भक्त शिरोमणि ध्रुव - एम. आई. राजस्वी Bhakt Shiromani Dhruv - Hindi book by - M. I. Rajasvi
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भक्त शिरोमणि ध्रुव

एम. आई. राजस्वी

प्रकाशक : मनोज पब्लिकेशन प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :76
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 3930
आईएसबीएन :81-310-0231-4

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अचल-अटल शब्दों का पर्याय बनने वाले विष्णु भक्त बालक की अपूर्व कथा...

Bhakat Shiromani Dhurva a hindi book by M. I. Rajasvi - भक्त शिरोमणि ध्रुव - एम. आई. राजस्वी

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

भगवद् भक्ति द्वारा अचल-अटल शब्दों का पर्याय बनने वाले एक बालक की पावन गाथा।
‘‘प्रिय भक्त ध्रुव ! हम तुम्हें राजा उत्तानपाद की गोद और राजसिंहासन से भी श्रेष्ठ.....सर्वश्रेष्ठ गोद और परमलोक का परमपद प्रदान करते हैं।
‘‘प्रिय ध्रुव ! तुम्हें प्रदान किया जाने वाला परलोक कल्प के अंत में भी अमर है। इसे आज तक कोई प्राणी प्राप्त नहीं कर पाया। यहां तक कि बड़े-बड़े ऋषि-मुनि भी इसकी प्राप्ति के लिए सदैव प्रयत्नशील रहते हैं....और तो और सप्तर्षि भी इस लोक की परिक्रमा करते रहते हैं। इसी लोक का परमपद हम तुम्हें प्रदान करते हैं। यह लोक तुम्हारे नाम पर ध्रुव लोक के नाम से जाना जाएगा और तुम्हारा राज्य सदैव अचल और अटल रहेगा।’’

भक्त शिरोमणि ध्रुव


ऋतुराज वसंत के आगमन पर पेड़-पौधे रंग-बिरंगे पुष्पों के अलंकरणों से सजने लगे थे। पक्षी मधुर कलरव करके वसंत के आगमन पर प्रसन्नता प्रकट कर रहे थे। कोयलों की कूक, पपीहों की पीन-पुकार और मयूरों के नृत्य से उद्यान में समा बंध गया था। उद्यान में चहुं ओर एक अनोखी छटा बिखरी हुई थी।
उद्यान के स्वर्ण-सज्जित झूले पर महाराज उत्तानपाद महारानी सुनीति के साथ बैठे हुए वहां के सुहावने समां ले रहे थे। राजमहल से उद्यान के लिए महारानी के साथ निकलते हुए महाराज उत्तानपाद का चित्त बड़ा प्रसन्न था। कुछ राज्य की सुख-समृद्धि और कुछ ऋतु की बहारों का प्रभाव महाराज के तन-मन को आह्लादित कर रहा था।
मोती-माणिक्यों और विभिन्न प्रकार की बहुमूल्य धातुओं से सजे झूले पर झूलते महाराज वातावरण की मादकता में खो गए थे, जबकि महारानी सुनीति के मुख पर खिन्नता के भाव बिखरे हुए थे। महाराज और महारानी दोनों एक ही झूले पर एक साथ बैठे हुए थे, किंतु दोनों के मन में अलग-अलग तरह के विचार उठ रहे थे।

‘‘महारानी !’’ वातावरण की मादकता में डूबे महाराज उत्तानपाद कह उठे, ‘‘इस उद्यान में चारों ओर कितना मोहक सौंदर्य बिखरा हुआ है ! इच्छा होती है कि राजमहल त्यागकर इसी उद्यान में निवास किया जाए।’’
‘‘महाराज !’’ अनमने ढंग से महारानी बोली, ‘‘यह उद्यान सदा सर्वदा के लिए न सही, आज की रात्रि का निवास तो हो ही जाएगा।’’
‘‘इस रमणी घाटी की रमणीयता को बाल्यकाल से ही हमें अपनी ओर आकर्षित करती रही है और रमणी घाटी का यह उद्यान तो जैसे स्वर्गलोक में इंद्रदेव का निवास ही है।’’
‘‘फिर भला इस उद्यान का सौंदर्य आपको आकर्षित करे भी तो क्यों नहीं ?’’

महाराज उत्तानपाद ने महारानी की बात का उत्तर केवल मुस्कराकर दिया।
अभी महाराज और महारानी में वार्तालाप चल ही रहा था कि तभी एक सेवक उनके सम्मुख उपस्थित हुआ। वह महाराज के सम्मुख शीश झुकाकर बोला, ‘‘महाराज की जय हो ! सेवक अपनी बात प्रस्तुत करने की आज्ञा चाहता है।’’
‘‘कहो सेवक !’’ महाराज उत्तानपाद गंभीर स्वर में बोले, ‘‘क्या बात है ?’’

