सर्वपल्ली डॉ राधाकृष्णन - एम. आई. राजस्वी Sarvpalli Dr. Radhakrishnan - Hindi book by - M. I. Rajasvi
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सर्वपल्ली डॉ राधाकृष्णन

एम. आई. राजस्वी

प्रकाशक : मनोज पब्लिकेशन प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :80
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 3929
आईएसबीएन :81-310-0179-2

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विश्व प्रसिद्ध दार्शनिक,शिक्षाविद्,शिक्षक एवं भारत के द्वितीय राष्ट्रपति की जीवनगाथा...

Sarvpalli DR. Radhakrishanan

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

दुनिया जितनी छोटी होती जा रही है मनुष्य के मन को उतना विशाल होना चाहिए, अन्यथा संघर्ष होंगे। हम युद्धों को परिस्थितियों से पैदा होने वाले नहीं मान सकते। वे ईश्वर के काम नहीं हैं। आज हमारे सामने एक चुनौती है और अगर हमें सभ्यता को विकसित करना है, तो उस चुनौती का पूर्ण रूप से सामाना करना होगा।

हमें अपने विचार और जीवन की धुरी को बदलना होगा।
आज हमें विनय की आवश्यकता है। हमें इस रवैये को त्यागना होगा कि हम सही रास्ते पर हैं
और हमारे विरोधी गलत रास्ते पर।

डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन


5 सितंबर को प्रतिवर्ष देश-भर में शिक्षक दिवस मनाया जाता है। क्या आप जानते हैं कि शिक्षक दिवस का आयोजन किस उपलक्ष्य में किया जाता है ? शिक्षक दिवस का आयोजन देश के महान दार्शनिक और उच्च कोटि के शिक्षाविद डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिन की स्मृति के रूप में मनाया जाता है।

डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन न केवल उच्च कोटि के शिक्षाविद् ही थे, बल्कि वे महान राजनेता भी थे। वे स्वत्रन्त्र भारत के प्रथम उपराष्ट्रपति बनाए गए। डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद के बाद 1962 में उन्हें देश का द्वितीय राष्ट्रपति होने का गौरव मिला।

5 सितंबर, 1888 को चेन्नई से लगभग 200 किलेमीटर उत्तर-पश्चिम में स्थित एक छोटे से कस्बे तिरुताणी में डॉक्टर राधाकृष्णन का जन्म हुआ था। उनके पिता का नाम सर्वपल्ली वी. रामास्वामी और माता का नाम श्रीमती सीता झा था। रामास्वामी एक गरीब ब्राह्मण थे और तिरुताणी कस्बे के जमींदार के यहाँ एक साधारण कर्मचारी के समान कार्य करते थे।

श्री रामास्वामी के नाम के साथ सर्वपल्ली जुड़ने का भी एक कारण है। दरअसल, उनके पूर्वज पहले ‘सर्वपल्ली’ नामक अपने पुश्तैनी ग्राम में निवास करते थे, जो बाद में वहाँ से आकर उत्तरी अर्काट जिले के तिरुताणी नामक कस्बे में बस गए थे उन्होंने फिर भी अपने नाम के साथ ‘सर्वपल्ली’ लगाकर इसे पहचान के रूप में अपना लिया था।

डॉक्टर राधाकृष्णन अपने पिता की दूसरी संतान थे। उनके चार भाई और एक छोटी बहन थी छः बहन-भाईयों और दो माता-पिता को मिलाकर आठ सदस्यों के इस परिवार की आय अत्यंत सीमित थी। इस सीमित आय में भी डॉक्टर राधाकृष्णन ने सिद्ध कर दिया कि प्रतिभा किसी की मोहताज नहीं होती। उन्होंने न केवल महान शिक्षाविद के रूप में ख्याति प्राप्त की, बल्कि देश के सर्वोच्च राष्ट्रपति पद को भी सुशोभित किया।

