राजा हरिशचन्द्र - एम. आई. राजस्वी Raja Harishchandra - Hindi book by - M. I. Rajasvi
लोगों की राय

महान व्यक्तित्व >> राजा हरिशचन्द्र

राजा हरिशचन्द्र

एम. आई. राजस्वी

प्रकाशक : मनोज पब्लिकेशन प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :94
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 3932
आईएसबीएन :81-8133-626-7

Like this Hindi book 7 पाठकों को प्रिय

195 पाठक हैं

जिसने मृत्यु समान विपत्ति में भी अपना धर्म नहीं छोड़ा ऐसे ही महापुरुष की गाथा...

Raja harishchandra

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

स्वप्न और सत्य के बीच की रेखा को महाराज हरिश्चंद्र ने अस्वीकार कर दिया था। महर्षि विश्वामित्र को राजा ने स्वप्न में अपना राज्य दानस्वरूप दिया था, जिसे महर्षि के दरबार में आने पर उन्होंने स्वीकार कर लिया। और महर्षि को राज्य दे अपने परिवार के साथ तीनों लोकों से न्यारी नगरी वाराणसी चले गए। अपने दिए वचन को निबाहने वाला उन जैसा न कोई हुआ, न ही कोई होगा।

हरिश्चंद्र ने डबडबाई आंखों से अपनी प्रिय पत्नी तारा की ओर देखा। उस समय बालक रोहिताश्व चलते-चलते बुरी तरह थककर चूर हो गया था। उसने कुछ यात्रा तो पैदल की थी और कुछ अपने पिता हरिश्चंद्र के कंधों पर बैठकर...। तीनों प्राणियों पति-पत्नी और पुत्र के पैरों से रक्त बहने लगा था। फिर भी उन्होंने अपनी यात्रा जारी रखी। काशी नगरी की सीमा पर आकर जब वे आराम करने बैठे तो रोहिताश्व मां की गोद में पड़ते ही सो गया।
यह वही राज परिवार था, जिसने कभी रथ, बग्घी घोड़े और हाथी के बिना इतनी लंबी यात्रा न की थी, वह भी नंगे पांव !
‘‘तारा ! कमजोरी के कारण यह घड़ा मुझसे उठ नहीं पा रहा है...थोड़ा-सा सहारा लगाकर यह घड़ा मेरे सिर पर रखवा दो।’’

‘‘प्राणनाथ। मेरे लिए भला यह किस प्रकार संभव है ? मैं एक वैश्य की दासी हूं और आप शूद्र के दास...यदि मैंने आपके घड़े को हाथ लगाया तो मेरा धर्म भ्रष्ट हो जाएगा।’’
‘‘हाँ तारा ? तुम ठीक कहती हो।’’ हरिश्चंद्र गंभीर स्वर में बोले, ‘‘मेरे घड़े को हाथ लगाकर निश्चय ही तुम्हारा धर्म भ्रष्ट हो जाएगा, मगर मुझे कोई ऐसा उपाय नहीं सूझ रहा है, जिससे मैं यह घड़ा उठा सकूं।’’
‘‘प्राणनाथ ! यदि आप पीठ तक पानी में प्रवेश कर जाएं तो बिना किसी सहायता के स्वयं ही घड़ा उठा सकते हैं।’’
‘‘प्राणनाथ ! मेरे पास तो कुछ भी नहीं है। मैं श्मशान घाट का कर कहां से दूं ?’’
‘‘इस बारे में मैं कुछ नहीं कह सकता तारा ! मैं भी विवश हूं।’’

‘‘...मगर यह आपका भी तो पुत्र है। इसके प्रति भी तो आपका कोई कर्तव्य है। ’’
‘‘तारा ! हमारे संबंध तो काशी के बाजार में बिक गए थे। अब तो केवल उन संबंधों की छाया ही शेष है।’’
तारा अपने पति के स्वभाव को जानती थी, इसलिए वह विवश दुखियारी नारी श्मशान घाट में चिता पर लेटे अपने पुत्र की लाश को छोड़कर भिक्षाटन के लिए निकल पड़ी।

‘‘सत्यवादी हरिश्चंद्र ! तुम्हारे ऊपर जो विपदाएं आईं, जो कष्ट आए, वह सब मेरे द्वारा रचा गया जाल था।’’ महर्षि विश्वामित्र बोले, ‘‘वास्तव में मैं तुम्हारी परीक्षा लेना चाहता था, मैंने देवलोक में महर्षि वशिष्ठ से तुम्हारे सत्य धर्म की बड़ी चर्चा सुनी थी-मैं देवराज इंद्र की सलाह पर तुम्हारी परीक्षा लेने चला आया। तुम परीक्षा में सफल हुए और तुम्हारे सत्य धर्म के सामने मैं हार गया। जिसके सत्य धर्म की चर्चा देवलोक में भी होती है उसी सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र को मेरा आशीर्वाद है कि इस पृथ्वीलोक पर उसके सत्य-धर्म की चर्चा युगों-युगों तक होती रहेगी।’’



प्रथम पृष्ठ

अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book