिकता के अंधे मोह में अध्यात्मवाद ने किनारा कर लिया है। वेद-पुराण, स्मृतियां मात्र पुस्तकालयों की शोभा बढ़ा रहे हैं। वेदमंत्र सुनने को नहीं मिलते, हवन का धुआं लुप्त हो गया है। सच कहूं तो मानवता के मूल्यों का निरन्तर ह्रास होता जा रहा है। इतना होने पर भी हम निराश नहीं हैं। प्रयत्नों का मार्ग अवरुद्ध नहीं हुआ है। हमारे रक्त कणों में जो पूर्वजों की सात्विकता, धार्मिकता धर्मपरायणता, सत्यता, आचार-विचार, ईश्वर निष्ठा है, उसका लोप नहीं हुआ है। उत्तिष्ठः जाग्रतः की आवश्यकता है। तन्द्रा के टूटने की बाट जोह रहे हैं। हम निराश भी नहीं हैं। जरूरत मार्गदर्शन की है। निराशा में भी आशा की किरण दिखाई दे रही है। अस्ताचलगामी होते सूर्य ने इठलाकर कहा—मैं अंधकार ला रहा हूं। किसी में शक्ति है जो अन्धकार को रोक सके। एक बार, दो बार, तीन बार, सूर्य ने यही दोहराया। अन्ततः एक नन्हें से दीपक ने उठकर कहा, ‘मैं शक्ति भर प्रयास करूंगा।’ आज इसी नन्हें से दीपक की आवश्यकता है। आज नैतिक-धार्मिक, आध्यात्मिक, शिक्षा लेने और देने की आवश्यकता है। भूली-बिसरी बातें याद दिलाने की हैं। सोए को जगाना होगा। पूर्वजों की थाती से परिचित कराना होगा और तब वह दिन दूर नहीं जब पुनः भारत वही भारत होगा।

मैं गत लम्बे समय से निरन्तर लिख रहा हूं, लिखता ही जा रहा हूं। मेरा प्रयास तो गिलहरी का प्रयास है जो सागर खाली करने करने को प्रयत्नशील थी। साथ ही मासिक पत्रिका ‘विश्व तन्त्र ज्योतिष’ द्वारा हर बार नयी विषय-वस्तु देने के लिए प्रयत्नशील हूं। उत्थान, विकास, जन-कल्याण, मानव मूल्यों की पहचान के लिए जो मेरा प्रयत्न है उसमें श्री हनुमान उपासना, भैरव उपासना, विष्णु उपासना, सरस्वती उपासना, गणेश उपासना, गायत्री उपासना में यह काली उपासना भी एक लड़ी में कड़ी है। हां, इससे पाठक को कुछ भी लाभ हुआ तो मैं अपना प्रयास सफल समझूंगा। आलोचना व विरोध के लिए आप सब प्रकार से स्वतंत्र हैं पर पहले साधक बनें, फिर आलोचक तो प्रसन्नता होगी।

हमारे वेद, हमारे पुराण, हमारे धार्मिक और आध्यात्मिक ग्रन्थ ज्ञान के सांगोपांग भण्डार हैं। उनका उपयोग, उपभोग कर, अकिंचन भी ज्ञानी, ध्यानी बन सकता है। रोगी, रोगमुक्त हो जाता है। निर्धन, धनी बन सकता है। कुकर्मी, सुकर्मी बन सकता है। जीवन के संतापों से मुक्ति पा सकता है। अभावों का नाश कर खुशहाल जीवन जी सकता है। सुख शान्ति आनन्द धन पा सकता है। आज का धनी देश जो भौतिकता में कहीं आगे है, भौतिकता से थक गया है। पतित वह घृणित जीवन से मुक्ति हेतु भारतीय आध्यात्म को पाने को लालायित है। और हम उसी अंधी होड़ में दौड़ने का प्रयास करते जा रहे हैं। भौतिक सुख को ही सर्वोपरि मान, पूर्वजों के दिखाए सन्मार्ग से विमुख होते जा रहे हैं। पर इस धरती की यह विशेषता है कि यह भूमि कभी भी संतों, महापुरुषों, देवज्ञों; विद्वानों से खाली नहीं हुई, रिक्त नहीं हुई। स्वामी विवेकानन्द, दयानंद सरस्वती, रामकृष्ण परमहंस, टैगोर और गांधी सरीखे महापुरुष आदर्श हैं, उनके कर्म अनुकरणीय हैं। उन्होंने क्या हमारा मार्गदर्शन नहीं किया ? सत्य और अहिंसा का पाठ नहीं पढ़ाया ? गौतम बुद्ध और महावीर स्वामी, इसी पावन धरती की उपज थे। इन्होंने सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह, एकता, विश्वबन्धुत्व, समानता, भेदभाव रहित जीवन, सद्वृत्ति, सद्ज्ञान, अहिंसा, राष्ट्रीयता का नारा दिया।