ज्ञान और शिक्षा के प्रति डॉक्टर राधाकृष्णन के मन में अपार स्थान था। यहीं कारण था कि प्रथम से लेकर अंतिम कक्षा तक उन्होंने प्रथम श्रेणी ही प्राप्त की। ज्ञान और शिक्षा के इस मोह का स्पष्टीकरण 23 जनवरी, 1957 को कलकत्ता विश्वविद्यालय के शताब्दी समारोह में उपाधि वितरण के अवसर पर दिए डॉक्टर राधाकृष्णन के भाषण से स्पष्ट होता है-
‘‘बंगाल में अपने शासन के शुरू के पचास वर्षों में ईस्ट इडिया कंपनी ने आधुनिक शिक्षा-प्रणाली लागू करने की इच्छा नहीं की। एक बात यह थी कि उस समय का प्रमुख व्यक्ति वारेन हेस्टिंग्ज प्राचीन भारतीय ग्रंथों का सच्चा प्रशंसक था और उसने भारत की प्राचीन संस्कृति को पुनर्जीवित करने का प्रयत्न किया। भारत के तत्कालीन अंग्रेजी नेता भारतीयों के विश्वास में बाधा नहीं देना चाहते थे और इसलिए उन्होंने अपनी प्राचीन विधाओं के अध्ययन को प्रोत्सहान ईसाई मिशनरियों और डेविड हेयर तथा राजा राममोहन राय जैसे प्रगतिशील नेताओं से मिला। जब मैकाले सार्वजनिक शिक्षा-समित का अध्यक्ष बना, तब उसने फरवरी, 1935 में अपना प्रसिद्ध विवरण लिखा जिसमें भविष्य में भारतीयों को आधुनिक शिक्षा देने का निर्णय किया गया। लॉर्ड विलियम बैंटिक ने मैकाले के परामर्श को स्वीकार किया और यह निश्चय किया कि शिक्षा के लिए उपलब्ध धन विशेष रूप से अंग्रेजों के माध्यम से आधुनिक शिक्षा देने वाले स्कूलों और कालेजों को चलाने में व्यय किया जाना चाहिए। सार्वजनिक शिक्षा-विभाग 1855 में खोले गये विश्वविद्यालय में।

प्रारंभिक वर्षों में यह विश्वविद्यालय भारत के एक बड़े भाग बंगाल, बिहार, उड़ीसा, आसाम, संयुक्त प्रांत, मध्य प्रदेश, बर्मा और श्रीलंका के कॉलेजों की शिक्षा का नियंत्रण करता था। धीरे-धीरे नए-नए विश्वविद्यालय का क्षेत्र घट गया। जब विश्वविद्यालय शुरूआत में खोले गए, तब केवल परीक्षाएँ लेते थे। स्वर्गीय श्री आशुतोष मुखर्जी के सुप्रयत्नों का यह फल हुआ कि इस विश्वविद्यलय के अधीन कलाओं और शुद्ध तथा व्यावहारिक विज्ञानों के स्नातकोत्तर विभाग खोले गए। इस विश्वविद्यालय की पहली मुहर में ‘विद्या की प्रगति’ शब्द अंग्रेजी में अंकित थे और यही इसका मुख्य लक्ष्य बन गया।
यह विश्वविद्यालय महान वैज्ञानिक और विख्यात विद्वान पैदा कर चुका है। हमारे समय में रायल सोसायटी के जो नौ फेलो चुने गए, उनमें से पाँच, जगदीश बोस, रमन साहा, कृष्णन और महालानोबिस इसी विश्वविद्यालय में काम करते थे। दो नोबल पुरस्कार विजेता, रवीन्द्रनाथ टैगोर साहित्य में और चंद्रशेखर वेंकटरमन भौतिक-विज्ञान में इस विश्वविद्यालय से संबन्धित थे। इसके कई विद्वान और वैज्ञानिक अपने विचारों की शुद्घता और विद्या-प्रेम से साहित्य, कला, विज्ञान और विद्वत्ता में महत्त्वपूर्ण अभिवृद्घि कर चुके हैं।