‘‘देव ! आज आपकी आज्ञा से रमणी घाटी में काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया है।’’ सेवक सम्मानित स्वर में बोला, ‘‘और आयोजन पूर्ण हो चुका है। आमंत्रित गण आपके पधारने की प्रतीक्षा कर रहे हैं।’’
‘‘क्या काव्य गोष्ठी में राज्य-भर से कविगण पधार चुके हैं ?’’
‘‘जी महाराज !’’ सेवक ने बताया, ‘‘सभी लोग आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं।’’

‘‘ठीक है, तुम चलो और उपस्थित जनों से कहो कि उन्हें अधिक समय तक प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ेगी।’’ महाराज उत्तानपाद ने सेवक से यह कहा तो वह शीश झुकाकर उद्यान से चला गया।
‘‘महारानी !’’ सेवक के जाने के बाद महाराज उत्तानपाद बोले, ‘‘आज रमणी घाटी में वार्षिक काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया है। प्रतिवर्ष की तरह रमणी घाटी की अमावस्या आज कविगणों की कविताओं से जगमगा उठेगी। इस काव्य गोष्ठी में राज्य के लोकप्रिय कवि कौमुद भी पधारे हैं। आपको भी महाकवि कौमुद की कविताएं पसंद हैं न ?’’ ‘‘जी महाराज ! पसंद तो हैं, किंतु.....’’
‘‘किंतु क्या ?’’
‘‘आज मेरी इच्छा किसी भी प्रकार के आयोजन में जाने की नहीं हो रही है।’’
‘‘क्यों भला ?’’
‘‘मेरा मन कुछ उद्विग्न हो रहा है।’’
‘‘यह उद्विग्नता कैसी है महारानी ?’’
‘‘महाराज ! मन की व्यथाएं जब घनीभूत होकर हृदय को कचोटने लगती हैं तो मन उद्विग्न होने लगता है।’’
महाराज उत्तानपाद क्षण-भर तक कुछ न बोले क्योंकि वे महारानी की व्यथाओं को भली प्रकार जानते थे, किंतु उनकी विवशता यह थी कि वे चाहकर भी कुछ नहीं कर पाते थे। महारानी के मन की व्यथा को विस्मृत करने के लिए महाराज ने उन्हें इच्छा न होते भी काव्य गोष्ठी में चलने के लिए जोर दिया।

महाराज महारानी के साथ काव्य गोष्ठी में चले आए। काव्य गोष्ठी में एक ऊंचा मंच बना हुआ था। मंच पर आगे की ओर कविगण बैठे हुए थे और उनसे कुछ पीछे एक ऊंचा आसन था, जो महाराज और महारानी के लिए आरक्षित था। मंच के सामने राज्य के गणमान्य श्रोता और अन्य प्रजाजन बैठे हुए थे।
रात्रि का दूसरा पहर चल रहा था। भोजनादि से निवृत्त होकर कविगण मंच पर और प्रजाजन श्रोताओं के रूप में काव्य गोष्ठी स्थल पर आ जमे थे। जब महाराज और महारानी ने आसन ग्रहण किया तो कविगण और श्रोताओं ने करतल ध्वनि की।
संपूर्ण सभामंडल प्रज्वलित मशालों के प्रकाश से जगमगा रहा था। यह अंधकारपूर्ण अमावस्या की रात्रि थी, किंतु मशालों के प्रकाश से सभामंडप में दिन जैसा उजाला फैला हुआ था। महाराज के संकेत पर काव्य गोष्ठी का शुभारंभ हुआ। सर्वप्रथम सरस्वती वन्दना से काव्य पाठ आरंभ हुआ। इसके बाद एक-एक कवि को काव्य पाठ करने का अवसर दिया गया।
कवि आनंदी ने अपनी कविता ‘वसंत का आगमन’ में प्रकृति के अनोखे रूप का वर्णन करते हुए कविता- पाठ किया-

प्रकृति की मनोरम छटा,
पतझड़ का मौसम हटा;
नन्हीं-नन्हीं कोंपलों से निकलने लगीं।
फूल खिलने लगे,
शूल बढ़ने लगे,
हरियाली की समां बंधने लगी।
मयूर नृत्य कर उठा,
बुलबुल-गान चल उठा;
चारों ओर मदहोश सुरभि छाने लगी।
पपीहों की पीन पुकार,
कोयलों की कूक भी;
उपवन में गूंजने लगी।
वसंत आ गया-वसंत आ गया,
शोर मच उठा;
पशुओं की सभा भी होने लगी।

कवि आनंदी के कविता-पाठ पर श्रोताओं ने खूब करतल ध्वनि की। उनके बाद संचालक ने कवि कल्याण को कविता-पाठ के लिए आमंत्रित किया।
कवि कल्याण ने महाराज-महारानी, समस्त कविगण और गणमान्य श्रोताओं का अभिवादन करते हुए कविता-पाठ आरंभ किया-

शाम-सवेरे पंछी सारे,
क्या कुछ कहते हैं !
ये सब कुछ तेरा है।
हम सबको एक दिन उड़ जाना है,
ये जीवन दो दिन का रैन बसेरा है।
क्या तेरा है, क्या मेरा है !
यही रह जाएंगे ये सब नारे।
शाम-सवेरे पंछी सारे....

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