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नारी विमर्श >> भैरवी (अजिल्द)

भैरवी (अजिल्द)

शिवानी

प्रकाशक : राधाकृष्ण प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2009
पृष्ठ :121
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 3737
आईएसबीएन :9788183610698

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पति-व्रता स्त्री के जीवन पर आधारित उपन्यास


फिर अपने विषधर पुत्र को दूध पिलाकर क्या यहीं सुलाने लाएगा वह नंगा अवधूत? और यदि अपनी अंगारे-सी दहकती आँखें चमकाता, उलझी जटाएँ फैलाता वह अपना दुर्दान्त चेहरा विवश पंगु असहाय पड़ी चन्दन के चेहरे से ही सटा बैठा तब? क्या कर लेगी वह? कंठहार से कंठ, का स्वामी तो कुछ कम भयावना नहीं था। उसका चेहरा वह ठीक से नहीं देख पाई थी। उसने देखी थीं केवल लाल आँखें और भस्मपुती छाती। गुफा में दूसरा द्वार होता तो वह अपने समस्त मनोबल की बैसाखियाँ टेकती भाग निकलती। पर जिस द्वार से वह गया था, उससे वह जाती भी तो शायद अवधूत से ही टकरा जाती।

हवा के अप्रत्याशित झोंके-सा वह लौटा। हाथ में कटोरा और उसके गले में लिपटा लाड़ला। उसने एक बार भी चन्दन की ओर नहीं देखा। दूध का कटोरा खाली होते ही उसने उस तक्षक की चिकनी मोटी देह ऐसे यत्न से उतारी मानो हीरों का हार उतार रहा हो। फिर इस बहुमूल्य आभूषण को उसने तहाकर टोकरी में रख दिया और तब चन्दनं ने एक आश्चर्यजनक नाटकीय घटना देखी। अवधूत झुका, टोकरी में कुंडली मारे तक्षक ने सिर उठाया। अपनी जीभ स्वामी के अधरों तक लाकर वह फिर टोकरी में दुबक गया। मानव और उसके जन्म-जन्मान्तर के शत्रु का मैत्री-चुम्बन देखकर चन्दन की विस्फारित दृष्टि पल-भर को स्थिर बन गई। वह एकटक उस औघड़ संन्यासी को देखती रही। संन्यासी ने टोकरी को बाँधा और धरा पर गड़े त्रिशूल के सम्मुख पालथी मारकर बैठ गया। फिर क्षण-भर में उसने इधर-उधर बिखरी हुई अव्यवस्थित लकड़ियों का त्रिकोण बना डाला। एक दीर्घ स्थायी धूनी की सृष्टि कर पूरे कमरे को धुएँ से भर दिया।

संन्यासी की अब तक अस्पष्ट आकृति सहसा खिड़की खुलने पर स्पष्ट हो उठी। अंग-भर में पुती भस्म, आश्चर्यजनक रूप से लम्बा कद और बैठने की अडिग मुद्रा देखकर लग रहा था, जैसे धूल-गर्द के अम्बार से ढकी कोई धातव मूर्ति हो। कमरे में रहने पर भी वह जैसे बाह्य ज्ञान से शून्य था, बिस्तर पर पड़ी सुन्दरी चन्दन की उपस्थिति की ओर से सर्वथा उदासीन। गम्भीर चेहरा और उस गाम्भीर्य को चीरकर पूरे कमरे में फैल रही एक तेजोमय दीप्ति। चन्दन एकटक उसे देखती जा रही थी। कैसा शान्त चेहरा लग रहा था, न तीक्ष्णता, न क्षण-भर पूर्व चरन के प्रति उठ रहा क्रोध का भभका। अद्भुत बाल-सुलभ स्निग्ध हँसी से रंगी भस्मपुती आँखें और उसी भस्म के मैसेकरा से रँगे हुए लड़कियों के-से रेशमी बाल। किसे देख रहा था वह पागल योगी? अपने दुलारे तक्षक को, राख से ठंडी धूनी को या त्रिशूल के नीचे पड़े नर-कंकाल के स्तूपीकृत पिरैमिड को?