अगर हम दुनियाँ के इतिहास को देखे, तो पाएँगे कि सभ्यता का निर्माण उन महान ऋषियों और वैज्ञानिकों के हाथों से हुआ है, जो स्वयं विचार करने की सामर्थ्य रखते हैं, जो देश और काल की गहराइयों में प्रवेश करते हैं, उनके रहस्यों का पता लगाते हैं और इस तरह से प्राप्त ज्ञान का उपयोग विश्व श्रेय या लोक-कल्याण के लिए करते हैं। विश्वविद्यालयों की मनुष्य की अजेय आत्मा में आस्था होती है और उन्हें चाहिए कि वे विद्वानों और साहित्यकारों को बिना बाधा के अध्ययन-अनुशीलन की पूरी सुविधा दें। उन्हें चाहिए कि वे प्रत्येक सत्यान्वेषण को वहां तक ले जाने का पूरा अवसर दें, जहाँ तक उसकी बुद्धि कल्पना और ईमानदारी उसे ले जा सकती है। कोई भी आजादी तब तक सच्ची नहीं होती, जब तक उसे विचार की आजादी प्राप्त न हो। किसी भी धार्मिक विश्वास या राजनीति सिद्धांत को सत्य की खोज में बाँधा नहीं देनी चाहिए।

पिछले सौ वर्षों के अंदर इस विश्वविद्यालय ने इस देश के निवासियों के लिए विचारों की तरफ की नई दुनिया खोली है तथा नए दृष्टिकोणों का विकास करने, महान उद्देश्यों को सहारा देने, विचार और जीवन के नए आंदोलनों को पैदा करने और राजनीतिक और आर्थिक, धार्मिक और सामाजिक स्वतंत्रता को फैलाने में मदद की है। हमारे देश की जो सांस्कृतिक जागृति पिछले सौ वर्षों के अन्दर हुई है, वह आधुनिक विचार और आलोचना का हमारी प्राचीन विद्या पर प्रभाव पड़ने का फल है। जब हम विद्यार्थियों को एक विश्वविद्यालय में शिक्षा देते हैं। जब हम उनको जिज्ञासु और आलोचक बनाते हैं, तब स्वाभाविक है कि वे राजनीतिक स्वत्रन्तता और लोकतंत्रीय शासन की माँग करेंगे। भारत आने से पूर्व मैकाले ने हाउस ऑफ कामन्स में कहा था–

‘क्या हम भारतवासियों को अज्ञानी बनाए रखना चाहते हैं ताकि वे अधीर बने रहें ? या हम सोचते हैं कि हम महत्वाकांक्षा जगाए बिना उनको ज्ञान दे सकते हैं ? या हमारा मतलब है कि हम महत्वाकांक्षा जगाएँ और उनको निकालने के लिए कोई वैध रास्ता न दें ? यह संभव है कि भारतीय जनता का मस्तिष्क हमारी प्रणाली से विकसित हो और यहां तक विकसित हो कि हमारे काबू से बाहर निकल जाए। संभव है कि अच्छे शासन के द्वारा हम अपनी प्रजा को इतनी शिक्षा दें कि उसके अंदर अच्छे शासन की योग्यता आ जाए, संभव है कि यूरोरीय ज्ञान की शिक्षा प्राप्त करके भविष्य में कभी वे यूरोपियन संस्थाओं की मांग करने लगें। मैं नहीं जानता कि ऐसा दिन कभी आएगा। जब भी हम वह आएगा वह अंग्रेजी इतिहास का सबसे गौरवपूर्ण दिन होगा।’ राजदंड हमारे हाथ से जा सकता है। हमारी विजय अस्थिर हो सकती है लेकिन एक विजय ऐसी भी होती है जो कभी हारती नहीं है। एक साम्राज्य ऐसा भी है, जो क्षय के सभी कारणों से मुक्त होता है। ऐसी विजय बर्बरता के ऊपर ज्ञान की शांतिपूर्ण विजय है। ऐसा साम्राज्य हमारी कलाओं और हमारी नैतिकता का, हमारे साहित्य और हमारे कानूनों का साम्राज्य है।

जब हम देश के नवयुवकों को आजादी की शिक्षा देते हैं। उन्हें यह सिखाते हैं कि शासक का कर्तव्य शासित की राय लेकर शासन करना है, तब अवश्य ही वे अधीनता से निकलकर आजादी की माँग करेंगे। इस विश्वविद्यालय के प्रथम स्नातकों में से एक बंकिमचन्द्र चटर्जी ने हमें ‘वन्दे मातरम्’ का महान गीत दिया।

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