इस पुस्तक को लिखकर मुझे आनंदानुभूति हो रही है, सन्तोष धन मिल रहा है, कृतज्ञ हूं मैं मां का और प्रेरणा देने वाली, सत्यनिष्ठ वेद-पाठी, संस्कारित, ईशोक्त जन्मदात्री को ही समर्पित है।

पं. राधाकृष्ण श्रीमाली
ज्योतिष अनुसंधान केन्द्र
19/20-ए हाईकोर्ट कालोनी
जोधपुर (राजस्थान)

श्री काली उत्पत्ति


श्री मार्कण्डेय पुराण में वर्णित देवी माहात्म्य अर्थात् दुर्गा सप्तशती के आठवें अध्याय के अनुसार श्री कालीदेवी की उत्पत्ति जग-जननी श्री अम्बिका के ललाट से हुई है। जिसकी कथा इस प्रकार है—
एक समय शुंभ और निशुंभ नामक तो अत्यन्त पराक्रमी, महाबलशाली असुरों ने अपने बाहुबल से देवराज इन्द्र को युद्ध में पराजित कर उनके सभी अधिकार छीन लिये। इसी प्रकार इन्द्र की तरह अन्य सभी देवताओं को निष्कासित किए जाने पर वह अपनी प्राण-रक्षा के लिए यहां-वहां, इधर-उधर भटकने लगे।
इससे पूर्व भी जब महिषासुर नामक राक्षस ने इन्द्रपुरी पर अधिकार कर लिया था तो श्री दुर्गा माता ने देवताओं के आह्वान पर महिषासुर का वध करके उन्हें यह वरदान दिया था कि भविष्य में जब कभी किसी कष्ट में देवता, देवी की सहायता चाहेंगे तो वह तुरन्त प्रकट होकर उनके दुःख दूर करेंगी।

श्री दुर्गा जी के इसी आश्वासन का ध्यान कर सभी देवताओं ने मिलकर मां दुर्गा का आमन्त्रण किया तो उन्होंने प्रकट होकर शुंभ और निशुंभ के दो शक्तिशाली युव चण्ड और मुण्ड को युद्ध में मार डाला। जब चण्ड और मुण्ड महाअसुरों की देवी ने बहुत-सी सेना सहित संहार कर दिया तो असुरेश्वर महाप्रतापी शुंभ ने अत्यन्त क्रोध से अपनी सम्पूर्ण सेना को संग्राम में कूच करने का आदेश दिया कि आज छियासी महा उदायुध असुर सेनापति और चौरासी कम्बु असुर सेनापति अपनी-अपनी सेना लेकर संग्राम में जायं। कोटिवीर्य नामक असुरों के पचास कुल, धूम्रवंश में उत्पन्न हुए एक सौ कुल, कालक, दौर्हृद मौर्य वंशी तथा कालकेय वंशी असुर युद्ध में लड़ने के लिए मेरी आज्ञा से शीघ्र चले जायें। भयंकर शासक शुंभ ऐसी आज्ञा देकर कई हजार महासेना को अपने साथ लेकर युद्ध के लिए चल दिया।

उसकी भयंकर सेना को आता देखकर देवी ने अपने धनुष की टंकार से पृथ्वी और आकाश को गुंजा दिया। तदनन्तर सिंह ने भी भयंकर गर्जना की और चण्डी ने अपना घण्टा बजाकर दूना शब्द कर दिया। इस प्रकार के शब्द को सुनकर असुर सेना ने देवी, सिंह और चण्डी को चारों ओर से घेर लिया। इसी समय दैत्यों का संहार कर तथा देवताओं का कष्ट निवारण करने के लिए ब्रह्मा, शंकर, स्वामी कार्तिकेय, विष्णु तथा इन्द्रादिक देवताओं के शरीर से जो शक्तियाँ उत्पन्न होकर आयीं उनका वर्णन इस प्रकार है—
1.    ब्रह्मा की शक्ति, रुद्राक्ष की माला धारण किये हुए, कमण्डल लेकर, हंसयुक्त विमान में बैठकर आई। इसलिए शक्ति का नाम ब्रह्माणी हुआ।
2.    शिवजी की शक्ति, वृषभ पर सवार होकर त्रिशूल हाथ में लिये महानाग का कंकण और चन्द्ररेखा से सुशोभित होकर आई।
3.    स्वामी कार्तिकेय की शक्ति, उन्हीं के समान स्वरूप धारण करके, मोर पर बैठकर, शक्ति के लिए असुरों से युद्ध करने आई।
4.    भगवान श्री विष्णु की शक्ति गरुड़ पर बैठकर, शंख-चक्र, गदा, शारंग, धनुष और खड्ग हाथ में लिये वहां आई।
5.    यज्ञ वाराह की शक्ति, वाराही सुन्दर शरीर को धारण किए हुए वहां आई।
6.    नृसिंह भगवान की नारसिंही शक्ति इन्हीं के समान रूप धरकर वहां आई जिसके केश हिलने से ही सम्पूर्ण तारागण हिलने लगते थे।
7.    इन्द्र की शक्ति, ऐन्द्री ऐरावत पर सवार होकर वज्र को लिये युद्ध में आई। वह सहस्त्र नेत्रों वाली थी।