उस निर्विकार नग्नता को देखकर भी चन्दन को भय नहीं हुआ। बीचबीच में वह अपने लम्बे चिमटे से बुझती धूनी की राख को उखेलता और अपनी शिशु-सुलभ हँसी से चमकते हुए चेहरे को नीचे झुका लेता। वह हँस रहा है, यह चन्दन उसकी हिलती चौड़ी पीठ को देखकर ही समझ लेती, पर कौन-सी स्मृति उसे ऐसे गुदगुदा रही थी? अचानक एक झटके से वह जलती धूनी में चिमटे का कड़ा प्रहार कर उठ गया। चिमटे की चोट से जलती धूनी के मुट्ठी-भर अंगारे पूरे कमरे में फुलझड़ी की बौछार से बिखर गए और राख-मिश्रित धुएँ के गुब्बारों से चन्दन का दम घुटने लगा। उसने आँखें बन्द कर लीं। पता नहीं, अब यह पागल बाबा क्या कर बैठेगा! आँखें खुली तो धुआँ पूरे कमरे में फैलता द्वार से निकलने लगा था और उसी विलीयमान धूम्ररेखा को चीरती चरन हाथ में पूजा की थाली लिए बढ़ रही थी।

"लो, आज तुम्हारे भाग्य से प्रसादी में खूब सारे केले चढ़े थे।" तीन-चार केले चरन ने उसकी चारपाई पर डाल दिए। फिर वह उकसाई गई धूनी को देख घबरा गई, “हाय राम! गुरु क्या आज अबेला ही लौट आए? लगता है, आज श्मशान में कोई अभागा फुकने नहीं आया। और जरूर इस कलमुँहे ने मेरी नालिश की होगी। क्यों है न?" बन्द पिटारी की ओर उसके इंगित को चन्दन समझ गई।

"इसके हिस्से का दूध तुमने मुझे क्यों पिला दिया, चरन?" चन्दन के पास ही थाल रखकर, चरन धम्म से बैठ गई।

"अच्छा तो गुरु महाराज लौट आए। अब वह लौट आए हैं तब माया दीदी भी आती ही होंगी। उन्हें तो उनके आने और जाने की खबर जैसे हवा से मिल जाती है। फिर तुम्हारे पास मुझे वह बैठने देगी? अच्छा अब बताओ जी, तुम रेलगाड़ी से खुद ही कूद गई थीं या किसी ने धकेल दिया?"

कदली-ग्रास सहसा चन्दन के गले में अटक गया। उसे लगा, वह इस वन-मृगी-सी आँखोंवाली सरल वनकन्या के सम्मुख मिथ्या भाषण नहीं कर पाएगी। पर वह कुछ उत्तर देती, इससे पहले ही त्रिशूल के धुंघरू छमकाती माया दीदी द्वार पर खड़ी हो गई।

"मैं जानती थी, खूब जानती थी।" माया दीदी ने अपने पुरुष-कंठ-स्वर की वज्रहुंकार से पूरी गुफा गुंजा दी, “यह तुम्हारे पास बैठी बातें मार रही होगी। आज मंगलवार है, मन्दिर में एक ही बजे भीड़ जमा हो जाएगी-बुहार आई या नहीं?"

अप्रसन्न, अबाध्य मुद्रा में चरन हाथ बाँधे बैठी रही। वह कब की मंदिर हो आई है, यह सब उसने नहीं कहा।

"भूखी-प्यासी दो मील चलकर आ रही हूँ।" माया दीदी कहने लगी, "पर इस अभागी के रहते मुझे इतना भी तो सुख नहीं कि यह मुझसे इतना तो पूछ ले, 'दीदी, तुमने कुछ खाया या नहीं?' इसी से चलने लगी तो बहन ने साथ चबैना बाँध दिया। कहने लगी, 'दीदी, वह कलूटी तो मुझे पानी को भी नहीं पूछेगी-तेरा खाया-पिया न निकाल ले, वही बहुत है।' "

फिर उसने अपनी पुष्ट जाँघों पर गेरुआ पोटली धरकर, मोटी-मोटी चने की रोटियाँ निकाल लीं, बीच-बीच में अचार की फाँक चाटती, वह एक के बाद एक मोटी रोटियों की गुंजिया-सी बनाकर उदरस्थ करने लगी तो चन्दन की क्षुधा अचानक हृदयहीन शत्रु बनकर उसके जिह्वाग्र पर चढ़ आई। उसके जी में आया कि वह उसके हाथ से रोटी छीनकर खा ले। शायद उसकी लोलुप क्षुधातुर दृष्टि की याचना वैष्णवी ने भी देख ली।

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