तदुपरान्त महादेव जी ने सभी देव शक्तियों और महामाया देवी से कहा—तुम असुरों का संहार करो और इसके साथ ही देवी के शरीर से अत्यन्त उग्र स्वरूप धारण करके चण्डिका प्रकट हुईं। जिसकी गर्जना सैकड़ों शेरों के समान थी। इस अपराजिता देवी ने शंकर से कहा कि आप मेरे दूत बनकर (भगवती ने शिवजी को अपना दूत बनाकर भेजा था। इस कारण देवी का नाम शिवदूती भी प्रसिद्ध हुआ) शुंभ और निशुंभ से जाकर कहो कि—‘हे असुर, यदि तुम जीवित रहना चाहते हो तो पाताल लोक में चले जाओ। त्रिलोकी का राज्य इन्द्र को दे दो, और देवगणों को यज्ञ का भाग उपभोग करने दो और यदि अपने बल के घमण्ड से युद्ध करना चाहते हो तो मेरे आगे आ जाओ। मेरी योगिनियां तुम्हारे शरीर का रक्त पान करके तृप्त होंगी।

भगवान शंकर से देवी की बातों को सुनकर अत्यन्त क्रोधित हुए असुर जहां कात्यायनी देवी थी, वहां उनके ऊपर बाण व अन्य शस्त्रों से प्रहार करने लगे। असुरों द्वारा चलाये गए बाण, शूल व फरसा आदि को देवी ने अपने बाणों से काट-काटकर खंड-खंड कर दिया। चण्डिका यह देखकर शत्रुओं को त्रिशूल से विदीर्ण करते हुए तथा खट्वांग से कुचलने लगी। ब्रह्माणी देवी जहां भी जाती वहां अपने कमण्डल का जल छिड़क कर असुरों के बलवीर्य और पराक्रम को नष्ट कर देती। वैष्णवी देवी ने चक्र से और कौमारी देवी ने शक्ति से शत्रुओं का विनाश आरंभ कर दिया। ऐन्द्री देवी के वज्र प्रहार से सैकड़ों दैत्य पृथ्वी पर खड़े-खड़े ही नष्ट हो गये। वाराही देवी ने अनेक असुरों को अपनी विशाल दाढ़ों से फाड़ डाला। नारसिंही अपने नखों से शत्रुओं को चीर-चीर कर चबाते हुए घूम रही थी। शिवदूती के निकट अट्टहास से व्याकुल होकर ही कितने असुर मूर्छित होकर भूमि पर गिर पड़ते।

इस प्रकार के महाविनाश को देख असुर सेना भागने लगी। उनको इस प्रकार भागते देखकर उनका एक विशेष सेनापति रक्तबीज बड़े क्रोध से आगे आया। इस राक्षस के शरीर से रक्त की एक बूंद पृथ्वी पर गिरते ही उसके समान बलशाली और राक्षस पैदा हो जाते थे। रक्तबीज गदा लेकर ऐंद्री देवी से लड़ने लगा। तब देवी ने वज्र से उस पर प्रहार किया। वज्र प्रपात होते ही बहुत-सा रक्त उसके शरीर से गिरा। उससे जितनी बूँद रक्त गिरा था, उतनी ही संख्या में और रक्तबीज उत्पन्न हो गये। यह सब असुर एक ही क्षण में सारी रणभूमि पर फैलने लगे। अनेक का सिर देवी अपने चक्र से एक ही बार में काट डालती। उनसे जो रक्त की बूंदे गिरतीं, उससे हजारों और रक्तबीज पैदा होते चले गए। इस बार वैष्णवी देवी ने बड़े क्रोध से चक्र छोड़ा तो कई हजार रक्तबीजों का सिर एक ही बार में कट कर गिरा तो उससे गिरे रक्त से अनगिनत रक्तबीज उत्पन्न हुए जिससे सम्पूर्ण विश्व ही व्याप्त हो गया। वाराही ने खड़्ग से, कौमारी ने शक्ति से और माहेश्वरी ने त्रिशूल से उनको मारा। परन्तु महाअसुर रक्तबीज से उत्पन्न रक्तबीजों की संख्या घटने की अपेक्षा बढ़ती ही रही।

देवताओं को यह देखकर भय हुआ अतः वे दुःखी हो उठे। देवताओं को दुःखी देखकर चण्डिका को अपार क्रोध उत्पन्न हुआ। क्रोध के कारण देवी का मुँह काला पड़ गया तथा उनके भौंहें टेढ़ी हो गईं। उसी समय उनकी भौंहों के मध्य भाग ललाट से ‘काली देवी’ की उत्पत्ति हुई। तब चण्डी ने काली से कहा मैं इस महाबलशाली दैत्य पर प्रहार करूं तो तुम इसके रक्त को पृथ्वी पर गिरने मत देना। तब काली अपने रौद्ररूप में प्रकट होकर हाथ में खप्पर लेकर रक्तबीज के समस्त रक्त को उसमें समेटती रही। जब खप्पर भर जाता तो काली उसका पान कर लेती। जब चण्डी अनेकों राक्षसों को एक ही प्रहार से मारने लगी तो काली ने भी क्रोधोन्मत्त होकर अपनी जिह्वा सारी रणभूमि में फैला दी और रक्तबीज के शरीरों से गिरने वाले रक्त को भूमि पर जाने से पूर्व ही पी जाती। इस प्रकार शस्त्रों के प्रहार से घायल और रक्तरहित होकर रक्तबीज पृथ्वी पर गिर पड़ा। उस रक्तबीज के भूमि पर गिरते ही देवता अत्यन्त प्रसन्न हुए और मातृ-शक्तियां और योगिनियां उन महाअसुरों का रक्त पी-पीकर मदोन्मत्त होकर नृत्य करने लगीं।

श्री दुर्गा शप्तशती का आठवां अध्याय


ऋषिरुवाच

ॐ चण्डे च निहते दैत्यै मुण्डे च विनिपातिते।
बहुलेषु च सैन्येषु क्षयितेष्वसुरेश्वरः।।

ऋषि बोले—
असुर चण्ड तथा असुर मुण्ड को बहुत बड़ी दैत्य सेना के साथ मर जाने से असुरेश्वर—

ततः कोपपराधीनचेताः शुम्भः प्रतापवान्।
उद्योगं सर्व सैन्यानां दैत्त्यानामादि देशह।।

प्रतापवान शुम्भ ने अत्यन्त क्रोध कर अपनी सब दैत्य सेना को लड़ने की आज्ञा देकर

अद्य सर्वबलैर्दैत्याः षडशीतिरुदायुधाः।
कम्बूनां चतुरशीतिर्निर्यान्तु स्वबलैर्वृताः।।

(शुम्भ ने कहा)—आज 86 उदायुध (जल्दी लड़ने वाले) दैत्य सेनापति और कंबु (शंखाकृति) के 84 असुर अपनी-अपनी सेना के साथ युद्ध में जायं।
कोटि वीर्याणि पञ्चाशदसुराणां कुलानि वै।
शतं कुलानि धौम्राणां निर्गच्छन्तु ममाज्ञया।।

कोटिवीर्य नामक असुरों के 50 कुल धूम्र (कंजे) कुल में पैदा हुए 500 कुल मेरी आज्ञा से लड़ाई को जाएं।

कालका दौर्हृदा मौर्याः कालकेयास्तथासुराः।
युद्धाय सज्जा निर्यान्तु आज्ञया त्वरिता मम।।

कालका, दुर्हृद, मयूरवंशी और काल वंश में उत्पन्न हुए असुर मेरी आज्ञा से जल्दी से तैयारी कर लड़ने को जायं।

इत्याज्ञाप्यासुरपतिः शुम्भो भैरव शासनः।
निर्जगाम महासैन्य सहस्रैर्बहुभिर्वृतः।।

इस प्रकार असुर पति शुम्भ भयंकर शासन करने वाला आज्ञा देकर कई सहस्त्र महासेना (छंटी हुई) साथ लेकर लड़ने को निकला।

आयांतं चण्डिका दृष्ट्वा तत्सैन्यमतिभीषणम्।
ज्यास्वनैः पूंरयामास धरणीगगनान्तरम्।।

चण्डिका ने आती हुई भीषण सेना को देखकर धनुष की टंकार से पृथ्वी और आकाश को पूरित गुंजायमान कर दिया।

ततः सिंहो महानादमतीव कृतवान् नृप।
घण्टास्वनेन तन्नादानंम्बिका चौपबृंहयत्।।

हे राजन ! सिंह ने भी अति गर्जना की, तब चण्डिका ने अपना घण्टा बजाकर द्विगुण शब्द कर दिया। इन शब्दों से काली का मुंह बढ़ गया।



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